कुशवाहा कांत और भैयाजी बनारसी के साहित्यिक योगदान पर व्याख्यानमाला आयोजित
वाराणसी। साहित्यिक संघ एवं विद्या श्री न्यास की संयुक्त आयोजन में हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा के षष्ठदश पुष्प रूप में अर्दली बाजार स्थित राजकीय पुस्तकालय में उपन्यासकार कुशवाहाकांत एवं भैया जी बनारसी की अवदान पर व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक विजय विनीत ने कुशवाहा कांत के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि कुशवाहा कांत को सिर्फ लोकप्रिय उपन्यासकार मानना उनके साहित्य और व्यक्तित्व को सीमित कर देता है। वह उस दौर के ऐसे कथाकार थे, जिन्होंने प्रेम, विद्रोह, हर्ष रोमांस, देशभक्ति और सामाजिक यथार्थ को एक ही कथाधारा में पिरोकर आम पाठक के सामने रखा। उन्होंने कहा काशी ने कुशवाहा कांत को वह दृष्टि दी जिसके सहारे वह अपने समय और समाज को कथा में बदल सके। कुशवाहा कांत की साहित्यिक यात्रा को उनकी सामाजिक संदर्भ से अलग करके नहीं देखा जा सकता है।
सांस्कृतिक समीक्षक अरविंद मिश्रा हर्ष ने मोहनलाल गुप्ता भैया जी बनारसी के जीवन के अनछुए पहलुओं पर चर्चा करते हुए कहा की प्रमुख हास्य कवि, साहित्यकार भैयाजी बनारसी ने काशी की पत्रकारिता की अमूल्य सेवा की है। विश्वनाथ मंदिर के हालात पर सबसे अधिक लेखनी चलाने वाले पत्रकारों में उनकी गिनती होती है। 1965 में ब्रिटिश सूचना विभाग में उन्होंने ब्रिटेन की यात्रा की और वहां के प्रमुख नेताओं का साक्षात्कार लिया था। नेपाल नरेश के निमंत्रण पर नेपाल गए। भारत मैत्री हेतु सद्भावना यात्रा में भाग लिया था। श्री मिश्र ने भैयाजी से संबंधित कई संस्मरण सुनाएं, जिनमें गीतकार अनजान तथा निराला जी से जुड़े संस्मरण अत्यंत रोचक रहे। वरिष्ठ पत्रकार डॉ दयानंद ने अध्यक्षता करते हुए कहा कि मोहनलाल गुप्त भैया जी बनारसी व्यावहारिक पत्रकारिता के क्षेत्र में मेरे गुरु थे। भैयाजी न केवल साहित्यसेवी थे, अपितृ साहित्यिक पत्रकारिता के शिखर पुरुष थे। उनके लेखन का दायरा बच्चों से लेकर प्रौढो तक रहा। उन्होंने नई पीढ़ी की साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया। भैया जी 1950 में आज में पहले साहित्यिक संपादक थे। साथ ही वह बनारसीपन के भी पक्के हिमायती थे। रईस होते हुए भी उनका जीवन सादगीपूर्ण था। डॉक्टर दयानंद ने कहा कि कुशवाहा कांत अपने दौर के विलक्षण साहित्यकार थे, मात्र 34 वर्षों के जीवनकाल में 35 उपन्यासों का लेखन उनकी असाधारण क्षमता और कौशल का अद्भुत प्रमाण है। कुशवाहा कांत साहित्यकार होने की साथ संपादक भी थे। चिंगारी, बिजली, नागिन पत्रिका का उन्होंने संपादन किया। उनकी रचनाओं में रहस्य, रोमांस, प्रेम और राष्ट्र भक्ति का भी समावेश था।
कार्यक्रम के प्रारंभ में दीप प्रज्ज्वलन के उपरांत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ दयानिधि मिश्र ने स्वागत करते हुए कहा कि पं विद्यानिवास मिश्र के जन्मशती वर्ष में संकल्पित श्रृंखला के सोलहवीं कड़ी में काशी की धरोहर पर चर्चा हेतु उपस्थित आप सभी का स्वागत है। सरस्वती वंदना आनंद कृष्ण मासूम ने किया।अंत में काव्यपाठ देवेंद्र नाथ पांडेय ने किया। कार्यक्रम का संचालन डॉ आशुतोष शास्त्री तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। आयोजन में डा. राम सुधार सिंह, ओम धीरज,अशोक कुमार सिंह,पवन कुमार शास्त्री, अत्रि भारद्वाज, डॉक्टर श्रद्धानंद ,शिवकुमार पराग, गिरिजेश तिवारी, शशिकला पाण्डेय, उमाशंकर तिवारी कंचन, गणेश गंभीर सहित अन्य साहित्यकार कवि एवं लेखक उपस्थित थे
