वाराणसी। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी समारोह के अंतर्गत राजकीय पुस्तकालय के सहयोग से साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में बुधवार को राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार के सभागार में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा विषयक श्रृंखलाबद्ध व्याख्यानमाला आयोजित हुआ। जिसके द्वितीय पुष्प के रूप में तेग अली तेग के समग्र योगदान पर प्रो. प्रकाश उदय ने कहा कि तेग अली भोजपुरी के पहले गजलगो तो हैं ही, उन्हें गजल और भोजपुरी दोनो को एक दूसरे के काबिल बनाने का भी श्रेय है। काशी अपनी आवाज, अपने अंदाज सब कुछ के साथ उनकी गजलगोई में समाई हुई है। स्वयं भारतेंदु उनके काव्य-बल के कायल रहे हैं। जयशंकर प्रसाद की कहानी ‘गुंडा’ और ईश्वरचंद्र सिन्हा की भोजपुरी कहानी ‘भैरवी के साज’ बहुत कुछ तेग अली की कविताई से ही प्रेरित है। नजाकत और नफासत के लिए ख्यात गजल को तेग अली ने अपनी काशिका के जरिए एक खास तरह की दबंगई और देहातीपन से जोड़ते हुए उसे एक अलग ही आस्वाद से संपन्न किया। जगन्नाथ दास रत्नाकर के अवदान परबोलते हुए प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि जगन्नाथदास रत्नाकर खड़ी बोली हिंदी के आरंभिक महत्वपूर्ण कवियों में से एक हैं ।वह अपने ब्रजभाषा में रचित “उद्धव शतक” के लिए विशेष रूप से याद किए जाते हैं। रत्नाकर जी रीतिकालीन कविता और आधुनिक कविता के सेतु हैं। उनका उद्धव शतक ब्रजभाषा कविता का अंतिम प्रबंधात्मक काव्य है इसमें उन्होंने निर्गुण पर सगुण और ज्ञान पर प्रेम की विजय का उद्घोष किया है। उद्धव शतक कृष्ण काव्य परंपरा में इसलिए भी विशिष्ट है की इसमें भावुकता के साथ-साथ तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टि भी है।
समारोह के अध्यक्षता करते हुए पूर्व अध्यक्ष हिन्दी विभाग महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ प्रो. सुरेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि तेग अली भारतेंदु काल के काशिका और भोजपुरी के कवि और लावनीकार थे। हिंदी के इतिहास ग्रंथों में इनका बहुत उल्लेख नहीं किया गया है। रत्नाकर जी ब्रजभाषा के अंतिम कवि हैं ।यह छायावाद का उत्कर्ष काल रहा है, पर उन्होंने ब्रजभाषा की परंपरा को अपनाया। रत्नाकर जी काशी की साहित्यिक परंपरा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज के आयोजन में दोनों वक्ताओं का समाहार करते हुए प्रो श्रद्धानंद ने कहा कि काशी के तेग अली, जगन्नाथ दास रत्नाकर आधुनिक काल के महत्वपूर्ण कवियों में है। एक काशिका का तो दूसरा ब्रज भाषा का। स्वागत डा.दयानिधि मिश्र, कार्यक्रम का संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह और धन्यवाद ज्ञापन नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। कार्यक्रम का आरंभ शरद श्रीवास्तव की सरस्वती वंदना से हुआ।संयोजन कंचन सिंह परिहार ने किया
