वाराणसी। विद्याश्री न्यास श्रीनिवास न्यास कार्यालय में विद्या निवास मिश्र शताब्दी वर्ष में भारतीय भाषाओं के संदर्भ में पं जी की भारतीय भाषाओं से संदर्भित वैश्विक अवधारणा पर एक संगोष्ठी आयोजित किया गया। इसमें मराठी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखक विश्वास पाटिल, इतिहास विद् एवं फिल्म निर्माता आशुतोष पाठक, एमजी निकम की विशेष उपस्थिति रही। संगोष्ठी में पधारे विद्धानों का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्र ने कहा कि पं विद्यानिवास मिश्र की भारतीय भाषाओं के संदर्भ में अपनी मौलिक अवधारणा थी। वे चाहते थे कि हिंदी के साथ समस्त भारतीय भाषाएं एकता के सूत्र में बंधकर मजबूत बने। हम चाहते हैं कि विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष मे भारतीय भाषाओं के साहित्यकारों के साथ संवाद करके इस विचार को मूर्तरूप दिया जाय। इसके पूर्व तमिल भाषा के विद्वानों के साथ संवाद हो चुका है। आज विश्वास पाटिल का स्वागत करते हुए अत्यंत हर्ष की अनुभूति हो रही है। विश्वास पाटिल ने कहा कि मुझे बताया गया है पंडित विद्यानिवास मिश्र जी की जब कर में दुर्घटना हुई उसे समय वह मेरा उपन्यास चंद्रमुखी पढ़ रहे थे यह सुनकर मैं बहुत भावुक हो गया और आज मैं पंडित जी की कर्मभूमि काशी के प्रणाम करने यहां आया हुआ हूं पार्टी ने कहा कि मैं महाराष्ट्र के सुदूर गांव में पैदा हुआ। वरूणा नदी के पास 18 साल की उम्र में मैंने एक लड़की की कहानी नाम से उपन्यास लिखा था और 28 वर्ष की उम्र में पानीपत लिखा, जो पानीपत की तीसरी लड़ाई पर आधारित ऐतिहासिक उपन्यास है मूल मराठी में यह उपन्यास अत्यंत लोकप्रिय हुआ और आज तक इसकी तीन 3 लाख से अधिक कृतियां बिक चुकी हैं इस तरह सुभाष चंद्र बोस के जीवन पर लिखा गया उपन्यास महानायक की अत्यंत लोकप्रिय हुआ चंद्रमुखी उपन्यास पर मराठी में फिल्म बन चुकी है जिसकी बहुत अधिक प्रशंसा हुई श्री पाटिल ने बताया कि वह शिवाजी के जीवन को लेकर महा सम्राट नाम से उपन्यास लिख रहे हैं इसके तीन खंड प्रकाशित हो चुके हैं और इनका अंग्रेजी हिंदी और कन्नड़ आदि भाषाओं में अनुवाद भी हो चुका है मेरे उपन्यास मराठी के बाद सबसे अधिक हिंदी में अनुवादित होकर पढ़े गए प्रारंभ में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने विश्वास पाटिल के सृजन संसार का परिचय देते हुए कहा कि विश्वास पाटिल के ऐतिहासिक प्रयासों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह पूर्ण ऐतिहासिक स्थलों पर स्वयं गए हैं और वहां से उन्होंने मूल स्रोतों की खोज की ।उनके उपन्यास इसी कारण काल्पनिक न होकर तथ्य परक हैं इन उपन्यास की दूसरी बड़ी विशेषता इनकी रोचक ता है यह कहीं भी पढ़ने में बोझिल नहीं होती है। आशुतोष पाठक ने कहा कि एक प्रशासनिक अधिकारी होते हुए पाटिल ने इतने वृहद आकर के उपन्यास का सृजन किया है। यह आश्चर्य की बात है। डा.प्रकाश उदय ने मराठी भाषा साहित्यकारों विशेषकर दलित कथाकारों पर अपने विचार रखे। संचालन प्रो उदयन मिश्र, धन्यवाद ज्ञापन डा.ॠतंधर मिश्र ने किया।
