‘हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा’ व्याख्यानमाला में साहित्यकारों ने किया स्मरण
वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में सोमवार को राजकीय पुस्तकालय अर्दली बाजार में ‘हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन-परंपरा’ व्याख्यानमाला की अष्टादश कड़ी आयोजित हुई। जन्मशती वर्ष में संकल्पित इस श्रृंखला में साहित्यकार डॉ. भोलाशंकर व्यास और काशीनाथ उपाध्याय ‘बेधड़क बनारसी’ के साहित्यिक योगदान को याद किया गया।
प्रो बलिराज पांडेय ने कहा कि
बीएचयू के हिन्दी विभाग के मूर्धन्य विद्वान डॉ. भोलाशंकर व्यास भाषा विज्ञान, हिन्दी, संस्कृत, पालि, प्राकृत और अंग्रेजी के प्रकांड पंडित थे। ‘हिन्दी दशरूपक’ और ‘ध्वनि संप्रदाय’ जैसी समीक्षात्मक कृतियों के रचयिता व्यासजी ने लंदन विश्वविद्यालय से भाषा विज्ञान का विशेष अध्ययन किया। उनकी रचना का शिखर ऐतिहासिक उपन्यास ‘समुद्र संगम’ है, जिसमें शाहजहाँ काल की पृष्ठभूमि पर पंडितराज जगन्नाथ की आत्मकथा अंकित है। यह उपन्यास मानवता का संदेश देते हुए अमीर-गरीब के भेद को मिटाने की पुरजोर वकालत करता है।
डॉ. वेद प्रकाश पांडेय ने काशीनाथ उपाध्याय ‘बेधड़क बनारसी’ के साहित्यिक अवदान पर व्याख्यान दिया। कहा कि काशी नाथ उपाध्याय बेधड़क बनारसी काशी की हास्य -व्यंग्य परम्परा के एक अनूठे हस्ताक्षर थे. वे हास्य -व्यंग्य रचते ही नहीं बल्कि जीते थे. एक ज़िदादिल आदमी ही हास्य व्यंग्य की कविता कर सकता है.
आपका जन्म 1919 में जम्मू में हुआ था, जहाँ आपके पिता विश्वनाथ उपाध्याय सेना में कर्नल थे। इनके पिता ने उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिए काशी भेजा, जहाँ आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से वाणिज्य में स्नात्तकोत्तर की उपाधि प्राप्त की. आपने हिन्दी एवं संस्कृत साहित्य का भी अध्ययन किया. उनके पिता उन्हें कुछ और बनाना चाहते थे लेकिन काशी की मिट्टी ने उन्हें हास्य -व्यंग्य का कवि बना दिया। प्रारम्भ में वे हसइयाँ नाम से संसार अख़बार में लिखना प्रारम्भ किये। सरस्वती वंदना पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार ने किया। अध्यक्षता करते हुए डॉ. चन्द्र भाल सुकुमार ने कहा कि भोलाशंकर व्यास हिन्दी के साथ संस्कृत के भी उद्भट विद्वान थे। भारतीय साहित्यशास्त्र, भाषा और ध्वनि विज्ञान पर उनकी गहरी पकड़ थी। उनकी विद्वता के साथ साहित्यिक कोमलता का सुंदर मेल दिखाई देता है। उन्होंने पंडितराज जगन्नाथ के जीवन पर ‘समुद्र संगम’ जैसा ललित ऐतिहासिक उपन्यास लिखा। संचालन धर्मेन्द्र गुप्त साहिल। काव्यपाठ, गणेश गंभीर। स्वागत, दयानिधि मिश्र (सचिव विद्याश्री न्यास) और धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। इस अवसर पर प्रोफेसर श्रद्धानंद, डॉक्टर शशिकला पाण्डेय, शिवकुमार पराग, उदय प्रताप सिंह,विनोद श्रीवास्तव, छाया शुक्ल, कंचन सिंह परिहार, श्रीनिवास पाण्डेय आदि।
