राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ – 11-13 अगस्त 2025

आ. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न आयोजनों की एक वर्षपर्यंत शृंखला विद्याश्री न्यास की तरफ से संकल्पित है, जिसमें से एक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ विषय पर केंद्रित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से भारत अध्ययन केंद्र, वाराणसी और लाल बहादुर शास्त्री पीजी काॅलेज, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में 11 से 13 अगस्त 2025 तक भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सभागार में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन ; माँ सरस्वती, महामना और आ. विद्यानिवास मिश्र के चित्र पर माल्यार्पण, श्री केशव मिश्र एवं श्री शिवम तिवारी के स्वस्ति-वाचन, श्री विवेक तिवारी के मंगलाचरण, आचार्य सुद्धन पांडेय की शंखध्वनि, संगीत और मंच कला संकाय के विद्यार्थियों की कुलगीत-प्रस्तुति, अतिथियों के सारस्वत सम्मान और प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी के स्वागत-वक्तव्य से हुआ। उद्घाटन-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए सत्र के मुख्य अतिथि आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी (अयोध्या) ने धर्म के सनातन स्वरूप को बहुत सहजता से हृदयंगम कराया। बताया कि जो होना चाहिए, वह होना और उसका होना ही धर्म है। भारतीय समाज में अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति के भीतर जो मूल्यबोध है, कर्तव्याकर्तव्य का विवेक है, वह हमारी धर्मभावना की देन है, जिसकी पहुँच शास्त्र से लेकर लोक तक अप्रतिहत है। धर्म को जीवन में नैतिकता, सत्य और करुणा का आधार बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसके पालन में आचरण की ईमानदारी सर्वोपरि है। धर्म के विवेचन के क्रम में उन्होंने आ. विद्यानिवास मिश्र की कालजयी कृति ‘हिंदू धर्म : जीवन में सनातन की खोज’ का विशेषतः उल्लेख किया। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि हमारे लिए धर्म जीवन-पद्धति का वाचक है, किसी वस्तु का मूल तत्व है, कर्म-प्रेरक है, कर्तव्य है, स्वभाव है ; अर्थ, काम और मोक्ष का केंद्र है और इस अर्थ में रिलिजन या मजहब से सर्वथा भिन्न है। उन्होंने रेखांकित किया कि धर्म की व्यवस्था गतिशील है और उसमें परिवर्तन सदा संभव है। प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, सचिव, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद ने धर्म और आधुनिक जीवन के बीच एक उचित तालमेल, सांप्रदायिक सौहार्द, सांस्कृतिक संरक्षण और धर्म-दर्शन के वैश्विक संदर्भों के साक्षात्कार की जरूरत पर बल दिया और उम्मीद जाहिर की इस संगोष्ठी में इन उद्देश्यों तक पहुँचने के रास्ते बन सकेंगे, विद्वत्संवाद से आगे बढ़कर यह आमजन और युवजन तक पहुँच बना सकेगी, उनमें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की समझ और उसके प्रति गौरव-बोध विकसित कर सकेगी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि महामना सदैव भारत और भारत-भाव की बात करते थे। भारत अध्ययन केंद्र द्वारा संचालित पाठ्यक्रम विभिन्न प्रांतों के जन-जन तक पहुँचे यह महत्त्वपूर्ण है।आ. विद्यानिवास मिश्र के एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा ज्ञान-प्राप्ति के उद्देश्य में बाधक नहीं हो सकती।

उद्घाटन-समारोह की एक उपलब्धि रही भारत अध्ययन केंद्र के भूतल पर नवनिर्मित ‘वैदिक यज्ञ-पात्र संग्रहालय’ का उद्घाटन और दूसरी उपलब्धि रही डाॅ. दयानिधि मिश्र द्वारा इस संगोष्ठी के केंद्रीय विषय पर संपादित और प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ का लोकार्पण। इसके साथ ही ‘सोच-विचार’ पत्रिका के यशस्वी संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों को पत्रिका के ‘काशी अंक-16’ और ‘विद्यानिवास मिश्र विशेषांक’ से विभूषित किया। सत्र में धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने और सत्र का संचालन-संयोजन डाॅ. रामसुधार सिंह ने किया।

पहला अकादमिक सत्र ‘धर्म की अवधारणा : धर्मविषयक चिंतन का विकास और विकृतियाँ, धर्म की विविध परंपराएँ’ विषय पर प्रो. श्याम सुन्दर दुबे (दमोह) की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। प्रो. शंकर कुमार मिश्र (वाराणसी) ने बताया कि वैदिक काल में धर्म को ऋत कहा गया, तदनुसार प्रकृति की नियमबद्धता ही धर्म है। उपनिषदों में वह आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष की ओर उन्मुख हुआ, आत्मा की शुद्धि और सत्य की खोज को ही धर्म का मान दिया गया। रामायण और महाभारत काल में इसे कर्तव्य और न्याय के रूप में देखा गया। धर्म की विविध परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रो. धनंजय मणि त्रिपाठी (नई दिल्ली) ने धर्म के विविध रूपों — सामान्य धर्म, विशिष्ट धर्म, वर्णधर्म या स्वधर्म, आश्रम धर्म, कुलधर्म, युगधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म आदि के माध्यम से उसके विभिन्न आयामों को प्रत्यक्ष किया। डाॅ. लक्ष्मी मिश्र ने धर्म के, स्मृतियों में प्रस्तुत स्वरूप को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए विश्लेषित किया। उन्होंने विभिन्न स्मृति-संदर्भों का आधार लेते हुए बताया कि स्मृतिकारों ने मानवमात्र के अभ्युदय एवं निःश्रेयस के लिए ही धर्म का निर्धारण किया है। व्यक्ति और समाज दोनो के कल्याण का संभव मार्ग धर्म ही है, यदि देश-काल और परिस्थिति के अनुसार उसकी नमनीयता को भी उसके एक अनिवार्य अभिलक्षण के रूप में समझा और स्वीकार किया जाय, तो। प्रो. श्याम सुंदर दुबे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन को धर्म और लोकजीवन के संबंध-परस्पर पर केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज के लिए धर्म हमेशा से प्रेरक की भूमिका में रहा है। वेद ने यदि प्रकृति को आत्मसात करते हुए दर्शन और अध्यात्म की गहराइयों में प्रवेश किया तो लोक ने प्रकृति के साथ जीना सीखा और अपनी सामाजिकता में ही अपने दर्शन और अध्यात्म को लीन कर लेने में बहुविध प्रवीण हुआ। वस्तुतः लोक का धर्म लोक जीवन के व्यापक व्यवहार का ही अंग है। इस सत्र का संचालन डाॅ. शिवलोचन शांडिल्य ने किया।

दूसरा अकादमिक सत्र (12/08/25) भारतीय शास्त्रीय चिंतन में धर्म के स्वरूप की खोज से संबंधित था। प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने रामचरितमानस का आधार लेते हुए सबके प्रति और सबकुछ के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति को सर्वोपरि धर्म के रूप में रेखांकित किया। तुलसी ने धर्म को जीवन की दैनंदिनी में प्रतिपादित किया है। ‘पर हित सरिस धरम नहिं भाई’ जैसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य के रूप में ही नहीं, ‘एहि ते अधिक धरम नहिं दूजा, सादर सास-ससुर पद पूजा’ जैसे अभी की समस्या के समाधान के लिए अभी-अभी रच लिए गए सिद्धांत भी धर्म के व्यावहारिक रूप को प्रत्यक्ष करते हैं। प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने कहा कि भारत की संपूर्ण शास्त्र-परंपरा लोक को समर्पित है। उसने अपने सिद्धांतों को लोक से ही पाया और फिर लोक तक ही पहुँचाया है। लोक तक पहुँचने-पहुँचाने में उसे जब और जहाँ कोई कठिनाई आई है, उसने नए रास्ते निकाले हैं, सिद्धांत नहीं बदले हैं। धर्म की वैदिक अवधारणा रामायण, महाभारत, स्मृतादिक के माध्यम से लोक तक पहुँचती है, लोक की जरूरतों के मुताबिक हमारे शास्त्र स्वयम् को नित्य नवीन करते रहते हैं और इसी अर्थ में वे सनातन हैं। प्रो. माधव जनार्दन रटाटे ने श्रीमद्भागवत में प्रतिपादित भागवत धर्म की व्याख्या की। उसमें सबके प्रति समभाव रखने को कहा गया है और भक्ति को परम धर्म के रूप में रेखांकित किया गया है। भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य की भी प्राप्ति होती है। श्री ज्ञानेश्वर प्रसाद त्रिपाठी (लखनऊ) ने पं. विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘भागवत भूमि’ का उल्लेख करते हुए सृष्टि-चक्र तथा धर्म और साहित्य के बहुस्तरीय रिश्तों के मर्म पर प्रकाश डाला। इस क्रम में उन्होंने स्वयं-संपादित ‘कबीर ज्योति’ पत्रिका भी मंचस्थ अतिथियों को प्रदान की। डाॅ. गायत्री प्रसाद पांडेय ने महाभारत के आलोक में धर्म की चर्चा करते हुए बताया कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा जो महाभारत में है वह अन्यत्र तो मिल सकता है, लेकिन जो महाभारत में नहीं है वह और कहीं नहीं है, यह भी सही है। वह मानता है कि सत्य के समान और परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। प्रो. संतोष कुमार शुक्ल (नई दिल्ली) ने धर्म की पौराणिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बताया कि जीवन में जो भी सनातन है वह धर्म है, यह भी कि भारतीय साहित्य, वह चाहे जिस रूप में हो, धर्म का ही आख्यान करता है, और यह भी कि हमारी चौदह विद्याएँ धर्म का ही प्रतिपादन करती हैं। प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने ‘पुराणों और धर्मशास्त्र में धर्म’ विषय पर बोलते हुए बताया कि सनातन धर्म प्रथम धर्म है, सनातन परम ब्रह्म है, वही ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सत्यमात्र का पर्याय है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरिदत्त शर्मा ने बताया कि महाभारत भारतीय धर्म-चिंतन का विश्वकोश है। धर्म के विभिन्न प्रकारों और आयामों को वह सोदाहरण प्रस्तुत करता है। उससे ज्ञात होता है कि सत्य और असत्य का संघर्ष भी सनातन है, जो धर्म को मारता है, धर्म उसे मार देता है तथा जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है — धर्मो रक्षति रक्षितः। इस सत्र का संचालन डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने किया।

संगोष्ठी के तीसरे अकादमिक सत्र ‘धर्म और दर्शन : भगवद्गीता, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, योग और आगम’ के अंतर्गत ‘प्रस्थानत्रयी में से शांकरभाष्य में धर्म का स्वरूप’ पर बोलते हुए प्रो. रामनाथ झा (नई दिल्ली) ने वृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से बताया कि ईश्वर बाहर से नहीं, हमारे भीतर रहकर नियमन करता है, इसी नाते वह अंतर्यामी भी है। उन्होंने भारतीय जीवनयापन के मूलाधार के रूप में धर्म की पहचान की। सारस्वत अतिथि प्रो. शशिप्रभा कुमार (शिमला) ने वैशेषिक दर्शन के आधार पर धर्म के लक्षण, उसके स्वरूप, उसकी उत्पत्ति-प्रक्रिया, उसके साधन, प्रकार आदि का विवेचन किया, साथ ही धर्म को आत्मा के गुण और आत्मा के विशेष गुण के रूप में व्याख्यायित किया। प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने वेदांत में धर्म के स्वरूप पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वेदांत में धर्म परंपरया मोक्ष का साधन होते हुए भी साक्षात मृत्युतरण का उपाय है। धर्मशास्त्र मानवजीवन का संविधान है। वह चारो पुरुषार्थों में हेतुवत है। उन्होंने धर्माचरण में आचार के महत्त्व को भी रेखांकित किया। प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बताया कि महर्षि जैमिनी ने वेदोक्त धर्म की युक्तियुक्त व्याख्या एवं यज्ञीय प्रायोगिक क्रियाओं की स्पष्ट विवेचना के लिए ही मीमांसा-सूत्रों की रचना की। उसमें वेदविहित कर्म को ही धर्म माना गया है। प्रो. सुद्युम्न आचार्य (सतना) ने शाश्वत धर्म के व्याख्याकार के रूप आदि शंकराचार्य के प्रदेयों पर प्रकाश डाला। आदि शंकराचार्य का धर्म-दर्शन अध्यात्म तथा भौतिक विज्ञान के साथ संवादी तथा व्यवहार में भी सहज आचरणीय है। उन्होंने जगत की अनिर्वचनीयता, व्यवहारिक स्तर पर ब्रह्मज्ञान और माया के अनिर्वचनीय विभेद आदि की चर्चा की। प्रो. शीतला प्रसाद पाण्डेय ने आगमशास्त्र के धर्म-विमर्श को प्रस्तुत करते हुए कहा कि धर्म-अधर्म दोनो का सांगोपांग विवरण देने वाला शास्त्र आगम ही है। वह मानता है कि सदाचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है और धर्म से आयु की वृद्धि होती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राजाराम शुक्ल ने सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए बताया कि कैसे हमारे आगम-निगम सभी शास्त्र और हमारा रचनात्मक साहित्य भी, धर्म-विषयक विमर्श को मिल-जुलकर निरंतर पूर्णतर करते रहे हैं। सत्र का संचालन डाॅ. ज्ञानेंद्र नारायण राय ने किया।

संगोष्ठी के तीसरे दिन (13/08/25) की शुरुआत ‘धर्म तथा समाज : आधुनिक विचारक’ विषयक चौथे अकादमिक सत्र से हुई। सोच-विचार पत्रिका के संपादक श्री नरेन्द्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया, उन्हें ‘सोच-विचार’ पत्रिका के काशी अंक 16 एवं आ. विद्यानिवास मिश्र विशेषांक प्रदान किए तथा पत्रिका की प्रकाशन-यात्रा का एक संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया डाॅ. विद्याविंदु सिंह (लखनऊ) ने अनेक लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि का संदर्भ लेते हुए भारतीय लोकजीवन में व्याप्त धर्म के सहज स्वरूप का उद्घाटन किया। वह एक छोटे-से सवाल “कुँअवा खनवले कवन फल, सुनऽ हो राजा दसरथ” और इसके इस छोटे-से जवाब “झोंझवन भरे पनिहारिन तबहिं फल होइहें” से भी जाहिर है। डाॅ. विश्वास पाटिल (महाराष्ट्र) ने महात्मा गांधी की धर्म विषयक अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि गांधी जी स्वयं को सनातनधर्मी कहते ही नहीं है, उसका निरंतर परीक्षण भी करते हैं। उनकी धर्म-संबंधी अवधारणा के मूल में आत्मिक शुद्धि के साथ-साथ व्यापकता की प्रक्रिया है जिसका क्षितिज समाजक्रांति तक फैला हुआ है। प्रो. अवधेश प्रधान ने स्वामी विवेकानंद की धर्म-दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए बताया कि वे धर्म को उस ब्रह्मत्व की अभिव्यक्ति मानते थे, जो मानवमात्र में पहले ही से मौजूद हुआ करता है। धर्म उनके अनुसार साक्षात्कार की वस्तु है, और भारत में धर्म का अर्थ प्रत्यक्षानुभूति है। वे निःस्वार्थपरता को ही धर्म की कसौटी मानते थे। पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता तक ऊपर उठने में धर्म मनुष्य का आंतरिक साथी है। वे धर्म के रूप में वेदांत के संदेश को आदिवासी, जनजाति, गिरिजन तक ले जाने के लिए प्रयत्नशील थे। श्री अजयेंद्र नाथ त्रिवेदी (कोलकाता) ने महर्षि अरविंद की धर्म-दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्होंने सनातन धर्म-चिंतन को नवीन आयाम दिए। अरविंद ने सनातन विचारधारा को भारतीय नवजागरण के उपकरण के रूप में ग्रहण किया। उन्होंने इसके उत्थान को राष्ट्र के उत्थान और इसके पतन को राष्ट्र के पतन के रूप में देखा। उन्होंने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का जो सिद्धांत दिया, सनातन धर्म का संवर्धन उसी सिद्धांत का क्रियापक्ष था। सारस्वत अतिथि और उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेशचंद्र शास्त्री (हरिद्वार) ने स्वामी दयानंद सरस्वती की धर्म-दृष्टि के आधार के रूप में चिकित्सा की उस भावना को रेखांकित किया जो रोग-निदान के लिए शल्य-क्रिया भी करता है, कड़वी औषधियों का भी उपयोग करता है। स्वामी जी ने खंडन और मंडन दोनो के सार्थक उपयोग से धर्म-संबंधी मान्यताओं को देश-काल के परिप्रेक्ष्य के बोध के साथ स्थापित किया। इस क्रम में उन्होंने ‘पंचधा परीक्षा’ की अवधारणा को भी व्याख्यायित किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध पत्रकार श्री राहुल देव ने कहा कि सनातन को एक समुदाय, भूगोल, दिनचर्या आदि तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह सार्वकालिक है, सार्वभौमिक है। ऐसे में वह किसी संकट में है, या हो सकता है — इस तरह की आशंका प्रकारांतर से उसकी सनातनता को ही संशय के घेरे में डालने वाली है। उन्होंने संस्कृति के बाह्य आवरण को सनातन मान लेने के तथा सनातन और समसामयिक में भेद न कर पाने के खतरों की तरफ भी इंगित किया। इस सत्र का संचालन प्रकाश उदय ने किया।

‘धर्म और लोकजीवन : पुरुषार्थ ; नैतिकता तथा मूल्य ; प्रकृति और धर्म ; धर्म में संलग्नता के विविध रूप (पर्व, उत्सव, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि) ; अध्यात्म और उदात्त जीवन की संकल्पना’ विषय पर केंद्रित पाँचवे अकादमिक सह संपूर्ति सत्र में बोलते हुए कला-समीक्षक डाॅ. राजेश कुमार व्यास (जयपुर) ने सनातन की खोज के रूप में हिंदू धर्म की पहचान रखने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के धर्म-संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया। मिश्र जी ने इसे सत्य और ऋत के गठबंधन तथा वर्तमानजीवी धर्म के रूप में देखा। हिंदू विश्व-दृष्टि मनुष्य और प्रकृति दोनो को अविलग देखती है, वह व्यक्त-अव्यक्त, चर-अचर आदि युग्मों को एक-दूसरे के लिए अपेक्षी मानती है। धर्म हमारे लिए न कोई विश्वास है, न आचार-संहिता, वह दोनो को अर्थ प्रदान करने वाला जीवन का स्वभाव-सिद्ध व्यापार है। उन्होंने तीर्थ और पर्वोत्सवों के रूप में व्यक्त होने वाले हमारे धर्म को जीवन के सनातन राग के रूप में ही विश्लेषित किया है। डाॅ. सुप्रिया पाठक (प्रयागराज) ने भारतीय लोकधर्म के जटिल ताने-बाने में स्त्रियों की केंद्रीय और बहुआयामी भूमिका और स्त्रियों के लोकधर्म को लेकर महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनकी भूमिका परंपराओं के संरक्षक के रूप में है, वे सांस्कृतिक प्रतीकों और प्रतिनिधि आकृतियों को प्रस्तुत करती रही हैं। गार्गी, मैत्रेयी से लेकर मीराबाई और उनके बाद की भी अनेक स्त्री-शक्तियों के हवाले से उन्होंने अपनी बात रखी। प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने धर्म और प्रकृति के संबंध-परस्पर को केंद्रित करते हुए धर्म को ईश्वर की रचना ‘प्रकृति’ से भिन्न मनुष्य की रचना के रूप में, धार्मिक अवधारणाओं के विकास को मनुष्य की चेतना के विकास के साथ जोड़कर देखने का आग्रह रखा। भारतीय चिंतन-धारा के मूल ग्रंथों में धर्म का जो स्वरूप है वह समाज की संवेदना को जगाने वाली व्यवस्था के रूप में है। वह जीवन और समाज को अनुशासित करने का एक सार्वभौम उपकरण है। हालाँकि हस्तक्षेप करते हुए प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने पूजा-अर्चना को भी धर्म के अंग के रूप में मान देने की बात कही और श्री सुशील त्रिपाठी (चित्रकूट) ने उनके मत का सतर्क समर्थन भी किया। डाॅ. कमल किशोर मिश्र (कोलकाता) ने धर्म के सजीव लोकपक्ष के रूप में पर्व, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि की चर्चा की। पर्व धर्म का सामूहिक आलोक है, प्रार्थना स्व और ब्रह्म के बीच के पुल की तरह है, कथा धर्म की दृष्टि से जीवन का शिल्प रचती है और सत्संग आत्मविकास की सामूहिक साधना है। श्री महेंद्र जी (लखनऊ) ने धर्म को जीवन के आधार के रूप में विश्लेषित किया। धर्म ही जीवन को अर्थवान और मूल्यवान बनाता है। डाॅ. मिथिलेश तिवारी (प्रयागराज) ने सामाजिक परिवर्तन में धर्म की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक परिवर्तन पर धर्म का प्रभाव इस बात पर निर्भर है कि धर्म को कैसे समझा और बरता जाता है। सामाजिक एकीकरण में और सामाजिक सुधारों में धार्मिक आंदोलनों की भूमिका को तो उन्होंने रेखांकित किया ही, यह भी कहा कि धर्म की संकुचित समझ सामाजिक विघटन को निमंत्रित कर सकती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए धर्मानुकूल आचरण अपेक्षित है। अर्थ और काम भी धर्म से संबद्ध होकर ही प्राप्य हैं। धर्मपूर्वक अर्थ और धर्मपूर्वक काम के सेवन का परिपाक ही मोक्षदायी है।

संपूर्ति सत्र में ही महाकवि प्रसाद पर केंद्रित विद्याश्री न्यास के दो आयोजनों की पुस्तक-परिणति ‘जयशंकर प्रसाद : सांस्कृतिक रचनाधर्मिता के आयाम’ को भी मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पित किया गया। प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का संपादन डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया है।

इस सत्र का संयोजन डाॅ. अमित कुमार पाण्डेय ने किया। लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के समस्त प्रतिभागियों, सहयोगियों, विद्वान वक्ताओं और सुधी श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट किया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न शिक्षा-संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के अतिरिक्त एक बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी और धर्म में, धर्म के वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार में रुचि रखने वाले सुधीजन की भी उपस्थिति रही।

‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल विषयक संगोष्ठी- जुलाई 2025

रामचंद्र शुक्ल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की साहित्यिक योगदानों पर मंथन

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत हिंदी गद्य के उन्नायक राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं हिंदी निबंध के शीर्ष आचार्य राम चंद्र शुक्ल से संबंधित संगोष्ठी आयोजित की गई ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समग्र योगदान को रेखांकित करते हुए मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विवि दिल्ली के हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के पहले गंभीर और व्यवस्थित आलोचक हैं। उनकी आलोचना का दायरा व्यापक है।हिंदी , अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के विस्तृत अध्ययन और विवेचन से उनका समीक्षा साहित्य विकसित हुआ है। वे मात्र समीक्षक ही नहीं हैं । कवि ,अनुवादक, निबंधकार , जीवनीकार , संपादन और टिप्पणीकार आदि रूपों में भी उनकी समान गति दिखाई देती है। शुक्लजी के अंग्रेजी निबंधों से हिंदी के पाठक कम परिचित हैं । इन निबंधों का दायरा विस्तृत है । ये निबंध साहित्य , समाज और राजनीति को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं । शुक्लजी के आलोचक व्यक्तित्व की निर्मिति में अंग्रेजी से हिंदी में किया गया उनका अनुवाद केंद्रीय भूमिका का निर्वाह करता है।

बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रो प्रभाकर सिंह ने शिवप्रसाद सितारे हिंद के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द:भाषा चिंतन और इतिहास दृष्टि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में और हिन्दी नवजागरण के चिंतक और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द भाषा और इतिहास संबधी अपने चिंतन के लिए जितना जाने गये उससे अधिक हिन्दी-उर्दू विवाद के लिए चर्चित रहे। ‘इतिहास तिमिर नाशक’ और ‘भूगोल हस्तमलक’पुस्तके उनके ज्ञान साहित्य की नवाचारी इतिहास-दृष्टि की परिचायक हैं तो ‘राजा भोज का सपना’उनके सृजन धर्मी व्यक्तित्व का उदाहरण है। प्राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के इतिहानलेल लेखन में अन्ग्रेजी साम्राज्यवादी इतिहास -दृष्टि के प्रति प्रशंसा भाव के बावजूद वह भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक चेतना की भी शिनाख्त कर रहे थे। भाषा चिंतन में वह हिन्दी-उर्दू के व्यावहारिक मिलन से उत्पन्न ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्षधर थे। फ़ारसी लिपि की जगह देवनागरी लिपि का समर्थन कर रहे थे। आज जरूरत है उनके चिंतन और सृजन के वैज्ञानिक पहलू‌ओं की पड़ताल करने की।

अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डा. मुक्ता ने कहा कि प्रारंभिक खड़ी बोली हिंदी के विकास एवं देवनागरी लिपि के अस्तित्व के संघर्ष में राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने हिंदी की रक्षा के लिए पाठ्य पुस्तक’ गुटका में राजा भोज का सपना वीर सिंह वृतांत आदि कहानियाँ लिखीं।’ बनारस अखबार ‘ का प्रकाशन शुरू किया। सुविख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कृति’ हिंदी साहित्य का इतिहास’ आज भी मिल का पत्थर बनी हुई है। हिंदी साहित्य का शब्दकोश हिंदी शब्द सागर, भाषा शैली व्याकरण संबंधी नए मानक बनाने और हिंदी साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का श्रेय आचार्य शुक्ल को है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी को’ देव बड़े हैं या बिहारी’ के संकीर्ण घेरे से बाहर निकाला। स्वागत भाषण करते हुए डा दयानिधि मिश्र ने हिंदी की धरोहर ःकाशी की सृजन परंपरा के महत्व को बताते हुए आज के विषय पर प्रकाश डाला। संचालन डा.शुभ्रा श्रीवास्तव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।सरस्वती वंदना मंजरी पाण्डेय ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,प्रो इंदीवर, डा.सुरेन्द्र प्रताप ने भी विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर दीपेश चौधरी, अशोक सिंह, इशरत जहां, मंजरी पाण्डेय,कवीन्द्र नारायण आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।

हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परम्परा (तृतीय पुष्प) – 23 जून 2025

वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय पुस्तकालय में साहित्यिक संस्था साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन -परंपरा के अन्तर्गत हरिश्चंद्र की प्रेमपोषिता एवं उस समय की महत्वपूर्ण किन्तु उपेक्षित लेखिका मल्लिका तथा हिन्दी के उन्नायक बाबू श्यामसुंदर दास पर केंद्रित व्याख्यानमाला आयोजित किया गया। मल्लिका के योगदान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डा. नीरजा माधव ने कहा कि 19वीं सदी की एक गुमनाम लेखिका 21वीं सदी में एकाएक चर्चा में आती हैं और वह थीं माल्लिका। मल्लिका प्रख्यात लेखक भारतेंदु की प्रेम पोषिता थीं, यह बात दुनिया को हिंदी साहित्य के पुराने इतिहास लेखन के ग्रन्थों से नहीं पता चलती क्योंकि वहां तो मल्लिका देवी का नामोल्लेख तक नहीं मिलता कि उन्होंने भी साहित्य में क ख ग कुछ भी लिखा था। मल्लिका बंगाल की बाल विधवा थीं। काशीवास के लिए आई थीं और भारतेंदु भवन के ठीक दक्षिण गली में वह निवास करती थीं। साहित्य के कारण ही वे भारतेंदु जी के संपर्क में आईं। मल्लिका की रचनाओं में चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश, कुमुदिनी और पारस्य उपन्यास के अलावा प्रेम तरंग नामक बांग्ला गानों का संग्रह भी है। उन्होंने बांग्ला साहित्य से कई ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया था। इसके अलावा उन्होंने बहुत सी स्फुट कहानियां भी लिखी थीं। नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी में उनकी बहुत सारी रचनाएं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मुझे उपलब्ध हुईं जिन्हें मैंने अपने इतिहास ग्रंथ” हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास” में पहली बार शामिल किया । लेकिन दुखद रहा कि भारतेंदु जी की समकालीन इस लेखिका को इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं मिल सकी। रोचक बात यह भी है कि बाद के कुछ इतिहासकारों ने “चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश” उपन्यास को भारतेंदु के ही रचनाओं के खाते में डाल दिया। मल्लिका के ब्याज से हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की एक नई पड़ताल आवश्यक हो गई है। बाबू श्यामसुंदर दास के योगदान की चर्चा करते हुए डा.प्रभात मिश्र ने कहा कि विभिन्न प्रांतों में इस समय भाषा को लेकर जिस प्रकार की संकुचित धारणा सामने आ रही हैं, उस समय बाबू श्यामसुंदर दास को याद करने का अर्थ बड़ा हो जाता है। श्यामसुंदर दास हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचारक, विस्तारक और उन्नायक इन तीनों भूमिकाओं में अग्रणी रहे। यह कहा जाता रहा है कि श्यामसुंदर दास ने ग्रंथों के साथ ग्रंथकारों की भी रचना की थी।

भाषा विज्ञान, साहित्य का इतिहास, समालोचना जैसे हिन्दी के नवीन क्षेत्रों में आपके द्वारा जैसी मजबूत पीठिका स्थापित हो सकी उसी पर हिन्दी आज भी स्थिर दिखाई पड़ती है। हिन्दी विषय में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा का आरंभ श्यामसुंदर दास के अशांत श्रम के अभाव में उस समय संभव ही नहीं था। काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सरस्वती पत्रिका, हिन्दू विश्वविद्यालय हर जगह श्यामसुंदर दास ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनके काम से बाद की पीढ़ियों ने प्रेरणा पाई है।

साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए श्यामसुंदर दास ने हजारों पांडुलिपियों की खोज करवाई, योग्य विद्वानों से उनका उत्कृष्ट संपादन करवाया, शब्दकोश का निर्माण किया और व्याकरण के ग्रंथ तैयार करवाए, साहित्य का इतिहास लिखा।

बाबू साहब जातीयता के प्रचण्ड पोषक थे, अपनी संस्कृति के कट्टर उद्घोषक थे। इसी से जातीयता अथवा संस्कृति संबंधी प्रश्नों पर किसी से समझौता करने के पक्ष में वे नहीं थे। वे देवनागरी लिपि को वैज्ञानिक लिपि मानते थे, और उसमें वे किसी भी प्रकार के परिवर्तन किये जाने के विरोधी थे। वे किसी भी मूल्य पर उसकी सुन्दरता नष्ट करने को तैयार नहीं थे।
श्यामसुंदर दास में दूरदृष्टि और निर्माण की अद्भुत क्षमता थी। हमें ऐसे साहित्य मनीषी की साहित्य सेवा के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए। अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर श्रद्धानंद ने कहा कि मल्लिका भारतेंदु की समकालीन थी,उन्हीं की प्रेरणा से बंगला से हिंदी साहित्य लेखन में प्रवृत्त हुई। उनकी ‘कुमुदिनी’ हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में परिगणित की जा सकती है,परंतु इतिहास लेखकों ने उपेक्षित रखा। उनकी कविताएँ भारतेंदु के प्रेमतरंग में संकलित है ।उनके साहित्यिक अवदान पर यथेष्ट प्रकाश डालने की आवश्यक है।
बाबू श्यामसुंदर दास जी ने हिंदी भाषा,नागरी तथा साहित्य को समृद्ध करने में अपना सर्वस्व खपाया।नागरी प्रचारिणी सभा उनका जीवंत स्मारक है। उन्होंने हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एवं हिन्दी आलोचना को नई दिशा दी । बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बाबू श्यामसुंदर दास के इतिहास एवं आलोचना दृष्टि को पुनर्मूल्यांकित करने की महती आवश्यकता है । प्रारंभ में स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्रा ने कहा कि साहित्यिक विरासत को जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है। धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने किया।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,डा.प्रकाश उदय,डा.अशोक कुमार सिंह,डा.भगवंती सिंह,डा.शशिकला पांडेय,कविन्द्र नारायण सहित बड़ी संख्या में काशी के कवि, रचनाकार, उपस्थित रहे। विशेष बात यह रही की कार्यक्रम में बाबू श्यामसुंदर दास के वंशज अशोक खन्ना,तथा भारतेन्दु के वंशज दीपेश चौधरी भी उपस्थित थे।

हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परम्परा (द्वितीय पुष्प) – 30 मई 2025

वाराणसी। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी समारोह के अंतर्गत राजकीय पुस्तकालय के सहयोग से साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में बुधवार को राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार के सभागार में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा विषयक श्रृंखलाबद्ध व्याख्यानमाला आयोजित हुआ। जिसके द्वितीय पुष्प के रूप में तेग अली तेग के समग्र योगदान पर प्रो. प्रकाश उदय ने कहा कि तेग अली भोजपुरी के पहले गजलगो तो हैं ही, उन्हें गजल और भोजपुरी दोनो को एक दूसरे के काबिल बनाने का भी श्रेय है। काशी अपनी आवाज, अपने अंदाज सब कुछ के साथ उनकी गजलगोई में समाई हुई है। स्वयं भारतेंदु उनके काव्य-बल के कायल रहे हैं। जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और ईश्वरचंद्र सिन्हा की भोजपुरी कहानी ‘भैरवी के साज’ बहुत कुछ तेग अली की कविताई से ही प्रेरित है। नजाकत और नफासत के लिए ख्यात गजल को तेग अली ने अपनी काशिका के जरिए एक खास तरह की दबंगई और देहातीपन से जोड़ते हुए उसे एक अलग ही आस्वाद से संपन्न किया। जगन्नाथ दास रत्नाकर के अवदान परबोलते हुए प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि जगन्नाथदास रत्नाकर खड़ी बोली हिंदी के आरंभिक महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं ।वह अपने ब्रजभाषा में रचित “उद्धव शतक” के लिए विशेष रूप से याद किए जाते हैं। रत्नाकर जी रीतिकालीन कविता और आधुनिक कविता के सेतु हैं। उनका उद्धव शतक ब्रजभाषा कविता का अंतिम प्रबंधात्मक काव्य है इसमें उन्होंने निर्गुण पर सगुण और ज्ञान पर प्रेम की विजय का उद्घोष किया है। उद्धव शतक कृष्ण काव्य परंपरा में इसलिए भी विशिष्ट है की इसमें भावुकता के साथ-साथ तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि भी है।
समारोह के अध्यक्षता करते हुए पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि तेग अली भारतेंदु काल के काशिका और भोजपुरी के कवि और लावनीकार थे। हिंदी के इतिहास ग्रंथों में इनका बहुत उल्लेख नहीं किया गया है। रत्नाकर जी ब्रजभाषा के अंतिम कवि हैं ।यह छायावाद का उत्कर्ष काल रहा है, पर उन्होंने ब्रजभाषा की परंपरा को अपनाया। रत्नाकर जी काशी की साहित्यिक परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज के आयोजन में दोनों वक्ताओं का समाहार करते हुए प्रो श्रद्धानंद ने कहा कि काशी के तेग अली, जगन्नाथ दास रत्नाकर आधुनिक काल के महत्वपूर्ण कवियों में है। एक काशिका का तो दूसरा ब्रज भाषा का। स्वागत डा.दयानिधि मिश्र, कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। कार्यक्रम का आरंभ शरद श्रीवास्तव की सरस्वती वंदना से हुआ।संयोजन कंचन सिंह परिहार ने किया

सभी भारतीय भाषाओं को एकता सूत्र में बांधना राष्ट्रीय एकता हित में – 24 मई 2025

वाराणसी। विद्याश्री न्यास श्रीनिवास न्यास कार्यालय में विद्या निवास मिश्र शताब्दी वर्ष में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में पं जी की भारतीय भाषाओं से संदर्भित वैश्विक अवधारणा पर एक संगोष्ठी आयोजित किया गया। इसमें मराठी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक विश्वास पाटिल, इतिहास विद् एवं फिल्म निर्माता आशुतोष पाठक, एमजी निकम की विशेष उपस्थिति रही। संगोष्ठी में पधारे विद्धानों का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्र ने कहा कि पं विद्यानिवास मिश्र की भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अपनी मौलिक अवधारणा थी। वे चाहते थे कि हिंदी के साथ समस्त भारतीय भाषाएं एकता के सूत्र में बंधकर मजबूत बने। हम चाहते हैं कि विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष मे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के साथ संवाद करके इस विचार को मूर्तरूप दिया जाय। इसके पूर्व तमिल भाषा के विद्वानों के साथ संवाद हो चुका है। आज विश्वास पाटिल का स्वागत करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। विश्वास पाटिल ने कहा कि मुझे बताया गया है पंडित विद्यानिवास मिश्र जी की जब कर में दुर्घटना हुई उसे समय वह मेरा उपन्यास चंद्रमुखी पढ़ रहे थे यह सुनकर मैं बहुत भावुक हो गया और आज मैं पंडित जी की कर्मभूमि काशी के प्रणाम करने यहां आया हुआ हूं पार्टी ने कहा कि मैं महाराष्ट्र के सुदूर गांव में पैदा हुआ। वरूणा नदी के पास 18 साल की उम्र में मैंने एक लड़की की कहानी नाम से उपन्यास लिखा था और 28 वर्ष की उम्र में पानीपत लिखा, जो पानीपत की तीसरी लड़ाई पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है मूल मराठी में यह उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आज तक इसकी तीन 3 लाख से अधिक कृतियां बिक चुकी हैं इस तरह सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर लिखा गया उपन्यास महानायक की अत्यंत लोकप्रिय हुआ चंद्रमुखी उपन्यास पर मराठी में फिल्म बन चुकी है जिसकी बहुत अधिक प्रशंसा हुई श्री पाटिल ने बताया कि वह शिवाजी के जीवन को लेकर महा सम्राट नाम से उपन्यास लिख रहे हैं इसके तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं और इनका अंग्रेजी हिंदी और कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है मेरे उपन्यास मराठी के बाद सबसे अधिक हिंदी में अनुवादित होकर पढ़े गए प्रारंभ में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने विश्वास पाटिल के सृजन संसार का परिचय देते हुए कहा कि विश्वास पाटिल के ऐतिहासिक प्रयासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह पूर्ण ऐतिहासिक स्थलों पर स्वयं गए हैं और वहां से उन्होंने मूल स्रोतों की खोज की ।उनके उपन्यास इसी कारण काल्पनिक न होकर तथ्य परक हैं इन उपन्यास की दूसरी बड़ी विशेषता इनकी रोचक ता है यह कहीं भी पढ़ने में बोझिल नहीं होती है। आशुतोष पाठक ने कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी होते हुए पाटिल ने इतने वृहद आकर के उपन्यास का सृजन किया है। यह आश्चर्य की बात है। डा.प्रकाश उदय ने मराठी भाषा साहित्यकारों विशेषकर दलित कथाकारों पर अपने विचार रखे। संचालन प्रो उदयन मिश्र, धन्यवाद ज्ञापन डा.ॠतंधर मिश्र ने किया।

शैल अग्रवाल जी की कहानियाँ सहज रूप में प्रभावित करती हैं, प्रो. सुरेन्द्र प्रताप – 26 मार्च 2025

साहित्यिक संघ, वाराणसी, राजकीय पुस्तकालय, वाराणसी एवं विद्याश्री न्यास द्वारा आयोजित इंग्लैण्ड की वरिष्ठ कवि-कथाकार शैल अग्रवाल के रचना-पाठ पर केन्द्रित संगोष्ठी में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए प्रो. सुरेन्द्र प्रताप ने कहा कि शैल जी गद्य और पद्य दोनों विधाओं पर समान रूप से अधिकार रखती हैं। आप की शैली भिन्नात्मक और अभिव्यक्ति की गहन संवेदना से भरपूर है।

कवि-कथाकार शैल अग्रवाल का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा शैल जी बनारस की बेटी हैं। एक लम्बे समय से ब्रिटेन में रहते हुए भी इन्हें भारत और राष्ट्रभाषा हिन्दी से अगाध प्रेम है। लेखन के साथ-साथ संगीत, नृत्य एवं चित्रकला में इनकी गहन रुचि है। शैल अग्रवाल जी ने ब्रिटेन, न्यूयार्क, मारिशस के विश्व हिंदी सम्मेलन में सक्रिय सहभागिता के अलावा आपने देश-विदेश के कई प्रतिष्ठित मंचों से कहानी-कविता व आलेख का पाठ किया है। आपको अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है।

प्रारंभ में शैल अग्रवाल जी ने अपनी चयनित कविताओं के पाठ के उपरान्त अपनी कविता सागर के मन मे, उलझन, एक और सच कविताओ का तथा जिजी कहानी का वाचन किया। ये कविताएँ मन को तलाशती सामाजिक विसंगतियों को उजागर करतीं तीन छोटी-छोटी कविताएं है। जिजी कहानी रिश्तों के ताने-बानेपर बुनी एक विभाजित वर्गों की कहानी, जो वक्त के महत्व को तो दर्शाती है! दिखाती है कैसे हजार नेक – नीयति के बाद भी कैसे जरा-सा आलस सामने वाले को पूरी तरह से तोड सकता है सबकुछ बिखेर सकता है क्योंकि अक्सर हमें दूसरे की जरूरत और मजबूरी का सही अनुमान नहीं लग पाता। पश्चाताप की अग्नि मे धधकती एक संवेदनात्मक कहानी।शैल जी के सृजनकर्म पर विचार व्यक्त करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डॉ. मुक्ता ने कहा कि बनारस में जन्मी और 55 वर्षों से ब्रिटेन में रह रहीं शैल अग्रवाल का रचना संसार बहुआयामी है। अपनी कहानियों में जहाँ वे एक ओर लोक से जुड़ती हैं, वहीं परम्परा के ग्राह्य तत्वों को स्वीकार करती हुई आलोचक दृष्टि से सम्पन्न है। शैल जी की कहानी स्त्री मन की परतों को उद्घाटित करती हैं। कहायिों का बुनावट पारदर्शी है। संवेदना से ओत-प्रोत आप की कहानियाँ मर्मस्पर्शी हैं। पर्यटन के अनुभव आपकी कहानियों में मुखर हैं। इस रूप में ‘शहजादी’ कहानी मन को छू लेने वाली है। इस कहानी में वर्ग संघर्ष स्पष्ट है। इनके कहानियों की भाषा पात्रानुकूल और संप्रेषणीय है। शैल जी की कविताएँ अन्तरमन से साक्षात्कार करती हुई समय के खड़े प्रश्नों से टकराती हैं।

अपने उद्सोपान में शैल जी ने विद्याश्री न्यास और सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र के प्रति आभार व्यक्त करते हुए बनारस के अपने अनुभवों को साझा किया और कहा कि लिखना प्रारंभ में मेरे लिए स्वान्तः सुखाय और जीवन के तनाव से मुक्ति के लिए रहा, जो बाद में आदत और मजबूरी बन गया। मेरी पहली कहानी, ग्यारह वर्ष की आयु में बनारस में पढ़ते समय छपी थी। बाद में कई कविताएँ और कहानियाँ आज अखबार में भी प्रकाशित हुई। मैं दुनिया में चाहे जहाँ भी धूम आऊँ, बनारस जैसा कहीं भी नहीं लगता।

कार्यक्रम का संचालन डॉ. प्रीति जायसवाल तथा श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र ने आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर. प्रोफेसर श्रद्धानंद प्रोफेसर जय राम सिंह हिमांशु उपाध्याय डॉ इंडिवर डॉ अशोक सिंह पवन कुमार शास्त्री सिद्ध नाथ शर्मा डॉ सत्येंद्र मिश्रा आचार्य श्रीकृष्ण शर्मा शशि शेखर मिश्र आदि उपस्थित रहे।

‘हिन्दी का विश्व प्रसार’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा – 22 मार्च 2025

पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर युवा हिन्दी संस्थान, अमेरिका, साहित्यिक संघ, वाराणसी, लालबहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुगलसराय व विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नदेसर स्थित होटल मैजिक लीफ मे आज “*हिन्दी का विश्व प्रसार” विषय पर अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया।

आज हिंदी का प्रयोग व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, कला, विज्ञान, के साथ विविध क्षेत्रों में बढ़ तो रहा है। भारतवासी जब तक सच्चे मन से हिन्दी को नहीं आपायेंगे तब तक उसे विश्व में सही स्थान मिलना कठिन है, अतः प्रसन्नता कि बात है कि भारत के बाहर खास तौर से अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में काफी प्रगति हुई है और हिन्दी विश्व हिन्दी के रुप में स्थापित होने की ओर अग्रसर है। उक्त बातें ‘हिंदी का विश्व-प्रसार’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा में युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका के अध्यक्ष *डॉ. अशोक ओझा ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति *प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि अमेरिका से यहाँ आये इन हिन्दी सेवियों को देख-सुनकर विश्व में हिंदी की लोकप्रियता को समझा जा सकता है। हिंदी का वैश्विक परिदृश्य संभावनाओं से परिपूर्ण है। इसका कारण हिंदीभाषियों का सम्पूर्ण विश्व में फैला होना है। आज भारत के लाखों नागरिक विदेशों में बसे हैं। इनमें शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से लेकर रोजगार तथा व्यापार के लिए गये लोग भी शामिल हैं। ये सभी लोग विदेश में भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं किन्तु भारत के लोगों को अंग्रेजी का मोह छोड़कर राष्ट्रीय भावना से हिन्दी को अपनाना होगा।
कार्यक्रम की सारस्वत अतिथि प्रो. गैब्रिएला निमोलावा ईलेवा ने कहा कि भाषा के आदान-प्रदान से दो राष्ट्रों के बीच सद्भाव और मैत्री की स्थापना होती है। आज पूरे विश्व में जो हिंदी का सम्मान बढ़ा है, उसका प्रमुख कारण हिंदी भाषा की उदारशीलता, अन्य भाषाओं के शब्दों की स्वीकार्यता है। आज काशी में आप सभी के बीच में आकर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हिंदी विश्व प्रेम की भाषा है।

कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि इस समय विश्व के लगभग डेढ़ सौ देशों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन हो रहा है। इसके पीछे हिंदी भाषा में निहित भारतीय ज्ञान परंपरा और मानवता के कल्याण की भावना तो है ही, यहाँ का जनबल और बाजार भी है। भारत में बाजार की संभावना के कारण अमेरिका, चीन एवं अन्य समर्थ देश अपने विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा रहे हैं। दुनिया भर में फैले भारतीय समाज के लोग हिन्दी और इसके साथ ही भारतीय संस्कृति का प्रसार कर रहे हैं। आज हिंदी भारत की आवाज है।

कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. रामसुधार सिंह ने वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की लोकप्रियता के सन्दर्भ में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिन्दी में किये जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा में विश्व की भाषा बनने की सामर्थ्य है, अपार संभावनाएँ और आवश्यकता भी है।
युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका से पधारे शिष्ट मण्डल का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक ओझा और उनकी टीम सच्चे मन से अमेरिका में हिन्दी का प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही है जो हमारे लिए प्रेरणास्पद है।

सुश्री कुद्युम, ड्यूक यूनिवर्सिटी, नार्थ कोलम्बिया ने कहा कि आज अधिकांश देशों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन और प्रशिक्षण कार्य हो रहा है। हिंदी की गद्य और पद्य की अनेकशः विद्याओं में विदेशी हिंदी विद्वान और साहित्यकार अपनी रचनायें कर रहे हैं। अनेक देशों में उनके आकाशवाणी केन्द्रों और दूरदर्शन के चैनेल्स पर विशेष हिंदी कार्यक्रम और पाठ्यक्रम चलाये जा रहे हैं। अकेले अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि आज विश्व की सांस्कृतिक राजधानी काशी में आप लोगों के बीच होने का अवसर प्राप्त हुआ है।

सुश्री भानुश्री सिसांदिया, युनिवर्सिटी आफ न्यूयार्क ने कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। हिंदी भावों को इस प्रकार प्रकट करती है कि वह मानस पटल को अन्दर तक आन्दोलित करते हैं और हृदय आल्हादित हो जाता है। यही इसकी जीवन्तता का रहस्य है। अमेरिका में हिंदी का अध्यापन करना मेरे लिए गौरव की बात है।
सुश्री नीलाक्षी फूकन ने कहा कि हिंदी की लिपि वैज्ञानिक लिपि है और हिंदी एक समर्थ भाषा है। यहाँ कैपिटल लेटर और छोटे लेटर का कोई विवाद नहीं है, हर लिपि की अपनी विशेषता है। विश्व पटल पर हिन्दी का प्रसार तेजी के साथ हो रहा है। मुझे प्रसन्नता है कि मैं अमेरिका में रहते हुए हिन्दी के विकास के लिए कार्य कर रही हूँ।
सुश्री प्रेमलता वैष्णव ने हिंदी के विकास के संबन्ध में अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि आज के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के युग में अमेरिका में हिन्दी साहित्यकारों का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी काफी आगे बढ़ चुकी है फिर भी इसे तकनीकी शिक्षा की दृष्टि से भी समृद्ध करने की जरूरत है।
सुश्री सविता बाला ने अनुवाद की दृष्टि से हिंदी को और अधिक सक्रिय और समृद्ध बनाने की बात कही। इन्होंने कहा कि अनुवाद के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा।

सुश्री इरियाना सविक ने कहा कि आज विश्व के कई देशों में हिन्दी भाषी लोग जाकर वसे हुए हैं और वहाँ सदियों से रहते हुए भी अपनी भाषा को भूले नहीं है। वे अपने परिवार में हिंदी में ही बातचीज करते हैं। अमेरिका में बड़ी संख्या में हिन्दी बोलने वाले भारत के लोग हैं और इन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।

सुश्री मयूरी रमन नयन- ने हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी भाषा के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि अमेरिका में हिन्दी सिनेमा तथा हिन्दी सीरियल काफी लोकप्रिय हैं। हिन्दी सिनेमा में विदेशी एवं प्रवासी भारतीयों को न केवल सहज समझ में आने वाली हिंदी ही सिखाई जाती है। बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति से भी परिचित कराया। इसी क्रम में सुश्री गरिमा अग्रवाल (न्यू जर्सी), सुश्री गाइनो मीरू मुर्मू (नाथ जर्सी) तथा अनुभूति काबरा ने हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण से संबंधित अपने रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अमेरिका में हिंदी के प्रति लोगों की रूचि बढ़ रही है। हिंदी की कुछ पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की जा रही हैं। दल के अन्य सदस्यों क्रमशः श्री डैनियल मैंगो, प्रशान्त शंकरण, विनोद चौबे, राजेश शाह तथा मनोज के. सिंह ने काशी में अपने अनुभव को साझा किया।

संगोष्ठी का संचालन प्रोफेसर अमित राय ने, धन्यवाद ज्ञापन श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र तथा वाणी के माध्यम से स्वागत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने किया एवं अंग वस्त्रम व स्मृति चिन्ह प्रो उदयन, प्राचार्य व प्रो धर्मेन्द्र सिंह, प्राचार्य ने दिया।इस अवसर पर डा उदयप्रताप सिंह, प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप, प्रोफेसर शैलेश मिश्र धीरज, डा कंचन परिहार, डा हरीश कुमार, हिमांशु उपाध्याय, डा डी डी सिंह, श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र, राम अवतार पाण्डेय, वासुदेव ओबेरॉय, गिरिजेश तिवारी,डा मुक्ता, डा शशिकला, श्रीमती वंदना ओझा,प्रो संजय, प्रो भावना, शत्रुंजय, प्रोफेसर राजीव, कवीन्द्र जी, डा दीपक, डा विमर्श, डा ध्रुवनारायण, श्री आलोक गुप्ता, श्री संतोष, यश नाइक, श्याम सुंदर,अरविंद, राजेश, अनुराग, बुद्धदेव तिवारी, संतोष कुमार, विजयप्रकाश, अशोक सिंह, कार्यक्रम के आरंभ में वैदिक मंगलाचरण जयेन्द्र पति व पौराणिक मंगलाचरण डा यज्ञनारायण ने किया।

अज्ञेय के जन्मदिवस 07 मार्च 2025 को कुशीनगर में आयोजित संगोष्ठी और काव्य संध्या की रिपोर्ट – डॉ गौरव तिवारी, कुशीनगर

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय भारतीय साहित्य संस्थान समिति, श्रद्धाश्री न्यास, विद्याश्री न्यास, कलावती देवी स्मृति न्यास, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर और राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में अज्ञेय के जन्मदिवस के अवसर पर सात मार्च 2025 को भारत चिंतन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आयोजन किया गया।

आयोजन की शुरुआत बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ सौरभ द्विवेदी के द्वारा किए गए मंगलाचरण से हुई। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अरुणेश नीरन ने की। अतिथियों का स्वागत विद्याश्री न्यास, श्रद्धाश्री न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने किया। इस आयोजन में प्रसिद्ध कथाकार और कवि उदय प्रकाश को अज्ञेय स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा मिले इस सम्मान में उन्हें उत्तरीय, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और पच्चीस हजार रुपए दिए गए। पुरस्कार प्राप्ति के बाद अपने स्वीकृति वक्तव्य में उदय प्रकाश ने कहा कि अज्ञेय के नाम से दिए इस सम्मान को प्राप्त करना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता की शुरुआत अज्ञेय से होती है। वे स्वातंत्र्य बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने अज्ञेय के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण भी सुनाए।

अष्टभुजा शुक्ल ने अज्ञेय स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा अज्ञेय से ज्यादा शब्द केंद्रित कवि हिंदी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ। भाषा तो बन जाएगी मूल प्रत्यय शब्द है। शब्द की गरिमा रोज गिराई जा रही है। क्रूर होते जा रहे समय में अज्ञेय के भारत चिंतन पर बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। कवि का पहला सरोकार सत्ता नहीं भाषा और मनुष्य है। भारतीय चिंतन परंपरा सूक्तियों की और सूत्रों की परम्परा है। अज्ञेय ढेर सारी बातें सूत्रों में करते हैं। वे कहते हैं अनंत काल तक जीना अमरत्व नहीं है। मृत्यु भी तो अनंत है। अमरत्व कोई क्षण कोई दृष्टि, कोई अनुभूति है। लोगों के लिए लोगों के द्वारा लोगों का शासन होते होते लोकतंत्र अज्ञेय के शब्दों में “अनपढ़ों के द्वारा अनपढ़ों के लिए अनपढ़ों का शासन” होता गया है।बूंद में समुद्र की शक्ति होती है। वैसे ही मनुष्य में असीम की शक्ति है। इसलिए बूंद होने का महत्व है। अज्ञेय की आधुनिकता और प्रतिबद्धता बूंदों के प्रति है। एक एक मनुष्य की इयत्ता के प्रति है।

उन्होंने अज्ञेय के प्रति अपनी प्रणति व्यक्त करते हुए कहा कि अज्ञेय जैसे विविध आयामी लेखक के भारत चिंतन जैसे विषय पर बात करना अत्यंत कठिन है। अज्ञेय के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है भाषा और भाषा से भी अधिक महत्वपूर्ण है शब्द। उन्होंने कहा कि उनके जानने में शब्द का अज्ञेय से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। अज्ञेय शब्द की प्रतिष्ठा के लिए बार-बार सबको सतर्क करते रहे। अज्ञेय के साथ एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मैथिली शरण गुप्त की जन्म शताब्दी कार्यक्रम में अज्ञेय ने कहा था “कोई भी श्रेष्ठ लेखक या कवि की ललक राष्ट्रकवि होने की नहीं है क्योंकि यह एक राजनीतिक शब्द है।“ वर्तमान अति राजनीतिक समय में अगर कोई अराजनीतिक कवि या लेखक है तो वह अज्ञेय हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अज्ञेय का व्यक्तित्व सागर की तरह है, सागर की तरह गहरा, मौन और शांत। अज्ञेय बुद्धि के कपाट खोलने वाले लेखक हैं। उन्होंने अज्ञेय के साथ-साथ अन्य कवियों – मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, धूमिल जैसे कवियों को याद किया तथा उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों को सभागार में उपस्थित लोगों के साथ साझा किया। इस सत्र में दयानिधि मिश्र द्वारा संपादित अज्ञेय स्मृति व्याख्यानो पर केंद्रित पुस्तक और नर्मदा प्रसाद उपाध्याय द्वारा संपादित पुस्तक “चयनित निबंध : पंडित विद्या निवास मिश्र” का विमोचन भी अतिथियों के द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी के आचार्य प्रोफेसर गौरव तिवारी ने किया।

द्वितीय सत्र का विषय भारत चिंतन पर केंद्रित था। इस सत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रो अवधेश प्रधान ने कृष्ण बिहारी मिश्र के भारत चिंतन पर व्याख्यान देते हुए कहा कि उनकी विद्या भूमि काशी है तथा उनके लेखन का एक बड़ा भाग वह है जो उन्होंने अपने गुरुवार सामान लोगों पर लिखा है। उन्होंने बताया कि कोलकाता में रहते हुए भी कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने काशी और बलिया के अपने संस्कारों को धूमिल नहीं होने दिया। उन्होंने नवजागरण के सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अपनाया। वे मुख्य रूप से विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण, विवेकानंद आदि से प्रभावित थे। कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने गांधी जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा आदि को बार-बार उद्धरित किया है और सर्वधर्म समन्वय की बात की है। उन्होंने धर्म के आधार पर धर्मनिरपेक्षता की बात की। उन्होंने बताया कि भारत में धर्म ने कभी विज्ञान का विरोध नहीं किया बल्कि यहां तो नास्तिकों को भी ऋषि – मुनि कहा गया है। अपने अंतिम दिनों में कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने विवेकानंद और परमहंस के भारत बोध पर काम किया इस ओर उस समय बहुत कम काम किया गया यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही है। उन्होंने कहा कि भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में किसी संस्था के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के बराबर अकेला कार्य कृष्ण बिहारी मिश्र ने किया। बनारस के साहित्यिक चरित्र और साहित्य पर उन्होंने बहुत आत्मीयता से लिखा। उन्होंने बताया कि कल्पतरु की उत्सव लीला में रामकृष्ण परमहंस की जीवनी के माध्यम से उन्होंने भारत के सांस्कृतिक विकास पर महत्वपूर्ण लेखन किया है।

वरिष्ठ कवि और आलोचक प्रो दिनेश कुशवाह ने कहा कि आगे, कृष्ण बिहारी मिश्र या विद्या निवास मिश्र के साहित्य में भारत चिंतन वह चिंतन नहीं है जो आज की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत दिखता रहता है। वह भारत की आत्मा को खोजने की कोशिश है।

पंडित विद्यानिवास मिश्र के भारत चिंतन पर चर्चा करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने बताया कि पंडित जी का भारत उदार और सर्व समावेशी है। भारतीय परंपरा और सभ्यता की बात करते हुए उन्होंने बताया की परंपरा वह नहीं होती जो हमें पीछे ले जाती है बल्कि परंपरा वह होती है जो हमें श्रेष्ठता की ओर आगे ले जाती है। उन्होंने बताया कि पंडित जी का मानना था धर्म अलग-अलग नहीं है,भारत का धर्म केवल एक है मनुष्यता का धर्म,दूसरे को स्वयं से श्रेष्ठ मानना। पंडित जी का भारत सबको अपने में समेटने वाला है न कि बाटने वाला।

उन्होंने कहा कि विद्या निवास मिश्र अपने लेखन और चिंतन में भारत की संस्कृति का चिंतन करते हुए यह बताया है कि इतिहास की बार बार चर्चा करना प्रतिशोध के लिए खुद को तैयार करना और ललकारना होता है। विद्यानिवास मिश्र का भारत श्रेष्ठता के दंभ का भारत नहीं है, वह श्रेष्ठता के तत्वों की व्याख्या करते हुए सबको अपने में समेटने वाला भारत है। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो अनंत मिश्र ने कहा कि कल्याण और पवित्र शब्द की अवधारणा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अज्ञेय और विद्यानिवास की वाणी में ज्ञान के तप की शक्ति है जो उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है।

अतिथियों और संगोष्ठी में भाग लेने वालों का धन्यवाद ज्ञापन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के प्राचार्य प्रो विनोद मोहन मिश्र ने किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशुतोष तिवारी ने किया।

संगोष्ठी के बाद काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश ने की। इस काव्य गोष्ठी में अष्टभुजा शुक्ल, दिनेश कुशवाहा , प्रकाश उदय, इंद्र कुमार दीक्षित, दयाशंकर सिंह कुशवाहा, सरोज पाण्डेय, उद्भव मिश्र, अंजलि अस्थाना खुशबू, दिनेश तिवारी, सरिता मिश्र, केतन यादव आदि ने अपनी कविताएं पढ़ीं।

कार्यक्रम में प्रो महेश्वर मिश्र, परितोष मिश्र, उद्भव मिश्र डॉ सुधाकर तिवारी प्रो अमृतांशु शुक्ल, प्रो उर्मिला यादव, प्रो प्रशिला सैम, कालिंदी त्रिपाठी, प्रो सीमा त्रिपाठी, प्रो इंद्रासन प्रसाद, प्रो वीरेंद्र कुमार, प्रो कौस्तुभ नारायण मिश्र, प्रो राजेश कुमार सिंह, प्रो इंद्रजीत मिश्र, डॉ अनुज कुमार,डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, डॉ अजय कुमार सिंह, डॉ अनूप पटेल, डॉ अरुण कुमार, डॉ संजय गुप्त, डॉ अंबिका प्रसाद तिवारी, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ यज्ञेश त्रिपाठी, डॉ पंकज दुबे, डॉ सुबोध गौतम, डॉ दीपक, डॉ रामनवल, डॉ राजीव राय, डॉ मंजेश भारती, डॉ विशेषता मिश्र सहित अनेक साहित्य प्रेमी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।