काशी की साहित्यिक धरोहर पर मंथन, ‘चोंच’ और ‘निर्गुण’ को किया याद

काशी की साहित्यिक धरोहर पर मंथन, ‘चोंच’ और ‘निर्गुण’ को किया याद

साहित्यकारों ने काशी की सृजन परंपरा और उपेक्षित रचनाकारों के योगदान पर डाला प्रकाश

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में गुरुवार को विद्यानिवास मिश्र जयंती वर्ष के अंतर्गत आयोजित व्याख्यानमाला “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के चतुर्दश पुष्प में साहित्यकारों एवं विद्वानों ने काशी की समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। समारोह में कांतानाथ पाण्डेय चोंच की रचनावली के दो खण्डों का लोकार्पण किया गया। मुख्य वक्ता शिव कुमार पराग ने कहा कि काशी की हास्य परंपरा की पंच महाविभूतियों में पं. कान्तानाथ पांडेय ‘चोंच’ का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कहा कि ‘चोंच’ जी का हास्य उच्चकोटि का था और उसमें अश्लीलता का कोई स्थान नहीं था। वे पैरोडी लेखन के बादशाह माने जाते थे तथा ‘राजहंस’ उपनाम से गंभीर साहित्य की भी रचना करते थे। साहित्यकार होने के साथ-साथ उन्होंने शिक्षक और प्रशासक के रूप में भी शिक्षा जगत में उल्लेखनीय योगदान दिया। उमाशंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ ने कथाकार पं. द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ को कालजयी रचनाकार बताते हुए कहा कि तत्कालीन वामपंथी समीक्षकों ने उनके साहित्य को अपेक्षित महत्व नहीं दिया, जिसके कारण वे उपेक्षा के शिकार रहे। इसके बावजूद हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, सारिका और माया जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रहीं और पाठकों का बड़ा वर्ग उनसे जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि निर्गुण जी भारतीय परिवेश, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के सशक्त कथाकार थे। अध्यक्षता करते हुए डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा” एक सार्थक अभियान है, जो समय की धुंध में खो चुके साहित्यकारों को पुनः प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव साहित्य भूषण डा.दया निधि मिश्र ने कहा कि हिंदी की धरोहर का यह 14वां पुष्प है। आज तक काशी के कुल 28 रचनाकारों पर चर्चा की जा चुकी है। आरंभ में सरस्वती वंदना गिरीश पांडेय ने किया। संचालन सूर्यकांत त्रिपाठी, धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया। समारोह में डा.राम सुधार सिंह, प्रकाश उदय, पवन कुमार शास्त्री,शशिकला पाण्डेय, ओम धीरज, श्रद्धानंद, हिमांशु उपाध्याय और चोंच जी की पुत्री तपस्या उपाध्याय भी उपस्थित रहीं।

पंo विद्यानिवास मिश्र के जन्मशती वर्ष के समापन पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर 2026 पर आधारित रेडियो रिपोर्ट

“हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा

काशी की साहित्यिक विरासत पर मंथन, रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान को किया याद

काशी को जानना है तो ‘बहती गंगा’ पढ़ना जरूरी : प्रो. आनंद वर्धन शर्मा

वाराणसी। साहित्यिक मंच एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की जयंती वर्ष के अवसर पर संकल्पित व्याख्यानमाला “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि काशी की साहित्यिक परंपरा में शिव प्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी ऐसे नाम हैं, जो काशी की जीवंत संस्कृति के संवाहक होने के साथ पाठकों के मन में बनारस को गहराई से समझने की उत्कंठा भी जगाते हैं। उन्होंने कहा कि काशी को सही रूप में जानने के लिए जितना भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेमजोगिनी पढ़ना आवश्यक है, उतना ही रुद्र जी की अमर कृति बहती गंगा को पढ़ना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि बहती गंगा का हर अंश अपने आप में संपूर्ण है और समग्र रूप में वह काशी की भोर, उजास, आँखों की चमक, बतकही और फक्कड़पन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। वहीं नज़ीर बनारसी की शायरी में गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनुपम स्वर दिखाई देता है। रूद्र काशिकेय के अवदान पर डा. मीनाक्षी मिश्रा ने कहा कि वे आधुनिक हिन्दी साहित्य और काशी के विलक्षण प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे। उपन्यास, नाटक, कहानी, काव्य, ग़ज़ल, गीत और निबंध सहित अनेक विधाओं में उन्होंने सृजन किया। उनकी कृति बहती गंगा काशी की समग्रता को समझने का सशक्त माध्यम है। डा. तमन्ना शाहीन ने नज़ीर बनारसी को अलमस्त शायर बताते हुए कहा कि वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी कविताएं हिन्दी जगत में अत्यंत लोकप्रिय रहीं। काशी से उन्हें अपार प्रेम था और उन्होंने जीवनभर आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया। कार्यक्रम के आरंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डा. दयानिधि मिश्र ने कहा कि काशी की सृजन परंपरा पर आयोजित यह व्याख्यानमाला की 13वीं कड़ी है, जो काशी के साहित्य की पहचान को सहेजने का प्रयास है। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने प्रस्तुत की। संचालन शिवकुमार पराग तथा धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।संतोष प्रीत ने एकल काव्यपाठ प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डा. रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय, दीपेश चौधरी, गिरीश पांडेय, संतोष प्रीत, रामजतन पाल, विनोद कुमार सहित अनेक साहित्यकार एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।

हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा द्वादश पुष्प के अंतर्गत हजारी प्रसाद द्विवेदी एवं सीताराम चतुर्वेदी के साहित्यिक अवदान पर चर्चा

हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा एवं विद्याश्री न्यास वाराणसी का संयुक्त का आयोजन। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित श्रृंखला के द्वादश पुष्प के रूप में आज अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के अवदान पर चर्चा हुई। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक अवदान पर बोलते हुए बसंत महिला महाविद्यालय हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं साहित्यकार प्रोफेसर शशि कला त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य द्विवेदी आलोचना की नई परंपरा में प्रमुख थे। बड़ा लेखक वही होता है जो अपने समकालीन को ही नहीं, अगली पीढ़ी को भी प्रभावित करें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी की पंडित की परंपरा के ऐसे ही उद्भट विद्वान लेखक थे ।हजारी प्रसाद द्विवेदी समावेशी समाज- संस्कृति के पक्षधर थे। उन्होंने संस्कृति की अनेक अंतर्धाराओं को पहचाना और उसे श्रेष्ठ परंपरा के रूप में रेखांकित किया ।आचार्य पंडित श्री राम चतुर्वेदी के योगदान को रेखांकित करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की पूर्व प्रोफेसर एवं जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया की पूर्व कुलपति प्रोफेसर कल्पलता पांडे ने कहा कि पंडित जी बहुआयामी व्यक्तित्व, ओजस्वी वक्ता, निर्भीकता, अनुशासन प्रियता, कला एवं नाटक के क्षेत्र में नवीन सृजनात्मकता आपको अत्यंत विशिष्ट बनाती है। चतुर्वेदी ने गद्य में जीवन चरित्र, उपन्यास, कहानी, ललित निबंध, चिंतन पूर्ण लेखन ,संस्मरण ,रेखा चित्र आदि सभी विधाओं में पर्याप्त लेखन किया। आपके जीवन का सूत्र वाक्य न दैन्यम् न पलायनम् था, जिसका पालन अपने पूरे जीवन किया। अध्यक्षता करते हुए कथा लेखिका डॉक्टर भगवंती सिंह ने कहा कि आज के इस आयोजन में जिन दो विशिष्ट साहित्यकारों पर विस्तार से चर्चा हुई है, दोनों का हिंदी साहित्य के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ विद्वान, ज्योतिषाचार्य एवं हिंदी तथा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। बाणभट्ट की आत्मकथा उनका सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक उपन्यास है। सूर साहित्य, हिंदी साहित्य का आदिकाल, कबीर आदि उनके अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं ।आचार्य सीताराम सरस्वती हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा में संपूर्ण जीवन लगा दिया ।समारोह का एक विशेष आकर्षण रहा हैदराबाद से पधारे हिंदी के वरिष्ठ कवि वेणुगोपाल भट्टड का होना ,जिन्होंने अपने हिंदी के हाइकू एवं व्यंग्य रचनाएं सुनाकर कर लोगों को भाव विभोर कर दिया। दीप प्रज्वलन एवं दोनों रचनाकारों के चित्र पर माल्यार्पण के उपरांत कार्यक्रम में सरस्वती वंदना पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार ने किया ।प्रारंभ में सभी का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दयानिधि मिश्र जी ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष में प्रारंभ हुए इस आयोजन का यह 12वां पुष्प है ।इसमें जिन दो विभूतियों पर आज चर्चा की गई, उन पर काशी की साहित्य परंपरा को अत्यंत गर्व है ।कार्यक्रम का संचालन कवयित्री डॉक्टर मंजरी पांडे ने तथा धन्यवाद प्रकाश सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया । इस अवसर पर प्रकाश उदय, डा. राम सुधार सिंह, प्रभात झा, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण,ओम धीरज,पवन कुमार शास्त्री, सुरेंद्र वाजपेई, अशोक कुमार सिंह, गौतम अरोड़ा सरस,शरद श्रीवास्तव, वासुदेव ओबेरॉय आदि कवि लेखक एवं साहित्यिक जन उपस्थित रहे।

सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जन्मदिवस 7 मार्च पर आयोजित अज्ञेय स्मृति समान कार्यक्रम

संस्कृति और संवेदना के कवि सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय के जन्मदिन 7मार्च पर प्रतिवर्ष कुशीनगर में कलावती देवी न्यास एवं विद्या श्री न्यास के तत्वाधान में आयोजित तृतीय अज्ञेय स्मृति सम्मान जनचेतना के वरिष्ठ कवि श्री ज्ञानेन्द्रपति को प्रदान किया गया, कार्यक्रम में डॉ महेश्वर मिश्र, डॉ दयानिधि मिश्र, डॉ अनंत मिश्र , डॉ रामसुधार सिंह , न्यास के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ पारितोष मणि, न्यास के सचिव आशुतोष मणि के द्वारा श्री ज्ञानेन्द्रपति को शॉल, प्रतीक चिह्न, पुष्पगुच्छ और सम्मान राशि प्रदान किया गया, परितोष मणि ने स्वागत वक्तव्य देते हुए ज्ञानेन्द्रपति को संस्कृति और सामाजिक सरोकार के अगुवा कवि के रूप में उनकी भूमिका को रेंखकित किया, ज्ञानेन्द्रपति ने अपने स्वीकृति वक्तव्य में बड़ा कवि अपने समय और युग की सीमाओ का अतिक्रमण करता है, ऐसे रचनाकारों को समय कभी कभी सही आँक नहीं पाता, बाद में उनका मूल्यांकन करता है अज्ञेय ऐसे ही कवि थे जिन्होंने साहित्य की हर विधा में अपनी छाप छोड़ी, आज उनके नाम से प्राप्त सम्मान पाकर मैं अपने पूर्वज कवि और कलावती देवी न्यास के प्रति गहरी कृतज्ञता व्यक्त करता हूँ ,श्री अनंत मिश्र ने ज्ञानेन्द्र पति को अज्ञेय की परम्परा और विरासत का सजग कवि कहा, अध्यक्ष डॉ माहेश्वर मिश्र ने ज्ञानेन्द्रपति को संभावना और सरोकार के कवि के रूप में याद किया।

कार्यक्रम के दूसरे सत्र में विद्या श्री न्यास के द्वारा अज्ञेय के निबंधों पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन हुआ जिसमे डॉ रामसुधार सिंह ने अज्ञेय के ललित निबंधों में कुट्टीचाटन जैसे बन्दर नचानेवाले मदारी के द्वारा अज्ञेय की सहजता और जन सरोकारों पर विस्तृत चर्चा की, डॉ अखिल मिश्र ने अज्ञेय के निबंधों में सामाजिक सरोकारों पर व्याख्यान दिया, डॉ परितोष मणि ने अज्ञेय की संस्कृति और भाषा विशेषकर हिंदी भाषा के अस्मिताबोध और स्वतंत्रता संघर्ष में हिंदी की भूमिका को लेकर उनके विपुल लेखन की चर्चा की ।डॉ प्रकाश उदय ने अज्ञेय की बहुलतावादी चिंतन को रेखांकित करते हुए आमंत्रित वक्ताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

कार्यक्रम के तीसरे सत्र में काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ जिसने नागरी प्रचारिणी सभा देवरिया के अध्यक्ष जयनाथ मणि, इंद्रमणि दीक्षित, वरिष्ठ गीतकार श्री गिरधर करुण, श्री उद्भव मिश्रा और अन्य कवियों ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति दी।

कार्यक्रम के समापन सत्र में अज्ञेय स्मृति उपवन कुशीनगर में विद्या श्री न्यास के सचिव डॉ दयानिधि मिश्र के मार्गदर्शन और डॉ गौरव तिवारी के संयोजन में अज्ञेय के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पण के पश्चात अज्ञेय की कविताओं का शोध छात्रो द्वारा वाचन किया गया। कलावती देवी न्यास के सचिव आशुतोष मणि ने आगंतुकों के प्रति आभार प्रदर्शन किया।

हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा : 27 फरवरी 2026

साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास द्वारा पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा के अंतर्गत जिला राजकीय पुस्तकालय में प्रसिद्ध समीक्षक शांतिप्रिय द्विवेदी के अवदान पर नरेंद्र नाथ मिश्र तथा नवगीत के प्रणेता रहे डॉ शंभू नाथ सिंह की अवदान पर डॉ भुवनेश्वर द्विवेदी का व्याख्यान हुआ। शांति प्रिय द्विवेदी के अवदान को रेखांकित करते हुए नरेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि पंडित शांति प्रिय द्विवेदी सही अर्थों में सर्वहारा साहित्यकार थे। द्विवेदी जी की गणना मुख्य रूप से निबंधकार एवं छायावादी समीक्षा के रूप में होती है किंतु वे समर्थ कवि, उपन्यासकार, संस्मरणकार एवं आत्मकथा लेखक भी थे। उन्हें छायावादी कविता की गहरी समझ थी। स्वतंत्रता पूर्व के दो दशकों में छायावाद को लेकर जो जनसामान्य में ऊहापोह चल रहा था, उसमें उनका हस्तक्षेप बहुत ही मजबूत था। नवगीत के ध्वजवाहक डॉक्टर शंभू नाथ सिंह के योगदान की चर्चा करते हुए डॉक्टर भुवनेश्वर द्विवेदी ने कहा कि जब-जब जहां-जहां लोकगीत का उल्लेख या चर्चा होगीउसमें शंभू नाथ सिंह निश्चित रूप से रहेंगे। बिना शंभू नाथ सिंह के नवगीत के प्रारूप का चित्रण नहीं किया जा सकता। शंभू नाथ सिंह नवगीत के प्रणेता तथा संवाहक पुरुष हैं। उनका साहित्य भारतीय हिंदी साहित्य को प्रभावित करता है। उनका साहित्य अनुशासन एवं मर्यादा से युक्त है। इसके माध्यम से जीवन के अनुशासन को समझा जा सकता है। उन्होंने खुद के साहित्य को ही नहीं संवारा, बल्कि नवगीत और नवगीतकारों को नवगीत में सम्मिलित करते हुए उनको महत्व प्रदान किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर शशि कला त्रिपाठी ने कहा कि यह आयोजन भूले बिसरे साहित्यकारों को याद करना उनके कृतित्व पर विचार चिंतन करना ऐतिहासिक कार्य है। यह एक विडंबना है कि जो रचनाकार पाठ्यक्रम में नहीं होते हैं उसेसे हिंदी पाठक जुड़ नहीं पता। छायावाद पर सशक्त समीक्षाएं लिखने के बावजूद शांतिप्रिय द्विवेदी को जितना महत्व मिलना चाहिए उतना नहीं मिला। डॉक्टर शंभू नाथ सिंह ने गीत एवं कविता के अतिरिक्त गद्य में भी प्रभूत लेखन किया है। इन दोनों रचनाकारों के पुननर्मूल्यांकन की आवश्यकता है। विशिष्ट अतिथि डॉ राजीव कुमार सिंह ने अपने पिता शंभू नाथ सिंह की साहित्य सेवा एवं उनकी सृजन कर्म की कई संस्करणों सुनाते हुए कहा कि उन्होंने नवगीत एवं नवगीत कारों की अगली पीढ़ी का नेतृत्व कियाप्रारंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दया निधि मिश्रा ने स्वागत करते हुए कहा कि हिंदी धरोहर की इस यात्रा का यह एकादश पुष्प है। मुझे विश्वास है कि यह यात्रा आगे चलती रहेगी ।सरस्वती वंदना पंडित सिद्धनाथ शर्मा ने किया धन्यवाद ज्ञापन डॉक्टर राम सुधार सिंह ने तथा संचालन सुनील नारायण उपाध्याय ने किया। समारोह में आनंद कृष्ण मासूम ने काव्य पाठ किया। इस अवसर पर शिवकुमार पराग, अत्रि भारद्वाज कविंद्र नारायण, हिमांशु उपाध्याय, पवन कुमार संतोष प्रीत आनंद मासूम, देवेंद्र पांडे, श्रीमती छाया शुक्ला, गौतम अरोड़ा सरस सुरेंद्र वाजपेई, उषा पांडे अरुण केसरी, सुश्री वात्सला सहित अन्य कवि एवं लेखक उपस्थित थे।