जन्मोत्सव : साहित्योत्सव ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर (14-15 जनवरी 2025)

विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2025) ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित था। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष पंडित जी का जन्म-शताब्दी वर्ष है और इस आयोजन के साथ ही न्यास द्वारा संकल्पित वर्षपर्यंत चलने वाले विभिन्न सांस्कृतिक-साहित्यिक उत्सवों-समारोहों का भी श्रीगणेश हुआ।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को, जन्म-शताब्दी वर्ष के वैशिष्ट्य के अनुरूप, धर्मसंघ शिक्षामंडल के, विद्यानिवास जी को अतिशय प्रिय राधा-माधव के युगल भाव से सुसज्जित सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ( आयुष्य राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश ), अध्यक्ष प्रो. सुनील कुलकर्णी ( निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), विशिष्ट अतिथियों प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ), श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), डाॅ. अरुणेश नीरन ( पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर बुद्ध महाविद्यालय, कुशीनगर ), प्रो. सदानंद शाही ( पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र ( पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ) तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी के वैदिक स्तवन, श्रीयुत श्रीनिवास विलासराव इनामदार के घनपाठ और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इस अवसर को आयुष्मान रिदित मिश्र के तबला-वादन , आयुष्मती आतुषी मिश्र के वीणा-वादन एवं श्री प्रीतम मिश्र के गायन ने एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। प्रो. अरविंद मिश्र, प्रो. श्रद्धानंद, प्रो. उदयन मिश्र और प्रो. ऋतंधर मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. अरुणेश नीरन ने स्वागत-भाषण के साथ ही संगोष्ठी के विषय को प्रस्तावित करते हुए हिंदी उपन्यास के महत्त्वपूर्ण पड़ावों और युगांतर उपस्थित करने वाली कृतियों के उल्लेख के साथ विमर्श के विभिन्न आयामों की तरफ मूल्यवान संकेत किए।

उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित दो पत्रिकाओं ‘सोच-विचार’ और ‘वीणा’ के साथ ही ‘नान्दी’ पत्रिका और डाॅ. दयानिधि मिश्र तथा प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा संपादित पुस्तकों ‘लोक, लोकतंत्र और मीडिया’ (सस्ता साहित्य मंडल), ‘समवेत का सौंदर्य’, ‘रामकथा मंदाकिनी’, ‘भारत और भारतीयता’, ‘पलाश के फूल की दहक’, ‘शिरीष का आग्रह’, ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ ( सभी प्रलेक प्रकाशन ), धर्मेंद्र सिंह संपादित ‘अविनाशी काशी’ के अतिरिक्त ‘भाषा-दर्शन’, ‘प्रियांश’, ‘मरुस्थल’ तथा ‘मृणाल सेन और उनका सिनेमा’ जैसी दर्जनाधिक पुस्तक-पत्रिकाओं का लोकार्पण संपन्न हुआ। डाॅ. राम सुधार सिंह ने इन सभी लोकार्पित कृतियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।

उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र को, लोककवि सम्मान से डाॅ. बलभद्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री रामजनम भारती को, पत्रकारिता सम्मान से श्री राकेश कुमार शर्मा को तथा श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री नरोत्तम शिल्पी को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। सम्मानित विभूतियों के परिचय तथा प्रशस्ति-वाचन का दायित्व सुश्री अंजलि मिश्र ने निभाया। अपरिहार्य कारणों से श्री राकेश कुमार शर्मा सम्मान-समारोह में उपस्थित नहीं हो सके। इस अवसर पर स्वीकृति वक्तव्य के साथ ही उनसे विशेष आग्रहपूर्वक उनकी कविताएँ भी सुनी गईं।

बीज-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि हिंदी साहित्य में यूरोप से आगत विधाओं में से सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास ने ही अर्जित की, इस वैशिष्ट्य के साथ कि इस पश्चिमी विधा को हिंदी ने ही नहीं, हिंद ने ही, अपने ही रंग-ढंग से विकसित किया। जिस मध्यवर्ग की विधा इसे माना गया, हिंदी में उसकी जगह शुरुआती दौर में किसानों और वंचितों ने ली, स्त्रियों ने विशेषतः। आज भी हिंदी उपन्यासों की मुख्य धारा में मुख्यतः वही हैं जो सामाजिक जीवन की मुख्य धारा में नहीं हैं। प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने इस सारस्वत आयोजन और उसमें एक साथ इतनी पुस्तकों के लोकार्पण को पंडित जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कथा के लिए जीवन को जितनी, जीवन के लिए कथा को भी उतनी ही बड़ी जरूरत के तौर पर निरूपित किया। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र की गरिमामय उपस्थिति ने इस आयोजन को संपन्नतर किया। ‘काशी अविनाशी’ के रचयिता श्री धर्मेंद्र सिंह ने उसी अविनाशी काशी की एक धरोहर के रूप में विद्यानिवास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। मुख्य अतिथि श्री दयाशंकर मिश्र दयालु ने पंडित जी के साथ ही काशी की पांडित्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए इस आयोजन से अपने जुड़ाव को एक ऐसे सौभाग्य के रूप में उद्धृत किया जो आत्मा को बल देता है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सुनील कुलकर्णी ने लोकार्पित कृतियों और सम्मानित विभूतियों के साथ ही प्रस्तुत वक्तव्यों के हवाले से इस और ऐसे सारस्वत आयोजनों को समकालीन भारत की सांस्कृतिक अनिवार्यता के रूप में रेखांकित किया। पंडित विद्यानिवास मिश्र को भारत-भाव के कथा-प्रवाह के दीप्त चरित के रूप में याद करते हुए उन्होंने उनके जन्मशती वर्ष के आगामी आयोजनों में अपने और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सतत सहभागी होने की प्रतिबद्धता जताई। इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।

दूसरे अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वतंत्रतापूर्व’ की शुरुआत डाॅ. श्रुति पाण्डेय (शिलांग, मेघालय) के वक्तव्य से हुई। मुक्ति-चेतना के ब्याज से स्वतंत्रतापूर्व के हिंदी उपन्यासों में निहित स्त्री-मुक्ति और भारत मुक्ति की समानांतर और उत्तरोत्तर दृढ़ होती गई आवाज को उन्होंने उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया। डाॅ. प्रभात मिश्र ने हिंदी उपन्यासों के विशिष्ट संदर्भ में भारतीय मध्यवर्ग की अपनी पहचान से हिंदी उपन्यासों की अपनी पहचान के बनने की बात कही। भारतीय मध्यवर्ग के घटनाबहुल जीवन से जुड़कर ही संभवतः हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास घटनाओं के घटाटोप से घिरे रहे हैं। इस मध्यवर्ग के स्वरूप में आए बदलाव के साथ ही उपन्यासों के स्वरूप में भी आते बदलाव को महसूस किया जा सकता है। प्रो. वशिष्ठ अनूप ने प्रेमचंद को भारतीय किसानों के सर्वाधिक विश्वसनीय कथाकार के रूप में आँकते हुए, कृषि-जीवन की उनकी समझ के साथ ही उनके और हिंदी के उपन्यासमात्र के, शिल्प और संवेदना दोनो दिशाओं में, उत्तरोत्तर विकास को निरूपित किया। प्रो. बलराज पाण्डेय ने हिंदी उपन्यास के प्रारंभिक से लेकर अब तक के विकास का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत करते हुए उसकी उपलब्धि के रूप में निम्न वर्ग और निम्न वर्ण और चाहे जिस बहाने, जिन तरीकों, दबाई-कुचली गई आवाजों को आवाज देने के हथियार के रूप में बनी और बनती रही पहचान को रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डाॅ. विश्वास पाटिल ने मुक्ति-चेतना के विभिन्न आयामों की चर्चा करते हुए उन्हें धारण करने वाले स्वतंत्रतापूर्व के प्रतिनिधि उपन्यासों और उपन्यासकारों के वैशिष्ट्य का व्याख्यान किया। सुचिंतित टिप्पणियों के साथ इस सत्र का सफल संयोजन डाॅ. प्रीति जायसवाल ने किया।

तीसरा अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वातंत्र्योत्तर चार दशक’ प्रो. चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। डाॅ. अखिलेश मिश्र ने आजादी के बाद के बहुविध मोहभंग और चतुर्दिक ह्रासोन्मुखता और सांप्रदायिक वैमनस्य को तब के उपन्यासों झूठा सच, तमस, आधा गाँव, कितने पाकिस्तान आदि के माध्यम से पढ़ने की कोशिश की। डाॅ. कुमार वरुण ने बैल की आँख, माधोपुर का घर आदि उपन्यासों के जरिए बिहार के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन को रेखांकित होते हुए दिखाया। डाॅ. मधुबाला शुक्ल ने विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक उन्माद के सामाजिक प्रभाव के औपन्यासिक पाठ के रूप में राही मासूम रजा के कथा-कर्म को प्रस्तुत किया। डाॅ. नरेंद्र नाथ राय ने मुक्ति-चेतना के कथा-पाठ को आपातकाल के विशेष संदर्भ में लिया और हिंदी उपन्यासों पर वैश्विक घटनाओं-परिघटनाओं के प्रभाव का भी मूल्यांकन किया। डाॅ. रंजन पांडेय ने पाहीघर, बेदखल, डूब, पार, माँ का आँचल आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों में बदलते हुए गाँवों के प्रवेश को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि होरी तो खैर अपने सामने आई चुनौतियों से जूझ रहा था, अब के किसानों के पास इसकी भी क्षमता नहीं बची। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने बताया कि प्रेमचंद के गाँव-केंद्रित उपन्यासों के बाद एक वक्त आया जब रेणु के यहाँ नायक शहर से उठकर गाँव आए, बहुत कुछ अच्छा-अच्छा करने के इरादे लेकर, लेकिन उसके बाद गाँवों का हाल कुछ इस कदर बेहाल हुआ कि चाहे ‘अलग-अलग वैतरणी’ का देवनाथ उपाध्याय हो या मास्टर शशिकांत या ‘रागदरबारी’ का रंगनाथ या ‘जल टूटता हुआ’ का सतीश — सबको गाँव छोड़कर भागना पड़ा। यह छोड़कर भागना नायकों का ही नहीं है, बहुत कुछ कथाकारों का भी है, यही वजह है शायद कि हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि के रूप में गाँव अब जब-तब है। प्रो. अवधेश प्रधान ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर केंद्रित होते हुए बताया कि कैसे वह एक तरफ स्त्री-मुक्ति का ताना-बाना बुनता है, दूसरी तरफ दूसरे विश्वयुद्ध की भी छाया छूता है, और तीसरी तरफ अपनी सामाजिक विषमता पर चोट करते हुए पूर्व की धार्मिक उदारता और पश्चिम की सामाजिक उदारता के गँठजोड़ की जरूरत की तरफ भी संकेत करता है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. चितरंजन मिश्र ने सबके समाहार के साथ ही बताया कि समस्याएँ भी और उनके समाधान के लिए संघर्ष भी बहुत है, और बहुविध है। संवेदनाओं के इतने रंग हैं कि कई बार वे एक-दूसरे को काटते हुए भी नजर आते हैं। ऐसे में कथाभूमि का चयन और उसका निर्वाह भी बेशक निरंतर कठिन होता जा रहा है, लेकिन अपनी कथा-प्रतिभा पर अविश्वास की भी कोई वजह नहीं दिखती। डाॅ. रचना शर्मा ने इस सत्र का संयोजन किया।

चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री शरद श्रीवास्तव, अभिनव अरुण, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, विजय जी, मासूम जी, प्रतीक त्रिपाठी, अंजलि मिश्र, हिमांशु त्रिपाठी, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, बेताल जी, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, धनंजय जी और इस वर्ष श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से सम्मानित नरोत्तम शिल्पी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।

आयोजन के दूसरे दिन, 15 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘हिंदी उपन्यास : रचना-विधान और विकास-क्रम। मुख्य वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह का था और उनके अतिरिक्त दो और महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रो. प्रभाकर सिंह और डाॅ. इंदीवर के हुए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. श्रद्धानंद ने की और इसका संयोजन किया डाॅ. बिजेंद्र पांडेय ने। अपने मुख्य वक्तव्य मे प्रो. दिलीप सिंह ने रचना-विधान के सौष्ठव की दृष्टि से कृति के विश्लेषण और परख के आग्रह के साथ कहा कि यदि हिंदी उपन्यास-यात्रा के आदि से आज तक के विकास-क्रम को देखें तो पाएँगे कि यह अपने भीतर सरल, हास्यमय, रहस्यमय, चामत्कारिक, गंभीर, सुखद, दुखद अनेक गद्यरूप समेटे हुए है। यह गुंफन ही हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को विचारणीय बनाता है। उन्होंने रचना-विधान के गठाव के आधार पर ही हिंदी के पहले उपन्यास को तय करने की बात कही। चंद्रकांता के रूप में, उन्होंने लक्ष्य किया कि अपने जन्म के दस ही बरस बाद हिंदी उपन्यास की भाषा दौड़ती-भागती, लहराती-मचलती, उछलती-कूदती हमारे सामने आ गई। रचना-विधान की इसी ठोस जमीन पर समाजगत मूल्यवत्ता में निहित अर्थवान तत्वों को पकड़ते हुए प्रेमचंद सामने आए। उन्होंने हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को नए-नए मोड़ से संपन्न करने वाले उपन्यास के रूप में प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, अज्ञेय, शिवकुमार मिश्र रुद्र, वृंदावन लाल वर्मा, यशपाल, धर्मवीर भारती, अमृत लाल नागर आदि की चयनित कथाकृतियों के पाठ का प्रस्ताव रखा। प्रो. प्रभाकर सिंह ने हिंदी उपन्यासों के रचना-विधान पर वैश्वीकरण के प्रभाव को अपने वक्तव्य के केंद्र में रखते हुए बताया कि यह एक तो उपन्यास में विभिन्न विधाओं के शिल्प के प्रवेश के रूप में घटित हुआ, जैसे ‘काशी का अस्सी’ या ‘कलिकथा बाई पास’ में, दूसरे यह विमर्शों की भीड़ में भी उनसे निराक्रांत रहने की अनधीरता में दिखता है, जैसे ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में और तीसरे ‘मणिकर्णिका’ या ‘मुर्दहिया’ जैसी घोषित रूप से आत्मकथाओं में जो अपने पूरे गठन से अपने उपन्यास होने को दर्ज करती हैं। इसे उन्होंने उपन्यास के केंद्र में न सिर्फ देश, बल्कि एक लघुतर देश जैसे एक मुहल्ले, अस्सी, के आ जाने के रूप में भी रेखांकित किया। डाॅ. इंदीवर ने हिंदी के प्रारंभिक ‘परीक्षा गुरु’, ‘देवरानी-जेठानी’ जैसे उपन्यासों की संरचना के माध्यम से हिंदी उपन्यासों की बनावट-बुनावट के अद्यावधि विस्तार की प्राथमिक रेखाओं को समझने-समझाने की चेष्टा की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रद्धानंद ने सभी वक्तव्यों के समाहार के साथ ही शिल्प और संवेदना दोनो स्तरों पर हिंदी की उपन्यास-यात्रा में प्रेमचंद की केंद्रीयता के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।

आयोजन का छठा सत्र 90 के बाद के हिंदी उपन्यासों पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। प्रो. सुमन जैन ने ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ को बाजारवाद के संकटों से घिरे आदिवासियों की संतप्त कथा के रूप में रेखांकित किया। आज के समय की सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण की है, जिसे आदिम समाज बचाए हुए है और सभ्यता की विकास-यात्रा उसी समाज को रोड़ा मानते हुए राह से हटा देने को तत्पर है। प्रो. मानवेंद्र पांडेय ने पूर्वोत्तर भारत के हिंदी उपन्यासों से उपेक्षित रह जाने को प्रश्नांकित करते हुए उसके भूगोल और सामाजिक जीवन में निहित कथा-संभावनाओं की चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी के उन विरलप्राय उपन्यासों का भी एक संक्षिप्त सारगर्भित मूल्यांकन प्रस्तुत किया जो पूर्वोत्तर के जनजातीय जीवन से जुड़े हैं, जैसे देवेंद्र सत्यार्थी का ‘ब्रह्मपुत्र’, श्रीप्रकाश मिश्र का ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’, ‘देश भीतर देश’ आदि। श्रीप्रकाश मिश्र ने आदिवासियों से जुड़े उपन्यासों की विस्तृत अनुभवजन्य चर्चा की। कहा कि आदिवासी रचनाकार आमतौर पर अपनी पहचान के लिए लिखते हैं जबकि गैरआदिवासी प्रायः किसी राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर चलते हैं। डाॅ. राम सुधार सिंह ने 90 के बाद के उपन्यासों में निहित मुक्ति-चेतना को विशेषतः ‘पहला गिरमिटिया’ और ‘बा’ तथा आनुषंगिक रूप से ‘निर्वासन’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘आखेट’, ‘दस द्वारे का पींजरा’ आदि के आधार पर विवेचित किया। सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. अनंत मिश्र ने सत्र के सभी व्याख्यानों के समाहार के साथ ही बताया कि रचनाकार के शिल्प का निर्माण उसके लेखन से होता है और प्रतिभाशाली लेखक अपनी रचनाओं में शिल्प को लेकर आते हैं। रचनाकार ही है जिसे समाज के अन्याय का अहसास होता है और वह उसकी तरफ इंगिति का साहस भी रखता है, सामर्थ्य भी। इस सत्र का संयोजन डाॅ. साधना भारती ने किया।

सातवें अकादमिक सत्र का विषय था ‘हिंदी उपन्यास और विभिन्न अस्मिताएँ’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार डाॅ. नीरजा माधव ने की। डाॅ. सुनील कुमार मानस ने स्त्री अस्मिता से जुड़े औपन्यासिक प्रयोगों की चर्चा की। डाॅ. मनु पांडेय ने ‘सूत्रधार’, ‘टोपी शुक्ला’ आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों की संरचनात्मक व्यवस्था की पहचान की। प्रो. वंदना मिश्र ने ‘यमदीप’, ‘पोस्ट बाॅक्स नंबर 203 नाला सोपारा’, ‘तीसरी ताली’ और ‘गुलाम मंडी’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से थर्ड जेंडर संबंधी विमर्श की औपन्यासिक परिणति का मूल्यांकन प्रस्तुत किया। प्रो. भारती गोरे ने स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श की विस्तृत चर्चा करते हुए यह भी कहा कि यदि ये विमर्श केवल विमर्श के नाम पर जिंदा हैं तो यह चर्चा की नहीं, चिंता का विषय है। स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब देह की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. नीरजा माधव ने सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिताओं का उल्लेख करते हुए विभिन्न अस्मिताओं को लेकर कुछ फैल गए और कुछ फैलाए गए भ्रमों के सोदाहरण निवारण की कोशिश की। रचना के स्तर पर, खास तौर पर थर्ड जेंडर को लेकर, कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कथाओं के गढ़न-पढ़न को उन्होंने प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि अस्मिता-विमर्श का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। अपनी विदग्ध टिप्पणियों के साथ इस सत्र का संयोजन प्रो. गोरखनाथ ने किया।

आठवाँ सत्र समापन, संपूर्ति समारोह, स्मृति-संवाद और पुरस्कार-वितरण के रूप में आयोजित हुआ। विद्यानिवास मिश्र स्मृति-संवाद में डाॅ. मुक्ता ने बताया कि पंडित जी उन विभूतियों में थे जो धारा में रहते हुए भी धारा के विपरीत चलने का भी साहस रखते हैं। डाॅ. शशिकला पांडेय ने प्रकृति से उनके लगाव और वात्सल्य भाव की विशेष चर्चा की। मुख्य अतिथि प्रो. गोपबंधु मिश्र ने इस आयोजन के केंद्रीय विषय के शास्त्रीय पक्ष को प्रस्तुत किया, इस तर्क के साथ कि मूल को भूलना स्वयं को भुलावे में रखना है, और यह बात पं. विद्यानिवास मिश्र की उस निबंध-कला से स्थापित होती है जो मौलिक, न कि मूलघ्न चिंतन पर आधारित है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पंडित जी ने कोई उपन्यास भले न लिखा हो, लेकिन अपने निबंधों से जो वैचारिक रसायन उन्होंने उपस्थित किया है वह कथा-प्रबंधों के लिए भी स्पृहा की वस्तु है। उन्होंने हिंदी के पहले वैश्विक उपन्यास के रूप में ‘पहला गिरमिटिया’ की पहचान का आग्रह भी किया।

युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं का पुरस्कार-वितरण भी इस सत्र का एक और आकर्षण था। उपन्यास-समीक्षा पर आधारित आलेखों में प्रथम पुरस्कार श्री धनंजय मलिक को, द्वितीय पुरस्कार डाॅ. गुलजबीं अख्तर को, तृतीय पुरस्कार सुश्री क्षमता मिश्र को, सांत्वना पुरस्कार सुश्री शिखा सिंह को तथा सौहार्द पुरस्कार सुश्री नीमालामा को प्रदान किया गया। कविता के लिए सुश्री कागोमादो को प्रथम, डाॅ. फिरोज को द्वितीय, कविता सरोज को तृतीय, अरशान अजीज और नवोदिता त्रिपाठी को सांत्वना पुरस्कार से तथा निबंध के लिए सुश्री पूजा राय को पुरस्कृत किया गया। इस सत्र के संयोजन का दायित्व डाॅ. धीरेंद्रनाथ चौबे ने निभाया।

इस दो दिवसीय आयोजन में वाराणसी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे सुधीजन की भागीदारी रही। हर वर्ष की तरह पूर्वोत्तर भारत के शोध छात्र-छात्राओं ने इस वर्ष भी आयोजन के विभिन्न उपक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आयोजन को सफल बनाने में इसके विभिन्न आयामों से जुड़े सभी सुधीजन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ऐसे आयोजनों के बहुत सारे प्रयोजन होते हैं, लेकिन यह आयोजन विशुद्ध रूप से साहित्य के लिए है। पंडित. विद्यानिवास मिश्र के जन्मोत्सव के साहित्योत्सव होने में ही उसकी सार्थकता है, और यह सार्थकता इस सारस्वत आयोजन में आप सभी सुधीजन की सहभागिता से है।

दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास

हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ (तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर) 14 से 16 जनवरी 2024

विद्याश्री न्यास एवं हिंदुस्तानी एकेडे मी, प्रयागराज (भाषा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन के नियंत्रणाधीन) ; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली तथा लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय , दीनदयाल उपाध्याय नगर, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में श्री धर्मसंघ शिक्षा मंडल सभागार, वाराणसी में ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ’ विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर (14 -16 जनवरी 2024) का उद्घाटन अध्यक्ष श्री सुरेंद्र दुबे (उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल), मुख्य अतिथि डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ (राज्यमंत्री ,स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ) एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. आनंद कुमार त्यागी (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. रजनीश शुक्ल (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), तथा श्री अशोक तिवारी (महापौर, वाराणसी) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) के द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र की चित्र पर माल्यार्पण, आ. जयन्तपति त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, आ. मृत्युंजय त्रिपाठी के घनपाठ तथा प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण एवं पूर्वोत्तर की छात्राओं हिमाश्री फुकन एवं हृतिराज छेत्री के बिहू नृत्य के साथ हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने अतिथियों का भावपूर्ण स्वागत करते हुए संगोष्ठी के लिए चयनित विषय के औचित्य पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर सम्मानित अतिथियों ने प्रभात प्रकाशन और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित ‘पं. विद्यानिवास मिश्र रचनावली’ ( 21 खंड) तथा प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ का, इन दोनो पुस्तकों के संपादक डाॅ. दयानिधि मिश्र और प्रलेक प्रकाशन के निदेशक श्री जितेन्द्र पात्रो के साथ लोकार्पित किया। पुष्प-संपदा के भीतर से पुस्तकों के अवतरण की जिस भव्य-दिव्य प्रविधि को पिलग्रिम्स प्रकाशन के निदेशक श्री रामानंद तिवारी ‘सनातनी’ ने आकार दिया उसने सहृदय समाज को मोह लिया। डॉ. अरुणेश नीरन (देवरिया) ने रचनावली के प्रकाशन की चुनौतियों और इसके महत्त्व पर प्रकाश डाला। न्यास द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले सम्मानों के क्रम में मंचस्थ अतिथियों एवं न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने इस वर्ष के आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान से प्रोफेसर अनंत मिश्र को, आचार्य विद्यानिवास मिश्र लोककवि सम्मान से श्री कमलेश राय को, राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री मंगल यादव ‘कवि’ को, श्री कृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री चंद्रभाल सुकुमार को एवं आचार्य विद्यानिवास मिश्र पत्रकारिता सम्मान से श्री रजनीश त्रिपाठी को उत्तरीय, नारियल, माला, पंचपुस्तक , प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और सम्मान राशि से सम्मानित किया। इस सम्मान-समारोह को डाॅ. डी.एन. पाण्डेय एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने शंख-ध्वनि से तथा आ. जयंतपति त्रिपाठी एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने स्वस्ति-वाचन से और सुश्री अंजलि ने प्रशस्ति-वाचन से गरिमा प्रदान की। सम्मानित विभूतियों ने अपने स्वीकृति-वक्तव्य में पंडित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को याद किया।

विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर अनंत कुमार त्यागी ने साहित्य के प्रति आज की पीढ़ी के आकर्षण के लिए नए रास्तों के अन्वेषण और ज्ञान के विविध अनुशासनों के समन्वय की आवश्यकता बताई। श्री अशोक तिवारी ने कहा कि आचार्य विद्यानिवास मिश्र को याद करना संपूर्ण भारतीयता को याद करना है। प्रो. रजनीश शुक्ल ने बताया कि जो ज्ञान पंडित जी से मिला है वह गुरु-ऋण है, और उस ज्ञान को अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित करके ही उसे चुकाया जा सकता है। उन्होंने रचनावाली को डॉ. दयानिधि मिश्र एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र के श्रम, स्वाध्याय और निष्ठा का प्रतिफल बताया। मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दयाशंकर मिश्र (दयालु) ने विद्याश्री न्यास के विभिन्न उपक्रमों को काशी के साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन की सकारात्मकता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूज्य मिश्र जी के लेखन के संस्पर्श से मुझे आत्मीय सुख मिलता रहा है। हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास-बोध के संदर्भ में भी इसके अध्ययन की आवश्यकता बताई। इस तरह के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की निर्बाध निरंतरता बनी रहे, इसके लिए एक सभागार के निर्माण हेतु राज्यमंत्री ने अपनी निधि से ₹ 25 लाख देने की बात कही। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री सुरेंद्र दुबे ने कहा कि विद्यानिवास जी का सानिध्य पाना लोक और वेद से गुजरना है। भारत जीवंत अतीत को याद करता है और यह परंपरा से ही संभव है। यह सनातन परंपरा ही है जो नित्य नूतनता का आकांक्षी रहा है। सनातन एक जीवंत वर्तमान है और पंडित जी इसी जीवंत वर्तमान की खोज करते हैं। ‘परंपरा बंधन नहीं’ में पंडित जी कहते हैं, “परंपरा हमारी ऊर्जा का स्रोत है हमारी सांस्कृतिक चेतना का द्योतक है इसलिए कालजयी है।” हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भाषा की प्रकृति और उसके विकास-क्रम को समझने में भी इस काल के साहित्य-आधारित अध्ययन को उपयोगी बताया। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने इस सत्र के सुधीजन के साथ ही इस वृहत् रचनावली को साकार करने वाले समस्त सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उद्घाटन सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।

दूसरा, अकादमिक सत्र बीज वक्तव्य के साथ ही सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य पर केंद्रित था। बीज वक्तव्य के रूप में प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने उदय काल नाम की सार्थकता एवं उसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि इस नाम में सृजनात्मकता है । इसमें 8वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक की उन सभी प्रवृत्तियों को सम्मिलित किया जा सकता है, जो सरहपा से लेकर कबीर तक पहुँचती हैं और ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के विश्वास में व्यक्त होती हैं। इस काल के साहित्य को धार्मिक और लौकिक में हम अपनी सुविधा से बाँट लेते हैं लेकिन वस्तुतः वह लोक-वाणी ही है। संवेदना के स्तर पर इस काल की कविता कट्टरता का विरोध करती है । उन्होंने सिद्ध, नाथ, जैन साहित्य, रासो काव्य और खुसरो, विद्यापति के उदाहरणों से उन प्रवृत्तियों को रेखांकित किया जिन्होंने भक्ति, रीति और आधुनिक काल तक को प्रभावित किया। समारोह के विशिष्ट अतिथि श्री देवेंद्र प्रताप सिंह (सचिव, हिंदुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज) ने उदयकाल के स्रोत के रूप में अपभ्रंश से लेकर संस्कृत साहित्य तक का विश्लेषण प्रस्तावित किया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस समय में संस्कृति और साहित्य का संरक्षण भी हमारा एक प्रमुख दायित्व है। प्रो. प्रभाकर सिंह (वाराणसी) ने कहा कि उदयकाल देशी भाषाओं की बहुलता का सृजनकाल है, यह जितना लिखित है उतना ही वाचिक है और साहित्येतिहास-लेखन में इसका खयाल रखना जरूरी है। डाॅ. सतीश पाण्डेय (मुंबई) ने नाथ और नाथ संप्रदाय की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए सिद्ध किया कि गोरखनाथ साधक योगी ही नहीं, दार्शनिक, धर्मपथ-प्रदर्शक, युगद्रष्टा रचनाकार और सामाजिक क्रांति के प्रणेता हैं। डाॅ. अवधेश शुक्ल (वर्धा) ने गोरख और गोरख-वाणी के अखिल भारतीय प्रसार और प्रभाव पर प्रकाश डाला। डाॅ. दिनेश पाठक (मुंबई) ने सिद्ध साहित्य के उन सामाजिक-साहित्यिक प्रदेयों की चर्चा की जिनका पल्लवन आगे चलकर संतकाव्य में भी हुआ। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने उदयकाल की पाठ-संबंधी समस्याओं को रेखांकित करते हुए कहा कि पाठ बहुत सीमित हैं, अत : मूल पाठों की ओर पुनः-पुनः लौट कर पाठों के अध्ययन पर विशेष बल देना चाहिए। प्रारंभिक साहित्य के पाठों को तय कैसे करें, इसका निर्णय भी हमें बहुत सावधानी से करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कर्म और श्रम के बीच जो अलौकिक और रहस्य की बात करते हैं उनका ज्ञान अधिक श्रेष्ठ है और भारतीय वैचारिकी का यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है। उदय काल में अध्यात्म एक तरह से लोकतांत्रिक हुआ और साहित्य जड़ता से सूक्ष्मता की ओर स्पंदित हुआ। इस सत्र का संयोजन प्रो. श्रद्धानंद (वाराणसी) ने किया।

तीसरे सत्र में श्री विश्वास पाटिल ( शहादा, महाराष्ट्र) की अध्यक्षता में उदयकाल के लौकिक साहित्य पर विचार किया गया। डाॅ. मनीषा खटाटे (नासिक) ने साहित्य और संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो के योगदान की चर्चा करते हुए उन्हें भारतीय लोक की अपनी आवाज के रूप में रेखांकित किया। प्रो. भारती गोरे (औरंगाबाद) ने खुसरो-कृत ‘खालिक बारी’ से संबंधित तमाम विवादों की पड़ताल करते हुए उसके वैशिष्ट्य को उजागर किया। डाॅ. विनीता कुमारी (दिल्ली) ने एक प्रेमकाव्य, विरहकाव्य और संदेशकाव्य के रूप में अब्दुल रहमान के ‘संदेश रासक’ के निजी वैशिष्ट्य को प्रकट किया। यह अवधारणा ही कि यह काव्य न मूर्ख के लिए है, न पंडित के लिए, उनके लिए है जो इनके बीच के हैं, ‘मझ्ययार’ हैं, अपने आप में विलक्षण है। प्रो. अवधेश प्रधान ने विद्यापति के उस व्यक्तित्व और काव्यत्व पर प्रकाश डाला जो उनकी कीर्तिलता जैसी कृति से व्यक्त होती है। इस कृति के आधार पर कहा जा सकता है कि विद्यापति न सिर्फ भक्ति और शृंगार के कवि हैं, बल्कि कविता में यथार्थवादी धारा की शुरुआत भी उन्हीं से होती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री विश्वास पाटिल ने सभी वक्तव्यों को समेटते हुए उदयकाल के लौकिक साहित्य पर नाथ साहित्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभावों का व्याख्यान किया। इस सत्र का संचालन डाॅ. बिजेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।

चौथा सत्र भोजपुरी-हिंदी के सुप्रसिद्ध, सर्वप्रिय कवि पं. हरिराम द्विवेदी की स्मृति काव्य-संध्या के रूप में प्रो. वशिष्ठ अनूप की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि डाॅ. जितेन्द्र नाथ मिश्र और विशिष्ट अतिथि प्रो. बलिराज पाण्डेय की उपस्थिति तथा डाॅ. अशोक सिंह के संयोजन में संपन्न हुआ। कवि-गोष्ठी का शुभारंभ पं. हरिराम द्विवेदी के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। उपर्युक्त के अतिरिक्त सर्वश्री गिरिधर करुण, कवीन्द्र नारायण, लियाकत अली, रचना शर्मा, नागेश त्रिपाठी शांडिल्य, सूर्य प्रकाश मिश्र, धर्मेंद्र गुप्त साहिल, गौतम अरोड़ा सरस, सिद्धनाथ शर्मा, सविता सौरभ, नसीमा निशा, ब्रजेश चंद्र पाण्डेय, करुणा सिंह, संगीता श्रीवास्तव, गिरीश पाण्डेय, वेद प्रकाश पाण्डेय आदि ने हरि भैया को श्रद्धांजलि के रूप में अपनी कविताओं के पाठ से आयोजन के पहले दिन को एक सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।

आयोजन के दूसरे दिन की शुरुआत पाँचवे सत्र के रूप में रासो-परंपरा पर बातचीत से हुई। सर्वश्री सत्येंद्र शर्मा (सतना) ने पृथ्वीराज रासो, नरेंद्र नारायण राय (वाराणसी) ने बीसलदेव रासो, वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने परमाल रासो, राम सुधार सिंह (वाराणसी) ने विजयपाल रासो, प्रकाश उदय (वाराणसी) ने हम्मीर रासो और अंजलि अस्थाना ने राम रासो के कथ्य और उनसे जुड़े तथ्यों की छानबीन की। रासो के मूल पाठ की अनुपलब्धता या अल्प उपलब्धता, प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता की समस्या को सभी ने अपनी-अपनी तरह से संबोधित किया। यह भी प्रायः सभी ने महसूस किया कि रासो काव्यों ने अतिजनप्रियता पाई, इस वजह से भी काफी कुछ इनके पाठ में जुड़ता और छूटता रहा है, और इस क्रम में इनकी ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता क्षतिग्रस्त हुई। इसके चलते इन रचनाओं के काव्यगत वैशिष्ट्य भी उपेक्षा के शिकार हुए। इस विमर्श में डाॅ. दयानिधि मिश्र ने ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ पुस्तक के संपादन के क्रम में रासो-ग्रंथों पर आलेख एकत्र करने की कठिनाइयों के अनुभवों को साझा करते हुए इस तरफ सुधीजन का ध्यान आकर्षित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने साहित्येतिहास-लेखन के विभिन्न प्रयत्नों का उल्लेख करते हुए आदिकाल के संदर्भ में शोध-अध्ययन में शिक्षकों-शोधार्थियों की अरुचि के प्रति चिंता जाहिर की। इस सत्र का समन्वय प्रो. गोरखनाथ पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।

छठा सत्र प्रो. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान के रूप में आयोजित किया गया। ‘हिंदी के उदयकाल का अवदान’ विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान को इस काल के विश्रुत विद्वान श्री ब्रजेंद्र कुमार सिंघल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी साहित्य के आदिकाल के लिए उदयकाल नाम को अधिक सार्थक और इस आयोजन की एक लब्धि के रूप में रेखांकित किया। इस संज्ञा की तरफ संकेत करने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के संबंध में उन्होंने कहा कि ‘आदि’ की जगह ‘उदय’ की बात वे इसलिए भी कर सके कि परंपरा और आधुनिकता दोनो को वे भारतीय संदर्भ में समझते हैं, लोक और शास्त्र दोनो में उनकी अबाध आवाजाही है, वे सर्जनात्मक समीक्षा को ‘रीति विज्ञान’ में निरूपित कर सकते हैं, ‘हिंदी की शब्द-संपदा’ को वे लोकजीवन में तलाश सकते हैं। इस काल के विभिन्न आयामों के संदर्भ में भारत भर में अब तक हुए और अभी भी चल रहे शोध-समीक्षा के प्रयत्नों का भी उन्होंने एक रोचक विवरण प्रस्तुत किया और उदयकालीन साहित्य की प्रामाणिकता पर संदेह के कई मिथकों को सप्रमाण निरस्त किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे उदयकाल का साहित्य अपने पूर्ववर्ती साहित्य के प्रदेयों को धारे हुए है और कैसे उसके अपने प्रदेयों को उसके उत्तरवर्ती रचना-कर्म ने धारण किया, न सिर्फ धारण किया बल्कि विस्तृत किया, उच्चतर आयामों तक पहुँचाया। प्रो. इन्दीवर (वाराणसी) ने हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य दोनो की विकास-रेखा को उत्तर अपभ्रंश से लेकर अद्यावधि निरूपित किया। सिद्ध, नाथ और संत साहित्य के सम-विषम आयामों को उन्होंने विशेषतः विश्लेषित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. दिलीप सिंह (अमरकंटक) ने कहा कि भाषा, साहित्य और संस्कृति के सरोकार जन-जन से जुड़े हुए हैं, और इसलिए इन्हें लेकर हम सिर्फ सरकारों से सक्रियता की अपेक्षा रखें यह उचित नहीं है। उन्होंने उदयकाल के गद्य साहित्य के संदर्भ में संक्षेप में ही, लेकिन एक गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया और इस दिशा में शोध के विविध आयामों की तरफ संकेत किए। पृष्ठभूमि के रूप में संस्कृत और अपभ्रंश के गद्य-सामर्थ्य के विवेचन के साथ ही गद्य के क्षेत्र में अवहट्ठ और दक्खिनी की सक्रियता का रोचक विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया। उन्होंने ज्ञान-क्षेत्र से आबद्ध प्रणालियों का उपयोग करते हुए उदयकाल के गद्य साहित्य के नए सिरे से पाठ-विश्लेषण के लिए प्रेरित किया। इस सत्र का संयोजन डाॅ. रचना शर्मा (वाराणसी) ने किया।

आयोजन का सातवाँ सत्र उदयकाल के विविध आयामों और प्रवृत्तियों पर केंद्रित था। प्रो. अशोक नाथ त्रिपाठी (वर्धा) ने सम्यक साहित्येतिहास-लेखन के लिए उदयकाल के भाषायी और साहित्यिक अंतर्विरोधों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया। डाॅ. राजेंद्र खटाटे (नासिक) ने भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और धर्म-अध्यात्म — प्रत्येक संदर्भ में राष्ट्र के ऐतिहासिक स्मरण में इस काल की उपादेयता सिद्ध की। प्रो. उमापति दीक्षित (आगरा) ने उदयकाल से जुड़ी अनुसंधान-संबंधी समस्याओं पर प्रकाश डाला, प्रो. सुमन जैन ने उदयकाल की भावभूमि को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ तथा प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (वर्धा) ने उदयकाल की विभिन्न प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया। प्रो. माधवेंद्र पाण्डेय (शिलांग) ने भारतीय सांस्कृतिक समन्वय के आदिग्रंथ पुष्पदंत के महापुराण का विशेष संदर्भ लेते हुए किसी भी पंथ या विचार-दर्शन की प्रासंगिकता को तय करने की भारतीय पद्धति की पहचान के यत्न किए। महापुराणकार जैन मान्यताओं को ही नहीं, अपने पूरे युग को वाणी प्रदान करता है, काव्य-कला के नए मानक गढ़ता है। इस सत्र का समन्वय डाॅ उदय प्रताप पाल (आजमगढ़) ने किया।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे दिन के कार्यक्रम — युवा संवाद, पुरस्कार-वितरण एवं समापन-समारोह — लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चंदौली के पं. पारसनाथ तिवारी नवीन परिसर के सभागार में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय (पूर्व संकायाध्यक्ष, का.हि.वि.वि.) की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. राजाराम शुक्ल (पूर्व कुलपति, सं.सं. विश्वविद्यालय, वाराणसी) और विशिष्ट अतिथि के रूप में डाॅ. शशिकला पाण्डेय ( पूर्व आचार्य, म.गां. काशी विद्यापीठ, वाराणसी) की उपस्थिति में संपन्न हुए। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती, पं. विद्यानिवास मिश्र और महाविद्यालय के संस्थापक पं. पारसनाथ तिवारी के चित्र पर माल्यार्पण और डाॅ. ध्रुव पाण्डेय द्वारा स्तोत्र-पाठ से हुआ। महाविद्यालय के यशस्वी प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने अतिथियों एवं उपस्थित सुधीजन का स्वागत किया। इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को मंचस्थ अतिथियों ने पुरस्कृत किया। निबंध-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार मदालसा मणि त्रिपाठी (अरुणाचल प्रदेश) को, कविता-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार अरुणाचल प्रदेश की ही कागो मादो को तथा द्वितीय और तृतीय पुरस्कार लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय के क्रमशः क्षितीश्वर और नीतू पटेल को ; आलेख-प्रतियोगिता का प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार इसी महाविद्यालय की क्रमशः नेहा कुमारी, संजना कुमारी और सुषमा चौहान को प्रदान किया गया। कागो मादो ने अपने काव्य-पाठ के साथ ही वाराणसी के अपने अनुभवों के व्याख्यान से भी प्रभावित किया। पूर्वोत्तर से आए डाॅ. आलोक सिंह ने पुष्पदंत के महापुराण पर केंद्रित अपने शोध-आलेख का प्रभावपूर्ण पाठ किया।

प्रो. ब्रजेंद्र कुमार सिंघल (नई दिल्ली) ने युवा अध्यापकों और छात्र-छात्राओं से आत्मीय संवाद स्थापित करते हुए कहा कि उत्कृष्ट रचनाशीलता के लिए अध्ययन और लेखन में गंभीरता जरूरी है। किसी भी रचना के निहितार्थ तक पहुँचने के लिए, जिस परिवेश में उसकी रचना हुई, इसे, और इतिहास से उसके रिश्ते को समझना चाहिए। डाॅ. वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्व-अनुशासन के महत्त्व और उसके सामने मौजूद समकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डाला। कवि-कथाकार डाॅ. मुक्ता ने आचार्य शुक्ल की काव्य-संबंधी मान्यताओं को उद्धृत करते हुए अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर रचनाधर्मिता और रचना-प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया। विशिष्ट अतिथि डाॅ. शशिकला पाण्डेय ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए शार्ट कट जैसी कोई प्रविधि नहीं है। एक गहरी संलग्नता और परिश्रम से पीछे न हटने वाला जो स्वभाव एक भारतीय किसान का है वही हमारे शिक्षार्थियों के लिए भी अपेक्षित है। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने महाविद्यालय के प्रबंधन, शिक्षक-समुदाय, शिक्षार्थियों और शिक्षणेतर कर्मचारियों के उस सम्मिलित प्रयास की सराहना की जिसके चलते न सिर्फ गंभीरतर विषयों पर विचार-विमर्श की निरंतरता कायम हुई है, बल्कि उसके उपयुक्त परिस्थितियाँ भी निर्मित हुई हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान का आदि-अंत नहीं होता, देश-काल के अनुरूप उसके विभिन्न आयामों का नए-नए सिरे से उदय अवश्य होता रहता है। मुख्य अतिथि प्रो. राजाराम शुक्ल ने पं. विद्यानिवास मिश्र के विषम, विपुल और सतत सृजन-कर्म से प्रेरणा लेते हुए स्वयं को सर्वतोभावेन सशक्त करने की सीख दी। उन्होंने उदयकाल के प्रवृत्ति-वैविध्य को उसके वैशिष्ट्य के रूप में रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय ने उदयकाल की राजनीतिक दृष्टि से अतिशय विपन्न स्थिति में भी भारतीय मनीषा और भावबोध को शिखरस्थ रखने के लिए तरह-तरह से यत्नशील साहित्य-साधकों के युग के रूप में याद किया। प्रबंधक श्री राजेश कुमार तिवारी ने महाविद्यालय की तरफ से अतिथियों के प्रति आभार-प्रदर्शन के साथ ही इस तरह के सारस्वत आयोजन की निरंतरता के बने रहने की कामना भी की। इस सत्र का संयोजन प्रो. इशरत जहाँ ने किया।

डाॅ. दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास