Author: admin
हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परम्परा (नवम् पुष्प) लक्ष्मी नारायण मिश्र एवं वासुदेव शरण अग्रवाल विषय पर चर्चा – 31 दिसम्बर 2025
लक्ष्मी नारायण मिश्र एवं वासुदेव शरण अग्रवाल दोनों भारतीय संस्कृति एवं ज्ञान परंपरा के अनुपम व्याख्याता थे
वाराणसी। पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी समारोहों के अंतर्गत राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्त्वावधान में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन-परम्परा विषयक श्रृंखलाबद्ध व्याख्यान माला नवम पुष्प में आयोजित हुआ। शुभारंभ दीप प्रज्वलन और कंचन सिंह परिहार के मां सरस्वती की स्तुति से हुआ। कार्यक्रम की विषय वस्तु मे स्थापना एवं स्वागत करते हुए साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने कहा कि आज हिंदी के धरोहर कार्यक्रम में जिन दो वरिष्ठ साहित्यकारों पर चर्चा होगी वह दोनों भारत भारतीय परंपरा एवं संस्कृति के गहन अधिकता एवं सृजनकर्ता थे।
बीएचयू के शोधार्थी सर्वेश मिश्रा ने लक्ष्मी नारायण मिश्र के अवदान पर बोलते हुए कहा लक्ष्मी नारायण मिश्र हिंदी के ऐसे पहले आधुनिक नाटककार हैं जिन्होंने अपने नाटकों में परंपरा से बुद्द और कबीर की बौद्धिकता की आधुनिक समाज की समस्याओं के उद्घाटन में वसूली इस्तेमाल किया है। मिश्रा जी अपने नाटकों में परंपरा के व्याप्त रूढ़ियों को छोड़ने और आधुनिक मूल्यों को भारतीय दृष्टि से अपनाने के पक्षधर हैं। छायावाद के दौर में रहते हुए भी उन्होंने अपने नाटकों की भाषा सहज, सरल रखी। उनके नाटको में स्त्री जीवन से जुड़ी समस्याएं प्रमुख हैं जिनमें परिवार, विवाह, प्रेम, विधवा विवाह और काम की समस्या विशेष रूप से में उल्लेखनीय है।
ऋषभ पाण्डेय ने कहा की वासुदेव शरण अग्रवाल भारतीय संस्कृति के अनुपम व्याख्याता थे। उन्होंने पणिति, पतंजलि वह विभिन्न भारतीय प्राचीन ग्रंथो का प्राणयन करते हुए भारतीय ज्ञान परंपरा एवं इतिहास का अध्ययन किया था वासुदेव शरण अग्रवाल के यहां जो वेस विचार मिलता है, वहां लोक और वेद दोनों का समन्वय दिखाई पड़ता है। वैदिक शब्दावली और जनपदीय संस्कृति का स्वरूप उनके यहां घुल-मिल मिल गए हैं।
अध्यक्षता करते हुए डॉ अति भारद्वाज ने कहा कि वासुदेव शरण अग्रवाल ने हिंदी गद्य को एक नई दिशा दी और भारत की सांस्कृतिक धरोहरों को दुनिया के सामने रखा। दूसरे प्रसिद्ध नाटककार लक्ष्मी नारायण मिश्र का हिंदी नाटककारों में अत्यंत महत्वपूर्ण नाम है।
डॉ संजय पंकज ने काव्यांजलि के अंतर्गत अपने लोकगीत सुना कर लोगों का को प्रभावित किया। कार्यक्रम का संचालन अंजली मिश्रा और धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया। समारोह में डॉ (मेजर) अरविंद कुमार सिंह, ओम धीरज, हिमांशु उपाध्याय, प्रो प्रकाश उदय, आनंद मासूम, प्रभात मिश्रा, प्रो श्रद्धानंद, प्रभात झा गिरिजेश तिवारी, राजीव कुमार गोंड,डॉ मंजरी पांडेय सहित अन्य रचनाकार एवं विद्यार्थी उपस्थित थे।
हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा के आठवें चरण के रूप में राधा कृष्ण दास तथा हिंदी में गद्य गीत विधा के प्रणेता राय कृष्ण दास के व्यापक अवदान पर गंभीर चर्चा – 29 नवम्बर 2025
काशी की संस्कृति एवं साहित्य परंपरा के संवाहक थे बाबू राधा कृष्ण दास और राय कृष्ण दास
वाराणसी। एलटी कॉलेज स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में शनिवार को विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संकल्पित योजना की श्रृंखला में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वाधान में हिंदी धरोहर काशी की सृजन परंपरा के आठवें चरण के रूप में भारतेंदु बाबू हरिश्चंद्र के फुफेरे भाई, उनके सहधर्मी और रचनाकार राधा कृष्ण दास तथा प्रसिद्ध पुरातत्वविद एवं हिंदी में गद्य गीत विधा के प्रणेता राय कृष्ण दास के व्यापक अवदान पर गंभीर चर्चा संपन्न हुई। अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण, मंजरी पांडेय द्वारा मंगलाचरण और अतिथियों के स्वागत से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। विद्याश्री न्यास के सचिव डा. दयानिधि मिश्रा ने परिचर्चा की विषय स्थापना के साथ सभी का स्वागत किया। आयोजन श्रृंखला के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इस श्रृंखलाबद्ध आयोजन के माध्यम से काशी के साहित्य का एक ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार हो रहा है। बाबू राधा कृष्ण दास के अवदान पर प्रकाश डालते हुए हिमांशु उपाध्याय ने कहा कि हिंदी साहित्य में बाबू राधा कृष्ण दास का ऐतिहासिक महत्व है। उनके पद्य और गद्य लेखन में पूरी तरह से भारतेंदु की छाप थी। अपने समसामयिक लेखो, कविता ,नाटक की अनेक कृतियों से जहां उन्होंने साहित्य की श्रीवृद्धि की, वहीं नागरी प्रचारिणी सभा, अग्रवाल समाज और हरिश्चंद्र स्कूल की स्थापना कर समाज के प्रति अपने दायित्व का नि किया भारतीय कला आंदोलन के पुरोधा पद्म विभूषण कला पारखी और साहित्य प्रेमी राधा कृष्ण दास के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की प्रोफेसर प्रीति जायसवाल ने कहा कि भारतीय मूर्ति कला और भारत की चित्रकला जैसी महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रणेता राय कृष्ण दास ने हिंदी साहित्य में अपना अमूल्य योगदान दिया है उन्होंने ब्रज भाषा और खड़ी बोली दोनों में रचनाएं लिखी। साधना और छाया पथ नामक गद्य गीत का अनुपम उपहार उन्होंने हिंदी संसार को दिया है। अपने समय के सभी बड़े रचनाकार जैसे जयशंकर प्रसाद ,महादेवी वर्मा, मैथिली शरण गुप्त अज्ञेय सभी का आत्मीय संबंध उनसे था। काशी हिंदू विश्वविद्यालय स्थित भारत कला भवन उनके कला प्रेम और समर्पण का जीवन्त स्वरूप है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए पूर्व प्रशासनिक अधिकारी और साहित्यकार श्री ओम धीरज ने कहा कि समय के क्रूर प्रभाव में बहुत से महत्वपूर्ण लोग इतिहास के पन्नों में विलुप्त होते जाते हैं, जबकि महत्व की दृष्टि से इनका योगदान किसी से कम नहीं होता। बाबू राधा कृष्ण दास और राय कृष्ण दास ऐसे ही लोग रहे हैं ।भारतेंदु के समकालीन और उसके बाद के उत्कृष्ट समाजसेवी रचनाकारों में राधा कृष्ण दास का नाम भुलाया नहीं जा सकता । भारत की कला एवं चित्रकला के पुरोधा तथा गद्य गीत के पुरष्कर्ता के रूप में राधा कृष्ण दास का नाम सर्वोपरि रहा है। जयशंकर प्रसाद का इनसे निकट का संबंध था ।प्रसाद जी जो भी लिखते थे उसे सबसे पहले उन्हें दिखते थे। बीएचयू स्थित राय साहब का आवास उस समय के सभी बड़े साहित्य कारों का आवास स्थल था ।इन दोनों हिंदी सेवियों पर चर्चा करके साहित्यिक संघ एवं विद्या श्रीन्यास ने हिंदी जगत का बहुत उपकार किया है। इस अवसर पर डॉक्टर राम सुधार सिंह , डॉक्टर प्रकाश उदय,गिरिजेश तिवारी,गिरीश पांडेय,डॉक्टर शशिकला पाण्डेय,दीपेश चौधरी आदि बड़ी संख्या में लोग उपस्थित हुए। कार्यक्रम का संचालन वासुदेव ओबेरॉय तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया।शिवकुमार पराग ने कार्यक्रम में अपनी गीतों से सभी को रस से भर दिया।
हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा के सातवें चरण के रूप में काशी की हास्य-व्यंग्य परंपरा में श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड, बेढब बनारसी तथा अन्नपूर्णानंद के व्यापक अवदान पर गंभीर परिचर्चा – 29 अक्टूबर 2025
राजकीय जिला पुस्तकालय में ‘हास्य-व्यंग्य परंपरा’ पर गंभीर मंथन
वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में बुधवार को पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संकल्पित योजनाओं की श्रृंखला में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी धरोहर:काशी की सृजन परंपरा के सातवें चरण के रूप में काशी की हास्य-व्यंग्य परंपरा में श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड, बेढब बनारसी तथा अन्नपूर्णानंद के व्यापक अवदान पर गंभीर परिचर्चा सम्पन्न हुई। अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण,कंचन सिंह परिहार द्वारा मंगलाचरण और अतिथियों के स्वागत से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्र ने परिचर्चा की विषय स्थापना के साथ सभी का स्वागत करते हुए आयोजन श्रृंखला के महत्व पर प्रकाश डाला। बताया कि इस श्रृंखलाबद्ध आयोजन के माध्यम से काशी के साहित्य का ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार हो रहा है। कृष्णदेव प्रसाद गौड बेढब बनारसी के महत्त्व को रेखांकित करते हुए बीएचयू हिन्दी विभाग की डा.प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि बनारस की माटी में जन्मे साहित्यकारों में बेढब बनारसी ने यहां की ठेठ बोली में समाज की सच्चाइयों हंसते-हंसते उजागर किया। उनकी रचनाओं में हास्य व्यंग्य और बनारसी ठेठ बोली का अनोखा रंग झलकता है। आमजन की बात को उन्होंने मुस्कुराहट और चुटकी में कह डाला। बेढब की कविता हंसी के बीच छिपे संदेश की कविता है यही उनकी पहचान है। आज की श्रृंखला के अन्य रचनाकार अन्नपूर्णानंद के महत्व की चर्चा करते हुए प्रोफेसर श्रध्दानंद ने कहा कि अन्नपूर्णानंद जी ने भारतेंदु के पश्चात हास्य व्यंग की धारा को जीवंत किया। नौ रसों में हास्य रस की सदा उपेक्षा की गई है, जबकि हास्य रस संघर्ष भरे इस जीवन की संजीवनी है। अन्नपूर्णानंद जी ने हास्य रस की इस सूखती धारा को अपनी रोचक एवं हास्य पूर्ण कहानियों के द्वारा सरस बनाया। उन्होंने शिष्ट हास्य-व्यंग्य के माध्यम में न केवल व्यक्ति, समाज और देश के विविध रूप रंगों को बखूबी टटोला, बल्कि साहित्य में हास्य रस के अभाव को भावमय किया। जीवन में संघर्ष और तनाव की स्थिति हर क़ाल खंड में बनी रहती है, ऐसे क्षण में सीख और सुख मिलने में हास्य व्यंग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने फूहड़ता के विरुद्ध शिष्ट और मर्यादित हास्य रस की सर्जना की। वे हास्य व्यंग के अद्भुत शैलीकार हैं। उनकी तुलना अंग्रेजी के प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य लेखक मार्कट्वेन से तथा बंगाल के प्रसिद्ध लेखक परशुराम से की जाती है। उनकी महाकविचच्चा, मगन रहु चोला, मंगलमोद, मेरी हजामत, मन मयूर,मिसिर जी आदि आधुनिक हिंदी साहित्य जगत की अद्वितीय रचनाएं हैं। अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर शशिकला पांडेय ने कहा कि काशी में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद के बाद एकदम सन्नाटा छा गया था, देश की आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था। ऐसे समय में काशी के इन रचनाकारों ने साहित्य की हास्य व्यंग की धारा को सशक्त करते हुए साहित्य को एक नए रंग से सजाया। इस परंपरा में पहला नाम बेढब बनारसी जी का आता है, उन्होंने अपनी व्यंग्य रचनाओं से अंग्रेजी सरकार को सीधी चुनौती दी। श्री अन्नपूर्णानंद ने पहली बार गद्य विधा में हास्य प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने तथा संचालन डॉक्टर अत्रि भारद्वाज किया।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह, डॉक्टर प्रकाश उदय ,डॉक्टर अशोक सिंह, शरद श्रीवास्तव, कवींद्र नारायण सहित बड़ी संख्या में छात्र एवं छात्राएं उपस्थित थे।
हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा के छठें चरण के अंतर्गत प्रसाद और शिवरानी देवी : काशी में हिंदी साहित्य का महाविमर्श – 28 सितम्बर 2025
पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संकल्पित आयोजनों की शृंखला में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा’ के छठे चरण के रूप में आज दिनांक 28 सितंबर 2025 को राजकीय पुस्तकालय, अर्दली बाजार के सभागार में हिंदी साहित्य को शिवरानी देवी और जयशंकर प्रसाद जी के प्रदेयों पर केंद्रित गंभीर परिचर्चा संपन्न हुई। अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण, कंचन सिंह परिहार द्वारा मंगलाचरण और अतिथियों के स्वागत से इस सारस्वत आयोजन का शुभारंभ हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र के स्वागत-भाषण ने स्वागत के साथ ही विषय-प्रस्ताव का दायित्व भी निभाया।
डाॅ. शुभ्रा श्रीवास्तव ने साहित्य के क्षेत्र में कम चर्चित रही शिवरानी देवी के अप्रतिम योगदान को रेखांकित किया। जिस रचना ने उन्हें स्थापित किया वह है ‘प्रेमचंद घर में’ लेकिन वे एक समर्थ कथाकार और समीक्षक भी थीं। डाॅ. शुभ्रा ने ‘शिवरानी देवी रचनावली’ के संपादन के रोचक अनुभवों को भी साझा किया। आजादी की लड़ाई में वे जेल भी गईं और जेल में भी सभी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ समान व्यवहार हो, इसके लिए लगातार धरना दिया। कृतित्व और व्यक्तित्व दोनो स्तरों पर उन्होंने एक योद्धा की भूमिका निभाई। प्रेमचंद की छाया में वह साहित्य-विमर्श से चाहे जितना छूटती गई हों, लेकिन शुभ्रा ने अनेक उदाहरणों से बताया कि कैसे वैचारिक और रचनात्मक स्तर पर कई मामलों में वे प्रेमचंद से अधिक प्रगतिशील हैं।
साहित्य को प्रसाद जी के योगदान के ज्ञात-अज्ञात अनेक पक्षों को प्रो. कमलेश वर्मा ने अपनी प्रतिष्ठित कृति ‘प्रसाद काव्य-कोश’ के हवाले गंभीर विमर्श का विषय बनाया। प्रसाद के यहाँ ऐसा कोई शब्द नहीं, जो अबूझ हो, जिसकी कोई परंपरा न हो। विशेषण-विशेष्य के विशिष्ट प्रयोग उन्होंने किए। कुछ ऐसे भी शब्द हैं जो प्रसाद को विशेषत: प्रिय हैं और उन्होंने उनका बहुविध उपयोग किया है, जैसे मधु, नील आदि। कुछ ऐसे भी शब्द हैं जिनका उपयोग छायावादी कवियों में प्रसाद ने ही किया, और बाद के रचनाकारों ने उन्हें हाथोहाथ लिया। दलित-विमर्श में आज जो बहुचर्चित शब्द है, ‘आजीवक’, वह भी हिंदी में प्रसाद जी का लाया हुआ है। ‘यायावर’ भी ऐसा ही एक शब्द है, जिसे प्रसाद जी संस्कृत से ले आए।
इस आयोजन में संयोग और सौभाग्य से पधारे प्रसिद्ध आलोचक प्रो. बजरंग बिहारी तिवारी ने शिवरानी देवी का संदर्भ लेते हुए अवन्ति सुन्दरी और बिज्जिका का भी उल्लेख किया और कहा कि प्रसाद जी के काव्य-सामर्थ्य पर उनके शब्द-प्रयोग के आधार पर चिंतन की जो परंपरा कमलेश जी ने शुरू की उसकी एक अपनी महत्ता है। प्रसाद जी की प्रपौत्री कविता प्रसाद ने इस आयोजन की उपलब्धियों को रेखांकित किया और प्रसाद और शिवरानी देवी पर एक साथ विमर्श के औचित्य को भी उनके जीवन-प्रसंगों से स्थापित किया।
इस विमर्श-आयोजन को एक नया आयाम मिला, प्रसिद्ध गीतकार श्री सुरेन्द्र वाजपेयी के सम्मोहक काव्य-पाठ से — गिरते हैं पेड़ों से पत्ते हरे-हरे, धूप दिखाकर आग चली जाती है … हवा लगाकर आग चली जाती है…।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. इंदीवर ने दोनो व्याख्यानों के समाहार के साथ ही प्रसाद जी और शिवरानी देवी देवी के सर्जनात्मक अवदान के महत्त्वपूर्ण आयामों की भी चर्चा की। इस आयोजन-शृंखला को उन्होंने काशी की रचनाशीलता के पुनराख्यान के रूप में परिभाषित किया।
धन्यवाद-ज्ञापन ‘सोच-विचार’ के संपादक श्री नरेन्द्र नाथ मिश्र ने किया और विदग्ध टिप्पणियों के साथ इस विचार-आयोजन का संयोजन-संचालन प्रो. इशरत जहाँ ने किया।
हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा में प्रेमचंद और बंगमहिला की गूँज – अगस्त 2025
“प्रेमचंद और बंगमहिला : साहित्य में मुक्ति चेतना के अग्रदूत”
“काशी की सृजन परंपरा में प्रेमचंद और बंगमहिला की गूँज”
प्रेमचंद और बंग महिला दोनो का कथा साहित्य मुक्ति चेतना का साहित्य है
वाराणसी। एलटी कालेज (अर्दली बाजार) में हिन्दी साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी की धरोहर:काशी की सृजन परंपरा विषयक व्याख्यान में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने कहा कि प्रेमचंद अपने समय की धड़कन को बहुत करीब से देख रहे थे।वे देख रहे थे कि देश के अर्थतंत्र की रीढ किसान दुखी है,स्त्री और दलित को समाज में उनका उचित स्थान प्राप्त नहीं है,समाज ऊंच नीच,अमीर गरीब में बंटा हुआ है,ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तांतरण होगी।बंग महिला ने ऐसे समय कहानी लिखना शुरू किया जब कहानी को युवाओं को बिगाड़ने वाली चीज माना जाता था।ऐसे समय में श्रीमती राजेन्द्र बाला घोष को अपना वास्तविक नाम छिपाकर बंग महिला नाम से लिखना पड़ा।आज के विवेच्य दोनो साहित्यकार अपने अपने ढंग से हर तरह ।के बंधन तोड़कर मुक्ति की गाथा रचने वाले रचनाकार थे।
पंचम पुष्प के रूप में प्रेमचंद के अवदान पर प्रो बलराज पांडेय ने कहा कि हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के द्वारा जो महत्व प्राप्त किया है,वह किसी भी कथाकार के लिए स्पर्द्धा का विषय हो सकता है।आज हर कथाकार की तमन्ना होती है कि वह प्रेमचंद की ऊंचाई का स्पर्श करे। सेवासदन से लेकर गोदान उपन्यास तथा पंच परमेश्वर से लेकर कफ़न कहानी जैसी कई अनमोल रचनाओं के द्वारा उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध किया है। हिन्दी ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय कथा साहित्य के वे गौरव हैं। विश्व के कथा साहित्य में उनकी तुलना मक्सीम गोर्की तथा लू शुन से की जाती है। प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य में उन लोगों को नायकत्व प्रदान किया,जो सदियों से उपेक्षित थे।वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी लेखनी के द्वारा बड़ी भूमिका निभा रहे थे।वे शोषण पर आधारित समाज व्यवस्था को बदलकर ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसमें समानता हो, बंधुत्व हो और भाईचारा हो। उन्होंने जाति और धर्म पर आधारित हर प्रकार के भेद-भाव और पाखंड का खुलकर विरोध किया।
राजेन्द्र बाला घोष बंग महिला का योगदान पर डा.मुक्ता ने कहा कि राजेंद्रबाला घोष ने उस काल में जन्म लिया जब स्त्रियाँ असूर्यमपश्याएँ हुआ करती थीं और बाल विवाह का अटल साम्राज्य था। यह काल और परिस्थितियां ही उनके क्रान्तिदर्शी लेखों की पृष्ठभूमि बनीं । सन1882 में राजेंद्रबाला घोष का काशी के कोदई चौकी मोहल्ले में जन्म हुआ। इनकी कहानी ‘ दुलाईवाली’ को हिंदी की प्रथम तीन मौलिक कहानियों में स्थान प्राप्त है। हिंदी ऐयारी और तिलस्म में उलझ चुकी थी । कुछ विद्वतजन उर्दू, फारसी और बंगला साहित्य की सामग्री से स्वयं को महिमामंडित करने का प्रयास कर रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में बंगमहिला ने’हिंदी के ग्रंथकार ‘शीर्षक लेख लिखकर चेतावनी दी और भविष्य के लिये सावधान किया। बंगमहिला स्त्री पुरूष समानता की पक्षधर थीं। हिन्दू धर्म और संस्कृति के नाम पर फैलाई जा रही भ्रामक बातों का उन्होंने लेख द्वारा एवं लेखों के अनुवाद द्वारा खंडन किया और लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।
बंगमहिला के सम्पूर्ण साहित्य में राष्ट्रीय चेतना और लोकजागरण की गूँज है।
प्रारंभ में दीप प्रज्वलन और पंडित विद्यानिवास मिश्र तथा प्रेमचंद, बंग महिला के चित्र पर माल्यार्पण के उपरान्त विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दयानिधि मिश्र ने स्वागत भाषण दिए और कंचन सिंह परिहार ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत किया।कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध गीतकार डॉक्टर अशोक कुमार सिंह ने तथा धन्यावाद प्रकाश सोच विचार पत्रिका के संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।
राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ – 11-13 अगस्त 2025
आ. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न आयोजनों की एक वर्षपर्यंत शृंखला विद्याश्री न्यास की तरफ से संकल्पित है, जिसमें से एक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ विषय पर केंद्रित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से भारत अध्ययन केंद्र, वाराणसी और लाल बहादुर शास्त्री पीजी काॅलेज, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में 11 से 13 अगस्त 2025 तक भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सभागार में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन ; माँ सरस्वती, महामना और आ. विद्यानिवास मिश्र के चित्र पर माल्यार्पण, श्री केशव मिश्र एवं श्री शिवम तिवारी के स्वस्ति-वाचन, श्री विवेक तिवारी के मंगलाचरण, आचार्य सुद्धन पांडेय की शंखध्वनि, संगीत और मंच कला संकाय के विद्यार्थियों की कुलगीत-प्रस्तुति, अतिथियों के सारस्वत सम्मान और प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी के स्वागत-वक्तव्य से हुआ। उद्घाटन-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए सत्र के मुख्य अतिथि आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी (अयोध्या) ने धर्म के सनातन स्वरूप को बहुत सहजता से हृदयंगम कराया। बताया कि जो होना चाहिए, वह होना और उसका होना ही धर्म है। भारतीय समाज में अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति के भीतर जो मूल्यबोध है, कर्तव्याकर्तव्य का विवेक है, वह हमारी धर्मभावना की देन है, जिसकी पहुँच शास्त्र से लेकर लोक तक अप्रतिहत है। धर्म को जीवन में नैतिकता, सत्य और करुणा का आधार बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसके पालन में आचरण की ईमानदारी सर्वोपरि है। धर्म के विवेचन के क्रम में उन्होंने आ. विद्यानिवास मिश्र की कालजयी कृति ‘हिंदू धर्म : जीवन में सनातन की खोज’ का विशेषतः उल्लेख किया। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि हमारे लिए धर्म जीवन-पद्धति का वाचक है, किसी वस्तु का मूल तत्व है, कर्म-प्रेरक है, कर्तव्य है, स्वभाव है ; अर्थ, काम और मोक्ष का केंद्र है और इस अर्थ में रिलिजन या मजहब से सर्वथा भिन्न है। उन्होंने रेखांकित किया कि धर्म की व्यवस्था गतिशील है और उसमें परिवर्तन सदा संभव है। प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, सचिव, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद ने धर्म और आधुनिक जीवन के बीच एक उचित तालमेल, सांप्रदायिक सौहार्द, सांस्कृतिक संरक्षण और धर्म-दर्शन के वैश्विक संदर्भों के साक्षात्कार की जरूरत पर बल दिया और उम्मीद जाहिर की इस संगोष्ठी में इन उद्देश्यों तक पहुँचने के रास्ते बन सकेंगे, विद्वत्संवाद से आगे बढ़कर यह आमजन और युवजन तक पहुँच बना सकेगी, उनमें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की समझ और उसके प्रति गौरव-बोध विकसित कर सकेगी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि महामना सदैव भारत और भारत-भाव की बात करते थे। भारत अध्ययन केंद्र द्वारा संचालित पाठ्यक्रम विभिन्न प्रांतों के जन-जन तक पहुँचे यह महत्त्वपूर्ण है।आ. विद्यानिवास मिश्र के एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा ज्ञान-प्राप्ति के उद्देश्य में बाधक नहीं हो सकती।
उद्घाटन-समारोह की एक उपलब्धि रही भारत अध्ययन केंद्र के भूतल पर नवनिर्मित ‘वैदिक यज्ञ-पात्र संग्रहालय’ का उद्घाटन और दूसरी उपलब्धि रही डाॅ. दयानिधि मिश्र द्वारा इस संगोष्ठी के केंद्रीय विषय पर संपादित और प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ का लोकार्पण। इसके साथ ही ‘सोच-विचार’ पत्रिका के यशस्वी संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों को पत्रिका के ‘काशी अंक-16’ और ‘विद्यानिवास मिश्र विशेषांक’ से विभूषित किया। सत्र में धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने और सत्र का संचालन-संयोजन डाॅ. रामसुधार सिंह ने किया।
पहला अकादमिक सत्र ‘धर्म की अवधारणा : धर्मविषयक चिंतन का विकास और विकृतियाँ, धर्म की विविध परंपराएँ’ विषय पर प्रो. श्याम सुन्दर दुबे (दमोह) की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। प्रो. शंकर कुमार मिश्र (वाराणसी) ने बताया कि वैदिक काल में धर्म को ऋत कहा गया, तदनुसार प्रकृति की नियमबद्धता ही धर्म है। उपनिषदों में वह आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष की ओर उन्मुख हुआ, आत्मा की शुद्धि और सत्य की खोज को ही धर्म का मान दिया गया। रामायण और महाभारत काल में इसे कर्तव्य और न्याय के रूप में देखा गया। धर्म की विविध परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रो. धनंजय मणि त्रिपाठी (नई दिल्ली) ने धर्म के विविध रूपों — सामान्य धर्म, विशिष्ट धर्म, वर्णधर्म या स्वधर्म, आश्रम धर्म, कुलधर्म, युगधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म आदि के माध्यम से उसके विभिन्न आयामों को प्रत्यक्ष किया। डाॅ. लक्ष्मी मिश्र ने धर्म के, स्मृतियों में प्रस्तुत स्वरूप को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए विश्लेषित किया। उन्होंने विभिन्न स्मृति-संदर्भों का आधार लेते हुए बताया कि स्मृतिकारों ने मानवमात्र के अभ्युदय एवं निःश्रेयस के लिए ही धर्म का निर्धारण किया है। व्यक्ति और समाज दोनो के कल्याण का संभव मार्ग धर्म ही है, यदि देश-काल और परिस्थिति के अनुसार उसकी नमनीयता को भी उसके एक अनिवार्य अभिलक्षण के रूप में समझा और स्वीकार किया जाय, तो। प्रो. श्याम सुंदर दुबे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन को धर्म और लोकजीवन के संबंध-परस्पर पर केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज के लिए धर्म हमेशा से प्रेरक की भूमिका में रहा है। वेद ने यदि प्रकृति को आत्मसात करते हुए दर्शन और अध्यात्म की गहराइयों में प्रवेश किया तो लोक ने प्रकृति के साथ जीना सीखा और अपनी सामाजिकता में ही अपने दर्शन और अध्यात्म को लीन कर लेने में बहुविध प्रवीण हुआ। वस्तुतः लोक का धर्म लोक जीवन के व्यापक व्यवहार का ही अंग है। इस सत्र का संचालन डाॅ. शिवलोचन शांडिल्य ने किया।
दूसरा अकादमिक सत्र (12/08/25) भारतीय शास्त्रीय चिंतन में धर्म के स्वरूप की खोज से संबंधित था। प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने रामचरितमानस का आधार लेते हुए सबके प्रति और सबकुछ के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति को सर्वोपरि धर्म के रूप में रेखांकित किया। तुलसी ने धर्म को जीवन की दैनंदिनी में प्रतिपादित किया है। ‘पर हित सरिस धरम नहिं भाई’ जैसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य के रूप में ही नहीं, ‘एहि ते अधिक धरम नहिं दूजा, सादर सास-ससुर पद पूजा’ जैसे अभी की समस्या के समाधान के लिए अभी-अभी रच लिए गए सिद्धांत भी धर्म के व्यावहारिक रूप को प्रत्यक्ष करते हैं। प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने कहा कि भारत की संपूर्ण शास्त्र-परंपरा लोक को समर्पित है। उसने अपने सिद्धांतों को लोक से ही पाया और फिर लोक तक ही पहुँचाया है। लोक तक पहुँचने-पहुँचाने में उसे जब और जहाँ कोई कठिनाई आई है, उसने नए रास्ते निकाले हैं, सिद्धांत नहीं बदले हैं। धर्म की वैदिक अवधारणा रामायण, महाभारत, स्मृतादिक के माध्यम से लोक तक पहुँचती है, लोक की जरूरतों के मुताबिक हमारे शास्त्र स्वयम् को नित्य नवीन करते रहते हैं और इसी अर्थ में वे सनातन हैं। प्रो. माधव जनार्दन रटाटे ने श्रीमद्भागवत में प्रतिपादित भागवत धर्म की व्याख्या की। उसमें सबके प्रति समभाव रखने को कहा गया है और भक्ति को परम धर्म के रूप में रेखांकित किया गया है। भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य की भी प्राप्ति होती है। श्री ज्ञानेश्वर प्रसाद त्रिपाठी (लखनऊ) ने पं. विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘भागवत भूमि’ का उल्लेख करते हुए सृष्टि-चक्र तथा धर्म और साहित्य के बहुस्तरीय रिश्तों के मर्म पर प्रकाश डाला। इस क्रम में उन्होंने स्वयं-संपादित ‘कबीर ज्योति’ पत्रिका भी मंचस्थ अतिथियों को प्रदान की। डाॅ. गायत्री प्रसाद पांडेय ने महाभारत के आलोक में धर्म की चर्चा करते हुए बताया कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा जो महाभारत में है वह अन्यत्र तो मिल सकता है, लेकिन जो महाभारत में नहीं है वह और कहीं नहीं है, यह भी सही है। वह मानता है कि सत्य के समान और परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। प्रो. संतोष कुमार शुक्ल (नई दिल्ली) ने धर्म की पौराणिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बताया कि जीवन में जो भी सनातन है वह धर्म है, यह भी कि भारतीय साहित्य, वह चाहे जिस रूप में हो, धर्म का ही आख्यान करता है, और यह भी कि हमारी चौदह विद्याएँ धर्म का ही प्रतिपादन करती हैं। प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने ‘पुराणों और धर्मशास्त्र में धर्म’ विषय पर बोलते हुए बताया कि सनातन धर्म प्रथम धर्म है, सनातन परम ब्रह्म है, वही ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सत्यमात्र का पर्याय है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरिदत्त शर्मा ने बताया कि महाभारत भारतीय धर्म-चिंतन का विश्वकोश है। धर्म के विभिन्न प्रकारों और आयामों को वह सोदाहरण प्रस्तुत करता है। उससे ज्ञात होता है कि सत्य और असत्य का संघर्ष भी सनातन है, जो धर्म को मारता है, धर्म उसे मार देता है तथा जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है — धर्मो रक्षति रक्षितः। इस सत्र का संचालन डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने किया।
संगोष्ठी के तीसरे अकादमिक सत्र ‘धर्म और दर्शन : भगवद्गीता, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, योग और आगम’ के अंतर्गत ‘प्रस्थानत्रयी में से शांकरभाष्य में धर्म का स्वरूप’ पर बोलते हुए प्रो. रामनाथ झा (नई दिल्ली) ने वृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से बताया कि ईश्वर बाहर से नहीं, हमारे भीतर रहकर नियमन करता है, इसी नाते वह अंतर्यामी भी है। उन्होंने भारतीय जीवनयापन के मूलाधार के रूप में धर्म की पहचान की। सारस्वत अतिथि प्रो. शशिप्रभा कुमार (शिमला) ने वैशेषिक दर्शन के आधार पर धर्म के लक्षण, उसके स्वरूप, उसकी उत्पत्ति-प्रक्रिया, उसके साधन, प्रकार आदि का विवेचन किया, साथ ही धर्म को आत्मा के गुण और आत्मा के विशेष गुण के रूप में व्याख्यायित किया। प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने वेदांत में धर्म के स्वरूप पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वेदांत में धर्म परंपरया मोक्ष का साधन होते हुए भी साक्षात मृत्युतरण का उपाय है। धर्मशास्त्र मानवजीवन का संविधान है। वह चारो पुरुषार्थों में हेतुवत है। उन्होंने धर्माचरण में आचार के महत्त्व को भी रेखांकित किया। प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बताया कि महर्षि जैमिनी ने वेदोक्त धर्म की युक्तियुक्त व्याख्या एवं यज्ञीय प्रायोगिक क्रियाओं की स्पष्ट विवेचना के लिए ही मीमांसा-सूत्रों की रचना की। उसमें वेदविहित कर्म को ही धर्म माना गया है। प्रो. सुद्युम्न आचार्य (सतना) ने शाश्वत धर्म के व्याख्याकार के रूप आदि शंकराचार्य के प्रदेयों पर प्रकाश डाला। आदि शंकराचार्य का धर्म-दर्शन अध्यात्म तथा भौतिक विज्ञान के साथ संवादी तथा व्यवहार में भी सहज आचरणीय है। उन्होंने जगत की अनिर्वचनीयता, व्यवहारिक स्तर पर ब्रह्मज्ञान और माया के अनिर्वचनीय विभेद आदि की चर्चा की। प्रो. शीतला प्रसाद पाण्डेय ने आगमशास्त्र के धर्म-विमर्श को प्रस्तुत करते हुए कहा कि धर्म-अधर्म दोनो का सांगोपांग विवरण देने वाला शास्त्र आगम ही है। वह मानता है कि सदाचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है और धर्म से आयु की वृद्धि होती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राजाराम शुक्ल ने सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए बताया कि कैसे हमारे आगम-निगम सभी शास्त्र और हमारा रचनात्मक साहित्य भी, धर्म-विषयक विमर्श को मिल-जुलकर निरंतर पूर्णतर करते रहे हैं। सत्र का संचालन डाॅ. ज्ञानेंद्र नारायण राय ने किया।
संगोष्ठी के तीसरे दिन (13/08/25) की शुरुआत ‘धर्म तथा समाज : आधुनिक विचारक’ विषयक चौथे अकादमिक सत्र से हुई। सोच-विचार पत्रिका के संपादक श्री नरेन्द्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया, उन्हें ‘सोच-विचार’ पत्रिका के काशी अंक 16 एवं आ. विद्यानिवास मिश्र विशेषांक प्रदान किए तथा पत्रिका की प्रकाशन-यात्रा का एक संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया डाॅ. विद्याविंदु सिंह (लखनऊ) ने अनेक लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि का संदर्भ लेते हुए भारतीय लोकजीवन में व्याप्त धर्म के सहज स्वरूप का उद्घाटन किया। वह एक छोटे-से सवाल “कुँअवा खनवले कवन फल, सुनऽ हो राजा दसरथ” और इसके इस छोटे-से जवाब “झोंझवन भरे पनिहारिन तबहिं फल होइहें” से भी जाहिर है। डाॅ. विश्वास पाटिल (महाराष्ट्र) ने महात्मा गांधी की धर्म विषयक अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि गांधी जी स्वयं को सनातनधर्मी कहते ही नहीं है, उसका निरंतर परीक्षण भी करते हैं। उनकी धर्म-संबंधी अवधारणा के मूल में आत्मिक शुद्धि के साथ-साथ व्यापकता की प्रक्रिया है जिसका क्षितिज समाजक्रांति तक फैला हुआ है। प्रो. अवधेश प्रधान ने स्वामी विवेकानंद की धर्म-दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए बताया कि वे धर्म को उस ब्रह्मत्व की अभिव्यक्ति मानते थे, जो मानवमात्र में पहले ही से मौजूद हुआ करता है। धर्म उनके अनुसार साक्षात्कार की वस्तु है, और भारत में धर्म का अर्थ प्रत्यक्षानुभूति है। वे निःस्वार्थपरता को ही धर्म की कसौटी मानते थे। पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता तक ऊपर उठने में धर्म मनुष्य का आंतरिक साथी है। वे धर्म के रूप में वेदांत के संदेश को आदिवासी, जनजाति, गिरिजन तक ले जाने के लिए प्रयत्नशील थे। श्री अजयेंद्र नाथ त्रिवेदी (कोलकाता) ने महर्षि अरविंद की धर्म-दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्होंने सनातन धर्म-चिंतन को नवीन आयाम दिए। अरविंद ने सनातन विचारधारा को भारतीय नवजागरण के उपकरण के रूप में ग्रहण किया। उन्होंने इसके उत्थान को राष्ट्र के उत्थान और इसके पतन को राष्ट्र के पतन के रूप में देखा। उन्होंने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का जो सिद्धांत दिया, सनातन धर्म का संवर्धन उसी सिद्धांत का क्रियापक्ष था। सारस्वत अतिथि और उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेशचंद्र शास्त्री (हरिद्वार) ने स्वामी दयानंद सरस्वती की धर्म-दृष्टि के आधार के रूप में चिकित्सा की उस भावना को रेखांकित किया जो रोग-निदान के लिए शल्य-क्रिया भी करता है, कड़वी औषधियों का भी उपयोग करता है। स्वामी जी ने खंडन और मंडन दोनो के सार्थक उपयोग से धर्म-संबंधी मान्यताओं को देश-काल के परिप्रेक्ष्य के बोध के साथ स्थापित किया। इस क्रम में उन्होंने ‘पंचधा परीक्षा’ की अवधारणा को भी व्याख्यायित किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध पत्रकार श्री राहुल देव ने कहा कि सनातन को एक समुदाय, भूगोल, दिनचर्या आदि तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह सार्वकालिक है, सार्वभौमिक है। ऐसे में वह किसी संकट में है, या हो सकता है — इस तरह की आशंका प्रकारांतर से उसकी सनातनता को ही संशय के घेरे में डालने वाली है। उन्होंने संस्कृति के बाह्य आवरण को सनातन मान लेने के तथा सनातन और समसामयिक में भेद न कर पाने के खतरों की तरफ भी इंगित किया। इस सत्र का संचालन प्रकाश उदय ने किया।
‘धर्म और लोकजीवन : पुरुषार्थ ; नैतिकता तथा मूल्य ; प्रकृति और धर्म ; धर्म में संलग्नता के विविध रूप (पर्व, उत्सव, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि) ; अध्यात्म और उदात्त जीवन की संकल्पना’ विषय पर केंद्रित पाँचवे अकादमिक सह संपूर्ति सत्र में बोलते हुए कला-समीक्षक डाॅ. राजेश कुमार व्यास (जयपुर) ने सनातन की खोज के रूप में हिंदू धर्म की पहचान रखने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के धर्म-संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया। मिश्र जी ने इसे सत्य और ऋत के गठबंधन तथा वर्तमानजीवी धर्म के रूप में देखा। हिंदू विश्व-दृष्टि मनुष्य और प्रकृति दोनो को अविलग देखती है, वह व्यक्त-अव्यक्त, चर-अचर आदि युग्मों को एक-दूसरे के लिए अपेक्षी मानती है। धर्म हमारे लिए न कोई विश्वास है, न आचार-संहिता, वह दोनो को अर्थ प्रदान करने वाला जीवन का स्वभाव-सिद्ध व्यापार है। उन्होंने तीर्थ और पर्वोत्सवों के रूप में व्यक्त होने वाले हमारे धर्म को जीवन के सनातन राग के रूप में ही विश्लेषित किया है। डाॅ. सुप्रिया पाठक (प्रयागराज) ने भारतीय लोकधर्म के जटिल ताने-बाने में स्त्रियों की केंद्रीय और बहुआयामी भूमिका और स्त्रियों के लोकधर्म को लेकर महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनकी भूमिका परंपराओं के संरक्षक के रूप में है, वे सांस्कृतिक प्रतीकों और प्रतिनिधि आकृतियों को प्रस्तुत करती रही हैं। गार्गी, मैत्रेयी से लेकर मीराबाई और उनके बाद की भी अनेक स्त्री-शक्तियों के हवाले से उन्होंने अपनी बात रखी। प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने धर्म और प्रकृति के संबंध-परस्पर को केंद्रित करते हुए धर्म को ईश्वर की रचना ‘प्रकृति’ से भिन्न मनुष्य की रचना के रूप में, धार्मिक अवधारणाओं के विकास को मनुष्य की चेतना के विकास के साथ जोड़कर देखने का आग्रह रखा। भारतीय चिंतन-धारा के मूल ग्रंथों में धर्म का जो स्वरूप है वह समाज की संवेदना को जगाने वाली व्यवस्था के रूप में है। वह जीवन और समाज को अनुशासित करने का एक सार्वभौम उपकरण है। हालाँकि हस्तक्षेप करते हुए प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने पूजा-अर्चना को भी धर्म के अंग के रूप में मान देने की बात कही और श्री सुशील त्रिपाठी (चित्रकूट) ने उनके मत का सतर्क समर्थन भी किया। डाॅ. कमल किशोर मिश्र (कोलकाता) ने धर्म के सजीव लोकपक्ष के रूप में पर्व, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि की चर्चा की। पर्व धर्म का सामूहिक आलोक है, प्रार्थना स्व और ब्रह्म के बीच के पुल की तरह है, कथा धर्म की दृष्टि से जीवन का शिल्प रचती है और सत्संग आत्मविकास की सामूहिक साधना है। श्री महेंद्र जी (लखनऊ) ने धर्म को जीवन के आधार के रूप में विश्लेषित किया। धर्म ही जीवन को अर्थवान और मूल्यवान बनाता है। डाॅ. मिथिलेश तिवारी (प्रयागराज) ने सामाजिक परिवर्तन में धर्म की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक परिवर्तन पर धर्म का प्रभाव इस बात पर निर्भर है कि धर्म को कैसे समझा और बरता जाता है। सामाजिक एकीकरण में और सामाजिक सुधारों में धार्मिक आंदोलनों की भूमिका को तो उन्होंने रेखांकित किया ही, यह भी कहा कि धर्म की संकुचित समझ सामाजिक विघटन को निमंत्रित कर सकती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए धर्मानुकूल आचरण अपेक्षित है। अर्थ और काम भी धर्म से संबद्ध होकर ही प्राप्य हैं। धर्मपूर्वक अर्थ और धर्मपूर्वक काम के सेवन का परिपाक ही मोक्षदायी है।
संपूर्ति सत्र में ही महाकवि प्रसाद पर केंद्रित विद्याश्री न्यास के दो आयोजनों की पुस्तक-परिणति ‘जयशंकर प्रसाद : सांस्कृतिक रचनाधर्मिता के आयाम’ को भी मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पित किया गया। प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का संपादन डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया है।
इस सत्र का संयोजन डाॅ. अमित कुमार पाण्डेय ने किया। लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के समस्त प्रतिभागियों, सहयोगियों, विद्वान वक्ताओं और सुधी श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट किया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न शिक्षा-संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के अतिरिक्त एक बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी और धर्म में, धर्म के वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार में रुचि रखने वाले सुधीजन की भी उपस्थिति रही।
‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल विषयक संगोष्ठी- जुलाई 2025
रामचंद्र शुक्ल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की साहित्यिक योगदानों पर मंथन
वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत हिंदी गद्य के उन्नायक राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं हिंदी निबंध के शीर्ष आचार्य राम चंद्र शुक्ल से संबंधित संगोष्ठी आयोजित की गई ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समग्र योगदान को रेखांकित करते हुए मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विवि दिल्ली के हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के पहले गंभीर और व्यवस्थित आलोचक हैं। उनकी आलोचना का दायरा व्यापक है।हिंदी , अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के विस्तृत अध्ययन और विवेचन से उनका समीक्षा साहित्य विकसित हुआ है। वे मात्र समीक्षक ही नहीं हैं । कवि ,अनुवादक, निबंधकार , जीवनीकार , संपादन और टिप्पणीकार आदि रूपों में भी उनकी समान गति दिखाई देती है। शुक्लजी के अंग्रेजी निबंधों से हिंदी के पाठक कम परिचित हैं । इन निबंधों का दायरा विस्तृत है । ये निबंध साहित्य , समाज और राजनीति को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं । शुक्लजी के आलोचक व्यक्तित्व की निर्मिति में अंग्रेजी से हिंदी में किया गया उनका अनुवाद केंद्रीय भूमिका का निर्वाह करता है।
बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रो प्रभाकर सिंह ने शिवप्रसाद सितारे हिंद के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द:भाषा चिंतन और इतिहास दृष्टि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में और हिन्दी नवजागरण के चिंतक और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द भाषा और इतिहास संबधी अपने चिंतन के लिए जितना जाने गये उससे अधिक हिन्दी-उर्दू विवाद के लिए चर्चित रहे। ‘इतिहास तिमिर नाशक’ और ‘भूगोल हस्तमलक’पुस्तके उनके ज्ञान साहित्य की नवाचारी इतिहास-दृष्टि की परिचायक हैं तो ‘राजा भोज का सपना’उनके सृजन धर्मी व्यक्तित्व का उदाहरण है। प्राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के इतिहानलेल लेखन में अन्ग्रेजी साम्राज्यवादी इतिहास -दृष्टि के प्रति प्रशंसा भाव के बावजूद वह भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक चेतना की भी शिनाख्त कर रहे थे। भाषा चिंतन में वह हिन्दी-उर्दू के व्यावहारिक मिलन से उत्पन्न ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्षधर थे। फ़ारसी लिपि की जगह देवनागरी लिपि का समर्थन कर रहे थे। आज जरूरत है उनके चिंतन और सृजन के वैज्ञानिक पहलूओं की पड़ताल करने की।
अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डा. मुक्ता ने कहा कि प्रारंभिक खड़ी बोली हिंदी के विकास एवं देवनागरी लिपि के अस्तित्व के संघर्ष में राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने हिंदी की रक्षा के लिए पाठ्य पुस्तक’ गुटका में राजा भोज का सपना वीर सिंह वृतांत आदि कहानियाँ लिखीं।’ बनारस अखबार ‘ का प्रकाशन शुरू किया। सुविख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कृति’ हिंदी साहित्य का इतिहास’ आज भी मिल का पत्थर बनी हुई है। हिंदी साहित्य का शब्दकोश हिंदी शब्द सागर, भाषा शैली व्याकरण संबंधी नए मानक बनाने और हिंदी साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का श्रेय आचार्य शुक्ल को है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी को’ देव बड़े हैं या बिहारी’ के संकीर्ण घेरे से बाहर निकाला। स्वागत भाषण करते हुए डा दयानिधि मिश्र ने हिंदी की धरोहर ःकाशी की सृजन परंपरा के महत्व को बताते हुए आज के विषय पर प्रकाश डाला। संचालन डा.शुभ्रा श्रीवास्तव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।सरस्वती वंदना मंजरी पाण्डेय ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,प्रो इंदीवर, डा.सुरेन्द्र प्रताप ने भी विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर दीपेश चौधरी, अशोक सिंह, इशरत जहां, मंजरी पाण्डेय,कवीन्द्र नारायण आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।
हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परम्परा (तृतीय पुष्प) – 23 जून 2025
वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय पुस्तकालय में साहित्यिक संस्था साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन -परंपरा के अन्तर्गत हरिश्चंद्र की प्रेमपोषिता एवं उस समय की महत्वपूर्ण किन्तु उपेक्षित लेखिका मल्लिका तथा हिन्दी के उन्नायक बाबू श्यामसुंदर दास पर केंद्रित व्याख्यानमाला आयोजित किया गया। मल्लिका के योगदान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डा. नीरजा माधव ने कहा कि 19वीं सदी की एक गुमनाम लेखिका 21वीं सदी में एकाएक चर्चा में आती हैं और वह थीं माल्लिका। मल्लिका प्रख्यात लेखक भारतेंदु की प्रेम पोषिता थीं, यह बात दुनिया को हिंदी साहित्य के पुराने इतिहास लेखन के ग्रन्थों से नहीं पता चलती क्योंकि वहां तो मल्लिका देवी का नामोल्लेख तक नहीं मिलता कि उन्होंने भी साहित्य में क ख ग कुछ भी लिखा था। मल्लिका बंगाल की बाल विधवा थीं। काशीवास के लिए आई थीं और भारतेंदु भवन के ठीक दक्षिण गली में वह निवास करती थीं। साहित्य के कारण ही वे भारतेंदु जी के संपर्क में आईं। मल्लिका की रचनाओं में चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश, कुमुदिनी और पारस्य उपन्यास के अलावा प्रेम तरंग नामक बांग्ला गानों का संग्रह भी है। उन्होंने बांग्ला साहित्य से कई ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया था। इसके अलावा उन्होंने बहुत सी स्फुट कहानियां भी लिखी थीं। नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी में उनकी बहुत सारी रचनाएं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मुझे उपलब्ध हुईं जिन्हें मैंने अपने इतिहास ग्रंथ” हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास” में पहली बार शामिल किया । लेकिन दुखद रहा कि भारतेंदु जी की समकालीन इस लेखिका को इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं मिल सकी। रोचक बात यह भी है कि बाद के कुछ इतिहासकारों ने “चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश” उपन्यास को भारतेंदु के ही रचनाओं के खाते में डाल दिया। मल्लिका के ब्याज से हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की एक नई पड़ताल आवश्यक हो गई है। बाबू श्यामसुंदर दास के योगदान की चर्चा करते हुए डा.प्रभात मिश्र ने कहा कि विभिन्न प्रांतों में इस समय भाषा को लेकर जिस प्रकार की संकुचित धारणा सामने आ रही हैं, उस समय बाबू श्यामसुंदर दास को याद करने का अर्थ बड़ा हो जाता है। श्यामसुंदर दास हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचारक, विस्तारक और उन्नायक इन तीनों भूमिकाओं में अग्रणी रहे। यह कहा जाता रहा है कि श्यामसुंदर दास ने ग्रंथों के साथ ग्रंथकारों की भी रचना की थी।
भाषा विज्ञान, साहित्य का इतिहास, समालोचना जैसे हिन्दी के नवीन क्षेत्रों में आपके द्वारा जैसी मजबूत पीठिका स्थापित हो सकी उसी पर हिन्दी आज भी स्थिर दिखाई पड़ती है। हिन्दी विषय में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा का आरंभ श्यामसुंदर दास के अशांत श्रम के अभाव में उस समय संभव ही नहीं था। काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सरस्वती पत्रिका, हिन्दू विश्वविद्यालय हर जगह श्यामसुंदर दास ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनके काम से बाद की पीढ़ियों ने प्रेरणा पाई है।
साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए श्यामसुंदर दास ने हजारों पांडुलिपियों की खोज करवाई, योग्य विद्वानों से उनका उत्कृष्ट संपादन करवाया, शब्दकोश का निर्माण किया और व्याकरण के ग्रंथ तैयार करवाए, साहित्य का इतिहास लिखा।
बाबू साहब जातीयता के प्रचण्ड पोषक थे, अपनी संस्कृति के कट्टर उद्घोषक थे। इसी से जातीयता अथवा संस्कृति संबंधी प्रश्नों पर किसी से समझौता करने के पक्ष में वे नहीं थे। वे देवनागरी लिपि को वैज्ञानिक लिपि मानते थे, और उसमें वे किसी भी प्रकार के परिवर्तन किये जाने के विरोधी थे। वे किसी भी मूल्य पर उसकी सुन्दरता नष्ट करने को तैयार नहीं थे।
श्यामसुंदर दास में दूरदृष्टि और निर्माण की अद्भुत क्षमता थी। हमें ऐसे साहित्य मनीषी की साहित्य सेवा के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए। अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर श्रद्धानंद ने कहा कि मल्लिका भारतेंदु की समकालीन थी,उन्हीं की प्रेरणा से बंगला से हिंदी साहित्य लेखन में प्रवृत्त हुई। उनकी ‘कुमुदिनी’ हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में परिगणित की जा सकती है,परंतु इतिहास लेखकों ने उपेक्षित रखा। उनकी कविताएँ भारतेंदु के प्रेमतरंग में संकलित है ।उनके साहित्यिक अवदान पर यथेष्ट प्रकाश डालने की आवश्यक है।
बाबू श्यामसुंदर दास जी ने हिंदी भाषा,नागरी तथा साहित्य को समृद्ध करने में अपना सर्वस्व खपाया।नागरी प्रचारिणी सभा उनका जीवंत स्मारक है। उन्होंने हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एवं हिन्दी आलोचना को नई दिशा दी । बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बाबू श्यामसुंदर दास के इतिहास एवं आलोचना दृष्टि को पुनर्मूल्यांकित करने की महती आवश्यकता है । प्रारंभ में स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्रा ने कहा कि साहित्यिक विरासत को जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है। धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने किया।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,डा.प्रकाश उदय,डा.अशोक कुमार सिंह,डा.भगवंती सिंह,डा.शशिकला पांडेय,कविन्द्र नारायण सहित बड़ी संख्या में काशी के कवि, रचनाकार, उपस्थित रहे। विशेष बात यह रही की कार्यक्रम में बाबू श्यामसुंदर दास के वंशज अशोक खन्ना,तथा भारतेन्दु के वंशज दीपेश चौधरी भी उपस्थित थे।



















































