राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर शताब्दी वर्ष 2026
पं. विद्यानिवास मिश्र : जन्म शताब्दी समारोह
“हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा
काशी की साहित्यिक विरासत पर मंथन, रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान को किया याद
काशी को जानना है तो ‘बहती गंगा’ पढ़ना जरूरी : प्रो. आनंद वर्धन शर्मा
वाराणसी। साहित्यिक मंच एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की जयंती वर्ष के अवसर पर संकल्पित व्याख्यानमाला “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि काशी की साहित्यिक परंपरा में शिव प्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी ऐसे नाम हैं, जो काशी की जीवंत संस्कृति के संवाहक होने के साथ पाठकों के मन में बनारस को गहराई से समझने की उत्कंठा भी जगाते हैं। उन्होंने कहा कि काशी को सही रूप में जानने के लिए जितना भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेमजोगिनी पढ़ना आवश्यक है, उतना ही रुद्र जी की अमर कृति बहती गंगा को पढ़ना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि बहती गंगा का हर अंश अपने आप में संपूर्ण है और समग्र रूप में वह काशी की भोर, उजास, आँखों की चमक, बतकही और फक्कड़पन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। वहीं नज़ीर बनारसी की शायरी में गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनुपम स्वर दिखाई देता है। रूद्र काशिकेय के अवदान पर डा. मीनाक्षी मिश्रा ने कहा कि वे आधुनिक हिन्दी साहित्य और काशी के विलक्षण प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे। उपन्यास, नाटक, कहानी, काव्य, ग़ज़ल, गीत और निबंध सहित अनेक विधाओं में उन्होंने सृजन किया। उनकी कृति बहती गंगा काशी की समग्रता को समझने का सशक्त माध्यम है। डा. तमन्ना शाहीन ने नज़ीर बनारसी को अलमस्त शायर बताते हुए कहा कि वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी कविताएं हिन्दी जगत में अत्यंत लोकप्रिय रहीं। काशी से उन्हें अपार प्रेम था और उन्होंने जीवनभर आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया। कार्यक्रम के आरंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डा. दयानिधि मिश्र ने कहा कि काशी की सृजन परंपरा पर आयोजित यह व्याख्यानमाला की 13वीं कड़ी है, जो काशी के साहित्य की पहचान को सहेजने का प्रयास है। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने प्रस्तुत की। संचालन शिवकुमार पराग तथा धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।संतोष प्रीत ने एकल काव्यपाठ प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डा. रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय, दीपेश चौधरी, गिरीश पांडेय, संतोष प्रीत, रामजतन पाल, विनोद कुमार सहित अनेक साहित्यकार एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।
पेपर मीडिया २०२६
हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा द्वादश पुष्प के अंतर्गत हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं सीताराम चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदान पर चर्चा
हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा एवं विद्याश्री न्यास वाराणसी का संयुक्त का आयोजन। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित श्रृंखला के द्वादश पुष्प के रूप में आज अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के अवदान पर चर्चा हुई। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक अवदान पर बोलते हुए बसंत महिला महाविद्यालय हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं साहित्यकार प्रोफेसर शशि कला त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य द्विवेदी आलोचना की नई परंपरा में प्रमुख थे। बड़ा लेखक वही होता है जो अपने समकालीन को ही नहीं, अगली पीढ़ी को भी प्रभावित करें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी की पंडित की परंपरा के ऐसे ही उद्भट विद्वान लेखक थे ।हजारी प्रसाद द्विवेदी समावेशी समाज- संस्कृति के पक्षधर थे। उन्होंने संस्कृति की अनेक अंतर्धाराओं को पहचाना और उसे श्रेष्ठ परंपरा के रूप में रेखांकित किया ।आचार्य पंडित श्री राम चतुर्वेदी के योगदान को रेखांकित करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की पूर्व प्रोफेसर एवं जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया की पूर्व कुलपति प्रोफेसर कल्पलता पांडे ने कहा कि पंडित जी बहुआयामी व्यक्तित्व, ओजस्वी वक्ता, निर्भीकता, अनुशासन प्रियता, कला एवं नाटक के क्षेत्र में नवीन सृजनात्मकता आपको अत्यंत विशिष्ट बनाती है। चतुर्वेदी ने गद्य में जीवन चरित्र, उपन्यास, कहानी, ललित निबंध, चिंतन पूर्ण लेखन ,संस्मरण ,रेखा चित्र आदि सभी विधाओं में पर्याप्त लेखन किया। आपके जीवन का सूत्र वाक्य न दैन्यम् न पलायनम् था, जिसका पालन अपने पूरे जीवन किया। अध्यक्षता करते हुए कथा लेखिका डॉक्टर भगवंती सिंह ने कहा कि आज के इस आयोजन में जिन दो विशिष्ट साहित्यकारों पर विस्तार से चर्चा हुई है, दोनों का हिंदी साहित्य के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ विद्वान, ज्योतिषाचार्य एवं हिंदी तथा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। बाणभट्ट की आत्मकथा उनका सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक उपन्यास है। सूर साहित्य, हिंदी साहित्य का आदिकाल, कबीर आदि उनके अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं ।आचार्य सीताराम सरस्वती हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा में संपूर्ण जीवन लगा दिया ।समारोह का एक विशेष आकर्षण रहा हैदराबाद से पधारे हिंदी के वरिष्ठ कवि वेणुगोपाल भट्टड का होना ,जिन्होंने अपने हिंदी के हाइकू एवं व्यंग्य रचनाएं सुनाकर कर लोगों को भाव विभोर कर दिया। दीप प्रज्वलन एवं दोनों रचनाकारों के चित्र पर माल्यार्पण के उपरांत कार्यक्रम में सरस्वती वंदना पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार ने किया ।प्रारंभ में सभी का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दयानिधि मिश्र जी ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष में प्रारंभ हुए इस आयोजन का यह 12वां पुष्प है ।इसमें जिन दो विभूतियों पर आज चर्चा की गई, उन पर काशी की साहित्य परंपरा को अत्यंत गर्व है ।कार्यक्रम का संचालन कवयित्री डॉक्टर मंजरी पांडे ने तथा धन्यवाद प्रकाश सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया । इस अवसर पर प्रकाश उदय, डा. राम सुधार सिंह, प्रभात झा, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण,ओम धीरज,पवन कुमार शास्त्री, सुरेंद्र वाजपेई, अशोक कुमार सिंह, गौतम अरोड़ा सरस,शरद श्रीवास्तव, वासुदेव ओबेरॉय आदि कवि लेखक एवं साहित्यिक जन उपस्थित रहे।
सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जन्मदिवस 7 मार्च पर आयोजित अज्ञेय स्मृति समान कार्यक्रम
संस्कृति और संवेदना के कवि सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जन्मदिन 7मार्च पर प्रतिवर्ष कुशीनगर में कलावती देवी न्यास एवं विद्या श्री न्यास के तत्वाधान में आयोजित तृतीय अज्ञेय स्मृति सम्मान जनचेतना के वरिष्ठ कवि श्री ज्ञानेन्द्रपति को प्रदान किया गया, कार्यक्रम में डॉ महेश्वर मिश्र, डॉ दयानिधि मिश्र, डॉ अनंत मिश्र , डॉ रामसुधार सिंह , न्यास के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ पारितोष मणि, न्यास के सचिव आशुतोष मणि के द्वारा श्री ज्ञानेन्द्रपति को शॉल, प्रतीक चिह्न, पुष्पगुच्छ और सम्मान राशि प्रदान किया गया, परितोष मणि ने स्वागत वक्तव्य देते हुए ज्ञानेन्द्रपति को संस्कृति और सामाजिक सरोकार के अगुवा कवि के रूप में उनकी भूमिका को रेंखकित किया, ज्ञानेन्द्रपति ने अपने स्वीकृति वक्तव्य में बड़ा कवि अपने समय और युग की सीमाओ का अतिक्रमण करता है, ऐसे रचनाकारों को समय कभी कभी सही आँक नहीं पाता, बाद में उनका मूल्यांकन करता है अज्ञेय ऐसे ही कवि थे जिन्होंने साहित्य की हर विधा में अपनी छाप छोड़ी, आज उनके नाम से प्राप्त सम्मान पाकर मैं अपने पूर्वज कवि और कलावती देवी न्यास के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ ,श्री अनंत मिश्र ने ज्ञानेन्द्र पति को अज्ञेय की परम्परा और विरासत का सजग कवि कहा, अध्यक्ष डॉ माहेश्वर मिश्र ने ज्ञानेन्द्रपति को संभावना और सरोकार के कवि के रूप में याद किया।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विद्या श्री न्यास के द्वारा अज्ञेय के निबंधों पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमे डॉ रामसुधार सिंह ने अज्ञेय के ललित निबंधों में कुट्टीचाटन जैसे बन्दर नचानेवाले मदारी के द्वारा अज्ञेय की सहजता और जन सरोकारों पर विस्तृत चर्चा की, डॉ अखिल मिश्र ने अज्ञेय के निबंधों में सामाजिक सरोकारों पर व्याख्यान दिया, डॉ परितोष मणि ने अज्ञेय की संस्कृति और भाषा विशेषकर हिंदी भाषा के अस्मिताबोध और स्वतंत्रता संघर्ष में हिंदी की भूमिका को लेकर उनके विपुल लेखन की चर्चा की ।डॉ प्रकाश उदय ने अज्ञेय की बहुलतावादी चिंतन को रेखांकित करते हुए आमंत्रित वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम के तीसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसने नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया के अध्यक्ष जयनाथ मणि, इंद्रमणि दीक्षित, वरिष्ठ गीतकार श्री गिरधर करुण, श्री उद्भव मिश्रा और अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।
कार्यक्रम के समापन सत्र में अज्ञेय स्मृति उपवन कुशीनगर में विद्या श्री न्यास के सचिव डॉ दयानिधि मिश्र के मार्गदर्शन और डॉ गौरव तिवारी के संयोजन में अज्ञेय के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पण के पश्चात अज्ञेय की कविताओं का शोध छात्रो द्वारा वाचन किया गया। कलावती देवी न्यास के सचिव आशुतोष मणि ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रदर्शन किया।
हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा : 27 फरवरी 2026
साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा के अंतर्गत जिला राजकीय पुस्तकालय में प्रसिद्ध समीक्षक शांतिप्रिय द्विवेदी के अवदान पर नरेंद्र नाथ मिश्र तथा नवगीत के प्रणेता रहे डॉ शंभू नाथ सिंह की अवदान पर डॉ भुवनेश्वर द्विवेदी का व्याख्यान हुआ। शांति प्रिय द्विवेदी के अवदान को रेखांकित करते हुए नरेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि पंडित शांति प्रिय द्विवेदी सही अर्थों में सर्वहारा साहित्यकार थे। द्विवेदी जी की गणना मुख्य रूप से निबंधकार एवं छायावादी समीक्षा के रूप में होती है किंतु वे समर्थ कवि, उपन्यासकार, संस्मरणकार एवं आत्मकथा लेखक भी थे। उन्हें छायावादी कविता की गहरी समझ थी। स्वतंत्रता पूर्व के दो दशकों में छायावाद को लेकर जो जनसामान्य में ऊहापोह चल रहा था, उसमें उनका हस्तक्षेप बहुत ही मजबूत था। नवगीत के ध्वजवाहक डॉक्टर शंभू नाथ सिंह के योगदान की चर्चा करते हुए डॉक्टर भुवनेश्वर द्विवेदी ने कहा कि जब-जब जहां-जहां लोकगीत का उल्लेख या चर्चा होगीउसमें शंभू नाथ सिंह निश्चित रूप से रहेंगे। बिना शंभू नाथ सिंह के नवगीत के प्रारूप का चित्रण नहीं किया जा सकता। शंभू नाथ सिंह नवगीत के प्रणेता तथा संवाहक पुरुष हैं। उनका साहित्य भारतीय हिंदी साहित्य को प्रभावित करता है। उनका साहित्य अनुशासन एवं मर्यादा से युक्त है। इसके माध्यम से जीवन के अनुशासन को समझा जा सकता है। उन्होंने खुद के साहित्य को ही नहीं संवारा, बल्कि नवगीत और नवगीतकारों को नवगीत में सम्मिलित करते हुए उनको महत्व प्रदान किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर शशि कला त्रिपाठी ने कहा कि यह आयोजन भूले बिसरे साहित्यकारों को याद करना उनके कृतित्व पर विचार चिंतन करना ऐतिहासिक कार्य है। यह एक विडंबना है कि जो रचनाकार पाठ्यक्रम में नहीं होते हैं उसेसे हिंदी पाठक जुड़ नहीं पता। छायावाद पर सशक्त समीक्षाएं लिखने के बावजूद शांतिप्रिय द्विवेदी को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना नहीं मिला। डॉक्टर शंभू नाथ सिंह ने गीत एवं कविता के अतिरिक्त गद्य में भी प्रभूत लेखन किया है। इन दोनों रचनाकारों के पुननर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथि डॉ राजीव कुमार सिंह ने अपने पिता शंभू नाथ सिंह की साहित्य सेवा एवं उनकी सृजन कर्म की कई संस्करणों सुनाते हुए कहा कि उन्होंने नवगीत एवं नवगीत कारों की अगली पीढ़ी का नेतृत्व कियाप्रारंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दया निधि मिश्रा ने स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी धरोहर की इस यात्रा का यह एकादश पुष्प है। मुझे विश्वास है कि यह यात्रा आगे चलती रहेगी ।सरस्वती वंदना पंडित सिद्धनाथ शर्मा ने किया धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर राम सुधार सिंह ने तथा संचालन सुनील नारायण उपाध्याय ने किया। समारोह में आनंद कृष्ण मासूम ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर शिवकुमार पराग, अत्रि भारद्वाज कविंद्र नारायण, हिमांशु उपाध्याय, पवन कुमार संतोष प्रीत आनंद मासूम, देवेंद्र पांडे, श्रीमती छाया शुक्ला, गौतम अरोड़ा सरस सुरेंद्र वाजपेई, उषा पांडे अरुण केसरी, सुश्री वात्सला सहित अन्य कवि एवं लेखक उपस्थित थे।
सदा सजग रहे समाज की सज्जन-शक्ति : 14 फरवरी 2026
विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं श्रमण विद्या संकाय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2026 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में *रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान, पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, आचार्य अंकित राज दूबे के वैदिक मंगलाचरण, आ. लेखमणि त्रिपाठी के पौराणिक मंगलाचरण, बौद्ध भिक्षुओं के बौद्ध मंगलाचरण, आ. अंकितराज दूबे और श्रीकृष्ण शर्मा के स्वस्तिवाचन और शंखध्वनि के बीच मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा श्रमण विद्या संकाय के अध्यक्ष प्रो. रमेश प्रसाद के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर वर्ष 2026 के ‘पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान’ से संस्कृत भाषा-साहित्य के विश्रुत विद्वान कविवर प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी को, मंचस्थ अतिथियों एवं डा दयानिधि मिश्र ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया।
श्रद्धानिधि न्यास द्वारा प्रवर्तित पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘साहित्यशास्त्र में भक्तिभाव एवं रस-पर्यावलोचन’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने आचार्य भरत से लेकर पंडितराज-पर्यंत रसतत्व का समीक्षात्मक विश्लेषण किया। इस क्रम में उन्होंने साहित्यशास्त्रियों के साथ ही रूपगोस्वामी और करपात्री जी जैसे संतों के भक्ति-संबंधी बोध और वैचारिकी का भी महत्त्व-प्रतिपादन किया। मुख्यअतिथि केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के कुलपति ने अपने संबोधन में विद्यानिवास जी के यथानाम व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा वाली भारतीय संस्कृति को आज की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में रेखांकित किया और सबसे सबके जुड़ाव का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वसुधैव कुटुंबकम भारतीय दर्शन (महा उपनिषद) पर आधारित है, जो भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर करुणा, समानता और साझा जिम्मेदारी के माध्यम से एक समृद्ध भविष्य के निर्माण को बढ़ावा देता है। विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संपर्क प्रमुख श्री दीनदयाल पांडेय ने पंडित जी की बहुमुखी प्रतिभा को सबके लिए प्रेरणादायी है उन्होंने कहा कि इसी के चलते उनकी कीर्ति एक छोटे-से गाँव से चलकर दिग्दिगंत तक छा गई। उन्होंने करणीय के तौर पर लोकहित को रेखांकित किया और कहा कि सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि समाज की सज्जन-शक्ति सोने न पाए, सदा सजग रहे।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने इस और ऐसे संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतिनिष्ठ आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित किया। कहा कि विद्यानिवास जी शास्त्र और लोक दोनो के ज्ञाता और उद्गाता ही नहीं, उनकी गहनता और सहजता को धारण करने वाले भी थे। जड़ों से जुड़ाव और आधुनिकता से निरंतर संवाद -दोनो को उन्होंने साधा भी और इस साधना के लिए प्रेरित भी किया।
प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में संपन्न संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत प्रो. गायत्री प्रसाद पाण्डेय (पुनरवतारम् धारय माधव रक्षतु भारत देश:), प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी (विद्यानिवास गुरवो विलसंति कीर्त्या:), प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी( नित्यं शास्त्र समर्पितेन विधिना देवस्य संपूजनम्), प्रो. विवेक पाण्डेय (‘सौमनस्यम्’ , ‘प्रिय ते दर्शनमिच्छामि सदा’ ), प्रो शैलेश तिवारी ( ‘दयित ददन दद दमित मदन मद’ और ‘नवमधुमास समागम समये’) आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया।
इस सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और संचालन प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया।
सर्वश्री नरेन्द्र नाथ मिश्र , डा राम सुधार सिंह, प्यारेलाल पाण्डेय, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल, वीरेंद्र राम त्रिपाठी, उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, आशीष मणि त्रिपाठी, शुभंकर बाबू, सत्येंद्र, ओमप्रकाश पांडेय, प्रकाश उदय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।
हिंदी की धरोहर काशी की सृजन-परंपरा : 28 जनवरी 2026
वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्मशती वर्ष में संकल्पित व्याख्यानमाला ‘हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन-परम्परा’ के दशम पुष्प के रूप में गुरुवार को राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार के सभागार में आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के अवदान पर डा.रामसुधार सिंह तथा आचार्य नामवर सिंह के अवदान पर डॉ. विवेक सिंह व्याख्यान हुआ। सरस्वती वंदना पुस्तकालयाध्य कंचन सिंह परिहार ने किया। अध्यक्षता करते हुए बीएचयू हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप ने कहा कि आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र मध्यकालीन हिंदी कविता के गहन अध्येता, कुशल संपादक और लोकप्रिय शिक्षक थे ।उन्होंने केशवदास, बिहारी, घनानंद आदि कवियों पर महत्वपूर्ण लेखन किया है वही डॉक्टर नामवर सिंह वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न आलोचक थे ।उन्होंने अपभ्रंश से लेकर समकालीन साहित्य तक का अध्ययन और मूल्यांकन किया ।उन्होंने रचना के नए प्रतिमान विकसित किया। स्वागत करते हुए डॉक्टर दयानंद जी मिश्रा ने कहा आज यह आयोजन पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शती वर्ष में संकल्पित दशम पुष्प के
रूप में प्रस्तुत है ।इस व्याख्यान माला में मध्यकालीन हिंदी साहित्य के मूर्धन्य विद्वान आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र तथा हिंदी रचना के शीर्षक आलोचक डॉक्टर नामवर सिंह पर केंद्रित है ।यह वर्ष डॉक्टर नामवर सिंह का भी शताब्दी वर्ष है।
साहित्यकार डा.रामसुधार सिंह ने कहा कि आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र मध्यकालीन हिंदी साहित्य के गहन अध्येता, साहित्य इतिहास लेखक एवं रीतिकालीन ग्रंथो के पाठ शोध एवं संपादन के लिए विशेष रूप से प्रतिष्ठित हैं। नागरिक प्रचारिणी सभा में विभिन्न पदों पर रहते हुए आपने कई महत्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन एवं प्रकाशन किया। मिश्र जी का जीवन परंपरा से प्रेरित होते हुए भी नवीन है ।आप रूढ़ियों के कायल कतई नहीं रहे। प्रगतिशीलता को आप स्वीकार करते हैं किंतु प्रतिक्रिया या विरोध के रूप में नहीं , परंपरा के सहज विकास के रूप में। 1920 में गांधी जी के आह्वान पर आपने पढ़ाई छोड़ दिया था ।आपका चंद्रशेखर आजाद सहित कई क्रांतिकारियों के साथ निकट का संबंध रहा ।आप हिंदी विभाग काशी हिंदू विश्वविद्यालय के आचार्य तथा मगध विश्वविद्यालय गया के हिंदी विभाग के अध्यक्ष रहे।
डॉ विवेक सिंह ने नामवर सिंह के आलोचना कर्म पर बोलते हुए कहा कि सृजनात्मक रूप में आलोचना मूलतः व्यक्तिगत प्रयास है क्योंकि किसी आलोचना की सच्ची प्रतिक्रिया तो वैयक्तिक ही हो सकती है। यदि आलोचना वैयक्तिक प्रयास है तो उसका कोई व्यवस्थित सुनिश्चित शास्त्र नहीं बन सकता। यदि शास्त्र बन भी जाए तो वह साहित्य शास्त्र तो होगा परंतु आलोचना नहीं होगा डॉक्टर नामवर सिंह का स्पष्ट मत है कि मृत शास्त्र जीवित आलोचना का स्थान नहीं नहीं ले सकता है । संचालन हिमांशु उपाध्याय, धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।






























