राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ – 11-13 अगस्त 2025

आ. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में विभिन्न आयोजनों की एक वर्षपर्यंत शृंखला विद्याश्री न्यास की तरफ से संकल्पित है, जिसमें से एक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ विषय पर केंद्रित तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी के रूप में भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली के सहयोग से भारत अध्ययन केंद्र, वाराणसी और लाल बहादुर शास्त्री पीजी काॅलेज, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में 11 से 13 अगस्त 2025 तक भारत अध्ययन केंद्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय के सभागार में सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन ; माँ सरस्वती, महामना और आ. विद्यानिवास मिश्र के चित्र पर माल्यार्पण, श्री केशव मिश्र एवं श्री शिवम तिवारी के स्वस्ति-वाचन, श्री विवेक तिवारी के मंगलाचरण, आचार्य सुद्धन पांडेय की शंखध्वनि, संगीत और मंच कला संकाय के विद्यार्थियों की कुलगीत-प्रस्तुति, अतिथियों के सारस्वत सम्मान और प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी के स्वागत-वक्तव्य से हुआ। उद्घाटन-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए सत्र के मुख्य अतिथि आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण जी (अयोध्या) ने धर्म के सनातन स्वरूप को बहुत सहजता से हृदयंगम कराया। बताया कि जो होना चाहिए, वह होना और उसका होना ही धर्म है। भारतीय समाज में अपढ़ से अपढ़ व्यक्ति के भीतर जो मूल्यबोध है, कर्तव्याकर्तव्य का विवेक है, वह हमारी धर्मभावना की देन है, जिसकी पहुँच शास्त्र से लेकर लोक तक अप्रतिहत है। धर्म को जीवन में नैतिकता, सत्य और करुणा का आधार बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि इसके पालन में आचरण की ईमानदारी सर्वोपरि है। धर्म के विवेचन के क्रम में उन्होंने आ. विद्यानिवास मिश्र की कालजयी कृति ‘हिंदू धर्म : जीवन में सनातन की खोज’ का विशेषतः उल्लेख किया। बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि हमारे लिए धर्म जीवन-पद्धति का वाचक है, किसी वस्तु का मूल तत्व है, कर्म-प्रेरक है, कर्तव्य है, स्वभाव है ; अर्थ, काम और मोक्ष का केंद्र है और इस अर्थ में रिलिजन या मजहब से सर्वथा भिन्न है। उन्होंने रेखांकित किया कि धर्म की व्यवस्था गतिशील है और उसमें परिवर्तन सदा संभव है। प्रो. सच्चिदानंद मिश्र, सचिव, भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद ने धर्म और आधुनिक जीवन के बीच एक उचित तालमेल, सांप्रदायिक सौहार्द, सांस्कृतिक संरक्षण और धर्म-दर्शन के वैश्विक संदर्भों के साक्षात्कार की जरूरत पर बल दिया और उम्मीद जाहिर की इस संगोष्ठी में इन उद्देश्यों तक पहुँचने के रास्ते बन सकेंगे, विद्वत्संवाद से आगे बढ़कर यह आमजन और युवजन तक पहुँच बना सकेगी, उनमें भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की समझ और उसके प्रति गौरव-बोध विकसित कर सकेगी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अजीत कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि महामना सदैव भारत और भारत-भाव की बात करते थे। भारत अध्ययन केंद्र द्वारा संचालित पाठ्यक्रम विभिन्न प्रांतों के जन-जन तक पहुँचे यह महत्त्वपूर्ण है।आ. विद्यानिवास मिश्र के एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने कहा कि कोई भी भाषा ज्ञान-प्राप्ति के उद्देश्य में बाधक नहीं हो सकती।

उद्घाटन-समारोह की एक उपलब्धि रही भारत अध्ययन केंद्र के भूतल पर नवनिर्मित ‘वैदिक यज्ञ-पात्र संग्रहालय’ का उद्घाटन और दूसरी उपलब्धि रही डाॅ. दयानिधि मिश्र द्वारा इस संगोष्ठी के केंद्रीय विषय पर संपादित और प्रलेक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘धर्म : जीवन में सनातन राग’ का लोकार्पण। इसके साथ ही ‘सोच-विचार’ पत्रिका के यशस्वी संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों को पत्रिका के ‘काशी अंक-16’ और ‘विद्यानिवास मिश्र विशेषांक’ से विभूषित किया। सत्र में धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने और सत्र का संचालन-संयोजन डाॅ. रामसुधार सिंह ने किया।

पहला अकादमिक सत्र ‘धर्म की अवधारणा : धर्मविषयक चिंतन का विकास और विकृतियाँ, धर्म की विविध परंपराएँ’ विषय पर प्रो. श्याम सुन्दर दुबे (दमोह) की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। प्रो. शंकर कुमार मिश्र (वाराणसी) ने बताया कि वैदिक काल में धर्म को ऋत कहा गया, तदनुसार प्रकृति की नियमबद्धता ही धर्म है। उपनिषदों में वह आत्मा, ब्रह्म और मोक्ष की ओर उन्मुख हुआ, आत्मा की शुद्धि और सत्य की खोज को ही धर्म का मान दिया गया। रामायण और महाभारत काल में इसे कर्तव्य और न्याय के रूप में देखा गया। धर्म की विविध परंपराओं का उल्लेख करते हुए प्रो. धनंजय मणि त्रिपाठी (नई दिल्ली) ने धर्म के विविध रूपों — सामान्य धर्म, विशिष्ट धर्म, वर्णधर्म या स्वधर्म, आश्रम धर्म, कुलधर्म, युगधर्म, राजधर्म, आपद्धर्म आदि के माध्यम से उसके विभिन्न आयामों को प्रत्यक्ष किया। डाॅ. लक्ष्मी मिश्र ने धर्म के, स्मृतियों में प्रस्तुत स्वरूप को वर्तमान संदर्भों से जोड़ते हुए विश्लेषित किया। उन्होंने विभिन्न स्मृति-संदर्भों का आधार लेते हुए बताया कि स्मृतिकारों ने मानवमात्र के अभ्युदय एवं निःश्रेयस के लिए ही धर्म का निर्धारण किया है। व्यक्ति और समाज दोनो के कल्याण का संभव मार्ग धर्म ही है, यदि देश-काल और परिस्थिति के अनुसार उसकी नमनीयता को भी उसके एक अनिवार्य अभिलक्षण के रूप में समझा और स्वीकार किया जाय, तो। प्रो. श्याम सुंदर दुबे ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन को धर्म और लोकजीवन के संबंध-परस्पर पर केंद्रित किया। उन्होंने कहा कि हमारे समाज के लिए धर्म हमेशा से प्रेरक की भूमिका में रहा है। वेद ने यदि प्रकृति को आत्मसात करते हुए दर्शन और अध्यात्म की गहराइयों में प्रवेश किया तो लोक ने प्रकृति के साथ जीना सीखा और अपनी सामाजिकता में ही अपने दर्शन और अध्यात्म को लीन कर लेने में बहुविध प्रवीण हुआ। वस्तुतः लोक का धर्म लोक जीवन के व्यापक व्यवहार का ही अंग है। इस सत्र का संचालन डाॅ. शिवलोचन शांडिल्य ने किया।

दूसरा अकादमिक सत्र (12/08/25) भारतीय शास्त्रीय चिंतन में धर्म के स्वरूप की खोज से संबंधित था। प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने रामचरितमानस का आधार लेते हुए सबके प्रति और सबकुछ के प्रति कृतज्ञता की अनुभूति को सर्वोपरि धर्म के रूप में रेखांकित किया। तुलसी ने धर्म को जीवन की दैनंदिनी में प्रतिपादित किया है। ‘पर हित सरिस धरम नहिं भाई’ जैसे सार्वभौमिक और सार्वकालिक सत्य के रूप में ही नहीं, ‘एहि ते अधिक धरम नहिं दूजा, सादर सास-ससुर पद पूजा’ जैसे अभी की समस्या के समाधान के लिए अभी-अभी रच लिए गए सिद्धांत भी धर्म के व्यावहारिक रूप को प्रत्यक्ष करते हैं। प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने कहा कि भारत की संपूर्ण शास्त्र-परंपरा लोक को समर्पित है। उसने अपने सिद्धांतों को लोक से ही पाया और फिर लोक तक ही पहुँचाया है। लोक तक पहुँचने-पहुँचाने में उसे जब और जहाँ कोई कठिनाई आई है, उसने नए रास्ते निकाले हैं, सिद्धांत नहीं बदले हैं। धर्म की वैदिक अवधारणा रामायण, महाभारत, स्मृतादिक के माध्यम से लोक तक पहुँचती है, लोक की जरूरतों के मुताबिक हमारे शास्त्र स्वयम् को नित्य नवीन करते रहते हैं और इसी अर्थ में वे सनातन हैं। प्रो. माधव जनार्दन रटाटे ने श्रीमद्भागवत में प्रतिपादित भागवत धर्म की व्याख्या की। उसमें सबके प्रति समभाव रखने को कहा गया है और भक्ति को परम धर्म के रूप में रेखांकित किया गया है। भक्ति से ही ज्ञान और वैराग्य की भी प्राप्ति होती है। श्री ज्ञानेश्वर प्रसाद त्रिपाठी (लखनऊ) ने पं. विद्यानिवास मिश्र के निबंध ‘भागवत भूमि’ का उल्लेख करते हुए सृष्टि-चक्र तथा धर्म और साहित्य के बहुस्तरीय रिश्तों के मर्म पर प्रकाश डाला। इस क्रम में उन्होंने स्वयं-संपादित ‘कबीर ज्योति’ पत्रिका भी मंचस्थ अतिथियों को प्रदान की। डाॅ. गायत्री प्रसाद पांडेय ने महाभारत के आलोक में धर्म की चर्चा करते हुए बताया कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की अवधारणा जो महाभारत में है वह अन्यत्र तो मिल सकता है, लेकिन जो महाभारत में नहीं है वह और कहीं नहीं है, यह भी सही है। वह मानता है कि सत्य के समान और परहित से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। प्रो. संतोष कुमार शुक्ल (नई दिल्ली) ने धर्म की पौराणिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए बताया कि जीवन में जो भी सनातन है वह धर्म है, यह भी कि भारतीय साहित्य, वह चाहे जिस रूप में हो, धर्म का ही आख्यान करता है, और यह भी कि हमारी चौदह विद्याएँ धर्म का ही प्रतिपादन करती हैं। प्रो. भगवत शरण शुक्ल ने ‘पुराणों और धर्मशास्त्र में धर्म’ विषय पर बोलते हुए बताया कि सनातन धर्म प्रथम धर्म है, सनातन परम ब्रह्म है, वही ब्रह्मा-विष्णु-महेश और सत्यमात्र का पर्याय है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरिदत्त शर्मा ने बताया कि महाभारत भारतीय धर्म-चिंतन का विश्वकोश है। धर्म के विभिन्न प्रकारों और आयामों को वह सोदाहरण प्रस्तुत करता है। उससे ज्ञात होता है कि सत्य और असत्य का संघर्ष भी सनातन है, जो धर्म को मारता है, धर्म उसे मार देता है तथा जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है — धर्मो रक्षति रक्षितः। इस सत्र का संचालन डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने किया।

संगोष्ठी के तीसरे अकादमिक सत्र ‘धर्म और दर्शन : भगवद्गीता, वेदांत, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, सांख्य, योग और आगम’ के अंतर्गत ‘प्रस्थानत्रयी में से शांकरभाष्य में धर्म का स्वरूप’ पर बोलते हुए प्रो. रामनाथ झा (नई दिल्ली) ने वृहदारण्यक उपनिषद के हवाले से बताया कि ईश्वर बाहर से नहीं, हमारे भीतर रहकर नियमन करता है, इसी नाते वह अंतर्यामी भी है। उन्होंने भारतीय जीवनयापन के मूलाधार के रूप में धर्म की पहचान की। सारस्वत अतिथि प्रो. शशिप्रभा कुमार (शिमला) ने वैशेषिक दर्शन के आधार पर धर्म के लक्षण, उसके स्वरूप, उसकी उत्पत्ति-प्रक्रिया, उसके साधन, प्रकार आदि का विवेचन किया, साथ ही धर्म को आत्मा के गुण और आत्मा के विशेष गुण के रूप में व्याख्यायित किया। प्रो. रामकिशोर त्रिपाठी ने वेदांत में धर्म के स्वरूप पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वेदांत में धर्म परंपरया मोक्ष का साधन होते हुए भी साक्षात मृत्युतरण का उपाय है। धर्मशास्त्र मानवजीवन का संविधान है। वह चारो पुरुषार्थों में हेतुवत है। उन्होंने धर्माचरण में आचार के महत्त्व को भी रेखांकित किया। प्रो. उपेंद्र कुमार त्रिपाठी ने बताया कि महर्षि जैमिनी ने वेदोक्त धर्म की युक्तियुक्त व्याख्या एवं यज्ञीय प्रायोगिक क्रियाओं की स्पष्ट विवेचना के लिए ही मीमांसा-सूत्रों की रचना की। उसमें वेदविहित कर्म को ही धर्म माना गया है। प्रो. सुद्युम्न आचार्य (सतना) ने शाश्वत धर्म के व्याख्याकार के रूप आदि शंकराचार्य के प्रदेयों पर प्रकाश डाला। आदि शंकराचार्य का धर्म-दर्शन अध्यात्म तथा भौतिक विज्ञान के साथ संवादी तथा व्यवहार में भी सहज आचरणीय है। उन्होंने जगत की अनिर्वचनीयता, व्यवहारिक स्तर पर ब्रह्मज्ञान और माया के अनिर्वचनीय विभेद आदि की चर्चा की। प्रो. शीतला प्रसाद पाण्डेय ने आगमशास्त्र के धर्म-विमर्श को प्रस्तुत करते हुए कहा कि धर्म-अधर्म दोनो का सांगोपांग विवरण देने वाला शास्त्र आगम ही है। वह मानता है कि सदाचार से ही धर्म की उत्पत्ति होती है और धर्म से आयु की वृद्धि होती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राजाराम शुक्ल ने सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए बताया कि कैसे हमारे आगम-निगम सभी शास्त्र और हमारा रचनात्मक साहित्य भी, धर्म-विषयक विमर्श को मिल-जुलकर निरंतर पूर्णतर करते रहे हैं। सत्र का संचालन डाॅ. ज्ञानेंद्र नारायण राय ने किया।

संगोष्ठी के तीसरे दिन (13/08/25) की शुरुआत ‘धर्म तथा समाज : आधुनिक विचारक’ विषयक चौथे अकादमिक सत्र से हुई। सोच-विचार पत्रिका के संपादक श्री नरेन्द्र नाथ मिश्र ने मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया, उन्हें ‘सोच-विचार’ पत्रिका के काशी अंक 16 एवं आ. विद्यानिवास मिश्र विशेषांक प्रदान किए तथा पत्रिका की प्रकाशन-यात्रा का एक संक्षिप्त परिचय भी प्रस्तुत किया डाॅ. विद्याविंदु सिंह (लखनऊ) ने अनेक लोकगीतों, लोककथाओं, लोकोक्तियों आदि का संदर्भ लेते हुए भारतीय लोकजीवन में व्याप्त धर्म के सहज स्वरूप का उद्घाटन किया। वह एक छोटे-से सवाल “कुँअवा खनवले कवन फल, सुनऽ हो राजा दसरथ” और इसके इस छोटे-से जवाब “झोंझवन भरे पनिहारिन तबहिं फल होइहें” से भी जाहिर है। डाॅ. विश्वास पाटिल (महाराष्ट्र) ने महात्मा गांधी की धर्म विषयक अवधारणा की चर्चा करते हुए कहा कि गांधी जी स्वयं को सनातनधर्मी कहते ही नहीं है, उसका निरंतर परीक्षण भी करते हैं। उनकी धर्म-संबंधी अवधारणा के मूल में आत्मिक शुद्धि के साथ-साथ व्यापकता की प्रक्रिया है जिसका क्षितिज समाजक्रांति तक फैला हुआ है। प्रो. अवधेश प्रधान ने स्वामी विवेकानंद की धर्म-दृष्टि को व्याख्यायित करते हुए बताया कि वे धर्म को उस ब्रह्मत्व की अभिव्यक्ति मानते थे, जो मानवमात्र में पहले ही से मौजूद हुआ करता है। धर्म उनके अनुसार साक्षात्कार की वस्तु है, और भारत में धर्म का अर्थ प्रत्यक्षानुभूति है। वे निःस्वार्थपरता को ही धर्म की कसौटी मानते थे। पशु से मनुष्य और मनुष्य से देवता तक ऊपर उठने में धर्म मनुष्य का आंतरिक साथी है। वे धर्म के रूप में वेदांत के संदेश को आदिवासी, जनजाति, गिरिजन तक ले जाने के लिए प्रयत्नशील थे। श्री अजयेंद्र नाथ त्रिवेदी (कोलकाता) ने महर्षि अरविंद की धर्म-दृष्टि को प्रस्तुत करते हुए कहा कि उन्होंने सनातन धर्म-चिंतन को नवीन आयाम दिए। अरविंद ने सनातन विचारधारा को भारतीय नवजागरण के उपकरण के रूप में ग्रहण किया। उन्होंने इसके उत्थान को राष्ट्र के उत्थान और इसके पतन को राष्ट्र के पतन के रूप में देखा। उन्होंने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का जो सिद्धांत दिया, सनातन धर्म का संवर्धन उसी सिद्धांत का क्रियापक्ष था। सारस्वत अतिथि और उत्तराखंड संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दिनेशचंद्र शास्त्री (हरिद्वार) ने स्वामी दयानंद सरस्वती की धर्म-दृष्टि के आधार के रूप में चिकित्सा की उस भावना को रेखांकित किया जो रोग-निदान के लिए शल्य-क्रिया भी करता है, कड़वी औषधियों का भी उपयोग करता है। स्वामी जी ने खंडन और मंडन दोनो के सार्थक उपयोग से धर्म-संबंधी मान्यताओं को देश-काल के परिप्रेक्ष्य के बोध के साथ स्थापित किया। इस क्रम में उन्होंने ‘पंचधा परीक्षा’ की अवधारणा को भी व्याख्यायित किया। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध पत्रकार श्री राहुल देव ने कहा कि सनातन को एक समुदाय, भूगोल, दिनचर्या आदि तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह सार्वकालिक है, सार्वभौमिक है। ऐसे में वह किसी संकट में है, या हो सकता है — इस तरह की आशंका प्रकारांतर से उसकी सनातनता को ही संशय के घेरे में डालने वाली है। उन्होंने संस्कृति के बाह्य आवरण को सनातन मान लेने के तथा सनातन और समसामयिक में भेद न कर पाने के खतरों की तरफ भी इंगित किया। इस सत्र का संचालन प्रकाश उदय ने किया।

‘धर्म और लोकजीवन : पुरुषार्थ ; नैतिकता तथा मूल्य ; प्रकृति और धर्म ; धर्म में संलग्नता के विविध रूप (पर्व, उत्सव, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि) ; अध्यात्म और उदात्त जीवन की संकल्पना’ विषय पर केंद्रित पाँचवे अकादमिक सह संपूर्ति सत्र में बोलते हुए कला-समीक्षक डाॅ. राजेश कुमार व्यास (जयपुर) ने सनातन की खोज के रूप में हिंदू धर्म की पहचान रखने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के धर्म-संबंधी विचारों को प्रस्तुत किया। मिश्र जी ने इसे सत्य और ऋत के गठबंधन तथा वर्तमानजीवी धर्म के रूप में देखा। हिंदू विश्व-दृष्टि मनुष्य और प्रकृति दोनो को अविलग देखती है, वह व्यक्त-अव्यक्त, चर-अचर आदि युग्मों को एक-दूसरे के लिए अपेक्षी मानती है। धर्म हमारे लिए न कोई विश्वास है, न आचार-संहिता, वह दोनो को अर्थ प्रदान करने वाला जीवन का स्वभाव-सिद्ध व्यापार है। उन्होंने तीर्थ और पर्वोत्सवों के रूप में व्यक्त होने वाले हमारे धर्म को जीवन के सनातन राग के रूप में ही विश्लेषित किया है। डाॅ. सुप्रिया पाठक (प्रयागराज) ने भारतीय लोकधर्म के जटिल ताने-बाने में स्त्रियों की केंद्रीय और बहुआयामी भूमिका और स्त्रियों के लोकधर्म को लेकर महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष प्रस्तुत किए। उनकी भूमिका परंपराओं के संरक्षक के रूप में है, वे सांस्कृतिक प्रतीकों और प्रतिनिधि आकृतियों को प्रस्तुत करती रही हैं। गार्गी, मैत्रेयी से लेकर मीराबाई और उनके बाद की भी अनेक स्त्री-शक्तियों के हवाले से उन्होंने अपनी बात रखी। प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने धर्म और प्रकृति के संबंध-परस्पर को केंद्रित करते हुए धर्म को ईश्वर की रचना ‘प्रकृति’ से भिन्न मनुष्य की रचना के रूप में, धार्मिक अवधारणाओं के विकास को मनुष्य की चेतना के विकास के साथ जोड़कर देखने का आग्रह रखा। भारतीय चिंतन-धारा के मूल ग्रंथों में धर्म का जो स्वरूप है वह समाज की संवेदना को जगाने वाली व्यवस्था के रूप में है। वह जीवन और समाज को अनुशासित करने का एक सार्वभौम उपकरण है। हालाँकि हस्तक्षेप करते हुए प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने पूजा-अर्चना को भी धर्म के अंग के रूप में मान देने की बात कही और श्री सुशील त्रिपाठी (चित्रकूट) ने उनके मत का सतर्क समर्थन भी किया। डाॅ. कमल किशोर मिश्र (कोलकाता) ने धर्म के सजीव लोकपक्ष के रूप में पर्व, प्रार्थना, कथा, सत्संग आदि की चर्चा की। पर्व धर्म का सामूहिक आलोक है, प्रार्थना स्व और ब्रह्म के बीच के पुल की तरह है, कथा धर्म की दृष्टि से जीवन का शिल्प रचती है और सत्संग आत्मविकास की सामूहिक साधना है। श्री महेंद्र जी (लखनऊ) ने धर्म को जीवन के आधार के रूप में विश्लेषित किया। धर्म ही जीवन को अर्थवान और मूल्यवान बनाता है। डाॅ. मिथिलेश तिवारी (प्रयागराज) ने सामाजिक परिवर्तन में धर्म की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि सामाजिक परिवर्तन पर धर्म का प्रभाव इस बात पर निर्भर है कि धर्म को कैसे समझा और बरता जाता है। सामाजिक एकीकरण में और सामाजिक सुधारों में धार्मिक आंदोलनों की भूमिका को तो उन्होंने रेखांकित किया ही, यह भी कहा कि धर्म की संकुचित समझ सामाजिक विघटन को निमंत्रित कर सकती है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने कहा कि परम पुरुषार्थ की प्राप्ति के लिए धर्मानुकूल आचरण अपेक्षित है। अर्थ और काम भी धर्म से संबद्ध होकर ही प्राप्य हैं। धर्मपूर्वक अर्थ और धर्मपूर्वक काम के सेवन का परिपाक ही मोक्षदायी है।

संपूर्ति सत्र में ही महाकवि प्रसाद पर केंद्रित विद्याश्री न्यास के दो आयोजनों की पुस्तक-परिणति ‘जयशंकर प्रसाद : सांस्कृतिक रचनाधर्मिता के आयाम’ को भी मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पित किया गया। प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का संपादन डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया है।

इस सत्र का संयोजन डाॅ. अमित कुमार पाण्डेय ने किया। लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के समस्त प्रतिभागियों, सहयोगियों, विद्वान वक्ताओं और सुधी श्रोताओं के प्रति आभार प्रकट किया। संगोष्ठी में देश के विभिन्न शिक्षा-संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों के अतिरिक्त एक बड़ी संख्या में साहित्यानुरागी और धर्म में, धर्म के वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार में रुचि रखने वाले सुधीजन की भी उपस्थिति रही।