‘पं. विद्यानिवास मिश्र का रचना-कर्म’ विषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर (13-15 जनवरी 2026)
विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2026) पंडित जी की जन्मशती के समापन-समारोह के रूप में मनाया गया और इसके ब्याज से उन के रचना-कर्म के विभिन्न आयामों को विमर्श के विषय के रूप में रखा गया।
विद्याश्री न्यास और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (लखनऊ), रजा फाउंडेशन (दिल्ली), माँ भवानी महाविद्यालय (चंदौली), साहित्यिक संघ (वाराणसी), और लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय (चंदौली) के संयुक्त तत्वावधान में इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को धर्मसंघ शिक्षामंडल, दुर्गाकुंड, वाराणसी के सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि महामहिम श्री लक्ष्मण आचार्य, राज्यपाल, असम ; अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, म. गां. काशी विद्यापीठ, वाराणसी), विशिष्ट अतिथियों श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), श्री जगजीतन पांडेय तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी, श्री लेखमणि त्रिपाठी, श्री सुद्धन पांडेय के वैदिक स्तवन और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र, श्री नरेंद्र नाथ मिश्र और प्रो. उदयन मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने स्वागत-भाषण के साथ ही जन्मशती वर्ष के पचासाधिक साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का भी एक संक्षिप्त विवरण दिया। इस अवसर पर पूर्वोत्तर भारत के प्रतिभागियों अंकिता दत्त तथा रोहन ने शास्त्रीय नृत्य और दीपशिखा सैकिया तथा जिंतुमनी भरुआ ने बिहू नृत्य प्रस्तुत किया।
उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत अनेक पुस्तकों — रात जुन्हैयावारी, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता, विद्यानिवास मिश्र : लोकदृष्टि और परंपरा से साक्षात्कार, आधुनिक हिंदी कविता के विविध आयाम, भारतीय ज्ञान-परंपरा : वैभव और व्याप्ति, डाॅ. नगेंद्र : सृजन के विविध आयाम, भारत-बोध : सभ्यता का नवोन्मेष तथा विकसित भारत की संकल्पना — के साथ ही पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित पत्रिकाओं — अक्षरा, भावक, बहुवचन, समीचीन, नान्दी, तथा भाषा — का मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पण संपन्न हुआ।
उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से डाॅ. मयंक मुरारी को, ‘लोककवि सम्मान’ से डाॅ. जयप्रकाश मिश्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्रीमती संतोष श्रीवास्तव को, पत्रकारिता सम्मान से डाॅ. अत्रि भारद्वाज को, श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से डाॅ. अमिता दुबे को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। विद्याश्री न्यास के स्तंभ रहे डाॅ. अरुणेश नीरन की स्मृति में प्रथम ‘अरुणेश नीरन भोजपुरी वैभव सम्मान’ के लिए चयनित प्रो. रामदेव शुक्ल स्वास्थ्य कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, उन्हें यह सम्मान न्यास द्वारा उनके घर जाकर प्रदान करना तय किया गया। सभी सम्मानित विभूतियों की तरफ से स्वीकृति वक्तव्य के रूप में श्रीमती संतोष श्रीवास्तव ने पंडित जी को विशेषतः प्रिय एक लोकगीत प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी की सोच भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से गहराई से जुड़ी थी। उन्होंने संस्कृत ज्ञान-संपदा की आध्यात्मिकता और सार्वभौमिक मूल्य-चेतना को आधुनिक संवेदना तथा विश्वदृष्टि के साथ जोड़ा। श्री धर्मेंद्र राय ने उनके रचना-कर्म को एक ऐसे वट-वृक्ष की संज्ञा दी जिसके पास सबको देने के लिए कुछ-न-कुछ है ; थका-माँदा, भूखा-प्यासा, भावक-विचारक — कोई उनके यहाँ से निराश नहीं लौटता। श्री जगजीतन पांडेय ने पंडित जी के व्यक्तित्व में निहित उस पारिवारिकता की चर्चा की, जो वसुधामात्र को एक कुटुंब मानने वाली भारतीयता की पहचान है। मुख्य अतिथि महामहिम लक्ष्मण आचार्य ने कहा कि विद्यानिवास जी न केवल अपने चिंतन में अद्यतन रहते थे, उसे साझा करने की दृष्टि से संवाद के लिए भी खुले मन से सदा तत्पर रहते थे। शास्त्र के साथ लोक में भी उनकी प्रगाढ़ निष्ठा थी और महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें इन दोनो से ऊपर उठना भी आता था। पूरब और पश्चिम की भी विचार-सरणियों में उनकी अद्भुत पैठ थी, और किसी तरह के दुराग्रह को उन्होंने कभी कोई जगह नहीं दी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने शिक्षा को लेकर पंडित जी की चिंताओं और इस क्षेत्र में उनके अवदान की चर्चा की। धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. अमिता दुबे ने किया तथा सत्र का संयोजन किया डाॅ. रामसुधार सिंह ने।
उद्घाटन सत्र के पूर्व का सत्र पहले अकादमिक सत्र के रूप में संपन्न हुआ। यह लालित्य-व्यंजना पर केंद्रित था। डाॅ. मधुबाला शुक्ल(मुंबई) ने विशेष रूप से उनके पहले निबंध और निबंध-संग्रह को आधार बनाते हुए उन बीज-विंदुओं को लक्षित किया जिन्होंने उनके रचना-कर्म में उत्तरोत्तर विस्तार पाया। डाॅ. अखिल मिश्र(गोरखपुर) ने आत्मीयता को सौंदर्य और लालित्य का आधार मानते हुए बताया कि विद्यानिवास जी का रचना-संसार हृदय की गहरी अनुभूति का प्रतिफलन है, इसलिए कोमलता और संवेदनशीलता के साथ स्वाभाविक रूप से लालित्य की स्थिति है। डाॅ. चंद्र प्रकाश सिंह (हैदराबाद) ने उनके निबंधों में मानवीय और सांस्कृतिक चेतना की चर्चा की। डाॅ. मिथिलेश कुमार तिवारी(प्रयागराज) ने पंडित जी के संस्मरणों के जरिए जीव-जीवन-जगत से उनके अपनी तरह के जुड़ाव की पड़ताल की। प्रो. अखिलेश कुमार दुबे(प्रयागराज) ने कहा कि पंडित जी जीवन को उत्सव मानने और मानव धर्म को सर्वोपरि मानने वाले सर्जक हैं। वे उजास रचने की प्रतिज्ञा वाले और ललित की उत्कट आकांक्षा वाले ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचना-भूमि में लोकमंगल और लोकसंग्रह की प्रधानता है। डाॅ. राजकुमार उपाध्याय मणि(दिल्ली) ने अमरकोश की परंपरा को याद करते हुए पंडित जी के विविध प्रकार के कोश-कार्य की महत्ता बताई। श्यामसुन्दर पांडेय(मुंबई) उनके रचना-कर्म को निबंध-कला के उत्कर्ष के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए बताया कि लोक का जीवन-क्रम, संस्कार, उत्सव, दिनचर्या, मनोरंजन, व्यवसाय, वस्त्राभूषण, मान-मर्यादा, वन-उपवन, फल-फूल, देवी-देवता, पशु-पक्षी, शकुन-अपशकुन, गीत-गाथा — सबकुछ उनके निबंधों में सहज शामिल है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. विश्वास पाटील(शहादा) ने सत्र के वक्तव्यों के समाहार के साथ ही कहा कि पंडित जी के जीवन, साधना और साहित्य की मूल धारा समन्वय और सुसंवादिता की आग्रही रही है, उन्होंने संस्कृत से साहित्य-अध्ययन की नींव रखी और विश्व-साहित्य के अध्ययन से उसे पुष्ट किया, वेद से लोक तक की सरणि से उसे समृद्ध किया और वे निरंतर मनुष्य की एकात्म परिस्थिति को माँजते-तराशते रहे। इस सत्र का संचालन और आभार-प्रदर्शन श्री विशाल पांडेय(नई दिल्ली) ने किया।
उद्घाटन सत्र के बाद का अकादमिक सत्र विद्यानिवास जी के संस्मरणों, यात्रावृत्त और उनके कवि-कर्म पर केंद्रित था। प्रो. क्रांतिबोध(गाजियाबाद) ने कहा कि विद्यानिवास जी ने अपनी कविताओं में लोक एवं संस्कृति के काव्यात्मक उन्मेष को अपने समय के प्रश्नों के साथ अभिव्यक्त किया है। वे नई कविता के दौर के समस्त काव्य-वैशिष्ट्य को अपनाते हुए राधा-कृष्ण और मनु-मनावी के प्रेम को पुनराख्यायित करते हैं। संवाद उनकी कविताओं का मूल गुण-धर्म है। प्रो. सुमन जैन(वाराणसी) ने कहा कि संस्कृत और भोजपुरी के गहरे रंग के साथ ही देश-दुनिया की तमाम चिंतन-परंपराओं के अध्ययन और उनमें आवाजाही के अनुभवों ने उनके रचना-कर्म को विशिष्ट बनाया है। प्रो. अशोक नाथ त्रिपाठी(वर्धा) ने ‘रैन बसेरे’ के बहाने पंडित जी के निजी जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया, उन गाँवों और शहरों का उल्लेख किया जिनका उनके व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव पड़ा। डाॅ. मीना राठौर(छत्तीसगढ) ने ‘अमरकंटक की सालती स्मृति और विद्यानिवास मिश्र’ शीर्षक से एक भावपूर्ण और चिंतन-संपन्न आलेख का पाठ किया। प्रो. विवेक निराला(प्रयागराज) ने ‘सपने कहाँ गए’ की चर्चा करते हुए कहा कि स्वाधीनता के पचास वर्षों बाद स्वाधीनता-संग्राम के दौर में बुने गए सपनों और उनके यथार्थ का पंडित जी ने विश्लेषण किया। उनकी यह पुस्तक संस्मरण, इतिहास, आलोचना का संतृप्त विलयन है। प्रो. परितोष मणि(गाजियाबाद) ने अपने व्याख्यान को उनके निबंधों के प्रकृति-वर्णन पर केंद्रित करते हुए कहा कि पंडित जी के यहाँ प्रकृति वाह्य नहीं, आंतरिक अनुभव है। वह दृश्य नहीं, भारतीयता और सनातनता का अक्षुण्ण प्रवाह है। उनके अनुसार प्रकृति लोक का उपाख्यान है, शास्त्र का देशी स्वरूप है, उसका अविरल प्रवाह है। प्रकृति के समस्त उपादान लोक से ही नि:सृत हैं और लोक में ही समाहित होते हैं। आरती स्मित(नई दिल्ली) ने उन्हें समृति-सागर से मोती चुन लाने वाले गुणग्राही के रूप में रेखांकित किया। उनके संस्मरणों में स्मरणीय के स्मरण की जितनी महिमा है, विस्मरणीय के विस्मरण की महिमा भी उससे कम नहीं है। प्रो. आनंदवर्धन(वाराणसी) ने कहा कि पं. विद्यानिवास मिश्र ऐसे साहित्य-चितेरे थे जिनकी दृष्टि से साहित्य-संसार की कोई घटना-परिघटना या उसका कोई आयाम अछूता नहीं था। अपने व्यक्तित्व के गढ़न के बारे में उनका अपना कहना है कि ” हिमालय के अंचल के निचले छोर ने मुझे अपनी ममता से खड़ा किया, गंगा-यमुना के संगम ने संघर्षों का झूला झुलाकर मुझे गति दी, और विंध्य ने धैर्य की गंभीरता दी”। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सतीश पांडेय(मुंबई) ने कहा कि उनके यात्रा-संस्मरण जगहों की पहचान के बदले आत्म के विस्तार और परिष्कार के प्रयास हैं। उनके अनुसार पश्चिम के देशों में परिवारहीनता चिंता का विषय है। भारतीय समाज भी इससे ग्रस्त हो रहा है यह और भी चिंता का कारण बन जाता है। भौतिक सुविधाभोग की प्रवृत्ति कृत्रिम उत्सवप्रियता का शिकार बनाती है। उन्होंने माना है कि पश्चिम के प्रति उपेक्षा का नहीं तितीक्षा का भाव होना चाहिए। पंडित जी के यात्रावृत्त उनके कला-पारखी व्यक्तित्व की भी पहचान कराते हैं। इस सत्र का संयोजन और धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. उदय पाल(वाराणसी) ने किया।
चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री जयप्रकाश मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, शिवकुमार पराग, धर्मेंद्र गुप्त साहिल, सिद्धनाथ शर्मा, विजय शंकर मिश्र भास्कर, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, अरविंद मिश्र, प्रकाश आनंद, हिमांशु तिवारी, आनंदकृष्ण, अंकित, विभा, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी, गौतम अरोड़ा सरस, ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश, शरद श्रीवास्तव, अंजलि पांडेय, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, अखलाक खान भारतीय, आलोक सिंह बेताब, सूर्यप्रकाश मिश्र, आनंद कृष्ण मासूम, रामजतन पाल, पुष्पेंद्र अस्थाना पुष्प निरंकारी, विकास पांडेय, प्रताप शंकर दूबे, सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येंदु, निकेता सिंह, धनंजय जी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।
आयोजन के दूसरे दिन, 14 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में कवि-कथाकार नीरजा माधव की कृति ‘शब्द-पारिजात’ के लोकार्पण के साथ पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘राम मुझे छोड़ते नहीं और कृष्ण मुझसे छूटते नहीं’, जो कि राम-कृष्ण से अपने संबंध के संबंध में पंडित जी की ही एक प्रसिद्ध उक्ति है। प्रसिद्ध आलोचक-चिंतक प्रो. रामजी तिवारी(सुल्तानपुर) ने यह स्मृति व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि शास्त्रीय प्रतिष्ठा और लोकस्वीकृति के साक्ष्य पर मिश्र जी ने राम और कृष्ण की महानता के अनेक अलक्षित पक्षों का उद्घाटन किया है और परंपरापोषित स्थापनाओं से सर्वथा भिन्न अपनी मौलिक स्थापनाएँ की हैं। विभिन्न कालखंडों में विभिन्न काव्य-रूपों में प्रस्तुत राम के स्वरूप में कोई भेद वे स्वीकार नहीं करते, यह जरूर है कि हर रचनाकार उसे युगापेक्षी दायित्व से मंडित करता है। वे मानते हैं कि कृष्ण महाभारत के भीतरी सत्य हैं। उन्हीं से जीवन-रस ग्रहण करके युधिष्ठिर रूपी धर्म-द्रुम विकसित होता है। वही कालचक्र, जगच्चक्र और युगचक्र के परिवर्तनकर्ता हैं। वे कहते हैं कि राम कण-कण और जन-जन में रम रहे हैं, सभी को रमा रहे हैं, उनसे अलग होने का कोई उपाय नहीं है। श्रीकृष्ण रिश्ते नहीं निभाते, सभी को छलते हैं, सभी के अभिमान को निर्ममता से तोड़ देते हैं। किंतु उनमें ऐसा दुर्निवार आकर्षण है कि उनसे ठगा जाना भी प्रीतिकर लगता है, वे छूटते नहीं। प्रो. प्रभाकर सिंह(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी रामकथा को भारतीय संस्कृति की बहुलता का प्रतीक मानते थे। ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ एवं ‘राममय संस्कृति’ जैसे निबंधों में वे रामकथा की जनसंस्कृति की तलाश करते हैं। उनकी प्रतिबद्धता जन के राम, जन-जन के राम के प्रति है। इस अवसर पर स्मृति-संवाद करते हुए प्रो. श्रद्धानंद(वाराणसी) और प्रो. शशिकला पांडेय(वाराणसी) ने पंडित जी से जुड़े अनेक आत्मीय प्रसंगों को साझा किया। अध्यक्षीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए श्रीमती नीरजा माधव (वाराणसी)ने कहा कि मिश्र जी के साहित्य से जुड़ना भारतीय संस्कृति की समग्रता से जुड़ना है, एक अखंड दृष्टि से जुड़ना है। भारतीय संस्कृति मनुष्य से मनुष्य और मनुष्य से प्रकृति के रिश्ते की बात करती है, राम और कृष्ण भारतीय चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पंडित जी इसे प्रत्यक्ष करते हुए शास्त्र और लोक के महनीय पक्षों को अपने लेखन का विषय बनाते हैं। इस सत्र का संचालन-संयोजन और धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. बिजेंद्र पांडेय(वाराणसी) ने किया।
आयोजन का चौथा सत्र पंडित जी के साहित्यालोचन पर केंद्रित था। डाॅ. प्रभात मिश्र(वाराणसी) ने कहा कि साहित्य के अध्ययन में साहित्य के इतिहास को उपयोगी मानने में जिस समय संशय खड़े किए जा रहे थे, उस समय विद्यानिवास जी ‘हिंदी साहित्य का पुनरालोकन’ के माध्यम से साहित्य के इतिहास की महत्ता की पुनर्स्थापना करते हैं। इसमें उन्होंने साहित्येतिहास के जटिल संदर्भों को लेकर तार्किक निष्कर्षों की उपलब्धि की है। हिंदी साहित्य संस्कृत और प्राकृत साहित्य-परंपरा से बल लेकर आगे बढ़ा है और उसमें इन दोनो के उज्ज्वल अंशों की निरंतरता है। प्रो. गोपबंधु मिश्र(वाराणसी) ने संस्कृत साहित्य केंद्रित उनके चिंतन पर विमर्श उपस्थित करते हुए कहा कि अमरुक शतक, गीत गोविंद, कालिदास, वाणभट्ट, अग्निपुराण आदि से संबंधित उनके विवेचन से स्पष्ट है कि शास्त्र, दर्शन, उदात्त चिंतन एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के समन्वय का नाम पं. विद्यानिवास मिश्र है। डाॅ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येंदु'(सुल्तानपुर) ने उनके कालिदास विषयक व्याख्यानों का संदर्भ लेते हुए कहा कि पंडित जी कालिदास को अजेय, अप्रमेय और अखंड भारत के महागायक के रूप में देखते हैं। उन्होंने रघुवंश के माध्यम से जीवन की शुचिता को परिभाषित किया तथा न्यायसंगत लोकतंत्र की भूमिका रची, ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के माध्यम से वे आरण्यक संस्कृति की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। ‘लोकमानस में स्त्री की उपस्थिति’ पर बात करते हुए सुप्रिया पाठक(प्रयागराज) ने कहा कि पंडित जी लोक और संस्कृति में स्त्रियों की संवाहक भूमिका की तलाश करते हैं। डाॅ. वेद प्रकाश वत्स(नई दिल्ली) ने मध्यकालीन कविता के अनूठे व्याख्याता के रूप में उनकी पहचान की। भक्तिकालीन और रीतिकालीन कविता दोनो की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं और सहृदय समाज में पैठ के दोनो के पास बहुतेरे उपाय हैं, जिन्हें मिश्र जी बहुत मन और जतन से प्रत्यक्ष करते हैं। श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र(प्रयागराज) ने कहा कि विद्यानिवास जी मानते हैं कि किसी भी देश में आधुनिकता, विचारधारा आदि आयातित होकर अपना वर्चस्व नहीं बना सकती, उसे यहाँ के जीवन, जरूरत और बोध के अनुसार ढलना ही होगा। पंडित जी ने हिंदी के आधुनिक साहित्य में इस ढलाई को जिन चरणों में लक्षित किया है, श्रीप्रकाश जी ने उसका एक सधा हुआ लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। कविर्मनीषी अष्टभुजा शुक्ल(बस्ती) ने कहा कि पंडित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व का एकमुखी विश्लेषण गलत निष्कर्षों तक ले जाएगा। भूलना नहीं चाहिए कि वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन, नामवर जी, अज्ञेय जी सब से संबद्ध रहे, उनका अध्यवसाय और लेखन दोनो विपुल भी है, विषम भी। भारतीय और पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा के गहन अवगाहन के बीच उनका अपना स्वाधीन चिंतन उन्हें अलग से प्रतिष्ठित करता है। वे ज्ञान बघारने वाले बहुज्ञ नहीं, उसे आत्मसात कर जीवन की सहज सर्जना में ढाल देने वाले कृती हैं। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए आचार्य अनंत मिश्र(गोरखपुर) ने कहा कि भारतीय वांग्मय-जगत के महापुरुष पं. विद्यानिवास मिश्र की जन्मशती के समापन-समारोह के रूप में आयोजित इस साहित्य-चर्चा में पंडित जी की जो विशेष दृष्टि सामने आई है वह है साझी संस्कृति पर जोर देने की उनकी उन्मुखता। यह दुनिया एक परिवार है, चर-अचर सभी प्राणी एक दूसरे के अस्तित्व के कारण हैं। वे मानते हैं कि कला थोड़ी तो जमीन के ऊपर की चीज है और इस जमीन के ऊपर की चीज के लिए भावक को भी थोड़ा-बहुत ऊपर उठना पड़ता है। ऐसा संदेश देकर पंडित जी जमीनवादियों को यह नहीं बता रहे हैं कि जमीन कोई कमतर है, वे कहना चाहते हैं कि जमीन तभी बनती है जब उसपर चेतना के रंग-बिरंगे फूल खिलें और महकें। इस सत्र के संयोजन, संचालन और धन्यवाद-प्रदर्शन का दायित्व डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने निभाया।
पाँचवे अकादमिक सत्र का विषय था ‘साहित्य, लोक और आस्वाद’। श्रीमती मनीषा खटाटे (मुंबई) ने पंडित जी के साहित्य के प्रयोजन संबंधी चिंतन को प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्य प्रकृति और जीव-जीवन-जगत का ही प्रतिबिंब है। पंडित जी का प्रयोजन संबंधी चिंतन इन सबसे जुड़ा हुआ है। प्रो. माधवेंद्र पांडेय (शिलांग) ने उनकी लोकचेतना की चर्चा करते हुए कहा लोक सूक्ष्म की अभिव्यक्ति है, प्रतीयमान की प्रस्तुति है और मिश्र जी इसी प्रतीयमान के गायक हैं। समरजीत यादव (वर्धा) ने लोक, शास्त्र और शिक्षा के संबंध-परस्पर पर बात रखते हुए कहा कि पंडित जी इन्हें अलग-अलग नहीं एक समग्र सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। डाॅ. राजेंद्र खटाटे(मुंबई) ने साहित्य के आस्वाद की चर्चा करते हुए अपने व्याख्यान को कला के साथ उसके रिश्ते, अनुभूति और अभिव्यक्ति की आपसदारी, आस्वाद की ज्ञान-प्रक्रिया और कला-विवेचन से संपन्न किया। प्रो. के. के. सिंह (पटना) ने लोकसंस्कृति के वैभव का जिक्र करते हुए कहा कि मिश्र जी के निबंधों में लोकजीवन के विविध रंगों का चित्रण अत्यंत सरसता से हुआ है। उनकी राय में लोक आम आदमी से अभिन्न है। लोक का वैभव उनके निबंधों में खुलकर है, खिलकर है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए प्रो. बलराज पाण्डेय(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी का मानना था कि साहित्य मूल रूप से एक संयोजन-व्यापार है। जोड़ना ही साहित्य का मूल धर्म है। आज मनुष्यता पर विश्वव्यापी संकट है, ऐसे में साहित्य की आवश्यकता आज पहले से बढ़कर है। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. सोनी पाण्डेय (आजमगढ़) ने किया।
छठा सत्र भाषा-चिंतन, हिंदी समाज, साक्षात्कार एवं डायरी और चिट्ठियों पर केंद्रित था। प्रकाश उदय(वाराणसी) ने पंडित जी की एकमात्र डायरी और अनेकानेक चिट्ठियों के हवाले से बताया कि उनके व्यक्तित्व के ढेर सारे पहलू, जो उनके व्यक्ति-व्यंजक निबंधों से भी अछूते रह गए हैं, उनकी डायरी और चिट्ठियों में अपने ठेठ रूप में मौजूद हैं। उनमें उनके भीतर की दुनिया तो है ही, उनके जरिए देश-दुनिया को भीतर से जानने का सुख भी है। प्रो. अवधेश प्रधान(वाराणसी) ने उनके साक्षात्कारों की चर्चा करते हुए बताया कि अपने साक्षात्कारों में उन्होंने अपने जीवन, साहित्य और बुनियादी सूत्रों को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि उन्हें पितृपक्ष से शास्त्र और मातृपक्ष से लोक के संस्कार मिले। उनके साहित्य में दोनो का संतुलन दिखता है। वे ललित निबंध को व्यक्ति-व्यंजक निबंध कहना उचित समझते थे लेकिन निबंध का व्यक्ति अपनी “संकल्पशील महाजाति का व्यंजक” है। उनकी सर्वात्मक दृष्टि मनुष्य को समस्त चराचर जगत को जोड़कर देखती है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि हिंदू धर्म सेकुलरिज्म के अधिक निकट है क्योंकि उसमें धर्म के लिए बहुत-से विकल्पों का महत्त्व स्वीकृत है। मनुष्य को विकल्प चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने अपने बारे में कहा है कि “मुझे एक साथ सेकुलर, समाजवादी और हिंदू रहने मे कोई परेशानी नहीं होती। प्रो. दिलीप सिंह (अमरकंटक) ने अपना अध्यक्षीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पंडित जी के भाषा-चिंतन पर विचार किया, उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य भाषा-विज्ञान के समन्वय और तुलना के लिए जो पुस्तकें और लेख लिखे, उसकी चर्चा की। उन्होंने कहा कि पंडित जी का सम्यक भाषा-चिंतन नवोन्मेषी है, भाषा-विश्लेषण के लिए आधुनिक भाषा-चिंतन के आलोक में भारतीय भाषा-चिंतन की अवधारणाओं को वे किस तरह प्रस्तुत करते हैं, इसका भी प्रो. सिंह ने उल्लेख किया। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. पूजा यादव ने किया।
15 जनवरी को सातवाँ सत्र ‘भारत-चिंतन, धर्म और संस्कृति’ पर केंद्रित था। गरिमा प्रकाश ने पंडित जी की सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। डाॅ. तनुज जैन(नई दिल्ली) ने ‘संस्कृति-विमर्श में परंपरा और आधुनिकता’ विषय पर बोलते हुए इसके संदर्भ में पंडित जी के रचना-कर्म को अनेकशः उद्धृत किया। प्रो. शशिकला त्रिपाठी(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी सांस्कृतिक नायक, देव-देवियों, त्योहार, पर्यावरण, लोक, वनसंपदा, पक्षियों आदि पर चिंतन करते हुए भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा से निरंतर साक्षात्कार करते हैं, तार्किक विश्लेषण करते हैं और तब सांस्कृतिक धरोहर को नवनीत की भाँति पाठकों के समक्ष रखते हैं। श्री सुशील कुमार तिवारी (चित्रकूट) और श्री राम प्रकाश शर्मा ने भी इस विषय में अपने विचार रखे। श्री अंबिकादत्त शर्मा (वाराणसी) ने पंडित जी के भारतबोध पर विचार करते हुए कहा कि उनके लिए भारत का मतलब भारत के पशु-पक्षी, पेड़-पहाड़, पर्व-त्योहार सब है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री नागेंद्र प्रसाद सिंह (नोएडा) ने सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए कहा कि विद्यानिवास जी का भारत-चिंतन और धर्म-संस्कृति संबंधी चिंतन हर तरह की अतियों से मुक्त और भारत के जन-मन के लिए, उसी की तरफ से है। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. प्रीति जायसवाल (वाराणसी) ने किया।
आठवाँ सत्र विचार सत्र के साथ ही समापन, संपूर्ति समारोह, जन्मशती सम्मान और पुरस्कार-वितरण के रूप प्रो. राकेश उपाध्याय, निदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि थे म. गां. काशी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति प्रो. पृथ्वीश नाग, विशिष्ट अतिथि थे पद्मश्री राजेश्वर आचार्य और श्री हरेंद्र प्रताप सिंह तथा सारस्वत अतिथि थे डाॅ. दयाशंकर मिश्र दयालु, आयुष राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश। प्रज्ञा प्रवाह के वरिष्ठ प्रचारक श्री रामाशीष सिंह ने कहा कि विद्यानिवास जी संस्कृति-पुरुष थे, दक्षिण भारत के बहुत-से प्रचारकों ने उन्हीं से हिंदी भाषा का ज्ञान लिया था। डाॅ. अंकिता तिवारी ने मिश्र जी के यात्रा-संस्मरणों की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी यात्राओं को मनुष्य की अर्थवत्ता की तलाश के रूप में रेखांकित किया है। प्रो. श्रुति पाण्डेय (शिलांग) ने विद्यानिवास जी के उस व्यक्तित्व का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत किया जो उनके व्यक्ति-व्यंजक निबंधों से व्यंजित होता है। डाॅ. प्रतिभा मिश्र ने कहा कि मिश्र जी का संपूर्ण जीवन उस चंदन की तरह है जिसकी सुरभि उनके बचपन की स्मृतियों में रची-बसी है। परंपरा के लचीलेपन को अनिवार्य मानते हुए उन्होंने धर्म को जीवन जीने की प्रक्रिया को जन्म देने वाला बताया है। डाॅ. रामसुधार सिंह (वाराणसी) ने उनके संपादन-कर्म पर टिप्पणी करते हुए बताया कि उनके संपादन कार्य के क्षितिज-विस्तार में संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और जनपदीय भाषाएँ — सभी शामिल हैं। ग्रंथ-संपादन के अतिरिक्त उन्होंने नवभारत टाइम्स जैसे दैनिक पत्र और ‘साहित्य अमृत’ सहित कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया। कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, रसखान से लेकर अज्ञेय तक की कविताओं का संचयन उन्होंने प्रस्तुत किया। प्रो. हीरामन तिवारी (नई दिल्ली) ने विद्यानिवास जी की उस वैचारिकी का विश्लेषण किया जिसमें उन्होंने कहा था कि लोक और शास्त्र का विभेद भारतीय संस्कृति में तभी संभव हो सकता है जब कोई हमारी संस्कृति की उस क्षमता को परख सके जिसमें ग्रहण और त्याग की भावना साथ-साथ प्रतिफलित होती है। विशिष्ट अतिथि श्री हरेंद्र प्रताप सिंह(दिल्ली) ने पंडित जी की पत्रकारिता की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति की आत्मा को ही स्थापित किया। वे भारतीय पत्रकारिता में सभी विचारधाराओं को लेकर चलने वाले इकलौते संपादक थे। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि मिश्र जी का मन भारतवर्ष की उस श्रेष्ठता की तरफ हमेशा खिंचा रहा जहाँ से सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ और प्रकाश की आशा में जिसकी तरफ आज भी दुनिया की निगाहें लगी हुई हैं। सारस्वत अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र दयालु ने कहा कि पंडित जी का रचना-संसार बहुत विस्तृत है। प्रतिवर्ष उनके जन्मदिन पर मनाए जाने वाले उत्सव के माध्यम से भारत के संपूर्ण साहित्य-जगत को जिस तरह विद्याश्री न्यास ने जोड़कर रखा है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन का सौंदर्य तो है ही, उसके लिए जो अपेक्षित है उसकी भी चर्चा है। मुख्य अतिथि प्रो. पृथ्वीश नाग ने कहा कि पंडित जी के कुलपति रहते काशी विद्यापीठ और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का चौमुख विकास हुआ। पाणिनी की व्याकरण-तकनीक का उन्होंने जो विश्लेषण किया वह दुनिया भर में आज भी मान्य और समादृत है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राकेश उपाध्याय(नई दिल्ली) ने कहा कि विद्यानिवास जी लोकधर्मी साहित्यकार, व्याख्याता और शिक्षाविद तो थे ही, एक महान संपादक के रूप में उन्होंने नवभारत टाइम्स को एक नया तेवर दिया। संपादक के रूप में उनका सोचना था कि पत्रकारिता नायकों का निर्माण करने के लिए नहीं, नायकों की खोज और उनके कर्मों के आकलन के लिए जरूरी है। कहा कि उन्हें इतिहास की दृष्टि लोक से मिली थी, उनका साहित्य अमर भारत की निरंतर सृजन-शक्ति का परिचायक है।
संपूर्ति सत्र में काशी की कला और साहित्य के क्षेत्र की सात विभूतियों — सर्वश्री सुनील कुमार विश्वकर्मा, मनीष खत्री, ज्ञानेश्वर नाथ शर्मा और कवि-कथाकार मुक्ता, ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी ‘शैलेश’, कवीन्द्र नारायण श्रीवास्तव तथा कंचन सिंह परिहार — को ‘पं. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती सम्मान’ से समारोहपूर्वक विभूषित किया गया। इसके साथ ही युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं में कविता के लिए शिखा सिंह को प्रथम, श्रुति शाश्वत चतुर्वेदी को द्वितीय और डाॅ. फिरोज को तृतीय पुरस्कार से तथा शोधालेख के लिए साधना सरोज को प्रथम, पूजा राय को द्वितीय और मुस्कान बेनी को तृतीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर असम और मेघालय के प्रतिभागी छात्र-छात्राओं अंकिता दत्त, रोहन, दीपशिखा सैकिया, जिंतुमनी भरुआ तथा अन्य को विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया।
विभिन्न सत्रों में सर्वश्री सुशील कुमार तिवारी, चंद्रप्रकाश सिंह, विभा द्विवेदी, दिनेश साहू (गंगटोक)रविकेश मिश्र, सुधीर तिवारी तथा मयंक मुरारी ने चर्चा-परिचर्चा में अपनी भागीदारी से विमर्श को और अर्थवान बनाया। अतिथि सुधीजन के साथ ही वाराणसी के प्रबुद्धजन तथा बीएचयू, विद्यापीठ, संस्कृत विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री पीजी कॉलेज और श्री बलदेव पीजी काॅलेज सहित विभिन्न शिक्षण-संस्थानों की प्रतिभागिता ने इस आयोजन की गरिमा में श्रीवृद्धि की।
इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया तथा ‘सोच-विचार’ पत्रिका के संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने आयोजक मंडल की तरफ से इस तीन दिवसीय आयोजन के सभी वक्ताओं, श्रोताओं और सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास
अज्ञेय के जन्मदिवस 07 मार्च 2025 को कुशीनगर में आयोजित संगोष्ठी और काव्य संध्या की रिपोर्ट – डॉ गौरव तिवारी, कुशीनगर
सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय भारतीय साहित्य संस्थान समिति, श्रद्धाश्री न्यास, विद्याश्री न्यास, कलावती देवी स्मृति न्यास, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर और राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में अज्ञेय के जन्मदिवस के अवसर पर सात मार्च 2025 को भारत चिंतन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आयोजन किया गया।
आयोजन की शुरुआत बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ सौरभ द्विवेदी के द्वारा किए गए मंगलाचरण से हुई। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अरुणेश नीरन ने की। अतिथियों का स्वागत विद्याश्री न्यास, श्रद्धाश्री न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने किया। इस आयोजन में प्रसिद्ध कथाकार और कवि उदय प्रकाश को अज्ञेय स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा मिले इस सम्मान में उन्हें उत्तरीय, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और पच्चीस हजार रुपए दिए गए। पुरस्कार प्राप्ति के बाद अपने स्वीकृति वक्तव्य में उदय प्रकाश ने कहा कि अज्ञेय के नाम से दिए इस सम्मान को प्राप्त करना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता की शुरुआत अज्ञेय से होती है। वे स्वातंत्र्य बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने अज्ञेय के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण भी सुनाए।
अष्टभुजा शुक्ल ने अज्ञेय स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा अज्ञेय से ज्यादा शब्द केंद्रित कवि हिंदी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ। भाषा तो बन जाएगी मूल प्रत्यय शब्द है। शब्द की गरिमा रोज गिराई जा रही है। क्रूर होते जा रहे समय में अज्ञेय के भारत चिंतन पर बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। कवि का पहला सरोकार सत्ता नहीं भाषा और मनुष्य है। भारतीय चिंतन परंपरा सूक्तियों की और सूत्रों की परम्परा है। अज्ञेय ढेर सारी बातें सूत्रों में करते हैं। वे कहते हैं अनंत काल तक जीना अमरत्व नहीं है। मृत्यु भी तो अनंत है। अमरत्व कोई क्षण कोई दृष्टि, कोई अनुभूति है। लोगों के लिए लोगों के द्वारा लोगों का शासन होते होते लोकतंत्र अज्ञेय के शब्दों में “अनपढ़ों के द्वारा अनपढ़ों के लिए अनपढ़ों का शासन” होता गया है।बूंद में समुद्र की शक्ति होती है। वैसे ही मनुष्य में असीम की शक्ति है। इसलिए बूंद होने का महत्व है। अज्ञेय की आधुनिकता और प्रतिबद्धता बूंदों के प्रति है। एक एक मनुष्य की इयत्ता के प्रति है।
उन्होंने अज्ञेय के प्रति अपनी प्रणति व्यक्त करते हुए कहा कि अज्ञेय जैसे विविध आयामी लेखक के भारत चिंतन जैसे विषय पर बात करना अत्यंत कठिन है। अज्ञेय के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है भाषा और भाषा से भी अधिक महत्वपूर्ण है शब्द। उन्होंने कहा कि उनके जानने में शब्द का अज्ञेय से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। अज्ञेय शब्द की प्रतिष्ठा के लिए बार-बार सबको सतर्क करते रहे। अज्ञेय के साथ एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मैथिली शरण गुप्त की जन्म शताब्दी कार्यक्रम में अज्ञेय ने कहा था “कोई भी श्रेष्ठ लेखक या कवि की ललक राष्ट्रकवि होने की नहीं है क्योंकि यह एक राजनीतिक शब्द है।“ वर्तमान अति राजनीतिक समय में अगर कोई अराजनीतिक कवि या लेखक है तो वह अज्ञेय हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अज्ञेय का व्यक्तित्व सागर की तरह है, सागर की तरह गहरा, मौन और शांत। अज्ञेय बुद्धि के कपाट खोलने वाले लेखक हैं। उन्होंने अज्ञेय के साथ-साथ अन्य कवियों – मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, धूमिल जैसे कवियों को याद किया तथा उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों को सभागार में उपस्थित लोगों के साथ साझा किया। इस सत्र में दयानिधि मिश्र द्वारा संपादित अज्ञेय स्मृति व्याख्यानो पर केंद्रित पुस्तक और नर्मदा प्रसाद उपाध्याय द्वारा संपादित पुस्तक “चयनित निबंध : पंडित विद्या निवास मिश्र” का विमोचन भी अतिथियों के द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी के आचार्य प्रोफेसर गौरव तिवारी ने किया।
द्वितीय सत्र का विषय भारत चिंतन पर केंद्रित था। इस सत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रो अवधेश प्रधान ने कृष्ण बिहारी मिश्र के भारत चिंतन पर व्याख्यान देते हुए कहा कि उनकी विद्या भूमि काशी है तथा उनके लेखन का एक बड़ा भाग वह है जो उन्होंने अपने गुरुवार सामान लोगों पर लिखा है। उन्होंने बताया कि कोलकाता में रहते हुए भी कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने काशी और बलिया के अपने संस्कारों को धूमिल नहीं होने दिया। उन्होंने नवजागरण के सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अपनाया। वे मुख्य रूप से विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण, विवेकानंद आदि से प्रभावित थे। कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने गांधी जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा आदि को बार-बार उद्धरित किया है और सर्वधर्म समन्वय की बात की है। उन्होंने धर्म के आधार पर धर्मनिरपेक्षता की बात की। उन्होंने बताया कि भारत में धर्म ने कभी विज्ञान का विरोध नहीं किया बल्कि यहां तो नास्तिकों को भी ऋषि – मुनि कहा गया है। अपने अंतिम दिनों में कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने विवेकानंद और परमहंस के भारत बोध पर काम किया इस ओर उस समय बहुत कम काम किया गया यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही है। उन्होंने कहा कि भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में किसी संस्था के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के बराबर अकेला कार्य कृष्ण बिहारी मिश्र ने किया। बनारस के साहित्यिक चरित्र और साहित्य पर उन्होंने बहुत आत्मीयता से लिखा। उन्होंने बताया कि कल्पतरु की उत्सव लीला में रामकृष्ण परमहंस की जीवनी के माध्यम से उन्होंने भारत के सांस्कृतिक विकास पर महत्वपूर्ण लेखन किया है।
वरिष्ठ कवि और आलोचक प्रो दिनेश कुशवाह ने कहा कि आगे, कृष्ण बिहारी मिश्र या विद्या निवास मिश्र के साहित्य में भारत चिंतन वह चिंतन नहीं है जो आज की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत दिखता रहता है। वह भारत की आत्मा को खोजने की कोशिश है।
पंडित विद्यानिवास मिश्र के भारत चिंतन पर चर्चा करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने बताया कि पंडित जी का भारत उदार और सर्व समावेशी है। भारतीय परंपरा और सभ्यता की बात करते हुए उन्होंने बताया की परंपरा वह नहीं होती जो हमें पीछे ले जाती है बल्कि परंपरा वह होती है जो हमें श्रेष्ठता की ओर आगे ले जाती है। उन्होंने बताया कि पंडित जी का मानना था धर्म अलग-अलग नहीं है,भारत का धर्म केवल एक है मनुष्यता का धर्म,दूसरे को स्वयं से श्रेष्ठ मानना। पंडित जी का भारत सबको अपने में समेटने वाला है न कि बाटने वाला।
उन्होंने कहा कि विद्या निवास मिश्र अपने लेखन और चिंतन में भारत की संस्कृति का चिंतन करते हुए यह बताया है कि इतिहास की बार बार चर्चा करना प्रतिशोध के लिए खुद को तैयार करना और ललकारना होता है। विद्यानिवास मिश्र का भारत श्रेष्ठता के दंभ का भारत नहीं है, वह श्रेष्ठता के तत्वों की व्याख्या करते हुए सबको अपने में समेटने वाला भारत है। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो अनंत मिश्र ने कहा कि कल्याण और पवित्र शब्द की अवधारणा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अज्ञेय और विद्यानिवास की वाणी में ज्ञान के तप की शक्ति है जो उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है।
अतिथियों और संगोष्ठी में भाग लेने वालों का धन्यवाद ज्ञापन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के प्राचार्य प्रो विनोद मोहन मिश्र ने किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशुतोष तिवारी ने किया।
संगोष्ठी के बाद काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश ने की। इस काव्य गोष्ठी में अष्टभुजा शुक्ल, दिनेश कुशवाहा , प्रकाश उदय, इंद्र कुमार दीक्षित, दयाशंकर सिंह कुशवाहा, सरोज पाण्डेय, उद्भव मिश्र, अंजलि अस्थाना खुशबू, दिनेश तिवारी, सरिता मिश्र, केतन यादव आदि ने अपनी कविताएं पढ़ीं।
कार्यक्रम में प्रो महेश्वर मिश्र, परितोष मिश्र, उद्भव मिश्र डॉ सुधाकर तिवारी प्रो अमृतांशु शुक्ल, प्रो उर्मिला यादव, प्रो प्रशिला सैम, कालिंदी त्रिपाठी, प्रो सीमा त्रिपाठी, प्रो इंद्रासन प्रसाद, प्रो वीरेंद्र कुमार, प्रो कौस्तुभ नारायण मिश्र, प्रो राजेश कुमार सिंह, प्रो इंद्रजीत मिश्र, डॉ अनुज कुमार,डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, डॉ अजय कुमार सिंह, डॉ अनूप पटेल, डॉ अरुण कुमार, डॉ संजय गुप्त, डॉ अंबिका प्रसाद तिवारी, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ यज्ञेश त्रिपाठी, डॉ पंकज दुबे, डॉ सुबोध गौतम, डॉ दीपक, डॉ रामनवल, डॉ राजीव राय, डॉ मंजेश भारती, डॉ विशेषता मिश्र सहित अनेक साहित्य प्रेमी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।
पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2025 को आयोजित कवि-गोष्ठी
विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2025 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में संस्कृत कवि सम्मान, पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के पूर्व संकायप्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्री लेखमणि त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा विद्याश्री न्यास एवं श्रद्धानिधि न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर वर्ष 2025 के ‘पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान’ से संस्कृत भाषा-साहित्य के विश्रुत विद्वान कविवर प्रो. गोपबंधु मिश्र को, मंचस्थ अतिथियों एवं डाॅ. दयानिधि मिश्र ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। अपने स्वीकृति-वक्तव्य में प्रो. गोपबंधु मिश्र ने पं. विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व-कृतित्व का अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने पंडित जी की वैचारिक प्रामाणिकता, भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अविचल निष्ठा के साथ ही उनके रचनाकर्म में निहित व्यंगात्मकता और उत्तरोत्तर गहनतर होती गई सामाजिकता की विशेषतः चर्चा की।
श्रद्धानिधि न्यास द्वारा प्रवर्तित पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘महाभारत की कथाभूमि’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा-साहित्य के पूर्व आचार्य प्रो. जयशंकर लाल त्रिपाठी ने महाभारत-संबंधी विमर्श के क्षेत्र में पं. विद्यानिवास मिश्र की रचना ‘महाभारत का काव्यार्थ’ के मूल्य और महत्त्व को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि महाभारत में वर्णित अनेक आख्यान-उपाख्यान हैं जिनके आधार पर संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में विविधविध साहित्य-रचना हुई है। कालिदास प्रभृति रचनाकारों की कृतियाँ तो विश्वविख्यात हुईं, लेकिन मूल कथाओं का अपना सौंदर्य है, अपना स्वरूप है। व्यास की शैली और कथा की बनावट-बुनावट नवीन अध्येताओं और शोध-छात्रों के लिए समीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।महाभारत आदि आर्ष ग्रंथों के मूलरूप के अध्ययन के महत्त्व को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से स्थापित किया।
संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र, श्री पवन कुमार शास्त्री, प्रो. चंद्रकांता राय, प्रो. गायत्री प्रसाद पाण्डेय, प्रो. विवेक पाण्डेय, प्रो.कमला पाण्डेय, प्रो. विजय पाण्डेय आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने इस और ऐसे संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित करते हुए यह भी बताया कि कैसे महाभारत की कथा हमारी सभ्यता का आख्यान है। उन्होंने अपने काव्य-पाठ से भी अपने उद्बोधन को संपन्न और सहृदय समाज को मंत्रमुग्ध किया।
इस सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और संचालन प्रो. चंद्रकांता राय ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया।
सर्वश्री राजनाथ त्रिपाठी, उमेश त्रिपाठी, सुजीत कुमार सिंह, राम सुधार सिंह, प्यारेलाल पाण्डेय, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल, शारदा, गोविन्द त्रिपाठी, वीरेंद्र राम त्रिपाठी, उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, आशीष मणि त्रिपाठी, शुभंकर बाबू, प्रकाश उदय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।
जन्मोत्सव : साहित्योत्सव ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर (14-15 जनवरी 2025)
पं. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती समारोह (2025-26)
विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2025) ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित था। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष पंडित जी का जन्म-शताब्दी वर्ष है और इस आयोजन के साथ ही न्यास द्वारा संकल्पित वर्षपर्यंत चलने वाले विभिन्न सांस्कृतिक-साहित्यिक उत्सवों-समारोहों का भी श्रीगणेश हुआ।
इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को, जन्म-शताब्दी वर्ष के वैशिष्ट्य के अनुरूप, धर्मसंघ शिक्षामंडल के, विद्यानिवास जी को अतिशय प्रिय राधा-माधव के युगल भाव से सुसज्जित सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ( आयुष्य राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश ), अध्यक्ष प्रो. सुनील कुलकर्णी ( निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), विशिष्ट अतिथियों प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ), श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), डाॅ. अरुणेश नीरन ( पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर बुद्ध महाविद्यालय, कुशीनगर ), प्रो. सदानंद शाही ( पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र ( पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ) तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी के वैदिक स्तवन, श्रीयुत श्रीनिवास विलासराव इनामदार के घनपाठ और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इस अवसर को आयुष्मान रिदित मिश्र के तबला-वादन , आयुष्मती आतुषी मिश्र के वीणा-वादन एवं श्री प्रीतम मिश्र के गायन ने एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। प्रो. अरविंद मिश्र, प्रो. श्रद्धानंद, प्रो. उदयन मिश्र और प्रो. ऋतंधर मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. अरुणेश नीरन ने स्वागत-भाषण के साथ ही संगोष्ठी के विषय को प्रस्तावित करते हुए हिंदी उपन्यास के महत्त्वपूर्ण पड़ावों और युगांतर उपस्थित करने वाली कृतियों के उल्लेख के साथ विमर्श के विभिन्न आयामों की तरफ मूल्यवान संकेत किए।
उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित दो पत्रिकाओं ‘सोच-विचार’ और ‘वीणा’ के साथ ही ‘नान्दी’ पत्रिका और डाॅ. दयानिधि मिश्र तथा प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा संपादित पुस्तकों ‘लोक, लोकतंत्र और मीडिया’ (सस्ता साहित्य मंडल), ‘समवेत का सौंदर्य’, ‘रामकथा मंदाकिनी’, ‘भारत और भारतीयता’, ‘पलाश के फूल की दहक’, ‘शिरीष का आग्रह’, ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ ( सभी प्रलेक प्रकाशन ), धर्मेंद्र सिंह संपादित ‘अविनाशी काशी’ के अतिरिक्त ‘भाषा-दर्शन’, ‘प्रियांश’, ‘मरुस्थल’ तथा ‘मृणाल सेन और उनका सिनेमा’ जैसी दर्जनाधिक पुस्तक-पत्रिकाओं का लोकार्पण संपन्न हुआ। डाॅ. राम सुधार सिंह ने इन सभी लोकार्पित कृतियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।
उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र को, लोककवि सम्मान से डाॅ. बलभद्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री रामजनम भारती को, पत्रकारिता सम्मान से श्री राकेश कुमार शर्मा को तथा श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री नरोत्तम शिल्पी को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। सम्मानित विभूतियों के परिचय तथा प्रशस्ति-वाचन का दायित्व सुश्री अंजलि मिश्र ने निभाया। अपरिहार्य कारणों से श्री राकेश कुमार शर्मा सम्मान-समारोह में उपस्थित नहीं हो सके। इस अवसर पर स्वीकृति वक्तव्य के साथ ही उनसे विशेष आग्रहपूर्वक उनकी कविताएँ भी सुनी गईं।
बीज-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि हिंदी साहित्य में यूरोप से आगत विधाओं में से सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास ने ही अर्जित की, इस वैशिष्ट्य के साथ कि इस पश्चिमी विधा को हिंदी ने ही नहीं, हिंद ने ही, अपने ही रंग-ढंग से विकसित किया। जिस मध्यवर्ग की विधा इसे माना गया, हिंदी में उसकी जगह शुरुआती दौर में किसानों और वंचितों ने ली, स्त्रियों ने विशेषतः। आज भी हिंदी उपन्यासों की मुख्य धारा में मुख्यतः वही हैं जो सामाजिक जीवन की मुख्य धारा में नहीं हैं। प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने इस सारस्वत आयोजन और उसमें एक साथ इतनी पुस्तकों के लोकार्पण को पंडित जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कथा के लिए जीवन को जितनी, जीवन के लिए कथा को भी उतनी ही बड़ी जरूरत के तौर पर निरूपित किया। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र की गरिमामय उपस्थिति ने इस आयोजन को संपन्नतर किया। ‘काशी अविनाशी’ के रचयिता श्री धर्मेंद्र सिंह ने उसी अविनाशी काशी की एक धरोहर के रूप में विद्यानिवास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। मुख्य अतिथि श्री दयाशंकर मिश्र दयालु ने पंडित जी के साथ ही काशी की पांडित्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए इस आयोजन से अपने जुड़ाव को एक ऐसे सौभाग्य के रूप में उद्धृत किया जो आत्मा को बल देता है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सुनील कुलकर्णी ने लोकार्पित कृतियों और सम्मानित विभूतियों के साथ ही प्रस्तुत वक्तव्यों के हवाले से इस और ऐसे सारस्वत आयोजनों को समकालीन भारत की सांस्कृतिक अनिवार्यता के रूप में रेखांकित किया। पंडित विद्यानिवास मिश्र को भारत-भाव के कथा-प्रवाह के दीप्त चरित के रूप में याद करते हुए उन्होंने उनके जन्मशती वर्ष के आगामी आयोजनों में अपने और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सतत सहभागी होने की प्रतिबद्धता जताई। इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।
दूसरे अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वतंत्रतापूर्व’ की शुरुआत डाॅ. श्रुति पाण्डेय (शिलांग, मेघालय) के वक्तव्य से हुई। मुक्ति-चेतना के ब्याज से स्वतंत्रतापूर्व के हिंदी उपन्यासों में निहित स्त्री-मुक्ति और भारत मुक्ति की समानांतर और उत्तरोत्तर दृढ़ होती गई आवाज को उन्होंने उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया। डाॅ. प्रभात मिश्र ने हिंदी उपन्यासों के विशिष्ट संदर्भ में भारतीय मध्यवर्ग की अपनी पहचान से हिंदी उपन्यासों की अपनी पहचान के बनने की बात कही। भारतीय मध्यवर्ग के घटनाबहुल जीवन से जुड़कर ही संभवतः हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास घटनाओं के घटाटोप से घिरे रहे हैं। इस मध्यवर्ग के स्वरूप में आए बदलाव के साथ ही उपन्यासों के स्वरूप में भी आते बदलाव को महसूस किया जा सकता है। प्रो. वशिष्ठ अनूप ने प्रेमचंद को भारतीय किसानों के सर्वाधिक विश्वसनीय कथाकार के रूप में आँकते हुए, कृषि-जीवन की उनकी समझ के साथ ही उनके और हिंदी के उपन्यासमात्र के, शिल्प और संवेदना दोनो दिशाओं में, उत्तरोत्तर विकास को निरूपित किया। प्रो. बलराज पाण्डेय ने हिंदी उपन्यास के प्रारंभिक से लेकर अब तक के विकास का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत करते हुए उसकी उपलब्धि के रूप में निम्न वर्ग और निम्न वर्ण और चाहे जिस बहाने, जिन तरीकों, दबाई-कुचली गई आवाजों को आवाज देने के हथियार के रूप में बनी और बनती रही पहचान को रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डाॅ. विश्वास पाटिल ने मुक्ति-चेतना के विभिन्न आयामों की चर्चा करते हुए उन्हें धारण करने वाले स्वतंत्रतापूर्व के प्रतिनिधि उपन्यासों और उपन्यासकारों के वैशिष्ट्य का व्याख्यान किया। सुचिंतित टिप्पणियों के साथ इस सत्र का सफल संयोजन डाॅ. प्रीति जायसवाल ने किया।
तीसरा अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वातंत्र्योत्तर चार दशक’ प्रो. चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। डाॅ. अखिलेश मिश्र ने आजादी के बाद के बहुविध मोहभंग और चतुर्दिक ह्रासोन्मुखता और सांप्रदायिक वैमनस्य को तब के उपन्यासों झूठा सच, तमस, आधा गाँव, कितने पाकिस्तान आदि के माध्यम से पढ़ने की कोशिश की। डाॅ. कुमार वरुण ने बैल की आँख, माधोपुर का घर आदि उपन्यासों के जरिए बिहार के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन को रेखांकित होते हुए दिखाया। डाॅ. मधुबाला शुक्ल ने विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक उन्माद के सामाजिक प्रभाव के औपन्यासिक पाठ के रूप में राही मासूम रजा के कथा-कर्म को प्रस्तुत किया। डाॅ. नरेंद्र नाथ राय ने मुक्ति-चेतना के कथा-पाठ को आपातकाल के विशेष संदर्भ में लिया और हिंदी उपन्यासों पर वैश्विक घटनाओं-परिघटनाओं के प्रभाव का भी मूल्यांकन किया। डाॅ. रंजन पांडेय ने पाहीघर, बेदखल, डूब, पार, माँ का आँचल आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों में बदलते हुए गाँवों के प्रवेश को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि होरी तो खैर अपने सामने आई चुनौतियों से जूझ रहा था, अब के किसानों के पास इसकी भी क्षमता नहीं बची। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने बताया कि प्रेमचंद के गाँव-केंद्रित उपन्यासों के बाद एक वक्त आया जब रेणु के यहाँ नायक शहर से उठकर गाँव आए, बहुत कुछ अच्छा-अच्छा करने के इरादे लेकर, लेकिन उसके बाद गाँवों का हाल कुछ इस कदर बेहाल हुआ कि चाहे ‘अलग-अलग वैतरणी’ का देवनाथ उपाध्याय हो या मास्टर शशिकांत या ‘रागदरबारी’ का रंगनाथ या ‘जल टूटता हुआ’ का सतीश — सबको गाँव छोड़कर भागना पड़ा। यह छोड़कर भागना नायकों का ही नहीं है, बहुत कुछ कथाकारों का भी है, यही वजह है शायद कि हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि के रूप में गाँव अब जब-तब है। प्रो. अवधेश प्रधान ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर केंद्रित होते हुए बताया कि कैसे वह एक तरफ स्त्री-मुक्ति का ताना-बाना बुनता है, दूसरी तरफ दूसरे विश्वयुद्ध की भी छाया छूता है, और तीसरी तरफ अपनी सामाजिक विषमता पर चोट करते हुए पूर्व की धार्मिक उदारता और पश्चिम की सामाजिक उदारता के गँठजोड़ की जरूरत की तरफ भी संकेत करता है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. चितरंजन मिश्र ने सबके समाहार के साथ ही बताया कि समस्याएँ भी और उनके समाधान के लिए संघर्ष भी बहुत है, और बहुविध है। संवेदनाओं के इतने रंग हैं कि कई बार वे एक-दूसरे को काटते हुए भी नजर आते हैं। ऐसे में कथाभूमि का चयन और उसका निर्वाह भी बेशक निरंतर कठिन होता जा रहा है, लेकिन अपनी कथा-प्रतिभा पर अविश्वास की भी कोई वजह नहीं दिखती। डाॅ. रचना शर्मा ने इस सत्र का संयोजन किया।
चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री शरद श्रीवास्तव, अभिनव अरुण, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, विजय जी, मासूम जी, प्रतीक त्रिपाठी, अंजलि मिश्र, हिमांशु त्रिपाठी, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, बेताल जी, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, धनंजय जी और इस वर्ष श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से सम्मानित नरोत्तम शिल्पी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।
आयोजन के दूसरे दिन, 15 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘हिंदी उपन्यास : रचना-विधान और विकास-क्रम। मुख्य वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह का था और उनके अतिरिक्त दो और महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रो. प्रभाकर सिंह और डाॅ. इंदीवर के हुए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. श्रद्धानंद ने की और इसका संयोजन किया डाॅ. बिजेंद्र पांडेय ने। अपने मुख्य वक्तव्य मे प्रो. दिलीप सिंह ने रचना-विधान के सौष्ठव की दृष्टि से कृति के विश्लेषण और परख के आग्रह के साथ कहा कि यदि हिंदी उपन्यास-यात्रा के आदि से आज तक के विकास-क्रम को देखें तो पाएँगे कि यह अपने भीतर सरल, हास्यमय, रहस्यमय, चामत्कारिक, गंभीर, सुखद, दुखद अनेक गद्यरूप समेटे हुए है। यह गुंफन ही हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को विचारणीय बनाता है। उन्होंने रचना-विधान के गठाव के आधार पर ही हिंदी के पहले उपन्यास को तय करने की बात कही। चंद्रकांता के रूप में, उन्होंने लक्ष्य किया कि अपने जन्म के दस ही बरस बाद हिंदी उपन्यास की भाषा दौड़ती-भागती, लहराती-मचलती, उछलती-कूदती हमारे सामने आ गई। रचना-विधान की इसी ठोस जमीन पर समाजगत मूल्यवत्ता में निहित अर्थवान तत्वों को पकड़ते हुए प्रेमचंद सामने आए। उन्होंने हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को नए-नए मोड़ से संपन्न करने वाले उपन्यास के रूप में प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, अज्ञेय, शिवकुमार मिश्र रुद्र, वृंदावन लाल वर्मा, यशपाल, धर्मवीर भारती, अमृत लाल नागर आदि की चयनित कथाकृतियों के पाठ का प्रस्ताव रखा। प्रो. प्रभाकर सिंह ने हिंदी उपन्यासों के रचना-विधान पर वैश्वीकरण के प्रभाव को अपने वक्तव्य के केंद्र में रखते हुए बताया कि यह एक तो उपन्यास में विभिन्न विधाओं के शिल्प के प्रवेश के रूप में घटित हुआ, जैसे ‘काशी का अस्सी’ या ‘कलिकथा बाई पास’ में, दूसरे यह विमर्शों की भीड़ में भी उनसे निराक्रांत रहने की अनधीरता में दिखता है, जैसे ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में और तीसरे ‘मणिकर्णिका’ या ‘मुर्दहिया’ जैसी घोषित रूप से आत्मकथाओं में जो अपने पूरे गठन से अपने उपन्यास होने को दर्ज करती हैं। इसे उन्होंने उपन्यास के केंद्र में न सिर्फ देश, बल्कि एक लघुतर देश जैसे एक मुहल्ले, अस्सी, के आ जाने के रूप में भी रेखांकित किया। डाॅ. इंदीवर ने हिंदी के प्रारंभिक ‘परीक्षा गुरु’, ‘देवरानी-जेठानी’ जैसे उपन्यासों की संरचना के माध्यम से हिंदी उपन्यासों की बनावट-बुनावट के अद्यावधि विस्तार की प्राथमिक रेखाओं को समझने-समझाने की चेष्टा की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रद्धानंद ने सभी वक्तव्यों के समाहार के साथ ही शिल्प और संवेदना दोनो स्तरों पर हिंदी की उपन्यास-यात्रा में प्रेमचंद की केंद्रीयता के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।
आयोजन का छठा सत्र 90 के बाद के हिंदी उपन्यासों पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। प्रो. सुमन जैन ने ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ को बाजारवाद के संकटों से घिरे आदिवासियों की संतप्त कथा के रूप में रेखांकित किया। आज के समय की सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण की है, जिसे आदिम समाज बचाए हुए है और सभ्यता की विकास-यात्रा उसी समाज को रोड़ा मानते हुए राह से हटा देने को तत्पर है। प्रो. मानवेंद्र पांडेय ने पूर्वोत्तर भारत के हिंदी उपन्यासों से उपेक्षित रह जाने को प्रश्नांकित करते हुए उसके भूगोल और सामाजिक जीवन में निहित कथा-संभावनाओं की चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी के उन विरलप्राय उपन्यासों का भी एक संक्षिप्त सारगर्भित मूल्यांकन प्रस्तुत किया जो पूर्वोत्तर के जनजातीय जीवन से जुड़े हैं, जैसे देवेंद्र सत्यार्थी का ‘ब्रह्मपुत्र’, श्रीप्रकाश मिश्र का ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’, ‘देश भीतर देश’ आदि। श्रीप्रकाश मिश्र ने आदिवासियों से जुड़े उपन्यासों की विस्तृत अनुभवजन्य चर्चा की। कहा कि आदिवासी रचनाकार आमतौर पर अपनी पहचान के लिए लिखते हैं जबकि गैरआदिवासी प्रायः किसी राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर चलते हैं। डाॅ. राम सुधार सिंह ने 90 के बाद के उपन्यासों में निहित मुक्ति-चेतना को विशेषतः ‘पहला गिरमिटिया’ और ‘बा’ तथा आनुषंगिक रूप से ‘निर्वासन’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘आखेट’, ‘दस द्वारे का पींजरा’ आदि के आधार पर विवेचित किया। सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. अनंत मिश्र ने सत्र के सभी व्याख्यानों के समाहार के साथ ही बताया कि रचनाकार के शिल्प का निर्माण उसके लेखन से होता है और प्रतिभाशाली लेखक अपनी रचनाओं में शिल्प को लेकर आते हैं। रचनाकार ही है जिसे समाज के अन्याय का अहसास होता है और वह उसकी तरफ इंगिति का साहस भी रखता है, सामर्थ्य भी। इस सत्र का संयोजन डाॅ. साधना भारती ने किया।
सातवें अकादमिक सत्र का विषय था ‘हिंदी उपन्यास और विभिन्न अस्मिताएँ’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार डाॅ. नीरजा माधव ने की। डाॅ. सुनील कुमार मानस ने स्त्री अस्मिता से जुड़े औपन्यासिक प्रयोगों की चर्चा की। डाॅ. मनु पांडेय ने ‘सूत्रधार’, ‘टोपी शुक्ला’ आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों की संरचनात्मक व्यवस्था की पहचान की। प्रो. वंदना मिश्र ने ‘यमदीप’, ‘पोस्ट बाॅक्स नंबर 203 नाला सोपारा’, ‘तीसरी ताली’ और ‘गुलाम मंडी’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से थर्ड जेंडर संबंधी विमर्श की औपन्यासिक परिणति का मूल्यांकन प्रस्तुत किया। प्रो. भारती गोरे ने स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श की विस्तृत चर्चा करते हुए यह भी कहा कि यदि ये विमर्श केवल विमर्श के नाम पर जिंदा हैं तो यह चर्चा की नहीं, चिंता का विषय है। स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब देह की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. नीरजा माधव ने सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिताओं का उल्लेख करते हुए विभिन्न अस्मिताओं को लेकर कुछ फैल गए और कुछ फैलाए गए भ्रमों के सोदाहरण निवारण की कोशिश की। रचना के स्तर पर, खास तौर पर थर्ड जेंडर को लेकर, कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कथाओं के गढ़न-पढ़न को उन्होंने प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि अस्मिता-विमर्श का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। अपनी विदग्ध टिप्पणियों के साथ इस सत्र का संयोजन प्रो. गोरखनाथ ने किया।
आठवाँ सत्र समापन, संपूर्ति समारोह, स्मृति-संवाद और पुरस्कार-वितरण के रूप में आयोजित हुआ। विद्यानिवास मिश्र स्मृति-संवाद में डाॅ. मुक्ता ने बताया कि पंडित जी उन विभूतियों में थे जो धारा में रहते हुए भी धारा के विपरीत चलने का भी साहस रखते हैं। डाॅ. शशिकला पांडेय ने प्रकृति से उनके लगाव और वात्सल्य भाव की विशेष चर्चा की। मुख्य अतिथि प्रो. गोपबंधु मिश्र ने इस आयोजन के केंद्रीय विषय के शास्त्रीय पक्ष को प्रस्तुत किया, इस तर्क के साथ कि मूल को भूलना स्वयं को भुलावे में रखना है, और यह बात पं. विद्यानिवास मिश्र की उस निबंध-कला से स्थापित होती है जो मौलिक, न कि मूलघ्न चिंतन पर आधारित है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पंडित जी ने कोई उपन्यास भले न लिखा हो, लेकिन अपने निबंधों से जो वैचारिक रसायन उन्होंने उपस्थित किया है वह कथा-प्रबंधों के लिए भी स्पृहा की वस्तु है। उन्होंने हिंदी के पहले वैश्विक उपन्यास के रूप में ‘पहला गिरमिटिया’ की पहचान का आग्रह भी किया।
युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं का पुरस्कार-वितरण भी इस सत्र का एक और आकर्षण था। उपन्यास-समीक्षा पर आधारित आलेखों में प्रथम पुरस्कार श्री धनंजय मलिक को, द्वितीय पुरस्कार डाॅ. गुलजबीं अख्तर को, तृतीय पुरस्कार सुश्री क्षमता मिश्र को, सांत्वना पुरस्कार सुश्री शिखा सिंह को तथा सौहार्द पुरस्कार सुश्री नीमालामा को प्रदान किया गया। कविता के लिए सुश्री कागोमादो को प्रथम, डाॅ. फिरोज को द्वितीय, कविता सरोज को तृतीय, अरशान अजीज और नवोदिता त्रिपाठी को सांत्वना पुरस्कार से तथा निबंध के लिए सुश्री पूजा राय को पुरस्कृत किया गया। इस सत्र के संयोजन का दायित्व डाॅ. धीरेंद्रनाथ चौबे ने निभाया।
इस दो दिवसीय आयोजन में वाराणसी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे सुधीजन की भागीदारी रही। हर वर्ष की तरह पूर्वोत्तर भारत के शोध छात्र-छात्राओं ने इस वर्ष भी आयोजन के विभिन्न उपक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आयोजन को सफल बनाने में इसके विभिन्न आयामों से जुड़े सभी सुधीजन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ऐसे आयोजनों के बहुत सारे प्रयोजन होते हैं, लेकिन यह आयोजन विशुद्ध रूप से साहित्य के लिए है। पंडित. विद्यानिवास मिश्र के जन्मोत्सव के साहित्योत्सव होने में ही उसकी सार्थकता है, और यह सार्थकता इस सारस्वत आयोजन में आप सभी सुधीजन की सहभागिता से है।
दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास
गतिविधि 2024
चिकितुषी 2024
हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ (तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर) 14 से 16 जनवरी 2024
विद्याश्री न्यास एवं हिंदुस्तानी एकेडे मी, प्रयागराज (भाषा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन के नियंत्रणाधीन) ; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली तथा लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय , दीनदयाल उपाध्याय नगर, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में श्री धर्मसंघ शिक्षा मंडल सभागार, वाराणसी में ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ’ विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर (14 -16 जनवरी 2024) का उद्घाटन अध्यक्ष श्री सुरेंद्र दुबे (उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल), मुख्य अतिथि डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ (राज्यमंत्री ,स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ) एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. आनंद कुमार त्यागी (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. रजनीश शुक्ल (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), तथा श्री अशोक तिवारी (महापौर, वाराणसी) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) के द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र की चित्र पर माल्यार्पण, आ. जयन्तपति त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, आ. मृत्युंजय त्रिपाठी के घनपाठ तथा प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण एवं पूर्वोत्तर की छात्राओं हिमाश्री फुकन एवं हृतिराज छेत्री के बिहू नृत्य के साथ हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने अतिथियों का भावपूर्ण स्वागत करते हुए संगोष्ठी के लिए चयनित विषय के औचित्य पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर सम्मानित अतिथियों ने प्रभात प्रकाशन और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित ‘पं. विद्यानिवास मिश्र रचनावली’ ( 21 खंड) तथा प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ का, इन दोनो पुस्तकों के संपादक डाॅ. दयानिधि मिश्र और प्रलेक प्रकाशन के निदेशक श्री जितेन्द्र पात्रो के साथ लोकार्पित किया। पुष्प-संपदा के भीतर से पुस्तकों के अवतरण की जिस भव्य-दिव्य प्रविधि को पिलग्रिम्स प्रकाशन के निदेशक श्री रामानंद तिवारी ‘सनातनी’ ने आकार दिया उसने सहृदय समाज को मोह लिया। डॉ. अरुणेश नीरन (देवरिया) ने रचनावली के प्रकाशन की चुनौतियों और इसके महत्त्व पर प्रकाश डाला। न्यास द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले सम्मानों के क्रम में मंचस्थ अतिथियों एवं न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने इस वर्ष के आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान से प्रोफेसर अनंत मिश्र को, आचार्य विद्यानिवास मिश्र लोककवि सम्मान से श्री कमलेश राय को, राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री मंगल यादव ‘कवि’ को, श्री कृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री चंद्रभाल सुकुमार को एवं आचार्य विद्यानिवास मिश्र पत्रकारिता सम्मान से श्री रजनीश त्रिपाठी को उत्तरीय, नारियल, माला, पंचपुस्तक , प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और सम्मान राशि से सम्मानित किया। इस सम्मान-समारोह को डाॅ. डी.एन. पाण्डेय एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने शंख-ध्वनि से तथा आ. जयंतपति त्रिपाठी एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने स्वस्ति-वाचन से और सुश्री अंजलि ने प्रशस्ति-वाचन से गरिमा प्रदान की। सम्मानित विभूतियों ने अपने स्वीकृति-वक्तव्य में पंडित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को याद किया।
विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर अनंत कुमार त्यागी ने साहित्य के प्रति आज की पीढ़ी के आकर्षण के लिए नए रास्तों के अन्वेषण और ज्ञान के विविध अनुशासनों के समन्वय की आवश्यकता बताई। श्री अशोक तिवारी ने कहा कि आचार्य विद्यानिवास मिश्र को याद करना संपूर्ण भारतीयता को याद करना है। प्रो. रजनीश शुक्ल ने बताया कि जो ज्ञान पंडित जी से मिला है वह गुरु-ऋण है, और उस ज्ञान को अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित करके ही उसे चुकाया जा सकता है। उन्होंने रचनावाली को डॉ. दयानिधि मिश्र एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र के श्रम, स्वाध्याय और निष्ठा का प्रतिफल बताया। मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दयाशंकर मिश्र (दयालु) ने विद्याश्री न्यास के विभिन्न उपक्रमों को काशी के साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन की सकारात्मकता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूज्य मिश्र जी के लेखन के संस्पर्श से मुझे आत्मीय सुख मिलता रहा है। हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास-बोध के संदर्भ में भी इसके अध्ययन की आवश्यकता बताई। इस तरह के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की निर्बाध निरंतरता बनी रहे, इसके लिए एक सभागार के निर्माण हेतु राज्यमंत्री ने अपनी निधि से ₹ 25 लाख देने की बात कही। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री सुरेंद्र दुबे ने कहा कि विद्यानिवास जी का सानिध्य पाना लोक और वेद से गुजरना है। भारत जीवंत अतीत को याद करता है और यह परंपरा से ही संभव है। यह सनातन परंपरा ही है जो नित्य नूतनता का आकांक्षी रहा है। सनातन एक जीवंत वर्तमान है और पंडित जी इसी जीवंत वर्तमान की खोज करते हैं। ‘परंपरा बंधन नहीं’ में पंडित जी कहते हैं, “परंपरा हमारी ऊर्जा का स्रोत है हमारी सांस्कृतिक चेतना का द्योतक है इसलिए कालजयी है।” हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भाषा की प्रकृति और उसके विकास-क्रम को समझने में भी इस काल के साहित्य-आधारित अध्ययन को उपयोगी बताया। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने इस सत्र के सुधीजन के साथ ही इस वृहत् रचनावली को साकार करने वाले समस्त सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उद्घाटन सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।
दूसरा, अकादमिक सत्र बीज वक्तव्य के साथ ही सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य पर केंद्रित था। बीज वक्तव्य के रूप में प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने उदय काल नाम की सार्थकता एवं उसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि इस नाम में सृजनात्मकता है । इसमें 8वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक की उन सभी प्रवृत्तियों को सम्मिलित किया जा सकता है, जो सरहपा से लेकर कबीर तक पहुँचती हैं और ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के विश्वास में व्यक्त होती हैं। इस काल के साहित्य को धार्मिक और लौकिक में हम अपनी सुविधा से बाँट लेते हैं लेकिन वस्तुतः वह लोक-वाणी ही है। संवेदना के स्तर पर इस काल की कविता कट्टरता का विरोध करती है । उन्होंने सिद्ध, नाथ, जैन साहित्य, रासो काव्य और खुसरो, विद्यापति के उदाहरणों से उन प्रवृत्तियों को रेखांकित किया जिन्होंने भक्ति, रीति और आधुनिक काल तक को प्रभावित किया। समारोह के विशिष्ट अतिथि श्री देवेंद्र प्रताप सिंह (सचिव, हिंदुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज) ने उदयकाल के स्रोत के रूप में अपभ्रंश से लेकर संस्कृत साहित्य तक का विश्लेषण प्रस्तावित किया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस समय में संस्कृति और साहित्य का संरक्षण भी हमारा एक प्रमुख दायित्व है। प्रो. प्रभाकर सिंह (वाराणसी) ने कहा कि उदयकाल देशी भाषाओं की बहुलता का सृजनकाल है, यह जितना लिखित है उतना ही वाचिक है और साहित्येतिहास-लेखन में इसका खयाल रखना जरूरी है। डाॅ. सतीश पाण्डेय (मुंबई) ने नाथ और नाथ संप्रदाय की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए सिद्ध किया कि गोरखनाथ साधक योगी ही नहीं, दार्शनिक, धर्मपथ-प्रदर्शक, युगद्रष्टा रचनाकार और सामाजिक क्रांति के प्रणेता हैं। डाॅ. अवधेश शुक्ल (वर्धा) ने गोरख और गोरख-वाणी के अखिल भारतीय प्रसार और प्रभाव पर प्रकाश डाला। डाॅ. दिनेश पाठक (मुंबई) ने सिद्ध साहित्य के उन सामाजिक-साहित्यिक प्रदेयों की चर्चा की जिनका पल्लवन आगे चलकर संतकाव्य में भी हुआ। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने उदयकाल की पाठ-संबंधी समस्याओं को रेखांकित करते हुए कहा कि पाठ बहुत सीमित हैं, अत : मूल पाठों की ओर पुनः-पुनः लौट कर पाठों के अध्ययन पर विशेष बल देना चाहिए। प्रारंभिक साहित्य के पाठों को तय कैसे करें, इसका निर्णय भी हमें बहुत सावधानी से करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कर्म और श्रम के बीच जो अलौकिक और रहस्य की बात करते हैं उनका ज्ञान अधिक श्रेष्ठ है और भारतीय वैचारिकी का यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है। उदय काल में अध्यात्म एक तरह से लोकतांत्रिक हुआ और साहित्य जड़ता से सूक्ष्मता की ओर स्पंदित हुआ। इस सत्र का संयोजन प्रो. श्रद्धानंद (वाराणसी) ने किया।
तीसरे सत्र में श्री विश्वास पाटिल ( शहादा, महाराष्ट्र) की अध्यक्षता में उदयकाल के लौकिक साहित्य पर विचार किया गया। डाॅ. मनीषा खटाटे (नासिक) ने साहित्य और संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो के योगदान की चर्चा करते हुए उन्हें भारतीय लोक की अपनी आवाज के रूप में रेखांकित किया। प्रो. भारती गोरे (औरंगाबाद) ने खुसरो-कृत ‘खालिक बारी’ से संबंधित तमाम विवादों की पड़ताल करते हुए उसके वैशिष्ट्य को उजागर किया। डाॅ. विनीता कुमारी (दिल्ली) ने एक प्रेमकाव्य, विरहकाव्य और संदेशकाव्य के रूप में अब्दुल रहमान के ‘संदेश रासक’ के निजी वैशिष्ट्य को प्रकट किया। यह अवधारणा ही कि यह काव्य न मूर्ख के लिए है, न पंडित के लिए, उनके लिए है जो इनके बीच के हैं, ‘मझ्ययार’ हैं, अपने आप में विलक्षण है। प्रो. अवधेश प्रधान ने विद्यापति के उस व्यक्तित्व और काव्यत्व पर प्रकाश डाला जो उनकी कीर्तिलता जैसी कृति से व्यक्त होती है। इस कृति के आधार पर कहा जा सकता है कि विद्यापति न सिर्फ भक्ति और शृंगार के कवि हैं, बल्कि कविता में यथार्थवादी धारा की शुरुआत भी उन्हीं से होती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री विश्वास पाटिल ने सभी वक्तव्यों को समेटते हुए उदयकाल के लौकिक साहित्य पर नाथ साहित्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभावों का व्याख्यान किया। इस सत्र का संचालन डाॅ. बिजेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।
चौथा सत्र भोजपुरी-हिंदी के सुप्रसिद्ध, सर्वप्रिय कवि पं. हरिराम द्विवेदी की स्मृति काव्य-संध्या के रूप में प्रो. वशिष्ठ अनूप की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि डाॅ. जितेन्द्र नाथ मिश्र और विशिष्ट अतिथि प्रो. बलिराज पाण्डेय की उपस्थिति तथा डाॅ. अशोक सिंह के संयोजन में संपन्न हुआ। कवि-गोष्ठी का शुभारंभ पं. हरिराम द्विवेदी के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। उपर्युक्त के अतिरिक्त सर्वश्री गिरिधर करुण, कवीन्द्र नारायण, लियाकत अली, रचना शर्मा, नागेश त्रिपाठी शांडिल्य, सूर्य प्रकाश मिश्र, धर्मेंद्र गुप्त साहिल, गौतम अरोड़ा सरस, सिद्धनाथ शर्मा, सविता सौरभ, नसीमा निशा, ब्रजेश चंद्र पाण्डेय, करुणा सिंह, संगीता श्रीवास्तव, गिरीश पाण्डेय, वेद प्रकाश पाण्डेय आदि ने हरि भैया को श्रद्धांजलि के रूप में अपनी कविताओं के पाठ से आयोजन के पहले दिन को एक सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।
आयोजन के दूसरे दिन की शुरुआत पाँचवे सत्र के रूप में रासो-परंपरा पर बातचीत से हुई। सर्वश्री सत्येंद्र शर्मा (सतना) ने पृथ्वीराज रासो, नरेंद्र नारायण राय (वाराणसी) ने बीसलदेव रासो, वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने परमाल रासो, राम सुधार सिंह (वाराणसी) ने विजयपाल रासो, प्रकाश उदय (वाराणसी) ने हम्मीर रासो और अंजलि अस्थाना ने राम रासो के कथ्य और उनसे जुड़े तथ्यों की छानबीन की। रासो के मूल पाठ की अनुपलब्धता या अल्प उपलब्धता, प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता की समस्या को सभी ने अपनी-अपनी तरह से संबोधित किया। यह भी प्रायः सभी ने महसूस किया कि रासो काव्यों ने अतिजनप्रियता पाई, इस वजह से भी काफी कुछ इनके पाठ में जुड़ता और छूटता रहा है, और इस क्रम में इनकी ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता क्षतिग्रस्त हुई। इसके चलते इन रचनाओं के काव्यगत वैशिष्ट्य भी उपेक्षा के शिकार हुए। इस विमर्श में डाॅ. दयानिधि मिश्र ने ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ पुस्तक के संपादन के क्रम में रासो-ग्रंथों पर आलेख एकत्र करने की कठिनाइयों के अनुभवों को साझा करते हुए इस तरफ सुधीजन का ध्यान आकर्षित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने साहित्येतिहास-लेखन के विभिन्न प्रयत्नों का उल्लेख करते हुए आदिकाल के संदर्भ में शोध-अध्ययन में शिक्षकों-शोधार्थियों की अरुचि के प्रति चिंता जाहिर की। इस सत्र का समन्वय प्रो. गोरखनाथ पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।
छठा सत्र प्रो. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान के रूप में आयोजित किया गया। ‘हिंदी के उदयकाल का अवदान’ विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान को इस काल के विश्रुत विद्वान श्री ब्रजेंद्र कुमार सिंघल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी साहित्य के आदिकाल के लिए उदयकाल नाम को अधिक सार्थक और इस आयोजन की एक लब्धि के रूप में रेखांकित किया। इस संज्ञा की तरफ संकेत करने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के संबंध में उन्होंने कहा कि ‘आदि’ की जगह ‘उदय’ की बात वे इसलिए भी कर सके कि परंपरा और आधुनिकता दोनो को वे भारतीय संदर्भ में समझते हैं, लोक और शास्त्र दोनो में उनकी अबाध आवाजाही है, वे सर्जनात्मक समीक्षा को ‘रीति विज्ञान’ में निरूपित कर सकते हैं, ‘हिंदी की शब्द-संपदा’ को वे लोकजीवन में तलाश सकते हैं। इस काल के विभिन्न आयामों के संदर्भ में भारत भर में अब तक हुए और अभी भी चल रहे शोध-समीक्षा के प्रयत्नों का भी उन्होंने एक रोचक विवरण प्रस्तुत किया और उदयकालीन साहित्य की प्रामाणिकता पर संदेह के कई मिथकों को सप्रमाण निरस्त किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे उदयकाल का साहित्य अपने पूर्ववर्ती साहित्य के प्रदेयों को धारे हुए है और कैसे उसके अपने प्रदेयों को उसके उत्तरवर्ती रचना-कर्म ने धारण किया, न सिर्फ धारण किया बल्कि विस्तृत किया, उच्चतर आयामों तक पहुँचाया। प्रो. इन्दीवर (वाराणसी) ने हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य दोनो की विकास-रेखा को उत्तर अपभ्रंश से लेकर अद्यावधि निरूपित किया। सिद्ध, नाथ और संत साहित्य के सम-विषम आयामों को उन्होंने विशेषतः विश्लेषित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. दिलीप सिंह (अमरकंटक) ने कहा कि भाषा, साहित्य और संस्कृति के सरोकार जन-जन से जुड़े हुए हैं, और इसलिए इन्हें लेकर हम सिर्फ सरकारों से सक्रियता की अपेक्षा रखें यह उचित नहीं है। उन्होंने उदयकाल के गद्य साहित्य के संदर्भ में संक्षेप में ही, लेकिन एक गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया और इस दिशा में शोध के विविध आयामों की तरफ संकेत किए। पृष्ठभूमि के रूप में संस्कृत और अपभ्रंश के गद्य-सामर्थ्य के विवेचन के साथ ही गद्य के क्षेत्र में अवहट्ठ और दक्खिनी की सक्रियता का रोचक विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया। उन्होंने ज्ञान-क्षेत्र से आबद्ध प्रणालियों का उपयोग करते हुए उदयकाल के गद्य साहित्य के नए सिरे से पाठ-विश्लेषण के लिए प्रेरित किया। इस सत्र का संयोजन डाॅ. रचना शर्मा (वाराणसी) ने किया।
आयोजन का सातवाँ सत्र उदयकाल के विविध आयामों और प्रवृत्तियों पर केंद्रित था। प्रो. अशोक नाथ त्रिपाठी (वर्धा) ने सम्यक साहित्येतिहास-लेखन के लिए उदयकाल के भाषायी और साहित्यिक अंतर्विरोधों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया। डाॅ. राजेंद्र खटाटे (नासिक) ने भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और धर्म-अध्यात्म — प्रत्येक संदर्भ में राष्ट्र के ऐतिहासिक स्मरण में इस काल की उपादेयता सिद्ध की। प्रो. उमापति दीक्षित (आगरा) ने उदयकाल से जुड़ी अनुसंधान-संबंधी समस्याओं पर प्रकाश डाला, प्रो. सुमन जैन ने उदयकाल की भावभूमि को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ तथा प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (वर्धा) ने उदयकाल की विभिन्न प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया। प्रो. माधवेंद्र पाण्डेय (शिलांग) ने भारतीय सांस्कृतिक समन्वय के आदिग्रंथ पुष्पदंत के महापुराण का विशेष संदर्भ लेते हुए किसी भी पंथ या विचार-दर्शन की प्रासंगिकता को तय करने की भारतीय पद्धति की पहचान के यत्न किए। महापुराणकार जैन मान्यताओं को ही नहीं, अपने पूरे युग को वाणी प्रदान करता है, काव्य-कला के नए मानक गढ़ता है। इस सत्र का समन्वय डाॅ उदय प्रताप पाल (आजमगढ़) ने किया।
इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे दिन के कार्यक्रम — युवा संवाद, पुरस्कार-वितरण एवं समापन-समारोह — लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चंदौली के पं. पारसनाथ तिवारी नवीन परिसर के सभागार में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय (पूर्व संकायाध्यक्ष, का.हि.वि.वि.) की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. राजाराम शुक्ल (पूर्व कुलपति, सं.सं. विश्वविद्यालय, वाराणसी) और विशिष्ट अतिथि के रूप में डाॅ. शशिकला पाण्डेय ( पूर्व आचार्य, म.गां. काशी विद्यापीठ, वाराणसी) की उपस्थिति में संपन्न हुए। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती, पं. विद्यानिवास मिश्र और महाविद्यालय के संस्थापक पं. पारसनाथ तिवारी के चित्र पर माल्यार्पण और डाॅ. ध्रुव पाण्डेय द्वारा स्तोत्र-पाठ से हुआ। महाविद्यालय के यशस्वी प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने अतिथियों एवं उपस्थित सुधीजन का स्वागत किया। इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को मंचस्थ अतिथियों ने पुरस्कृत किया। निबंध-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार मदालसा मणि त्रिपाठी (अरुणाचल प्रदेश) को, कविता-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार अरुणाचल प्रदेश की ही कागो मादो को तथा द्वितीय और तृतीय पुरस्कार लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय के क्रमशः क्षितीश्वर और नीतू पटेल को ; आलेख-प्रतियोगिता का प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार इसी महाविद्यालय की क्रमशः नेहा कुमारी, संजना कुमारी और सुषमा चौहान को प्रदान किया गया। कागो मादो ने अपने काव्य-पाठ के साथ ही वाराणसी के अपने अनुभवों के व्याख्यान से भी प्रभावित किया। पूर्वोत्तर से आए डाॅ. आलोक सिंह ने पुष्पदंत के महापुराण पर केंद्रित अपने शोध-आलेख का प्रभावपूर्ण पाठ किया।
प्रो. ब्रजेंद्र कुमार सिंघल (नई दिल्ली) ने युवा अध्यापकों और छात्र-छात्राओं से आत्मीय संवाद स्थापित करते हुए कहा कि उत्कृष्ट रचनाशीलता के लिए अध्ययन और लेखन में गंभीरता जरूरी है। किसी भी रचना के निहितार्थ तक पहुँचने के लिए, जिस परिवेश में उसकी रचना हुई, इसे, और इतिहास से उसके रिश्ते को समझना चाहिए। डाॅ. वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्व-अनुशासन के महत्त्व और उसके सामने मौजूद समकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डाला। कवि-कथाकार डाॅ. मुक्ता ने आचार्य शुक्ल की काव्य-संबंधी मान्यताओं को उद्धृत करते हुए अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर रचनाधर्मिता और रचना-प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया। विशिष्ट अतिथि डाॅ. शशिकला पाण्डेय ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए शार्ट कट जैसी कोई प्रविधि नहीं है। एक गहरी संलग्नता और परिश्रम से पीछे न हटने वाला जो स्वभाव एक भारतीय किसान का है वही हमारे शिक्षार्थियों के लिए भी अपेक्षित है। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने महाविद्यालय के प्रबंधन, शिक्षक-समुदाय, शिक्षार्थियों और शिक्षणेतर कर्मचारियों के उस सम्मिलित प्रयास की सराहना की जिसके चलते न सिर्फ गंभीरतर विषयों पर विचार-विमर्श की निरंतरता कायम हुई है, बल्कि उसके उपयुक्त परिस्थितियाँ भी निर्मित हुई हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान का आदि-अंत नहीं होता, देश-काल के अनुरूप उसके विभिन्न आयामों का नए-नए सिरे से उदय अवश्य होता रहता है। मुख्य अतिथि प्रो. राजाराम शुक्ल ने पं. विद्यानिवास मिश्र के विषम, विपुल और सतत सृजन-कर्म से प्रेरणा लेते हुए स्वयं को सर्वतोभावेन सशक्त करने की सीख दी। उन्होंने उदयकाल के प्रवृत्ति-वैविध्य को उसके वैशिष्ट्य के रूप में रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय ने उदयकाल की राजनीतिक दृष्टि से अतिशय विपन्न स्थिति में भी भारतीय मनीषा और भावबोध को शिखरस्थ रखने के लिए तरह-तरह से यत्नशील साहित्य-साधकों के युग के रूप में याद किया। प्रबंधक श्री राजेश कुमार तिवारी ने महाविद्यालय की तरफ से अतिथियों के प्रति आभार-प्रदर्शन के साथ ही इस तरह के सारस्वत आयोजन की निरंतरता के बने रहने की कामना भी की। इस सत्र का संयोजन प्रो. इशरत जहाँ ने किया।
डाॅ. दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास

