वाराणसी। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी समारोह के अंतर्गत राजकीय पुस्तकालय के सहयोग से साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में बुधवार को राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार के सभागार में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा विषयक श्रृंखलाबद्ध व्याख्यानमाला आयोजित हुआ। जिसके द्वितीय पुष्प के रूप में तेग अली तेग के समग्र योगदान पर प्रो. प्रकाश उदय ने कहा कि तेग अली भोजपुरी के पहले गजलगो तो हैं ही, उन्हें गजल और भोजपुरी दोनो को एक दूसरे के काबिल बनाने का भी श्रेय है। काशी अपनी आवाज, अपने अंदाज सब कुछ के साथ उनकी गजलगोई में समाई हुई है। स्वयं भारतेंदु उनके काव्य-बल के कायल रहे हैं। जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और ईश्वरचंद्र सिन्हा की भोजपुरी कहानी ‘भैरवी के साज’ बहुत कुछ तेग अली की कविताई से ही प्रेरित है। नजाकत और नफासत के लिए ख्यात गजल को तेग अली ने अपनी काशिका के जरिए एक खास तरह की दबंगई और देहातीपन से जोड़ते हुए उसे एक अलग ही आस्वाद से संपन्न किया। जगन्नाथ दास रत्नाकर के अवदान परबोलते हुए प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि जगन्नाथदास रत्नाकर खड़ी बोली हिंदी के आरंभिक महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं ।वह अपने ब्रजभाषा में रचित “उद्धव शतक” के लिए विशेष रूप से याद किए जाते हैं। रत्नाकर जी रीतिकालीन कविता और आधुनिक कविता के सेतु हैं। उनका उद्धव शतक ब्रजभाषा कविता का अंतिम प्रबंधात्मक काव्य है इसमें उन्होंने निर्गुण पर सगुण और ज्ञान पर प्रेम की विजय का उद्घोष किया है। उद्धव शतक कृष्ण काव्य परंपरा में इसलिए भी विशिष्ट है की इसमें भावुकता के साथ-साथ तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि भी है।
समारोह के अध्यक्षता करते हुए पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि तेग अली भारतेंदु काल के काशिका और भोजपुरी के कवि और लावनीकार थे। हिंदी के इतिहास ग्रंथों में इनका बहुत उल्लेख नहीं किया गया है। रत्नाकर जी ब्रजभाषा के अंतिम कवि हैं ।यह छायावाद का उत्कर्ष काल रहा है, पर उन्होंने ब्रजभाषा की परंपरा को अपनाया। रत्नाकर जी काशी की साहित्यिक परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज के आयोजन में दोनों वक्ताओं का समाहार करते हुए प्रो श्रद्धानंद ने कहा कि काशी के तेग अली, जगन्नाथ दास रत्नाकर आधुनिक काल के महत्वपूर्ण कवियों में है। एक काशिका का तो दूसरा ब्रज भाषा का। स्वागत डा.दयानिधि मिश्र, कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। कार्यक्रम का आरंभ शरद श्रीवास्तव की सरस्वती वंदना से हुआ।संयोजन कंचन सिंह परिहार ने किया
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सभी भारतीय भाषाओं को एकता सूत्र में बांधना राष्ट्रीय एकता हित में – 24 मई 2025
वाराणसी। विद्याश्री न्यास श्रीनिवास न्यास कार्यालय में विद्या निवास मिश्र शताब्दी वर्ष में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में पं जी की भारतीय भाषाओं से संदर्भित वैश्विक अवधारणा पर एक संगोष्ठी आयोजित किया गया। इसमें मराठी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक विश्वास पाटिल, इतिहास विद् एवं फिल्म निर्माता आशुतोष पाठक, एमजी निकम की विशेष उपस्थिति रही। संगोष्ठी में पधारे विद्धानों का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्र ने कहा कि पं विद्यानिवास मिश्र की भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अपनी मौलिक अवधारणा थी। वे चाहते थे कि हिंदी के साथ समस्त भारतीय भाषाएं एकता के सूत्र में बंधकर मजबूत बने। हम चाहते हैं कि विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष मे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के साथ संवाद करके इस विचार को मूर्तरूप दिया जाय। इसके पूर्व तमिल भाषा के विद्वानों के साथ संवाद हो चुका है। आज विश्वास पाटिल का स्वागत करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। विश्वास पाटिल ने कहा कि मुझे बताया गया है पंडित विद्यानिवास मिश्र जी की जब कर में दुर्घटना हुई उसे समय वह मेरा उपन्यास चंद्रमुखी पढ़ रहे थे यह सुनकर मैं बहुत भावुक हो गया और आज मैं पंडित जी की कर्मभूमि काशी के प्रणाम करने यहां आया हुआ हूं पार्टी ने कहा कि मैं महाराष्ट्र के सुदूर गांव में पैदा हुआ। वरूणा नदी के पास 18 साल की उम्र में मैंने एक लड़की की कहानी नाम से उपन्यास लिखा था और 28 वर्ष की उम्र में पानीपत लिखा, जो पानीपत की तीसरी लड़ाई पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है मूल मराठी में यह उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आज तक इसकी तीन 3 लाख से अधिक कृतियां बिक चुकी हैं इस तरह सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर लिखा गया उपन्यास महानायक की अत्यंत लोकप्रिय हुआ चंद्रमुखी उपन्यास पर मराठी में फिल्म बन चुकी है जिसकी बहुत अधिक प्रशंसा हुई श्री पाटिल ने बताया कि वह शिवाजी के जीवन को लेकर महा सम्राट नाम से उपन्यास लिख रहे हैं इसके तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं और इनका अंग्रेजी हिंदी और कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है मेरे उपन्यास मराठी के बाद सबसे अधिक हिंदी में अनुवादित होकर पढ़े गए प्रारंभ में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने विश्वास पाटिल के सृजन संसार का परिचय देते हुए कहा कि विश्वास पाटिल के ऐतिहासिक प्रयासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह पूर्ण ऐतिहासिक स्थलों पर स्वयं गए हैं और वहां से उन्होंने मूल स्रोतों की खोज की ।उनके उपन्यास इसी कारण काल्पनिक न होकर तथ्य परक हैं इन उपन्यास की दूसरी बड़ी विशेषता इनकी रोचक ता है यह कहीं भी पढ़ने में बोझिल नहीं होती है। आशुतोष पाठक ने कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी होते हुए पाटिल ने इतने वृहद आकर के उपन्यास का सृजन किया है। यह आश्चर्य की बात है। डा.प्रकाश उदय ने मराठी भाषा साहित्यकारों विशेषकर दलित कथाकारों पर अपने विचार रखे। संचालन प्रो उदयन मिश्र, धन्यवाद ज्ञापन डा.ॠतंधर मिश्र ने किया।
शैल अग्रवाल जी की कहानियाँ सहज रूप में प्रभावित करती हैं, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप – 26 मार्च 2025
साहित्यिक संघ, वाराणसी, राजकीय पुस्तकालय, वाराणसी एवं विद्याश्री न्यास द्वारा आयोजित इंग्लैण्ड की वरिष्ठ कवि-कथाकार शैल अग्रवाल के रचना-पाठ पर केन्द्रित संगोष्ठी में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ने कहा कि शैल जी गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान रूप से अधिकार रखती हैं। आप की शैली भिन्नात्मक और अभिव्यक्ति की गहन संवेदना से भरपूर है।
कवि-कथाकार शैल अग्रवाल का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा शैल जी बनारस की बेटी हैं। एक लम्बे समय से ब्रिटेन में रहते हुए भी इन्हें भारत और राष्ट्रभाषा हिन्दी से अगाध प्रेम है। लेखन के साथ-साथ संगीत, नृत्य एवं चित्रकला में इनकी गहन रुचि है। शैल अग्रवाल जी ने ब्रिटेन, न्यूयार्क, मारिशस के विश्व हिंदी सम्मेलन में सक्रिय सहभागिता के अलावा आपने देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों से कहानी-कविता व आलेख का पाठ किया है। आपको अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है।
प्रारंभ में शैल अग्रवाल जी ने अपनी चयनित कविताओं के पाठ के उपरान्त अपनी कविता सागर के मन मे, उलझन, एक और सच कविताओ का तथा जिजी कहानी का वाचन किया। ये कविताएँ मन को तलाशती सामाजिक विसंगतियों को उजागर करतीं तीन छोटी-छोटी कविताएं है। जिजी कहानी रिश्तों के ताने-बानेपर बुनी एक विभाजित वर्गों की कहानी, जो वक्त के महत्व को तो दर्शाती है! दिखाती है कैसे हजार नेक – नीयति के बाद भी कैसे जरा-सा आलस सामने वाले को पूरी तरह से तोड सकता है सबकुछ बिखेर सकता है क्योंकि अक्सर हमें दूसरे की जरूरत और मजबूरी का सही अनुमान नहीं लग पाता। पश्चाताप की अग्नि मे धधकती एक संवेदनात्मक कहानी।शैल जी के सृजनकर्म पर विचार व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डॉ. मुक्ता ने कहा कि बनारस में जन्मी और 55 वर्षों से ब्रिटेन में रह रहीं शैल अग्रवाल का रचना संसार बहुआयामी है। अपनी कहानियों में जहाँ वे एक ओर लोक से जुड़ती हैं, वहीं परम्परा के ग्राह्य तत्वों को स्वीकार करती हुई आलोचक दृष्टि से सम्पन्न है। शैल जी की कहानी स्त्री मन की परतों को उद्घाटित करती हैं। कहायिों का बुनावट पारदर्शी है। संवेदना से ओत-प्रोत आप की कहानियाँ मर्मस्पर्शी हैं। पर्यटन के अनुभव आपकी कहानियों में मुखर हैं। इस रूप में ‘शहजादी’ कहानी मन को छू लेने वाली है। इस कहानी में वर्ग संघर्ष स्पष्ट है। इनके कहानियों की भाषा पात्रानुकूल और संप्रेषणीय है। शैल जी की कविताएँ अन्तरमन से साक्षात्कार करती हुई समय के खड़े प्रश्नों से टकराती हैं।
अपने उद्सोपान में शैल जी ने विद्याश्री न्यास और सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र के प्रति आभार व्यक्त करते हुए बनारस के अपने अनुभवों को साझा किया और कहा कि लिखना प्रारंभ में मेरे लिए स्वान्तः सुखाय और जीवन के तनाव से मुक्ति के लिए रहा, जो बाद में आदत और मजबूरी बन गया। मेरी पहली कहानी, ग्यारह वर्ष की आयु में बनारस में पढ़ते समय छपी थी। बाद में कई कविताएँ और कहानियाँ आज अखबार में भी प्रकाशित हुई। मैं दुनिया में चाहे जहाँ भी धूम आऊँ, बनारस जैसा कहीं भी नहीं लगता।
कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति जायसवाल तथा श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर. प्रोफेसर श्रद्धानंद प्रोफेसर जय राम सिंह हिमांशु उपाध्याय डॉ इंडिवर डॉ अशोक सिंह पवन कुमार शास्त्री सिद्ध नाथ शर्मा डॉ सत्येंद्र मिश्रा आचार्य श्रीकृष्ण शर्मा शशि शेखर मिश्र आदि उपस्थित रहे।
‘हिन्दी का विश्व प्रसार’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा – 22 मार्च 2025
पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर युवा हिन्दी संस्थान, अमेरिका, साहित्यिक संघ, वाराणसी, लालबहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुगलसराय व विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नदेसर स्थित होटल मैजिक लीफ मे आज “*हिन्दी का विश्व प्रसार” विषय पर अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया।
आज हिंदी का प्रयोग व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, कला, विज्ञान, के साथ विविध क्षेत्रों में बढ़ तो रहा है। भारतवासी जब तक सच्चे मन से हिन्दी को नहीं आपायेंगे तब तक उसे विश्व में सही स्थान मिलना कठिन है, अतः प्रसन्नता कि बात है कि भारत के बाहर खास तौर से अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में काफी प्रगति हुई है और हिन्दी विश्व हिन्दी के रुप में स्थापित होने की ओर अग्रसर है। उक्त बातें ‘हिंदी का विश्व-प्रसार’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा में युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका के अध्यक्ष *डॉ. अशोक ओझा ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति *प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि अमेरिका से यहाँ आये इन हिन्दी सेवियों को देख-सुनकर विश्व में हिंदी की लोकप्रियता को समझा जा सकता है। हिंदी का वैश्विक परिदृश्य संभावनाओं से परिपूर्ण है। इसका कारण हिंदीभाषियों का सम्पूर्ण विश्व में फैला होना है। आज भारत के लाखों नागरिक विदेशों में बसे हैं। इनमें शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से लेकर रोजगार तथा व्यापार के लिए गये लोग भी शामिल हैं। ये सभी लोग विदेश में भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं किन्तु भारत के लोगों को अंग्रेजी का मोह छोड़कर राष्ट्रीय भावना से हिन्दी को अपनाना होगा।
कार्यक्रम की सारस्वत अतिथि प्रो. गैब्रिएला निमोलावा ईलेवा ने कहा कि भाषा के आदान-प्रदान से दो राष्ट्रों के बीच सद्भाव और मैत्री की स्थापना होती है। आज पूरे विश्व में जो हिंदी का सम्मान बढ़ा है, उसका प्रमुख कारण हिंदी भाषा की उदारशीलता, अन्य भाषाओं के शब्दों की स्वीकार्यता है। आज काशी में आप सभी के बीच में आकर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हिंदी विश्व प्रेम की भाषा है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि इस समय विश्व के लगभग डेढ़ सौ देशों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन हो रहा है। इसके पीछे हिंदी भाषा में निहित भारतीय ज्ञान परंपरा और मानवता के कल्याण की भावना तो है ही, यहाँ का जनबल और बाजार भी है। भारत में बाजार की संभावना के कारण अमेरिका, चीन एवं अन्य समर्थ देश अपने विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा रहे हैं। दुनिया भर में फैले भारतीय समाज के लोग हिन्दी और इसके साथ ही भारतीय संस्कृति का प्रसार कर रहे हैं। आज हिंदी भारत की आवाज है।
कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. रामसुधार सिंह ने वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की लोकप्रियता के सन्दर्भ में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिन्दी में किये जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा में विश्व की भाषा बनने की सामर्थ्य है, अपार संभावनाएँ और आवश्यकता भी है।
युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका से पधारे शिष्ट मण्डल का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक ओझा और उनकी टीम सच्चे मन से अमेरिका में हिन्दी का प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही है जो हमारे लिए प्रेरणास्पद है।
सुश्री कुद्युम, ड्यूक यूनिवर्सिटी, नार्थ कोलम्बिया ने कहा कि आज अधिकांश देशों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन और प्रशिक्षण कार्य हो रहा है। हिंदी की गद्य और पद्य की अनेकशः विद्याओं में विदेशी हिंदी विद्वान और साहित्यकार अपनी रचनायें कर रहे हैं। अनेक देशों में उनके आकाशवाणी केन्द्रों और दूरदर्शन के चैनेल्स पर विशेष हिंदी कार्यक्रम और पाठ्यक्रम चलाये जा रहे हैं। अकेले अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि आज विश्व की सांस्कृतिक राजधानी काशी में आप लोगों के बीच होने का अवसर प्राप्त हुआ है।
सुश्री भानुश्री सिसांदिया, युनिवर्सिटी आफ न्यूयार्क ने कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। हिंदी भावों को इस प्रकार प्रकट करती है कि वह मानस पटल को अन्दर तक आन्दोलित करते हैं और हृदय आल्हादित हो जाता है। यही इसकी जीवन्तता का रहस्य है। अमेरिका में हिंदी का अध्यापन करना मेरे लिए गौरव की बात है।
सुश्री नीलाक्षी फूकन ने कहा कि हिंदी की लिपि वैज्ञानिक लिपि है और हिंदी एक समर्थ भाषा है। यहाँ कैपिटल लेटर और छोटे लेटर का कोई विवाद नहीं है, हर लिपि की अपनी विशेषता है। विश्व पटल पर हिन्दी का प्रसार तेजी के साथ हो रहा है। मुझे प्रसन्नता है कि मैं अमेरिका में रहते हुए हिन्दी के विकास के लिए कार्य कर रही हूँ।
सुश्री प्रेमलता वैष्णव ने हिंदी के विकास के संबन्ध में अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि आज के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के युग में अमेरिका में हिन्दी साहित्यकारों का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी काफी आगे बढ़ चुकी है फिर भी इसे तकनीकी शिक्षा की दृष्टि से भी समृद्ध करने की जरूरत है।
सुश्री सविता बाला ने अनुवाद की दृष्टि से हिंदी को और अधिक सक्रिय और समृद्ध बनाने की बात कही। इन्होंने कहा कि अनुवाद के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा।
सुश्री इरियाना सविक ने कहा कि आज विश्व के कई देशों में हिन्दी भाषी लोग जाकर वसे हुए हैं और वहाँ सदियों से रहते हुए भी अपनी भाषा को भूले नहीं है। वे अपने परिवार में हिंदी में ही बातचीज करते हैं। अमेरिका में बड़ी संख्या में हिन्दी बोलने वाले भारत के लोग हैं और इन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।
सुश्री मयूरी रमन नयन- ने हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी भाषा के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि अमेरिका में हिन्दी सिनेमा तथा हिन्दी सीरियल काफी लोकप्रिय हैं। हिन्दी सिनेमा में विदेशी एवं प्रवासी भारतीयों को न केवल सहज समझ में आने वाली हिंदी ही सिखाई जाती है। बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति से भी परिचित कराया। इसी क्रम में सुश्री गरिमा अग्रवाल (न्यू जर्सी), सुश्री गाइनो मीरू मुर्मू (नाथ जर्सी) तथा अनुभूति काबरा ने हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण से संबंधित अपने रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अमेरिका में हिंदी के प्रति लोगों की रूचि बढ़ रही है। हिंदी की कुछ पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की जा रही हैं। दल के अन्य सदस्यों क्रमशः श्री डैनियल मैंगो, प्रशान्त शंकरण, विनोद चौबे, राजेश शाह तथा मनोज के. सिंह ने काशी में अपने अनुभव को साझा किया।
संगोष्ठी का संचालन प्रोफेसर अमित राय ने, धन्यवाद ज्ञापन श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र तथा वाणी के माध्यम से स्वागत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने किया एवं अंग वस्त्रम व स्मृति चिन्ह प्रो उदयन, प्राचार्य व प्रो धर्मेन्द्र सिंह, प्राचार्य ने दिया।इस अवसर पर डा उदयप्रताप सिंह, प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप, प्रोफेसर शैलेश मिश्र धीरज, डा कंचन परिहार, डा हरीश कुमार, हिमांशु उपाध्याय, डा डी डी सिंह, श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र, राम अवतार पाण्डेय, वासुदेव ओबेरॉय, गिरिजेश तिवारी,डा मुक्ता, डा शशिकला, श्रीमती वंदना ओझा,प्रो संजय, प्रो भावना, शत्रुंजय, प्रोफेसर राजीव, कवीन्द्र जी, डा दीपक, डा विमर्श, डा ध्रुवनारायण, श्री आलोक गुप्ता, श्री संतोष, यश नाइक, श्याम सुंदर,अरविंद, राजेश, अनुराग, बुद्धदेव तिवारी, संतोष कुमार, विजयप्रकाश, अशोक सिंह, कार्यक्रम के आरंभ में वैदिक मंगलाचरण जयेन्द्र पति व पौराणिक मंगलाचरण डा यज्ञनारायण ने किया।
अज्ञेय के जन्मदिवस 07 मार्च 2025 को कुशीनगर में आयोजित संगोष्ठी और काव्य संध्या की रिपोर्ट – डॉ गौरव तिवारी, कुशीनगर
सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय भारतीय साहित्य संस्थान समिति, श्रद्धाश्री न्यास, विद्याश्री न्यास, कलावती देवी स्मृति न्यास, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर और राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में अज्ञेय के जन्मदिवस के अवसर पर सात मार्च 2025 को भारत चिंतन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आयोजन किया गया।
आयोजन की शुरुआत बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ सौरभ द्विवेदी के द्वारा किए गए मंगलाचरण से हुई। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अरुणेश नीरन ने की। अतिथियों का स्वागत विद्याश्री न्यास, श्रद्धाश्री न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने किया। इस आयोजन में प्रसिद्ध कथाकार और कवि उदय प्रकाश को अज्ञेय स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा मिले इस सम्मान में उन्हें उत्तरीय, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और पच्चीस हजार रुपए दिए गए। पुरस्कार प्राप्ति के बाद अपने स्वीकृति वक्तव्य में उदय प्रकाश ने कहा कि अज्ञेय के नाम से दिए इस सम्मान को प्राप्त करना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता की शुरुआत अज्ञेय से होती है। वे स्वातंत्र्य बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने अज्ञेय के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण भी सुनाए।
अष्टभुजा शुक्ल ने अज्ञेय स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा अज्ञेय से ज्यादा शब्द केंद्रित कवि हिंदी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ। भाषा तो बन जाएगी मूल प्रत्यय शब्द है। शब्द की गरिमा रोज गिराई जा रही है। क्रूर होते जा रहे समय में अज्ञेय के भारत चिंतन पर बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। कवि का पहला सरोकार सत्ता नहीं भाषा और मनुष्य है। भारतीय चिंतन परंपरा सूक्तियों की और सूत्रों की परम्परा है। अज्ञेय ढेर सारी बातें सूत्रों में करते हैं। वे कहते हैं अनंत काल तक जीना अमरत्व नहीं है। मृत्यु भी तो अनंत है। अमरत्व कोई क्षण कोई दृष्टि, कोई अनुभूति है। लोगों के लिए लोगों के द्वारा लोगों का शासन होते होते लोकतंत्र अज्ञेय के शब्दों में “अनपढ़ों के द्वारा अनपढ़ों के लिए अनपढ़ों का शासन” होता गया है।बूंद में समुद्र की शक्ति होती है। वैसे ही मनुष्य में असीम की शक्ति है। इसलिए बूंद होने का महत्व है। अज्ञेय की आधुनिकता और प्रतिबद्धता बूंदों के प्रति है। एक एक मनुष्य की इयत्ता के प्रति है।
उन्होंने अज्ञेय के प्रति अपनी प्रणति व्यक्त करते हुए कहा कि अज्ञेय जैसे विविध आयामी लेखक के भारत चिंतन जैसे विषय पर बात करना अत्यंत कठिन है। अज्ञेय के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है भाषा और भाषा से भी अधिक महत्वपूर्ण है शब्द। उन्होंने कहा कि उनके जानने में शब्द का अज्ञेय से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। अज्ञेय शब्द की प्रतिष्ठा के लिए बार-बार सबको सतर्क करते रहे। अज्ञेय के साथ एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मैथिली शरण गुप्त की जन्म शताब्दी कार्यक्रम में अज्ञेय ने कहा था “कोई भी श्रेष्ठ लेखक या कवि की ललक राष्ट्रकवि होने की नहीं है क्योंकि यह एक राजनीतिक शब्द है।“ वर्तमान अति राजनीतिक समय में अगर कोई अराजनीतिक कवि या लेखक है तो वह अज्ञेय हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अज्ञेय का व्यक्तित्व सागर की तरह है, सागर की तरह गहरा, मौन और शांत। अज्ञेय बुद्धि के कपाट खोलने वाले लेखक हैं। उन्होंने अज्ञेय के साथ-साथ अन्य कवियों – मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, धूमिल जैसे कवियों को याद किया तथा उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों को सभागार में उपस्थित लोगों के साथ साझा किया। इस सत्र में दयानिधि मिश्र द्वारा संपादित अज्ञेय स्मृति व्याख्यानो पर केंद्रित पुस्तक और नर्मदा प्रसाद उपाध्याय द्वारा संपादित पुस्तक “चयनित निबंध : पंडित विद्या निवास मिश्र” का विमोचन भी अतिथियों के द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी के आचार्य प्रोफेसर गौरव तिवारी ने किया।
द्वितीय सत्र का विषय भारत चिंतन पर केंद्रित था। इस सत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रो अवधेश प्रधान ने कृष्ण बिहारी मिश्र के भारत चिंतन पर व्याख्यान देते हुए कहा कि उनकी विद्या भूमि काशी है तथा उनके लेखन का एक बड़ा भाग वह है जो उन्होंने अपने गुरुवार सामान लोगों पर लिखा है। उन्होंने बताया कि कोलकाता में रहते हुए भी कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने काशी और बलिया के अपने संस्कारों को धूमिल नहीं होने दिया। उन्होंने नवजागरण के सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अपनाया। वे मुख्य रूप से विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण, विवेकानंद आदि से प्रभावित थे। कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने गांधी जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा आदि को बार-बार उद्धरित किया है और सर्वधर्म समन्वय की बात की है। उन्होंने धर्म के आधार पर धर्मनिरपेक्षता की बात की। उन्होंने बताया कि भारत में धर्म ने कभी विज्ञान का विरोध नहीं किया बल्कि यहां तो नास्तिकों को भी ऋषि – मुनि कहा गया है। अपने अंतिम दिनों में कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने विवेकानंद और परमहंस के भारत बोध पर काम किया इस ओर उस समय बहुत कम काम किया गया यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही है। उन्होंने कहा कि भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में किसी संस्था के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के बराबर अकेला कार्य कृष्ण बिहारी मिश्र ने किया। बनारस के साहित्यिक चरित्र और साहित्य पर उन्होंने बहुत आत्मीयता से लिखा। उन्होंने बताया कि कल्पतरु की उत्सव लीला में रामकृष्ण परमहंस की जीवनी के माध्यम से उन्होंने भारत के सांस्कृतिक विकास पर महत्वपूर्ण लेखन किया है।
वरिष्ठ कवि और आलोचक प्रो दिनेश कुशवाह ने कहा कि आगे, कृष्ण बिहारी मिश्र या विद्या निवास मिश्र के साहित्य में भारत चिंतन वह चिंतन नहीं है जो आज की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत दिखता रहता है। वह भारत की आत्मा को खोजने की कोशिश है।
पंडित विद्यानिवास मिश्र के भारत चिंतन पर चर्चा करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने बताया कि पंडित जी का भारत उदार और सर्व समावेशी है। भारतीय परंपरा और सभ्यता की बात करते हुए उन्होंने बताया की परंपरा वह नहीं होती जो हमें पीछे ले जाती है बल्कि परंपरा वह होती है जो हमें श्रेष्ठता की ओर आगे ले जाती है। उन्होंने बताया कि पंडित जी का मानना था धर्म अलग-अलग नहीं है,भारत का धर्म केवल एक है मनुष्यता का धर्म,दूसरे को स्वयं से श्रेष्ठ मानना। पंडित जी का भारत सबको अपने में समेटने वाला है न कि बाटने वाला।
उन्होंने कहा कि विद्या निवास मिश्र अपने लेखन और चिंतन में भारत की संस्कृति का चिंतन करते हुए यह बताया है कि इतिहास की बार बार चर्चा करना प्रतिशोध के लिए खुद को तैयार करना और ललकारना होता है। विद्यानिवास मिश्र का भारत श्रेष्ठता के दंभ का भारत नहीं है, वह श्रेष्ठता के तत्वों की व्याख्या करते हुए सबको अपने में समेटने वाला भारत है। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो अनंत मिश्र ने कहा कि कल्याण और पवित्र शब्द की अवधारणा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अज्ञेय और विद्यानिवास की वाणी में ज्ञान के तप की शक्ति है जो उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है।
अतिथियों और संगोष्ठी में भाग लेने वालों का धन्यवाद ज्ञापन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के प्राचार्य प्रो विनोद मोहन मिश्र ने किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशुतोष तिवारी ने किया।
संगोष्ठी के बाद काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश ने की। इस काव्य गोष्ठी में अष्टभुजा शुक्ल, दिनेश कुशवाहा , प्रकाश उदय, इंद्र कुमार दीक्षित, दयाशंकर सिंह कुशवाहा, सरोज पाण्डेय, उद्भव मिश्र, अंजलि अस्थाना खुशबू, दिनेश तिवारी, सरिता मिश्र, केतन यादव आदि ने अपनी कविताएं पढ़ीं।
कार्यक्रम में प्रो महेश्वर मिश्र, परितोष मिश्र, उद्भव मिश्र डॉ सुधाकर तिवारी प्रो अमृतांशु शुक्ल, प्रो उर्मिला यादव, प्रो प्रशिला सैम, कालिंदी त्रिपाठी, प्रो सीमा त्रिपाठी, प्रो इंद्रासन प्रसाद, प्रो वीरेंद्र कुमार, प्रो कौस्तुभ नारायण मिश्र, प्रो राजेश कुमार सिंह, प्रो इंद्रजीत मिश्र, डॉ अनुज कुमार,डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, डॉ अजय कुमार सिंह, डॉ अनूप पटेल, डॉ अरुण कुमार, डॉ संजय गुप्त, डॉ अंबिका प्रसाद तिवारी, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ यज्ञेश त्रिपाठी, डॉ पंकज दुबे, डॉ सुबोध गौतम, डॉ दीपक, डॉ रामनवल, डॉ राजीव राय, डॉ मंजेश भारती, डॉ विशेषता मिश्र सहित अनेक साहित्य प्रेमी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
राष्ट्रीय एकता की दृष्टि से हिंदी तथा भारतीय भाषाओं के बीच आवाजाही आवश्यक है – 22 फरवरी 2025
वाराणसी। मातृभाषा दिवस पर विद्याश्री न्यास कार्यालय [अभिलाषा नगर कॉलोनी] में विद्या निवास शताब्दी वर्ष में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में पंडित जी की भारतीय भाषाओं से संदर्भित मौलिक अवधारणा पर एक संगोष्ठी हुई, जिसमें प्रोफेसर आर चंद्रशेखरन, निदेशक केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान चेन्नई, उपनिदेशक भारतीय भाषा संस्थान मैसूर डॉक्टर एल आर प्रेम कुमार , केंद्रीय शास्त्रीय संस्थान चेन्नई के डॉक्टर एम गोविंद राजन की विशेष उपस्थिति रही। काशी तमिल संगमाम में काशी पधारे इन विद्वानों का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दया निधि मिश्रा ने कहा विद्या निवास मिश्र की भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अपनी मौलिक अवधारणा थी ।वे चाहते थे की हिंदी के साथ समस्त भारतीय भाषा विशेष कर दक्षिण की भाषाएं एकता के सूत्र में बंधकर मजबूत बनें।केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान चेन्नई के निदेशक प्रोफेसर आज चंद्रशेखर ने कहा कि संस्थान द्वारा तमिल तेलगु कन्नड़ जैसी प्राचीन भाषाओं के शास्त्रीय ग्रंथों के अनुवाद संस्थान द्वारा हिंदी में व्यापक स्तर पर कराया जा रहा है ।उन्होंने यह भी कहा कि दक्षिण की भाषाओं के विकास के मूल में संस्कृत है जिससे हिंदी का विकास हुआ है ।इन प्राचीन भाषाओं का काशी से गहरा संबंध रहा है डॉक्टर एम गोविंद राजन ,जिन्होंने तमिल के प्राचीन ग्रंथो का हिंदी अनुवाद किया है ,कहा कि मुझे तमिल भाषा के प्राचीन ग्रंथो का हिंदी अनुवाद करने में परम संतोष की अनुभूति हो रही है।
उन्होंने आगे कहा कि हिंदी भाषा भाषियों को तमिल भाषा सीखाने का संकल्प लिया है और तमिल हिंदी प्रशिक्षण संबधी पुस्तकों को भी तैयार किया है ।काशी के तमाम लोग इसमें रुचि ले रहे हैं ।भारतीय भाषा संस्था मैसूर के डॉक्टर प्रेम कुमार ने संस्था की गतिविधियों से सभी को परिचित कराया और कहा कि काशी तमिल संगम प्रधानमंत्री मोदी की एक अद्भुत योजना है जिससे पूरा देश एकता के सूत्र में बंधने की दिशा में अग्रसर है। विद्वानों ने आने वाले दिनों में विद्यार्थी न्यास के साथ मिलकर एक बड़ी राष्ट्रीय संगोष्ठी करने की आवश्यकता पर बल दिया।कहा कि चेन्नै तथा मैसूर में इस विषय पर व्याख्यान आयोजित किया जाएगा। इस संबंध में एक व्यापक योजना बनाकर इस कार्य को आगे बढ़ाया जाएगा। संगोष्ठी में भारतीय भाषा केंद्र उदय प्रताप कॉलेज के पूर्व सहायक निदेशक साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने निदेशक महोदय को अपनी पुस्तक चलो मान तुम काशी की प्रति भेंट की ।निदेशक महोदय ने पुस्तक की प्रशंसा करते हुए आश्वस्त किया कि इस पुस्तक का तमिल भाषा में अनुवाद संस्थान द्वारा कराया जाएगा ।इस अवसर पर प्रोफेसर आर चंद्रशेखर द्वारा केंद्रीय तमिल संस्थान चेन्नई द्वारा भाषा को प्राचीन ग्रंथो का हिंदी अनुवाद विद्याश्री न्यास को भेंट की।सभा की अध्यक्षता प्रोफेसर चंद्रशेखरन ने की।संचालन डॉक्टर प्रकाश उदय ने किया।संगोष्ठी में प्रोफेसर उदयन मिश्र, अरविंद कुमार पांडेय, सत्येंद्र राम, वीरेंद्र राम त्रिपाठी ने भी विचार व्यक्त किए।
पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2025 को आयोजित कवि-गोष्ठी
विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2025 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में संस्कृत कवि सम्मान, पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के पूर्व संकायप्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्री लेखमणि त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा विद्याश्री न्यास एवं श्रद्धानिधि न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर वर्ष 2025 के ‘पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान’ से संस्कृत भाषा-साहित्य के विश्रुत विद्वान कविवर प्रो. गोपबंधु मिश्र को, मंचस्थ अतिथियों एवं डाॅ. दयानिधि मिश्र ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। अपने स्वीकृति-वक्तव्य में प्रो. गोपबंधु मिश्र ने पं. विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व-कृतित्व का अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने पंडित जी की वैचारिक प्रामाणिकता, भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अविचल निष्ठा के साथ ही उनके रचनाकर्म में निहित व्यंगात्मकता और उत्तरोत्तर गहनतर होती गई सामाजिकता की विशेषतः चर्चा की।
श्रद्धानिधि न्यास द्वारा प्रवर्तित पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘महाभारत की कथाभूमि’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा-साहित्य के पूर्व आचार्य प्रो. जयशंकर लाल त्रिपाठी ने महाभारत-संबंधी विमर्श के क्षेत्र में पं. विद्यानिवास मिश्र की रचना ‘महाभारत का काव्यार्थ’ के मूल्य और महत्त्व को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि महाभारत में वर्णित अनेक आख्यान-उपाख्यान हैं जिनके आधार पर संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में विविधविध साहित्य-रचना हुई है। कालिदास प्रभृति रचनाकारों की कृतियाँ तो विश्वविख्यात हुईं, लेकिन मूल कथाओं का अपना सौंदर्य है, अपना स्वरूप है। व्यास की शैली और कथा की बनावट-बुनावट नवीन अध्येताओं और शोध-छात्रों के लिए समीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।महाभारत आदि आर्ष ग्रंथों के मूलरूप के अध्ययन के महत्त्व को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से स्थापित किया।
संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र, श्री पवन कुमार शास्त्री, प्रो. चंद्रकांता राय, प्रो. गायत्री प्रसाद पाण्डेय, प्रो. विवेक पाण्डेय, प्रो.कमला पाण्डेय, प्रो. विजय पाण्डेय आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने इस और ऐसे संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित करते हुए यह भी बताया कि कैसे महाभारत की कथा हमारी सभ्यता का आख्यान है। उन्होंने अपने काव्य-पाठ से भी अपने उद्बोधन को संपन्न और सहृदय समाज को मंत्रमुग्ध किया।
इस सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और संचालन प्रो. चंद्रकांता राय ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया।
सर्वश्री राजनाथ त्रिपाठी, उमेश त्रिपाठी, सुजीत कुमार सिंह, राम सुधार सिंह, प्यारेलाल पाण्डेय, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल, शारदा, गोविन्द त्रिपाठी, वीरेंद्र राम त्रिपाठी, उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, आशीष मणि त्रिपाठी, शुभंकर बाबू, प्रकाश उदय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।
आधुनिक हिंदी कविता पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी : 6 फरवरी 2025
वाराणसी, 6 फरवरी 2025
पंडित विद्यानिवास मिश्र की जन्मशताब्दी के अवसर पर आज ‘विद्याश्री न्यास’ एवं हिंदी विभाग , उदय प्रताप कॉलेज , वाराणसी के संयुक्त तत्पावधान में उदय प्रताप कॉलेज के राजर्षि सेमिनार हाल में ‘आधुनिक हिंदी कविता’ विषय पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं विचारक प्रो. दिलीप सिंह ने किया। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र का संबंध निबंध लेखन , पत्रकारिता, संस्कृति और लोक साहित्य से तो था ही साथ ही हिंदी कविता से भी उनका गहरा संबंध था । पंडित विद्यानिवास मिश्र ने ‘मॉडर्न पोएट्री’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ का हिंदी अनुवाद एवं पाठ विश्लेषण किया था जिसमें दुनिया एवं हिंदी के प्रमुख कवियों को स्थान दिया गया है। प्रो. दिलीप सिंह ने अपने वक्तव्य में यह भी कहा कि यह बात ठीक नहीं है कि आधुनिक हिंदी कविता में आभिजात्य अधिक है। यह बात त्रिलोचन , केदारनाथ सिंह जैसे कवियों के द्वारा प्रमाणित होती है। उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता में संवेदना के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इन कविताओं में संवेदना का स्तर जमीन पर उतर आया है। अब कविता हवा में बात नहीं करती। उन्होंने आधुनिक हिंदी कविता की विशेषताओं को रेखांकित करते हुए कहा कि इस कविता में व्यंग्य का स्वर प्रमुख हुआ है, लोकरंग की गहराई स्पष्ट होकर सामने आई है और इस कविता में भाषा में कसावट, अतीत को चित्रित करने की क्षमता आई है। यह विशेषताएं हमें धूमिल, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, लीलाधर जगूड़ी, मुक्तिबोध, केदारनाथ सिंह, महेश अनघ , त्रिलोचन जैसे कवियों में अच्छी तरह दिखाई देती है ।
आज की इस संगोष्ठी में ‘स्वाधीनता के पूर्व हिंदी कविता’ पर बोलते हुए प्रसिद्ध कवि अष्टभुजा शुक्ल कहा कि यह कविता पराधीनता के भीतर छटपटाती हुई स्वाधीनता की चेतना की कविता है जो हमारे भीतर अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध तीव्र चेतना का संचार करती है। आजादी के पूर्व जयशंकर प्रसाद, निराला ,पंत, दिनकर जैसे कवियों ने अपनी कविताओं के माध्यम से पराधीनता के विरुद्ध स्वाधीनता का वातावरण निर्मित किया । उन्होंने आजादी के पहले की हिंदी कविता के वैशिष्ट्य को रेखांकित करते हुए यह भी कहा कि आजादी के पहले के हिंदी कविता न केवल स्वाधीनता की चेतना की कविता है बल्कि वह हमें सौंदर्य और प्रेम के लिए लड़ना सिखने वाली कविता भी है। आजादी के पहले की हिंदी कविता की यही बुनियाद उसे आज भी प्रासंगिक बने हुए है।
संगोष्ठी में ‘आजादी के बाद से लेकर 1990 तक’ की हिंदी कविता पर बात करते हुए प्रसिद्ध कवि एवं कथाकार श्री श्रीप्रकाश मिश्र ने कहा कि कविता हमेशा ही प्रतिपक्ष में खड़ी होती है। यह बात आजादी के बाद की हिंदी कविता पर विशेष रूप से लागू होती है । यह मूल रूप से मनुष्यता के पक्ष में खड़ी हुई कविता है। उन्होंने इन चार दशकों में नई कविता और समकालीन कविता में आने वाले राजकमल चौधरी, धूमिल ,श्रीराम सिंह ‘सलभ’, कुमारेन्द्र पारसनाथ सिंह, विजेंद्र ,वीरेंद्र डंगवाल ,गोरख पांडे ,राजेश जोशी ,अरुण कमल ,विनोद कुमार शुक्ल, चंद्रकांत देवताले, श्रीकांत वर्मा जैसे कवियों की चर्चा करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि आजादी के बाद की हिंदी कविता मनुष्यता के पक्ष में खड़ी हुई कविता है ।
आज की संगोष्ठी में 1990 के बाद की हिंदी कविता पर बोलते हुए काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी में हिंदी विभाग के प्रो. प्रभाकर सिंह ने कहा कि 90 के बाद की हिंदी कविता वैश्वीकरण के प्रभाव , समाजवादी दुनिया के महास्वप्न के टूटने आदि से उपजी कविता है। उन्होंने यह भी कहा कि 1964 के बाद की हिंदी कविता पर सबसे ज्यादा प्रभाव मुक्तिबोध का रहा है। प्रो. प्रभाकर सिंह ने 90 के बाद हिंदी कविता की कम से कम चार पीढ़ियों के कवियों के रचनारत होने की बात कही और इस अवधि में आने वाले कुंवर नारायण, राजेश जोशी, अष्टभुजा शुक्ल ,गगन गिल ,बोधिसत्व, एकांत श्रीवास्तव, राकेश रंजन, अच्युतानंद मिश्र ,जेसिंदा केरकेट्टा ,अनुज लुगुन जैसे महत्वपूर्ण कवियों का उल्लेख किया। उन्होंने 90 के बाद की कविता की एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति विस्थापन की बताया । साथ ही आदिवासी कविता की चर्चा करते हुए यह भी कहा कि वह केवल जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ने वाली कविता नहीं ही है बल्कि पर्यावरण को बचाने के लिए संघर्ष करने वाली कविता भी है ।
आज की संगोष्ठी में मंगलाचरण श्री नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया और आए हुए अतिथियों का स्वागत महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. धर्मेंद्र कुमार सिंह ने किया । उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य में कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र आरंभ से ही कला, संस्कृति ,भाषा, साहित्य और राजनीति से गहरी सलंग्नता रखने वाले साहित्यकार एवं विचारक थे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आजादी के बाद का समय भारतीय जीवन और समाज के लिए गहरी छटपटाहट का समय है जिसका प्रमाण इस दौर की हिंदी कविताओं में प्रचुरता से मिल जाता है ।
आज की संगोष्ठी का संचालन और प्रो. गोरखनाथ ने किया और धन्यवाद विद्याश्री न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने दिया। इस अवसर पर डॉ. राम सुधार सिंह, श्री ओम धीरज, डॉ, अशोक सिंह , प्रो. श्रद्धानंद, प्रो.एस.के. सिंह, प्रो. उदयन मिश्र, प्रो.प्रकाश उदय, प्रो .बनारसी मिश्र, प्रो .सुधीर कुमार शाही, प्रो. सुधीर कुमार राय, प्रो. शशिकांत द्विवेदी, प्रो .पंकज कुमार सिंह , प्रो. मनोज प्रकाश त्रिपाठी , प्रो .मधु सिंह, डॉ.डी.डी. सिंह , प्रो. अनिता सिंह, डा. संजय श्रीवास्तव, डॉ. प्रदीप कुमार सिंह, डॉ. अनिल कुमार सिंह, डॉ .अनूप कुमार सिंह, डॉ. सपना सिंह, डा. रंजना श्रीवास्तव, डॉ. अग्नि प्रकाश शर्मा , डॉ. शशिकांत सिंह सहित बड़ी संख्या में छात्र एवं छात्राएं उपस्थित रहे।
जन्मोत्सव : साहित्योत्सव ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर (14-15 जनवरी 2025)
विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2025) ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित था। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष पंडित जी का जन्म-शताब्दी वर्ष है और इस आयोजन के साथ ही न्यास द्वारा संकल्पित वर्षपर्यंत चलने वाले विभिन्न सांस्कृतिक-साहित्यिक उत्सवों-समारोहों का भी श्रीगणेश हुआ।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को, जन्म-शताब्दी वर्ष के वैशिष्ट्य के अनुरूप, धर्मसंघ शिक्षामंडल के, विद्यानिवास जी को अतिशय प्रिय राधा-माधव के युगल भाव से सुसज्जित सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ( आयुष्य राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश ), अध्यक्ष प्रो. सुनील कुलकर्णी ( निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), विशिष्ट अतिथियों प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ), श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), डाॅ. अरुणेश नीरन ( पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर बुद्ध महाविद्यालय, कुशीनगर ), प्रो. सदानंद शाही ( पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र ( पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ) तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी के वैदिक स्तवन, श्रीयुत श्रीनिवास विलासराव इनामदार के घनपाठ और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इस अवसर को आयुष्मान रिदित मिश्र के तबला-वादन , आयुष्मती आतुषी मिश्र के वीणा-वादन एवं श्री प्रीतम मिश्र के गायन ने एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। प्रो. अरविंद मिश्र, प्रो. श्रद्धानंद, प्रो. उदयन मिश्र और प्रो. ऋतंधर मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. अरुणेश नीरन ने स्वागत-भाषण के साथ ही संगोष्ठी के विषय को प्रस्तावित करते हुए हिंदी उपन्यास के महत्त्वपूर्ण पड़ावों और युगांतर उपस्थित करने वाली कृतियों के उल्लेख के साथ विमर्श के विभिन्न आयामों की तरफ मूल्यवान संकेत किए।
उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित दो पत्रिकाओं ‘सोच-विचार’ और ‘वीणा’ के साथ ही ‘नान्दी’ पत्रिका और डाॅ. दयानिधि मिश्र तथा प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा संपादित पुस्तकों ‘लोक, लोकतंत्र और मीडिया’ (सस्ता साहित्य मंडल), ‘समवेत का सौंदर्य’, ‘रामकथा मंदाकिनी’, ‘भारत और भारतीयता’, ‘पलाश के फूल की दहक’, ‘शिरीष का आग्रह’, ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ ( सभी प्रलेक प्रकाशन ), धर्मेंद्र सिंह संपादित ‘अविनाशी काशी’ के अतिरिक्त ‘भाषा-दर्शन’, ‘प्रियांश’, ‘मरुस्थल’ तथा ‘मृणाल सेन और उनका सिनेमा’ जैसी दर्जनाधिक पुस्तक-पत्रिकाओं का लोकार्पण संपन्न हुआ। डाॅ. राम सुधार सिंह ने इन सभी लोकार्पित कृतियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।
उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र को, लोककवि सम्मान से डाॅ. बलभद्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री रामजनम भारती को, पत्रकारिता सम्मान से श्री राकेश कुमार शर्मा को तथा श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री नरोत्तम शिल्पी को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। सम्मानित विभूतियों के परिचय तथा प्रशस्ति-वाचन का दायित्व सुश्री अंजलि मिश्र ने निभाया। अपरिहार्य कारणों से श्री राकेश कुमार शर्मा सम्मान-समारोह में उपस्थित नहीं हो सके। इस अवसर पर स्वीकृति वक्तव्य के साथ ही उनसे विशेष आग्रहपूर्वक उनकी कविताएँ भी सुनी गईं।
बीज-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि हिंदी साहित्य में यूरोप से आगत विधाओं में से सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास ने ही अर्जित की, इस वैशिष्ट्य के साथ कि इस पश्चिमी विधा को हिंदी ने ही नहीं, हिंद ने ही, अपने ही रंग-ढंग से विकसित किया। जिस मध्यवर्ग की विधा इसे माना गया, हिंदी में उसकी जगह शुरुआती दौर में किसानों और वंचितों ने ली, स्त्रियों ने विशेषतः। आज भी हिंदी उपन्यासों की मुख्य धारा में मुख्यतः वही हैं जो सामाजिक जीवन की मुख्य धारा में नहीं हैं। प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने इस सारस्वत आयोजन और उसमें एक साथ इतनी पुस्तकों के लोकार्पण को पंडित जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कथा के लिए जीवन को जितनी, जीवन के लिए कथा को भी उतनी ही बड़ी जरूरत के तौर पर निरूपित किया। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र की गरिमामय उपस्थिति ने इस आयोजन को संपन्नतर किया। ‘काशी अविनाशी’ के रचयिता श्री धर्मेंद्र सिंह ने उसी अविनाशी काशी की एक धरोहर के रूप में विद्यानिवास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। मुख्य अतिथि श्री दयाशंकर मिश्र दयालु ने पंडित जी के साथ ही काशी की पांडित्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए इस आयोजन से अपने जुड़ाव को एक ऐसे सौभाग्य के रूप में उद्धृत किया जो आत्मा को बल देता है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सुनील कुलकर्णी ने लोकार्पित कृतियों और सम्मानित विभूतियों के साथ ही प्रस्तुत वक्तव्यों के हवाले से इस और ऐसे सारस्वत आयोजनों को समकालीन भारत की सांस्कृतिक अनिवार्यता के रूप में रेखांकित किया। पंडित विद्यानिवास मिश्र को भारत-भाव के कथा-प्रवाह के दीप्त चरित के रूप में याद करते हुए उन्होंने उनके जन्मशती वर्ष के आगामी आयोजनों में अपने और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सतत सहभागी होने की प्रतिबद्धता जताई। इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।
दूसरे अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वतंत्रतापूर्व’ की शुरुआत डाॅ. श्रुति पाण्डेय (शिलांग, मेघालय) के वक्तव्य से हुई। मुक्ति-चेतना के ब्याज से स्वतंत्रतापूर्व के हिंदी उपन्यासों में निहित स्त्री-मुक्ति और भारत मुक्ति की समानांतर और उत्तरोत्तर दृढ़ होती गई आवाज को उन्होंने उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया। डाॅ. प्रभात मिश्र ने हिंदी उपन्यासों के विशिष्ट संदर्भ में भारतीय मध्यवर्ग की अपनी पहचान से हिंदी उपन्यासों की अपनी पहचान के बनने की बात कही। भारतीय मध्यवर्ग के घटनाबहुल जीवन से जुड़कर ही संभवतः हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास घटनाओं के घटाटोप से घिरे रहे हैं। इस मध्यवर्ग के स्वरूप में आए बदलाव के साथ ही उपन्यासों के स्वरूप में भी आते बदलाव को महसूस किया जा सकता है। प्रो. वशिष्ठ अनूप ने प्रेमचंद को भारतीय किसानों के सर्वाधिक विश्वसनीय कथाकार के रूप में आँकते हुए, कृषि-जीवन की उनकी समझ के साथ ही उनके और हिंदी के उपन्यासमात्र के, शिल्प और संवेदना दोनो दिशाओं में, उत्तरोत्तर विकास को निरूपित किया। प्रो. बलराज पाण्डेय ने हिंदी उपन्यास के प्रारंभिक से लेकर अब तक के विकास का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत करते हुए उसकी उपलब्धि के रूप में निम्न वर्ग और निम्न वर्ण और चाहे जिस बहाने, जिन तरीकों, दबाई-कुचली गई आवाजों को आवाज देने के हथियार के रूप में बनी और बनती रही पहचान को रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डाॅ. विश्वास पाटिल ने मुक्ति-चेतना के विभिन्न आयामों की चर्चा करते हुए उन्हें धारण करने वाले स्वतंत्रतापूर्व के प्रतिनिधि उपन्यासों और उपन्यासकारों के वैशिष्ट्य का व्याख्यान किया। सुचिंतित टिप्पणियों के साथ इस सत्र का सफल संयोजन डाॅ. प्रीति जायसवाल ने किया।
तीसरा अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वातंत्र्योत्तर चार दशक’ प्रो. चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। डाॅ. अखिलेश मिश्र ने आजादी के बाद के बहुविध मोहभंग और चतुर्दिक ह्रासोन्मुखता और सांप्रदायिक वैमनस्य को तब के उपन्यासों झूठा सच, तमस, आधा गाँव, कितने पाकिस्तान आदि के माध्यम से पढ़ने की कोशिश की। डाॅ. कुमार वरुण ने बैल की आँख, माधोपुर का घर आदि उपन्यासों के जरिए बिहार के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन को रेखांकित होते हुए दिखाया। डाॅ. मधुबाला शुक्ल ने विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक उन्माद के सामाजिक प्रभाव के औपन्यासिक पाठ के रूप में राही मासूम रजा के कथा-कर्म को प्रस्तुत किया। डाॅ. नरेंद्र नाथ राय ने मुक्ति-चेतना के कथा-पाठ को आपातकाल के विशेष संदर्भ में लिया और हिंदी उपन्यासों पर वैश्विक घटनाओं-परिघटनाओं के प्रभाव का भी मूल्यांकन किया। डाॅ. रंजन पांडेय ने पाहीघर, बेदखल, डूब, पार, माँ का आँचल आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों में बदलते हुए गाँवों के प्रवेश को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि होरी तो खैर अपने सामने आई चुनौतियों से जूझ रहा था, अब के किसानों के पास इसकी भी क्षमता नहीं बची। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने बताया कि प्रेमचंद के गाँव-केंद्रित उपन्यासों के बाद एक वक्त आया जब रेणु के यहाँ नायक शहर से उठकर गाँव आए, बहुत कुछ अच्छा-अच्छा करने के इरादे लेकर, लेकिन उसके बाद गाँवों का हाल कुछ इस कदर बेहाल हुआ कि चाहे ‘अलग-अलग वैतरणी’ का देवनाथ उपाध्याय हो या मास्टर शशिकांत या ‘रागदरबारी’ का रंगनाथ या ‘जल टूटता हुआ’ का सतीश — सबको गाँव छोड़कर भागना पड़ा। यह छोड़कर भागना नायकों का ही नहीं है, बहुत कुछ कथाकारों का भी है, यही वजह है शायद कि हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि के रूप में गाँव अब जब-तब है। प्रो. अवधेश प्रधान ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर केंद्रित होते हुए बताया कि कैसे वह एक तरफ स्त्री-मुक्ति का ताना-बाना बुनता है, दूसरी तरफ दूसरे विश्वयुद्ध की भी छाया छूता है, और तीसरी तरफ अपनी सामाजिक विषमता पर चोट करते हुए पूर्व की धार्मिक उदारता और पश्चिम की सामाजिक उदारता के गँठजोड़ की जरूरत की तरफ भी संकेत करता है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. चितरंजन मिश्र ने सबके समाहार के साथ ही बताया कि समस्याएँ भी और उनके समाधान के लिए संघर्ष भी बहुत है, और बहुविध है। संवेदनाओं के इतने रंग हैं कि कई बार वे एक-दूसरे को काटते हुए भी नजर आते हैं। ऐसे में कथाभूमि का चयन और उसका निर्वाह भी बेशक निरंतर कठिन होता जा रहा है, लेकिन अपनी कथा-प्रतिभा पर अविश्वास की भी कोई वजह नहीं दिखती। डाॅ. रचना शर्मा ने इस सत्र का संयोजन किया।
चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री शरद श्रीवास्तव, अभिनव अरुण, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, विजय जी, मासूम जी, प्रतीक त्रिपाठी, अंजलि मिश्र, हिमांशु त्रिपाठी, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, बेताल जी, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, धनंजय जी और इस वर्ष श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से सम्मानित नरोत्तम शिल्पी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।
आयोजन के दूसरे दिन, 15 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘हिंदी उपन्यास : रचना-विधान और विकास-क्रम। मुख्य वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह का था और उनके अतिरिक्त दो और महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रो. प्रभाकर सिंह और डाॅ. इंदीवर के हुए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. श्रद्धानंद ने की और इसका संयोजन किया डाॅ. बिजेंद्र पांडेय ने। अपने मुख्य वक्तव्य मे प्रो. दिलीप सिंह ने रचना-विधान के सौष्ठव की दृष्टि से कृति के विश्लेषण और परख के आग्रह के साथ कहा कि यदि हिंदी उपन्यास-यात्रा के आदि से आज तक के विकास-क्रम को देखें तो पाएँगे कि यह अपने भीतर सरल, हास्यमय, रहस्यमय, चामत्कारिक, गंभीर, सुखद, दुखद अनेक गद्यरूप समेटे हुए है। यह गुंफन ही हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को विचारणीय बनाता है। उन्होंने रचना-विधान के गठाव के आधार पर ही हिंदी के पहले उपन्यास को तय करने की बात कही। चंद्रकांता के रूप में, उन्होंने लक्ष्य किया कि अपने जन्म के दस ही बरस बाद हिंदी उपन्यास की भाषा दौड़ती-भागती, लहराती-मचलती, उछलती-कूदती हमारे सामने आ गई। रचना-विधान की इसी ठोस जमीन पर समाजगत मूल्यवत्ता में निहित अर्थवान तत्वों को पकड़ते हुए प्रेमचंद सामने आए। उन्होंने हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को नए-नए मोड़ से संपन्न करने वाले उपन्यास के रूप में प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, अज्ञेय, शिवकुमार मिश्र रुद्र, वृंदावन लाल वर्मा, यशपाल, धर्मवीर भारती, अमृत लाल नागर आदि की चयनित कथाकृतियों के पाठ का प्रस्ताव रखा। प्रो. प्रभाकर सिंह ने हिंदी उपन्यासों के रचना-विधान पर वैश्वीकरण के प्रभाव को अपने वक्तव्य के केंद्र में रखते हुए बताया कि यह एक तो उपन्यास में विभिन्न विधाओं के शिल्प के प्रवेश के रूप में घटित हुआ, जैसे ‘काशी का अस्सी’ या ‘कलिकथा बाई पास’ में, दूसरे यह विमर्शों की भीड़ में भी उनसे निराक्रांत रहने की अनधीरता में दिखता है, जैसे ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में और तीसरे ‘मणिकर्णिका’ या ‘मुर्दहिया’ जैसी घोषित रूप से आत्मकथाओं में जो अपने पूरे गठन से अपने उपन्यास होने को दर्ज करती हैं। इसे उन्होंने उपन्यास के केंद्र में न सिर्फ देश, बल्कि एक लघुतर देश जैसे एक मुहल्ले, अस्सी, के आ जाने के रूप में भी रेखांकित किया। डाॅ. इंदीवर ने हिंदी के प्रारंभिक ‘परीक्षा गुरु’, ‘देवरानी-जेठानी’ जैसे उपन्यासों की संरचना के माध्यम से हिंदी उपन्यासों की बनावट-बुनावट के अद्यावधि विस्तार की प्राथमिक रेखाओं को समझने-समझाने की चेष्टा की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रद्धानंद ने सभी वक्तव्यों के समाहार के साथ ही शिल्प और संवेदना दोनो स्तरों पर हिंदी की उपन्यास-यात्रा में प्रेमचंद की केंद्रीयता के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।
आयोजन का छठा सत्र 90 के बाद के हिंदी उपन्यासों पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। प्रो. सुमन जैन ने ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ को बाजारवाद के संकटों से घिरे आदिवासियों की संतप्त कथा के रूप में रेखांकित किया। आज के समय की सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण की है, जिसे आदिम समाज बचाए हुए है और सभ्यता की विकास-यात्रा उसी समाज को रोड़ा मानते हुए राह से हटा देने को तत्पर है। प्रो. मानवेंद्र पांडेय ने पूर्वोत्तर भारत के हिंदी उपन्यासों से उपेक्षित रह जाने को प्रश्नांकित करते हुए उसके भूगोल और सामाजिक जीवन में निहित कथा-संभावनाओं की चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी के उन विरलप्राय उपन्यासों का भी एक संक्षिप्त सारगर्भित मूल्यांकन प्रस्तुत किया जो पूर्वोत्तर के जनजातीय जीवन से जुड़े हैं, जैसे देवेंद्र सत्यार्थी का ‘ब्रह्मपुत्र’, श्रीप्रकाश मिश्र का ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’, ‘देश भीतर देश’ आदि। श्रीप्रकाश मिश्र ने आदिवासियों से जुड़े उपन्यासों की विस्तृत अनुभवजन्य चर्चा की। कहा कि आदिवासी रचनाकार आमतौर पर अपनी पहचान के लिए लिखते हैं जबकि गैरआदिवासी प्रायः किसी राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर चलते हैं। डाॅ. राम सुधार सिंह ने 90 के बाद के उपन्यासों में निहित मुक्ति-चेतना को विशेषतः ‘पहला गिरमिटिया’ और ‘बा’ तथा आनुषंगिक रूप से ‘निर्वासन’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘आखेट’, ‘दस द्वारे का पींजरा’ आदि के आधार पर विवेचित किया। सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. अनंत मिश्र ने सत्र के सभी व्याख्यानों के समाहार के साथ ही बताया कि रचनाकार के शिल्प का निर्माण उसके लेखन से होता है और प्रतिभाशाली लेखक अपनी रचनाओं में शिल्प को लेकर आते हैं। रचनाकार ही है जिसे समाज के अन्याय का अहसास होता है और वह उसकी तरफ इंगिति का साहस भी रखता है, सामर्थ्य भी। इस सत्र का संयोजन डाॅ. साधना भारती ने किया।
सातवें अकादमिक सत्र का विषय था ‘हिंदी उपन्यास और विभिन्न अस्मिताएँ’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार डाॅ. नीरजा माधव ने की। डाॅ. सुनील कुमार मानस ने स्त्री अस्मिता से जुड़े औपन्यासिक प्रयोगों की चर्चा की। डाॅ. मनु पांडेय ने ‘सूत्रधार’, ‘टोपी शुक्ला’ आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों की संरचनात्मक व्यवस्था की पहचान की। प्रो. वंदना मिश्र ने ‘यमदीप’, ‘पोस्ट बाॅक्स नंबर 203 नाला सोपारा’, ‘तीसरी ताली’ और ‘गुलाम मंडी’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से थर्ड जेंडर संबंधी विमर्श की औपन्यासिक परिणति का मूल्यांकन प्रस्तुत किया। प्रो. भारती गोरे ने स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श की विस्तृत चर्चा करते हुए यह भी कहा कि यदि ये विमर्श केवल विमर्श के नाम पर जिंदा हैं तो यह चर्चा की नहीं, चिंता का विषय है। स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब देह की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. नीरजा माधव ने सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिताओं का उल्लेख करते हुए विभिन्न अस्मिताओं को लेकर कुछ फैल गए और कुछ फैलाए गए भ्रमों के सोदाहरण निवारण की कोशिश की। रचना के स्तर पर, खास तौर पर थर्ड जेंडर को लेकर, कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कथाओं के गढ़न-पढ़न को उन्होंने प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि अस्मिता-विमर्श का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। अपनी विदग्ध टिप्पणियों के साथ इस सत्र का संयोजन प्रो. गोरखनाथ ने किया।
आठवाँ सत्र समापन, संपूर्ति समारोह, स्मृति-संवाद और पुरस्कार-वितरण के रूप में आयोजित हुआ। विद्यानिवास मिश्र स्मृति-संवाद में डाॅ. मुक्ता ने बताया कि पंडित जी उन विभूतियों में थे जो धारा में रहते हुए भी धारा के विपरीत चलने का भी साहस रखते हैं। डाॅ. शशिकला पांडेय ने प्रकृति से उनके लगाव और वात्सल्य भाव की विशेष चर्चा की। मुख्य अतिथि प्रो. गोपबंधु मिश्र ने इस आयोजन के केंद्रीय विषय के शास्त्रीय पक्ष को प्रस्तुत किया, इस तर्क के साथ कि मूल को भूलना स्वयं को भुलावे में रखना है, और यह बात पं. विद्यानिवास मिश्र की उस निबंध-कला से स्थापित होती है जो मौलिक, न कि मूलघ्न चिंतन पर आधारित है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पंडित जी ने कोई उपन्यास भले न लिखा हो, लेकिन अपने निबंधों से जो वैचारिक रसायन उन्होंने उपस्थित किया है वह कथा-प्रबंधों के लिए भी स्पृहा की वस्तु है। उन्होंने हिंदी के पहले वैश्विक उपन्यास के रूप में ‘पहला गिरमिटिया’ की पहचान का आग्रह भी किया।
युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं का पुरस्कार-वितरण भी इस सत्र का एक और आकर्षण था। उपन्यास-समीक्षा पर आधारित आलेखों में प्रथम पुरस्कार श्री धनंजय मलिक को, द्वितीय पुरस्कार डाॅ. गुलजबीं अख्तर को, तृतीय पुरस्कार सुश्री क्षमता मिश्र को, सांत्वना पुरस्कार सुश्री शिखा सिंह को तथा सौहार्द पुरस्कार सुश्री नीमालामा को प्रदान किया गया। कविता के लिए सुश्री कागोमादो को प्रथम, डाॅ. फिरोज को द्वितीय, कविता सरोज को तृतीय, अरशान अजीज और नवोदिता त्रिपाठी को सांत्वना पुरस्कार से तथा निबंध के लिए सुश्री पूजा राय को पुरस्कृत किया गया। इस सत्र के संयोजन का दायित्व डाॅ. धीरेंद्रनाथ चौबे ने निभाया।
इस दो दिवसीय आयोजन में वाराणसी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे सुधीजन की भागीदारी रही। हर वर्ष की तरह पूर्वोत्तर भारत के शोध छात्र-छात्राओं ने इस वर्ष भी आयोजन के विभिन्न उपक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आयोजन को सफल बनाने में इसके विभिन्न आयामों से जुड़े सभी सुधीजन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ऐसे आयोजनों के बहुत सारे प्रयोजन होते हैं, लेकिन यह आयोजन विशुद्ध रूप से साहित्य के लिए है। पंडित. विद्यानिवास मिश्र के जन्मोत्सव के साहित्योत्सव होने में ही उसकी सार्थकता है, और यह सार्थकता इस सारस्वत आयोजन में आप सभी सुधीजन की सहभागिता से है।
दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास
