मनु शर्मा की रचनाधर्मिता और ‘बावला’ की लोकचेतना पर हुआ मंथन*

वाराणसी। जिला पुस्तकालय में शनिवार को ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ के तहत सप्तदश पुष्प में साहित्यकार मनु शर्मा और भोजपुरी के लोककवि राम जियावन दास ‘बावला’ के साहित्यिक योगदान पर चर्चा हुई। अध्यक्षता करते हुए ‘सोच-विचार’ पत्रिका के प्रधान संपादक जितेन्द्र नाथ मिश्र ने कहा कि मनु शर्मा जी किसी बने-बनाए रास्ते पर नहीं चले, कृष्ण की पौराणिक कथा को आत्मकथा की शैली में प्रस्तुत करने की उनकी कल्पना बिल्कुल नई थी।उन्होंने कहा कि बावला ने उद्भावनाओं से प्रेरणा लेकर रामचरित विषयक रचनाएँ भोजपुरी में की। उनके गीतों का जनमानस पर तत्काल प्रभाव पड़ता है और उनकी गूंज लंबे समय तक बनी रहती है। उनका साहित्य भोजपुरी के साथ पूरे हिंदी क्षेत्र और देश के लिए महत्वपूर्ण अवदान है।
नागरी प्रचारिणी सभा के प्रधानमंत्री और ख्यात साहित्यकार व्योमेश शुक्ल ने कहा कि मनु शर्मा काशी के रचनाकारों की पहली पंक्ति में विशिष्ट स्थान रखते हैं। वह बहुमुखी प्रतिभा से संपन्न ऐसे लेखक थे, जिन्होंने साहित्य के अनेक क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका विपुल लेखन और विशद सार्वजनिक जीवन इस बात का प्रमाण है कि हिंदी को साधक, कर्मठ और समर्पित रचनाकारों ने समृद्ध किया। उन्होंने स्थानीय को सार्वभौम और पारंपरिक को आधुनिक बनाने का रचनात्मक अभियान चलाया। उनकी साहित्यिक दृष्टि और सक्रियता आज भी नई पीढ़ी के लिए प्रेरणादायी है। उनके योगदान को आगे बढ़ाना काशी की साहित्यिक परंपरा को समृद्ध करने की दिशा में महत्वपूर्ण दायित्व है। भारत अध्ययन केंद्र, बीएचयू के डॉ. अमित कुमार पांडेय ने कहा कि ‘बावला’ की कविता में भक्ति, लोकानुभव और सामाजिक यथार्थ का विशिष्ट संबंध दिखाई देता है। उन्होंने तुलसी की भक्ति परंपरा को लौकिक धरातल पर पुनर्व्याख्यायित किया। उनकी रचनाओं में सामाजिक विषमता, अभाव और संघर्ष लोकचेतना के रूप में सामने आते हैं। भक्ति और सामाजिक चेतना का समन्वय उनकी काव्य-दृष्टि की प्रमुख विशेषता है। आयोजन के प्रारंभ में अतिथियों का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानंद मिश्र ने काशी के रत्न के रूप में मनु शर्मा और बावला जी का एक आत्मीय परिचय दिया। सरस्वती-वंदना की प्रस्तुति श्री विजेंद्र नाथ मिश्र ने की और संचालन किया श्री अभिनव अरुण ने किया और आभार-प्रदर्शन का दायित्व प्रो. उमेश प्रसाद सिंह ने निभाया। इस अवसर पर एकल काव्य-पाठ की परंपरा का निर्वाह श्री कंचन सिंह परिहार ने किया। उल्लेखनीय है कि यह आयोजन श्री रमाशंकर राय की पुस्तक ‘महाप्रलय’ के लोकार्पण का भी साक्षी बना।
इस अवसर पर सर्वश्री नरेंद्र नाथ मिश्र, सुरेन्द्र प्रताप सिंह, श्रद्धानंद, अत्रि भारद्वाज, मंजरी पांडेय, अशोक सिंह, सुरेंद्र वाजपेयी, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण, इंदीवर, रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय जैसे सुधीजन की उपस्थिति रही।

कुशवाहाकांत और भैयाजी बनारसी की साहित्यिक यात्रा पर काशी में हुआ मंथन

कुशवाहा कांत और भैयाजी बनारसी के साहित्यिक योगदान पर व्याख्यानमाला आयोजित

वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्या श्री न्यास की संयुक्त आयोजन में हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा के षष्ठदश पुष्प रूप में अर्दली बाजार स्थित राजकीय पुस्तकालय में उपन्यासकार कुशवाहाकांत एवं भैया जी बनारसी की अवदान पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत ने कुशवाहा कांत के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि कुशवाहा कांत को सिर्फ लोकप्रिय उपन्यासकार मानना उनके साहित्य और व्यक्तित्व को सीमित कर देता है। वह उस दौर के ऐसे कथाकार थे, जिन्होंने प्रेम, विद्रोह, हर्ष रोमांस, देशभक्ति और सामाजिक यथार्थ को एक ही कथाधारा में पिरोकर आम पाठक के सामने रखा। उन्होंने कहा काशी ने कुशवाहा कांत को वह दृष्टि दी जिसके सहारे वह अपने समय और समाज को कथा में बदल सके। कुशवाहा कांत की साहित्यिक यात्रा को उनकी सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
सांस्कृतिक समीक्षक अरविंद मिश्रा हर्ष ने मोहनलाल गुप्ता भैया जी बनारसी के जीवन के अनछुए पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा की प्रमुख हास्य कवि, साहित्यकार भैयाजी बनारसी ने काशी की पत्रकारिता की अमूल्य सेवा की है। विश्वनाथ मंदिर के हालात पर सबसे अधिक लेखनी चलाने वाले पत्रकारों में उनकी गिनती होती है। 1965 में ब्रिटिश सूचना विभाग में उन्होंने ब्रिटेन की यात्रा की और वहां के प्रमुख नेताओं का साक्षात्कार लिया था। नेपाल नरेश के निमंत्रण पर नेपाल गए। भारत मैत्री हेतु सद्भावना यात्रा में भाग लिया था। श्री मिश्र ने भैयाजी से संबंधित कई संस्मरण सुनाएं, जिनमें गीतकार अनजान तथा निराला जी से जुड़े संस्मरण अत्यंत रोचक रहे। वरिष्ठ पत्रकार डॉ दयानंद ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि मोहनलाल गुप्त भैया जी बनारसी व्यावहारिक पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे गुरु थे। भैयाजी न केवल साहित्यसेवी थे, अपितृ साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे। उनके लेखन का दायरा बच्चों से लेकर प्रौढो तक रहा। उन्होंने नई पीढ़ी की साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया। भैया जी 1950 में आज में पहले साहित्यिक संपादक थे‌। साथ ही वह बनारसीपन के भी पक्के हिमायती थे। रईस होते हुए भी उनका जीवन सादगीपूर्ण था। डॉक्टर दयानंद ने कहा कि कुशवाहा कांत अपने दौर के विलक्षण साहित्यकार थे, मात्र 34 वर्षों के जीवनकाल में 35 उपन्यासों का लेखन उनकी असाधारण क्षमता और कौशल का अद्भुत प्रमाण है। कुशवाहा कांत साहित्यकार होने की साथ संपादक भी थे। चिंगारी, बिजली, नागिन पत्रिका का उन्होंने संपादन किया। उनकी रचनाओं में रहस्य, रोमांस, प्रेम और राष्ट्र भक्ति का भी समावेश था।
कार्यक्रम के प्रारंभ में दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ दयानिधि मिश्र ने स्वागत करते हुए कहा कि पं विद्यानिवास मिश्र के जन्मशती वर्ष में संकल्पित श्रृंखला के सोलहवीं कड़ी में काशी की धरोहर पर चर्चा हेतु उपस्थित आप सभी का स्वागत है। सरस्वती वंदना आनंद कृष्ण मासूम ने किया।अंत में काव्यपाठ देवेंद्र नाथ पांडेय ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ आशुतोष शास्त्री तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। आयोजन में डा. राम सुधार सिंह, ओम धीरज,अशोक कुमार सिंह,पवन कुमार शास्त्री, अत्रि भारद्वाज, डॉक्टर श्रद्धानंद ,शिवकुमार पराग, गिरिजेश तिवारी, शशिकला पाण्डेय, उमाशंकर तिवारी कंचन, गणेश गंभीर सहित अन्य साहित्यकार कवि एवं लेखक उपस्थित थे

नई समीक्षा में काशी के गौरव थे डॉ. बच्चन सिंह – डॉ. इंदीवर

बच्चन सिंह, व्यापक अध्ययन वाले साहित्य-इतिहास के विवेचक अनुसंधाता थे। वे आलोचना के नए उपकरणों से टकराते थे, उनकी उपयोगिता और औचित्य की छानबीन करते थे। बच्चन सिंह द्वारा की गई समीक्षा प्रतिष्ठित और स्वीकृत आलोचकों से अलग दिखती है। उनके लेखन में संतुलन के साथ-साथ समग्रता है। काशी में वे एकमात्र आलोचक थे जो नई समीक्षा में काशी के गौरव कहे जा सकते हैं। उनके अतिरिक्त छठे दशक में कोई आलोचक काशी से प्रारंभ कर काशी में ही अंतिम अवस्था को प्राप्त नहीं हुआ, उक्त विचार वरिष्ठ समीक्षक डॉ. इंदीवर ने साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री-न्यास द्वारा राजकीय जिला पुस्तकालय में आयोजित काशी की धरोहर कार्यक्रम के पंद्रहवें आयोजन में व्यक्त किए। अध्यक्षता करते हुए प्रो. ओम प्रकाश सिंह ने कहा कि बच्चन सिंह में यथार्थोन्मुख जीवन-दृष्टि थी। उनकी मेधा समीक्षा, काव्यशास्त्र और इतिहास क्षेत्र में सृजित हुई है। उन्होंने भारतीय काव्यशास्त्र और पाश्चात्य काव्यशास्त्र का विवेकपूर्ण समन्वय उपस्थित किया है। उनकी आलोचना में भाषिक संरचना, उसके रूप तत्व की विलक्षणता का सूक्ष्म विवेचन हुआ है।
संगोष्ठी में कवि त्रिलोचन की काव्य यात्रा पर भी विचार करते हुए राजीव गांधी डीम्ड विश्वविद्यालय, अरुणाचल प्रदेश के प्रवक्ता डॉ. हरिनिवास पांडेय ने त्रिलोचन को धरती का कवि कहा। उन्होंने उनकी अनेक कविताओं का उद्धरण प्रस्तुत कर उन्हें मुक्त छंद की कविता का उत्कृष्ट कवि बताया। उनकी प्रतिभा पर व्यापक प्रकाश डालते हुए उन्हें हिंदी सॉनेट का बेजोड़ कवि बताया।
कार्यक्रम के संयोजक विद्याश्री-न्यास के सचिव डॉ० दयानिधि मिश्र ने स्वागत भाषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि जो समाज अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञ नहीं रहता वह उन्नति नहीं कर सकता, पीछे छूट जाता हैं। ‘सोच विचार’ पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने धन्यवाद-ज्ञापन किया। प्रो. सुरेंद्र प्रताप आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का शुभारंभ आनन्द कृष्ण मासूम ने माता सरस्वती की वंदना से किया, तथा सुचिस्मिता पाण्डेय ने गीत प्रस्तुत किया। अत्रि भारद्वाज, डॉ० अशोक कुमार सिंह, गोपाल जी राय, अरून कुमार केशरी, मंजरी पाण्डेय, संतोष प्रीत, गिरीश पाण्डेय, प्रो. श्रद्धानंद, डॉ. प्रताप शंकर दुबे, कंचन सिंह परिहार, डॉ. कुमार महेन्द्र, डॉ. शैलेन्द्र सिंह, डॉ. शिव कुमार पराग, डॉ. राजीव कुमार सिंह, रामजतन पाल, सूर्यकांत त्रिपाठी, प्रकाश उदय आदि उपस्थित थे। संचालन डॉ. संगीता श्रीवास्तव ने किया।

काशी की साहित्यिक धरोहर पर मंथन, ‘चोंच’ और ‘निर्गुण’ को किया याद

काशी की साहित्यिक धरोहर पर मंथन, ‘चोंच’ और ‘निर्गुण’ को किया याद

साहित्यकारों ने काशी की सृजन परंपरा और उपेक्षित रचनाकारों के योगदान पर डाला प्रकाश

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में गुरुवार को विद्यानिवास मिश्र जयंती वर्ष के अंतर्गत आयोजित व्याख्यानमाला “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के चतुर्दश पुष्प में साहित्यकारों एवं विद्वानों ने काशी की समृद्ध साहित्यिक परंपरा पर विस्तार से चर्चा की। समारोह में कांतानाथ पाण्डेय चोंच की रचनावली के दो खण्डों का लोकार्पण किया गया। मुख्य वक्ता शिव कुमार पराग ने कहा कि काशी की हास्य परंपरा की पंच महाविभूतियों में पं. कान्तानाथ पांडेय ‘चोंच’ का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने कहा कि ‘चोंच’ जी का हास्य उच्चकोटि का था और उसमें अश्लीलता का कोई स्थान नहीं था। वे पैरोडी लेखन के बादशाह माने जाते थे तथा ‘राजहंस’ उपनाम से गंभीर साहित्य की भी रचना करते थे। साहित्यकार होने के साथ-साथ उन्होंने शिक्षक और प्रशासक के रूप में भी शिक्षा जगत में उल्लेखनीय योगदान दिया। उमाशंकर चतुर्वेदी ‘कंचन’ ने कथाकार पं. द्विजेन्द्रनाथ मिश्र ‘निर्गुण’ को कालजयी रचनाकार बताते हुए कहा कि तत्कालीन वामपंथी समीक्षकों ने उनके साहित्य को अपेक्षित महत्व नहीं दिया, जिसके कारण वे उपेक्षा के शिकार रहे। इसके बावजूद हिन्दुस्तान, धर्मयुग, कादम्बिनी, सारिका और माया जैसी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उनकी रचनाएं लगातार प्रकाशित होती रहीं और पाठकों का बड़ा वर्ग उनसे जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि निर्गुण जी भारतीय परिवेश, संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के सशक्त कथाकार थे। अध्यक्षता करते हुए डॉ. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा” एक सार्थक अभियान है, जो समय की धुंध में खो चुके साहित्यकारों को पुनः प्रकाश में लाने का महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है। स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव साहित्य भूषण डा.दया निधि मिश्र ने कहा कि हिंदी की धरोहर का यह 14वां पुष्प है। आज तक काशी के कुल 28 रचनाकारों पर चर्चा की जा चुकी है। आरंभ में सरस्वती वंदना गिरीश पांडेय ने किया। संचालन सूर्यकांत त्रिपाठी, धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया। समारोह में डा.राम सुधार सिंह, प्रकाश उदय, पवन कुमार शास्त्री,शशिकला पाण्डेय, ओम धीरज, श्रद्धानंद, हिमांशु उपाध्याय और चोंच जी की पुत्री तपस्या उपाध्याय भी उपस्थित रहीं।

पंo विद्यानिवास मिश्र के जन्मशती वर्ष के समापन पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर 2026 पर आधारित रेडियो रिपोर्ट

“हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा

काशी की साहित्यिक विरासत पर मंथन, रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान को किया याद

काशी को जानना है तो ‘बहती गंगा’ पढ़ना जरूरी : प्रो. आनंद वर्धन शर्मा

वाराणसी। साहित्यिक मंच एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की जयंती वर्ष के अवसर पर संकल्पित व्याख्यानमाला “हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा” के त्रयोदश पुष्प के रूप में रूद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी के योगदान पर विस्तार से चर्चा हुई।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. आनंद वर्धन शर्मा ने कहा कि काशी की साहित्यिक परंपरा में शिव प्रसाद मिश्र रुद्र काशिकेय और नज़ीर बनारसी ऐसे नाम हैं, जो काशी की जीवंत संस्कृति के संवाहक होने के साथ पाठकों के मन में बनारस को गहराई से समझने की उत्कंठा भी जगाते हैं। उन्होंने कहा कि काशी को सही रूप में जानने के लिए जितना भारतेंदु हरिश्चंद्र की प्रेमजोगिनी पढ़ना आवश्यक है, उतना ही रुद्र जी की अमर कृति बहती गंगा को पढ़ना भी जरूरी है। उन्होंने कहा कि बहती गंगा का हर अंश अपने आप में संपूर्ण है और समग्र रूप में वह काशी की भोर, उजास, आँखों की चमक, बतकही और फक्कड़पन का जीवंत चित्र प्रस्तुत करता है। वहीं नज़ीर बनारसी की शायरी में गंगा-जमुनी तहज़ीब का अनुपम स्वर दिखाई देता है। रूद्र काशिकेय के अवदान पर डा. मीनाक्षी मिश्रा ने कहा कि वे आधुनिक हिन्दी साहित्य और काशी के विलक्षण प्रतिभा संपन्न रचनाकार थे। उपन्यास, नाटक, कहानी, काव्य, ग़ज़ल, गीत और निबंध सहित अनेक विधाओं में उन्होंने सृजन किया। उनकी कृति बहती गंगा काशी की समग्रता को समझने का सशक्त माध्यम है। डा. तमन्ना शाहीन ने नज़ीर बनारसी को अलमस्त शायर बताते हुए कहा कि वे सच्चे देशभक्त थे। उनकी कविताएं हिन्दी जगत में अत्यंत लोकप्रिय रहीं। काशी से उन्हें अपार प्रेम था और उन्होंने जीवनभर आपसी प्रेम, सद्भाव और भाईचारे का संदेश दिया। कार्यक्रम के आरंभ में विद्याश्री न्यास के सचिव डा. दयानिधि मिश्र ने कहा कि काशी की सृजन परंपरा पर आयोजित यह व्याख्यानमाला की 13वीं कड़ी है, जो काशी के साहित्य की पहचान को सहेजने का प्रयास है। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने प्रस्तुत की। संचालन शिवकुमार पराग तथा धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।संतोष प्रीत ने एकल काव्यपाठ प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डा. रामसुधार सिंह, प्रकाश उदय, दीपेश चौधरी, गिरीश पांडेय, संतोष प्रीत, रामजतन पाल, विनोद कुमार सहित अनेक साहित्यकार एवं विद्यार्थी उपस्थित रहे।