हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ (तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक शिविर) 14 से 16 जनवरी 2024

विद्याश्री न्यास एवं हिंदुस्तानी एकेडे मी, प्रयागराज (भाषा विभाग, उत्तर प्रदेश शासन के नियंत्रणाधीन) ; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली तथा लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय , दीनदयाल उपाध्याय नगर, चंदौली के संयुक्त तत्वावधान में श्री धर्मसंघ शिक्षा मंडल सभागार, वाराणसी में ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल : विन्यास और संवेदनाएँ’ विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर (14 -16 जनवरी 2024) का उद्घाटन अध्यक्ष श्री सुरेंद्र दुबे (उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल), मुख्य अतिथि डॉ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ (राज्यमंत्री ,स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश शासन, लखनऊ) एवं विशिष्ट अतिथि प्रो. आनंद कुमार त्यागी (कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ, वाराणसी), प्रो. रजनीश शुक्ल (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा), तथा श्री अशोक तिवारी (महापौर, वाराणसी) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र (पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) के द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र की चित्र पर माल्यार्पण, आ. जयन्तपति त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, आ. मृत्युंजय त्रिपाठी के घनपाठ तथा प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण एवं पूर्वोत्तर की छात्राओं हिमाश्री फुकन एवं हृतिराज छेत्री के बिहू नृत्य के साथ हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने अतिथियों का भावपूर्ण स्वागत करते हुए संगोष्ठी के लिए चयनित विषय के औचित्य पर भी प्रकाश डाला। इस अवसर पर सम्मानित अतिथियों ने प्रभात प्रकाशन और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से प्रकाशित ‘पं. विद्यानिवास मिश्र रचनावली’ ( 21 खंड) तथा प्रलेक प्रकाशन से प्रकाशित ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ का, इन दोनो पुस्तकों के संपादक डाॅ. दयानिधि मिश्र और प्रलेक प्रकाशन के निदेशक श्री जितेन्द्र पात्रो के साथ लोकार्पित किया। पुष्प-संपदा के भीतर से पुस्तकों के अवतरण की जिस भव्य-दिव्य प्रविधि को पिलग्रिम्स प्रकाशन के निदेशक श्री रामानंद तिवारी ‘सनातनी’ ने आकार दिया उसने सहृदय समाज को मोह लिया। डॉ. अरुणेश नीरन (देवरिया) ने रचनावली के प्रकाशन की चुनौतियों और इसके महत्त्व पर प्रकाश डाला। न्यास द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले सम्मानों के क्रम में मंचस्थ अतिथियों एवं न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने इस वर्ष के आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान से प्रोफेसर अनंत मिश्र को, आचार्य विद्यानिवास मिश्र लोककवि सम्मान से श्री कमलेश राय को, राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री मंगल यादव ‘कवि’ को, श्री कृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री चंद्रभाल सुकुमार को एवं आचार्य विद्यानिवास मिश्र पत्रकारिता सम्मान से श्री रजनीश त्रिपाठी को उत्तरीय, नारियल, माला, पंचपुस्तक , प्रशस्ति पत्र, प्रतीक चिह्न और सम्मान राशि से सम्मानित किया। इस सम्मान-समारोह को डाॅ. डी.एन. पाण्डेय एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने शंख-ध्वनि से तथा आ. जयंतपति त्रिपाठी एवं आ. श्रीकृष्ण शर्मा ने स्वस्ति-वाचन से और सुश्री अंजलि ने प्रशस्ति-वाचन से गरिमा प्रदान की। सम्मानित विभूतियों ने अपने स्वीकृति-वक्तव्य में पंडित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व को याद किया।

विशिष्ट अतिथि प्रोफेसर अनंत कुमार त्यागी ने साहित्य के प्रति आज की पीढ़ी के आकर्षण के लिए नए रास्तों के अन्वेषण और ज्ञान के विविध अनुशासनों के समन्वय की आवश्यकता बताई। श्री अशोक तिवारी ने कहा कि आचार्य विद्यानिवास मिश्र को याद करना संपूर्ण भारतीयता को याद करना है। प्रो. रजनीश शुक्ल ने बताया कि जो ज्ञान पंडित जी से मिला है वह गुरु-ऋण है, और उस ज्ञान को अगली पीढ़ी तक स्थानांतरित करके ही उसे चुकाया जा सकता है। उन्होंने रचनावाली को डॉ. दयानिधि मिश्र एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र के श्रम, स्वाध्याय और निष्ठा का प्रतिफल बताया। मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए उत्तर प्रदेश के राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री दयाशंकर मिश्र (दयालु) ने विद्याश्री न्यास के विभिन्न उपक्रमों को काशी के साहित्यिक-सांस्कृतिक जीवन की सकारात्मकता के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि पूज्य मिश्र जी के लेखन के संस्पर्श से मुझे आत्मीय सुख मिलता रहा है। हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भारतीय इतिहास-बोध के संदर्भ में भी इसके अध्ययन की आवश्यकता बताई। इस तरह के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों की निर्बाध निरंतरता बनी रहे, इसके लिए एक सभागार के निर्माण हेतु राज्यमंत्री ने अपनी निधि से ₹ 25 लाख देने की बात कही। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री सुरेंद्र दुबे ने कहा कि विद्यानिवास जी का सानिध्य पाना लोक और वेद से गुजरना है। भारत जीवंत अतीत को याद करता है और यह परंपरा से ही संभव है। यह सनातन परंपरा ही है जो नित्य नूतनता का आकांक्षी रहा है। सनातन एक जीवंत वर्तमान है और पंडित जी इसी जीवंत वर्तमान की खोज करते हैं। ‘परंपरा बंधन नहीं’ में पंडित जी कहते हैं, “परंपरा हमारी ऊर्जा का स्रोत है हमारी सांस्कृतिक चेतना का द्योतक है इसलिए कालजयी है।” हिंदी साहित्य के उदयकाल की चर्चा करते हुए उन्होंने भाषा की प्रकृति और उसके विकास-क्रम को समझने में भी इस काल के साहित्य-आधारित अध्ययन को उपयोगी बताया। प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने इस सत्र के सुधीजन के साथ ही इस वृहत् रचनावली को साकार करने वाले समस्त सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उद्घाटन सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।

दूसरा, अकादमिक सत्र बीज वक्तव्य के साथ ही सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य पर केंद्रित था। बीज वक्तव्य के रूप में प्रो. चितरंजन मिश्र (गोरखपुर) ने उदय काल नाम की सार्थकता एवं उसके महत्व पर विस्तृत चर्चा करते हुए कहा कि इस नाम में सृजनात्मकता है । इसमें 8वीं से लेकर 14वीं शताब्दी तक की उन सभी प्रवृत्तियों को सम्मिलित किया जा सकता है, जो सरहपा से लेकर कबीर तक पहुँचती हैं और ‘देसिल बयना सब जन मिठ्ठा’ के विश्वास में व्यक्त होती हैं। इस काल के साहित्य को धार्मिक और लौकिक में हम अपनी सुविधा से बाँट लेते हैं लेकिन वस्तुतः वह लोक-वाणी ही है। संवेदना के स्तर पर इस काल की कविता कट्टरता का विरोध करती है । उन्होंने सिद्ध, नाथ, जैन साहित्य, रासो काव्य और खुसरो, विद्यापति के उदाहरणों से उन प्रवृत्तियों को रेखांकित किया जिन्होंने भक्ति, रीति और आधुनिक काल तक को प्रभावित किया। समारोह के विशिष्ट अतिथि श्री देवेंद्र प्रताप सिंह (सचिव, हिंदुस्तानी एकेडेमी, प्रयागराज) ने उदयकाल के स्रोत के रूप में अपभ्रंश से लेकर संस्कृत साहित्य तक का विश्लेषण प्रस्तावित किया। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस समय में संस्कृति और साहित्य का संरक्षण भी हमारा एक प्रमुख दायित्व है। प्रो. प्रभाकर सिंह (वाराणसी) ने कहा कि उदयकाल देशी भाषाओं की बहुलता का सृजनकाल है, यह जितना लिखित है उतना ही वाचिक है और साहित्येतिहास-लेखन में इसका खयाल रखना जरूरी है। डाॅ. सतीश पाण्डेय (मुंबई) ने नाथ और नाथ संप्रदाय की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए सिद्ध किया कि गोरखनाथ साधक योगी ही नहीं, दार्शनिक, धर्मपथ-प्रदर्शक, युगद्रष्टा रचनाकार और सामाजिक क्रांति के प्रणेता हैं। डाॅ. अवधेश शुक्ल (वर्धा) ने गोरख और गोरख-वाणी के अखिल भारतीय प्रसार और प्रभाव पर प्रकाश डाला। डाॅ. दिनेश पाठक (मुंबई) ने सिद्ध साहित्य के उन सामाजिक-साहित्यिक प्रदेयों की चर्चा की जिनका पल्लवन आगे चलकर संतकाव्य में भी हुआ। अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. अनंत मिश्र (गोरखपुर) ने उदयकाल की पाठ-संबंधी समस्याओं को रेखांकित करते हुए कहा कि पाठ बहुत सीमित हैं, अत : मूल पाठों की ओर पुनः-पुनः लौट कर पाठों के अध्ययन पर विशेष बल देना चाहिए। प्रारंभिक साहित्य के पाठों को तय कैसे करें, इसका निर्णय भी हमें बहुत सावधानी से करना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि कर्म और श्रम के बीच जो अलौकिक और रहस्य की बात करते हैं उनका ज्ञान अधिक श्रेष्ठ है और भारतीय वैचारिकी का यह भी एक महत्त्वपूर्ण प्रकार है। उदय काल में अध्यात्म एक तरह से लोकतांत्रिक हुआ और साहित्य जड़ता से सूक्ष्मता की ओर स्पंदित हुआ। इस सत्र का संयोजन प्रो. श्रद्धानंद (वाराणसी) ने किया।

तीसरे सत्र में श्री विश्वास पाटिल ( शहादा, महाराष्ट्र) की अध्यक्षता में उदयकाल के लौकिक साहित्य पर विचार किया गया। डाॅ. मनीषा खटाटे (नासिक) ने साहित्य और संगीत के क्षेत्र में अमीर खुसरो के योगदान की चर्चा करते हुए उन्हें भारतीय लोक की अपनी आवाज के रूप में रेखांकित किया। प्रो. भारती गोरे (औरंगाबाद) ने खुसरो-कृत ‘खालिक बारी’ से संबंधित तमाम विवादों की पड़ताल करते हुए उसके वैशिष्ट्य को उजागर किया। डाॅ. विनीता कुमारी (दिल्ली) ने एक प्रेमकाव्य, विरहकाव्य और संदेशकाव्य के रूप में अब्दुल रहमान के ‘संदेश रासक’ के निजी वैशिष्ट्य को प्रकट किया। यह अवधारणा ही कि यह काव्य न मूर्ख के लिए है, न पंडित के लिए, उनके लिए है जो इनके बीच के हैं, ‘मझ्ययार’ हैं, अपने आप में विलक्षण है। प्रो. अवधेश प्रधान ने विद्यापति के उस व्यक्तित्व और काव्यत्व पर प्रकाश डाला जो उनकी कीर्तिलता जैसी कृति से व्यक्त होती है। इस कृति के आधार पर कहा जा सकता है कि विद्यापति न सिर्फ भक्ति और शृंगार के कवि हैं, बल्कि कविता में यथार्थवादी धारा की शुरुआत भी उन्हीं से होती है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में श्री विश्वास पाटिल ने सभी वक्तव्यों को समेटते हुए उदयकाल के लौकिक साहित्य पर नाथ साहित्य के प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष प्रभावों का व्याख्यान किया। इस सत्र का संचालन डाॅ. बिजेन्द्र पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।

चौथा सत्र भोजपुरी-हिंदी के सुप्रसिद्ध, सर्वप्रिय कवि पं. हरिराम द्विवेदी की स्मृति काव्य-संध्या के रूप में प्रो. वशिष्ठ अनूप की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि डाॅ. जितेन्द्र नाथ मिश्र और विशिष्ट अतिथि प्रो. बलिराज पाण्डेय की उपस्थिति तथा डाॅ. अशोक सिंह के संयोजन में संपन्न हुआ। कवि-गोष्ठी का शुभारंभ पं. हरिराम द्विवेदी के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। उपर्युक्त के अतिरिक्त सर्वश्री गिरिधर करुण, कवीन्द्र नारायण, लियाकत अली, रचना शर्मा, नागेश त्रिपाठी शांडिल्य, सूर्य प्रकाश मिश्र, धर्मेंद्र गुप्त साहिल, गौतम अरोड़ा सरस, सिद्धनाथ शर्मा, सविता सौरभ, नसीमा निशा, ब्रजेश चंद्र पाण्डेय, करुणा सिंह, संगीता श्रीवास्तव, गिरीश पाण्डेय, वेद प्रकाश पाण्डेय आदि ने हरि भैया को श्रद्धांजलि के रूप में अपनी कविताओं के पाठ से आयोजन के पहले दिन को एक सांस्कृतिक गरिमा प्रदान की।

आयोजन के दूसरे दिन की शुरुआत पाँचवे सत्र के रूप में रासो-परंपरा पर बातचीत से हुई। सर्वश्री सत्येंद्र शर्मा (सतना) ने पृथ्वीराज रासो, नरेंद्र नारायण राय (वाराणसी) ने बीसलदेव रासो, वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने परमाल रासो, राम सुधार सिंह (वाराणसी) ने विजयपाल रासो, प्रकाश उदय (वाराणसी) ने हम्मीर रासो और अंजलि अस्थाना ने राम रासो के कथ्य और उनसे जुड़े तथ्यों की छानबीन की। रासो के मूल पाठ की अनुपलब्धता या अल्प उपलब्धता, प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता की समस्या को सभी ने अपनी-अपनी तरह से संबोधित किया। यह भी प्रायः सभी ने महसूस किया कि रासो काव्यों ने अतिजनप्रियता पाई, इस वजह से भी काफी कुछ इनके पाठ में जुड़ता और छूटता रहा है, और इस क्रम में इनकी ऐतिहासिकता और प्रामाणिकता क्षतिग्रस्त हुई। इसके चलते इन रचनाओं के काव्यगत वैशिष्ट्य भी उपेक्षा के शिकार हुए। इस विमर्श में डाॅ. दयानिधि मिश्र ने ‘हिंदी साहित्य का उदयकाल’ पुस्तक के संपादन के क्रम में रासो-ग्रंथों पर आलेख एकत्र करने की कठिनाइयों के अनुभवों को साझा करते हुए इस तरफ सुधीजन का ध्यान आकर्षित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने साहित्येतिहास-लेखन के विभिन्न प्रयत्नों का उल्लेख करते हुए आदिकाल के संदर्भ में शोध-अध्ययन में शिक्षकों-शोधार्थियों की अरुचि के प्रति चिंता जाहिर की। इस सत्र का समन्वय प्रो. गोरखनाथ पाण्डेय (वाराणसी) ने किया।

छठा सत्र प्रो. दिलीप सिंह की अध्यक्षता में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान के रूप में आयोजित किया गया। ‘हिंदी के उदयकाल का अवदान’ विषय पर केंद्रित इस व्याख्यान को इस काल के विश्रुत विद्वान श्री ब्रजेंद्र कुमार सिंघल ने प्रस्तुत किया। उन्होंने हिंदी साहित्य के आदिकाल के लिए उदयकाल नाम को अधिक सार्थक और इस आयोजन की एक लब्धि के रूप में रेखांकित किया। इस संज्ञा की तरफ संकेत करने वाले पं. विद्यानिवास मिश्र के संबंध में उन्होंने कहा कि ‘आदि’ की जगह ‘उदय’ की बात वे इसलिए भी कर सके कि परंपरा और आधुनिकता दोनो को वे भारतीय संदर्भ में समझते हैं, लोक और शास्त्र दोनो में उनकी अबाध आवाजाही है, वे सर्जनात्मक समीक्षा को ‘रीति विज्ञान’ में निरूपित कर सकते हैं, ‘हिंदी की शब्द-संपदा’ को वे लोकजीवन में तलाश सकते हैं। इस काल के विभिन्न आयामों के संदर्भ में भारत भर में अब तक हुए और अभी भी चल रहे शोध-समीक्षा के प्रयत्नों का भी उन्होंने एक रोचक विवरण प्रस्तुत किया और उदयकालीन साहित्य की प्रामाणिकता पर संदेह के कई मिथकों को सप्रमाण निरस्त किया। उन्होंने दिखाया कि कैसे उदयकाल का साहित्य अपने पूर्ववर्ती साहित्य के प्रदेयों को धारे हुए है और कैसे उसके अपने प्रदेयों को उसके उत्तरवर्ती रचना-कर्म ने धारण किया, न सिर्फ धारण किया बल्कि विस्तृत किया, उच्चतर आयामों तक पहुँचाया। प्रो. इन्दीवर (वाराणसी) ने हिंदी भाषा और हिंदी साहित्य दोनो की विकास-रेखा को उत्तर अपभ्रंश से लेकर अद्यावधि निरूपित किया। सिद्ध, नाथ और संत साहित्य के सम-विषम आयामों को उन्होंने विशेषतः विश्लेषित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. दिलीप सिंह (अमरकंटक) ने कहा कि भाषा, साहित्य और संस्कृति के सरोकार जन-जन से जुड़े हुए हैं, और इसलिए इन्हें लेकर हम सिर्फ सरकारों से सक्रियता की अपेक्षा रखें यह उचित नहीं है। उन्होंने उदयकाल के गद्य साहित्य के संदर्भ में संक्षेप में ही, लेकिन एक गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया और इस दिशा में शोध के विविध आयामों की तरफ संकेत किए। पृष्ठभूमि के रूप में संस्कृत और अपभ्रंश के गद्य-सामर्थ्य के विवेचन के साथ ही गद्य के क्षेत्र में अवहट्ठ और दक्खिनी की सक्रियता का रोचक विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया। उन्होंने ज्ञान-क्षेत्र से आबद्ध प्रणालियों का उपयोग करते हुए उदयकाल के गद्य साहित्य के नए सिरे से पाठ-विश्लेषण के लिए प्रेरित किया। इस सत्र का संयोजन डाॅ. रचना शर्मा (वाराणसी) ने किया।

आयोजन का सातवाँ सत्र उदयकाल के विविध आयामों और प्रवृत्तियों पर केंद्रित था। प्रो. अशोक नाथ त्रिपाठी (वर्धा) ने सम्यक साहित्येतिहास-लेखन के लिए उदयकाल के भाषायी और साहित्यिक अंतर्विरोधों पर विशेष ध्यान देने की जरूरत पर बल दिया। डाॅ. राजेंद्र खटाटे (नासिक) ने भाषा, साहित्य, संस्कृति, समाज और धर्म-अध्यात्म — प्रत्येक संदर्भ में राष्ट्र के ऐतिहासिक स्मरण में इस काल की उपादेयता सिद्ध की। प्रो. उमापति दीक्षित (आगरा) ने उदयकाल से जुड़ी अनुसंधान-संबंधी समस्याओं पर प्रकाश डाला, प्रो. सुमन जैन ने उदयकाल की भावभूमि को ऐतिहासिक संदर्भों के साथ तथा प्रो. अखिलेश कुमार दुबे (वर्धा) ने उदयकाल की विभिन्न प्रवृत्तियों को स्पष्ट किया। प्रो. माधवेंद्र पाण्डेय (शिलांग) ने भारतीय सांस्कृतिक समन्वय के आदिग्रंथ पुष्पदंत के महापुराण का विशेष संदर्भ लेते हुए किसी भी पंथ या विचार-दर्शन की प्रासंगिकता को तय करने की भारतीय पद्धति की पहचान के यत्न किए। महापुराणकार जैन मान्यताओं को ही नहीं, अपने पूरे युग को वाणी प्रदान करता है, काव्य-कला के नए मानक गढ़ता है। इस सत्र का समन्वय डाॅ उदय प्रताप पाल (आजमगढ़) ने किया।

इस राष्ट्रीय संगोष्ठी के तीसरे दिन के कार्यक्रम — युवा संवाद, पुरस्कार-वितरण एवं समापन-समारोह — लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, चंदौली के पं. पारसनाथ तिवारी नवीन परिसर के सभागार में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय (पूर्व संकायाध्यक्ष, का.हि.वि.वि.) की अध्यक्षता, मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. राजाराम शुक्ल (पूर्व कुलपति, सं.सं. विश्वविद्यालय, वाराणसी) और विशिष्ट अतिथि के रूप में डाॅ. शशिकला पाण्डेय ( पूर्व आचार्य, म.गां. काशी विद्यापीठ, वाराणसी) की उपस्थिति में संपन्न हुए। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती, पं. विद्यानिवास मिश्र और महाविद्यालय के संस्थापक पं. पारसनाथ तिवारी के चित्र पर माल्यार्पण और डाॅ. ध्रुव पाण्डेय द्वारा स्तोत्र-पाठ से हुआ। महाविद्यालय के यशस्वी प्राचार्य प्रो. उदयन मिश्र ने अतिथियों एवं उपस्थित सुधीजन का स्वागत किया। इस अवसर पर विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजयी प्रतिभागियों को मंचस्थ अतिथियों ने पुरस्कृत किया। निबंध-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार मदालसा मणि त्रिपाठी (अरुणाचल प्रदेश) को, कविता-प्रतियोगिता का प्रथम पुरस्कार अरुणाचल प्रदेश की ही कागो मादो को तथा द्वितीय और तृतीय पुरस्कार लाल बहादुर शास्त्री महाविद्यालय के क्रमशः क्षितीश्वर और नीतू पटेल को ; आलेख-प्रतियोगिता का प्रथम, द्वितीय, तृतीय पुरस्कार इसी महाविद्यालय की क्रमशः नेहा कुमारी, संजना कुमारी और सुषमा चौहान को प्रदान किया गया। कागो मादो ने अपने काव्य-पाठ के साथ ही वाराणसी के अपने अनुभवों के व्याख्यान से भी प्रभावित किया। पूर्वोत्तर से आए डाॅ. आलोक सिंह ने पुष्पदंत के महापुराण पर केंद्रित अपने शोध-आलेख का प्रभावपूर्ण पाठ किया।

प्रो. ब्रजेंद्र कुमार सिंघल (नई दिल्ली) ने युवा अध्यापकों और छात्र-छात्राओं से आत्मीय संवाद स्थापित करते हुए कहा कि उत्कृष्ट रचनाशीलता के लिए अध्ययन और लेखन में गंभीरता जरूरी है। किसी भी रचना के निहितार्थ तक पहुँचने के लिए, जिस परिवेश में उसकी रचना हुई, इसे, और इतिहास से उसके रिश्ते को समझना चाहिए। डाॅ. वीरेंद्र निर्झर (बुरहानपुर) ने विद्यार्थियों के लिए एकाग्रता और स्व-अनुशासन के महत्त्व और उसके सामने मौजूद समकालीन चुनौतियों पर प्रकाश डाला। कवि-कथाकार डाॅ. मुक्ता ने आचार्य शुक्ल की काव्य-संबंधी मान्यताओं को उद्धृत करते हुए अपने व्यावहारिक अनुभवों के आधार पर रचनाधर्मिता और रचना-प्रक्रिया की सूक्ष्मताओं से परिचित कराया। विशिष्ट अतिथि डाॅ. शशिकला पाण्डेय ने कहा कि किसी भी क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि के लिए शार्ट कट जैसी कोई प्रविधि नहीं है। एक गहरी संलग्नता और परिश्रम से पीछे न हटने वाला जो स्वभाव एक भारतीय किसान का है वही हमारे शिक्षार्थियों के लिए भी अपेक्षित है। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने महाविद्यालय के प्रबंधन, शिक्षक-समुदाय, शिक्षार्थियों और शिक्षणेतर कर्मचारियों के उस सम्मिलित प्रयास की सराहना की जिसके चलते न सिर्फ गंभीरतर विषयों पर विचार-विमर्श की निरंतरता कायम हुई है, बल्कि उसके उपयुक्त परिस्थितियाँ भी निर्मित हुई हैं। उन्होंने कहा कि ज्ञान का आदि-अंत नहीं होता, देश-काल के अनुरूप उसके विभिन्न आयामों का नए-नए सिरे से उदय अवश्य होता रहता है। मुख्य अतिथि प्रो. राजाराम शुक्ल ने पं. विद्यानिवास मिश्र के विषम, विपुल और सतत सृजन-कर्म से प्रेरणा लेते हुए स्वयं को सर्वतोभावेन सशक्त करने की सीख दी। उन्होंने उदयकाल के प्रवृत्ति-वैविध्य को उसके वैशिष्ट्य के रूप में रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रीनिवास पाण्डेय ने उदयकाल की राजनीतिक दृष्टि से अतिशय विपन्न स्थिति में भी भारतीय मनीषा और भावबोध को शिखरस्थ रखने के लिए तरह-तरह से यत्नशील साहित्य-साधकों के युग के रूप में याद किया। प्रबंधक श्री राजेश कुमार तिवारी ने महाविद्यालय की तरफ से अतिथियों के प्रति आभार-प्रदर्शन के साथ ही इस तरह के सारस्वत आयोजन की निरंतरता के बने रहने की कामना भी की। इस सत्र का संयोजन प्रो. इशरत जहाँ ने किया।

डाॅ. दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास

पं. विज्ञानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2023 को आयोजित संस्कृत कवि-गोष्ठी

विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं श्रमण विद्या संकाय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2023 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में संस्कृत कवि सम्मान, पं. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन सं. सं. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी की अध्यक्षता तथा मुख्य अतिथि के रूप में सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गोपबंधु मिश्र एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र के सारस्वत सानिध्य में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, आ. लेखमणि त्रिपाठी के मंगलाचरण, बौद्ध दर्शन विभाग के बौद्ध मंगलाचरण, मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा विद्याश्री न्यास एवं श्रद्धानिधि न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर 2021, 2022 एवं 2023 के पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान से क्रमशः प्रो. कौशलेन्द्र पाण्डेय, प्रो. उपेन्द्र पाण्डेय तथा डाॅ. गायत्री प्रसाद पाण्डेय को मंचस्थ अतिथियों ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। इसी क्रम में इस वर्ष संस्कृत विद्या युवा प्रतिभा सम्मान से पं. ऋषि कुमार द्विवेदी को और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से विशिष्ट पुरस्कार-प्राप्त प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. धर्मदत्त चतुर्वेदी तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सौहार्द सम्मान-प्राप्त प्रो. पवन कुमार शास्त्री को भी सम्मानित किया गया। सम्मान-समारोह में प्रशस्ति-पत्र का वाचन प्रो. चंद्रकांता राय ने तथा शंखध्वनि एवं स्वस्ति-वाचन डाॅ. जयेन्द्रपति त्रिपाठी ने किया।

पं. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘कवि-समय का प्रवाह’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में प्रो. गोपबंधु मिश्र ने ‘कवि-समय’ या ‘कवि-प्रसिद्धि’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसके काव्यशास्त्रीय ही नहीं समाजशास्त्रीय पक्षों को भी निरूपित किया। काल-प्रवाह में कवि-प्रसिद्धियों की सुदीर्घ यात्राएँ जीवन में, और जीवन के लिए, विश्वास के बल को ही नहीं ; तर्क की, निरर्थकता को भी बखानती हैं, और सबसे बड़ी बात है कि वे इसे विद्या-बल से नहीं, अपने रचनात्मक पराक्रम से संपन्न करती हैं। उन्होंने कवि-प्रसिद्धियों के तमाम प्रकारों और प्रकरणों का उल्लेख करते हुए कवि-कर्म में शामिल उन घटकों की भी चर्चा की, जिन्हें हम आम तौर पर कवि-समय के तौर पर न जानते हैं, न मानते हैं, लेकिन जिनका मूल चरित्र बहुधा और बहुलांश में वही है। ध्यातव्य है कि प्राकृतिक उपादानों से मानवीय रिश्ते कायम करने की परंपरा हमारे यहाँ अद्यावधि अबाधित है। विद्वान वक्ता ने इन कवि-समयों को तमाम भाषिक भिन्नताओं के रहते भारत की सांस्कृतिक एकता की पहचान के रूप में भी प्रस्तावित किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने विभिन्न कवियों द्वारा एक ही कवि-समय के वैविध्यपूर्ण रचनात्मक उपयोग का सोदाहरण महत्त्वांकन करते हुए बताया कि कवि-प्रसिद्धियों को नित्य नूतन किए रखने की इस प्रविधि ने ही उन्हें काल-प्रवाह में निरन्तर उपस्थित रखा है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने सबका समाहार करते हुए इस सारस्वत आयोजन को पं. विद्यानिवास मिश्र के वैदुष्य के अनुरूप बताया। विगत अठारह वर्षों से नियत तिथि को अनवरुद्ध चल रही यह संस्कृत काव्य-गोष्ठी अपने ढंग की अकेली भी है, अनूठी भी। उन्होंने स्मृति व्याख्यान के लिए कवि-समय के प्रवाह जैसे अत्यल्प-चर्चित विषय के चयन की भी प्रशंसा की और इस विषय के कुछ अछूते आयामों की तरफ भी संकेत किए।

संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत युवा कवियों के अतिरिक्त सर्वश्री कौशलेन्द्र पाण्डेय, उपेन्द्र पाण्डेय, गायत्री प्रसाद पाण्डेय, पवन कुमार शास्त्री, चंद्रकांता राय, विवेक कुमार पाण्डेय, उमाकांत चतुर्वेदी, कमला पाण्डेय, कमलाकांत त्रिपाठी, धर्मदत्त चतुर्वेदी, विजय कुमार पाण्डेय, शिवराम शर्मा, सदाशिव कुमार द्विवेदी, मनुलता शर्मा आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया। इस आयोजन के कुशल संयोजन और संचालन प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय ने किया।

सर्वश्री प्यारेलाल पाण्डेय, गोविन्द त्रिपाठी, गोविन्द मिश्र, अशोक सिंह, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल,पद उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, प्रकाश उदय, प्रतीक त्रिपाठी एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।

मध्यकालीन कविता : अवधारणाओं का पुनराविष्कार तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर 14-16 जनवरी 2023

मध्यकालीन कविता : अवधारणाओं का पुनराविष्कार
तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर
14-16 जनवरी 2023

14 जनवरी 2023 को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ ; साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ; लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, दीनदयाल उपाध्याय नगर, चंदौली और विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में श्री धर्मसंघ शिक्षामंडल सभागार में ‘मध्यकालीन कविता : अवधारणाओं का पुनराविष्कार’ विषय पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर का उद्घाटन अध्यक्ष प्रो. हरेराम त्रिपाठी, कुलपति, सं. सं. विश्वविद्यालय, वाराणसी ; मुख्य अतिथि माननीय दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’, राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश शासन और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की संपादक डाॅ. अमिता दुबे, विद्याश्री न्यास के न्यासी श्री अरुणेश नीरन, पूर्व प्राचार्य, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर एवं श्री गिरीश्वर मिश्र, पूर्व कुलपति, म. गां. अं. हिं. विश्वविद्यालय, वर्धा द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्र पर माल्यार्पण, आचार्य जयेन्द्रपति त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, आचार्य मृत्युंजय त्रिपाठी के घनपाठ, श्री उमापति दीक्षित, आचार्य, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के वैदिक पौराणिक मंगलाचरण एवं पूर्वोत्तर से पधारी सुश्री बीजोमोनी बोरा के बिहू नृत्य के साथ हुआ। आयोजक-मंडल की तरफ से डाॅ. अमिता दुबे ने अतिथियों का भावभीना स्वागत किया। मंचस्थ अतिथियों ने संभावना कलामंच के शिल्पी श्री राजकुमार की स्मृति को समर्पित कला-प्रदर्शनी के साथ ही न्यास के आयोजनों पर आधृत पुस्तकों ‘प्रमुख भारतीय भाषाएँ : समकालीन प्रवृत्तियाँ’ एवं ‘मध्यकालीन कविता : सृजन के नए आयाम’, न्यास की शोध-पत्रिका ‘चिकितुषी’ 2023, पं. विद्यानिवास मिश्र रचनावली (21 खंड) के आवरण-चित्र, प्रो. मंजुला चतुर्वेदी की कविता-पुस्तक ‘एक उम्मीद है दिये की तरह’ एवं श्री धर्मेन्द्र सिंह की पुस्तक ‘भारत-विभाजन और कश्मीर’ को भी लोकार्पित किया। न्यास की तरफ से प्रतिवर्ष प्रदान किए जाने वाले सम्मानों के क्रम में मंचस्थ अतिथियों एवं न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने इस वर्ष के आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान से हिन्दी-तमिल भाषा-साहित्य के सेतु-पुरुष श्री एम. गोविंद राजन को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से प्रख्यात बिरहा-गायक श्री मन्नू यादव को, आचार्य विद्यानिवास मिश्र पत्रकारिता सम्मान से निर्भीक, नवोन्मेषी पत्रकार श्री धर्मेन्द्र सिंह को तथा श्री कृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री हीरालाल मिश्र ‘मधुकर’ को उत्तरीय, नारियल, पंचमाला, पंचपुस्तक, प्रशस्तिपत्र, प्रतीक-चिह्न और सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। स्वास्थ्य कारणों से लोककवि सम्मान से सम्मानित हिंदी-भोजपुरी के कवि-कथाकार श्री अनिल ओझा नीरद समारोह में उपस्थित नहीं हो पाए, लेकिन सौभाग्य से वर्ष 2022 के आचार्य विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान से प्रसिद्ध गांधीविद श्री विश्वास पाटील और लोककवि सम्मान से भोजपुरी के ललित कवि श्री रविकेश मिश्र को भी इस मंच से सम्मानित करने का अवसर मिला। सम्मान-समारोह को आचार्य श्रीकृष्ण शर्मा ने शंख-ध्वनि से और आचार्य जयेन्द्रपति त्रिपाठी ने स्वस्ति-वाचन से गरिमा प्रदान की। अपने प्रस्तावना-भाषण में श्री अरुणेश नीरन ने अवधारणाओं के पुनराविष्कार के संदर्भ में मध्यकालीन कविता के विविध पक्षों पर पुनः-पुनः विमर्श की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। प्रो. आनंदवर्धन, निदेशक, स्टाफ एकेडमिक काॅलेज, बीएचयू ने स्मृति-संवाद के अंतर्गत पंडितजी से जुड़े उन प्रसंगों को याद किया जिनसे भाषा-साहित्य और सभ्यता-संस्कृति को देखने-परखने के नजरिए को विस्तार मिला। मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए राज्यमंत्री डाॅ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ने कहा कि विद्याश्री न्यास के इस कार्यक्रम में आकर खुद को गौरवन्तित महसूस कर रहा हूँ क्योंकि काशी की पहचान विद्वानों व कलाकारों से है। उन्होंने मध्यकालीन कविता के उस हिस्से का विशेष उल्लेख किया जो काशी से जुड़ा रहा है। कहा कि कबीर, रैदास और तुलसी मध्यकाल की कविता ही नहीं काशी की भी पहचान हैं। विशिष्ट अतिथि श्री राजेश कुमार गौतम ने विमर्श के विषय-चयन के साथ ही साहित्य, संगीत और कला से सम्बंधित विद्वानों के सतत सम्मान के लिए न्यास की प्रशंसा की। दूसरे विशिष्ट अतिथि पद्मश्री कमलाकर त्रिपाठी ने कहा कि एक चिकित्सक के रूप में उनके पास पंडित जी से दुख की भाषा में संवाद का अनुभव है। मध्यकाल की कविता भी एक तरह से इसी दुख की भाषा का संवाद है, और शायद इसीलिए वह मातृभाषा में है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सम्पूर्णनंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने कहा कि विद्याश्री न्यास के द्वारा समाज के लिए नवाचार के सतत अन्वेषण का जो क्रम चल रहा है उसको शब्दों में नहीं बाँधा जा सकता। उन्होंने प्रभु और प्रेम को समर्पित मध्यकालीन कविता को मनुष्यता के विस्तार की कोशिश के रूप में रेखांकित किया। तुलसी की रामकथा में मनुष्य ही नहीं, बानर-भालू भी आदर पाते हैं , सब जीवों के प्रति राम में दया का बराबर भाव है। तुलसी वर्ण व्यस्थावादी थे लेकिन उनका वर्णव्यवस्थावाद जातिवाद का पर्याय नहीं है। वह समाज के नियमन और अनुकूलन के लिए मार्ग प्रशस्त करता है। धन्यवाद-ज्ञापन के क्रम में प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने और सत्र के संयोजन-संचालन के क्रम में डाॅ. रामसुधार सिंह ने विमर्श के आगामी सत्रों के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण सूत्रों की तरफ संकेत किए।

दूसरा सत्र पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान के रूप में ‘मध्यकालीन कविता की भावभूमि’ पर केंद्रित रहा। मुख्य वक्ता श्री श्याम सुंदर दुबे ने अपने विस्तृत व्याख्यान में बताया कि कैसे भक्ति के क्षेत्र में करुणा का भाव प्रेम से तादात्म्य कर मानव-जाति को ईश्वर के निकट करता है, कैसे इस काल में व्यक्ति-बोध की सीमित रेखाएँ धूमिल पड़ जाती हैं और कैसे भक्तिकाल से रीतिकाल तक प्रेम कितने-कितने रूपों में लोक-प्रसार पाता है, लौकिक से अलौकिक और अलौकिक से लौकिक धरातल तक की यात्राएँ करता है। इसी सत्र में बीज वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. चितरंजन मिश्र ने इस उल्लेख के साथ कि लोहिया ने संस्कृत कविता को महत्त्वपूर्ण कविता और भक्तिकाल की कविता को महान कविता के रूप में रेखांकित किया था, बताया कि मध्यकाल ने जाने कितनी जटिल अवधारणाओं को सहज किया, जनसाधारण की समझ के मुताबिक किया और जीव-जीवन-जगत के लिए जरूरी जाने कितने सूत्रों का संधान किया। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ने कहा कि साहित्य के साथ आदिकालीन, मध्यकालीन जैसे विशेषण अध्ययन की सुविधा मात्र के लिए है, वस्तुतः उसकी भावभूमि सदा एक ही रही है, और वह है मुष्यता की भावभूमि जिसे चहुँओर से चुनौतियाँ मिलती रहती हैं, कविता इन्हीं चुनौतियों से टकराती है और मध्यकाल की कविता संभवतः सबसे बेहतर तरीके से टकराती है। इस सत्र का संचालन विदुषी डाॅ. शशिकला पांडेय ने किया।

तीसरा सत्र कबीर, रैदास, जायसी और दादू पर केंद्रित रहा। डाॅ. वंदना मिश्र ने मध्यकाल की स्त्री-चेतना और उस काल में मौजूद कविता के स्त्री स्वर के वैशिष्ट्य को रेखांकित किया। मीरां जैसे स्त्री कवियों के कथ्य ही नहीं उनकी भाषा में भी स्त्री के होने और बोलने को महसूस किया जा सकता है। प्रो. अखिलेश कुमार दुबे ने बताया कि कैसे कबीर ने सामान्य जन को अभय का मंत्र देकर उन्हें अमरत्व का बोध कराया, शास्त्र के गूढ़ सत्य को जनसुलभ बनाया और मनुष्यता की रक्षा के यज्ञ में एक बड़ी भूमिका निभाई। डाॅ. सत्यप्रिय पांडेय ने कहा कि जायसी ने अपने लोकसंग्रह की शक्ति का प्रमाण देते हुए कहावतों के इस्तेमाल से जीवन का समाजशास्त्र उद्घाटित किया है। ऐसा लगता है जैसे वे अवधी कहावतों का इनसाइक्लोपीडिया तैयार कर रहे हों। कवि-आलोचक इन्दीवर ने निर्गुणपंथ की उन विशेषताओं की विशेषतः चर्चा की जो सगुणपंथ से उसकी कथित दूरियों की अवधारणा को खारिज करती हैं। प्रो. बलराज पांडेय ने रैदास के संदर्भ में कहा कि उनकी वाणी में एक निर्मल मिठास है। वे ढपोर संस्कृति के विरुद्ध ढोर संस्कृति को महत्त्व देते हैं। दूसरे संत कवियों से भिन्न स्त्री के प्रति उनकी कविता में अवहेलना का भाव नहीं है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. त्रिभुवननाथ शुक्ल ने बताया कि संत साहित्य अद्वैत की जड़ता को तोड़ता है। संत न तो अभाव में जीता है न प्रभाव में, वह स्वभाव में जीता है। उसका यह स्वभाव देशभाव है, मनुष्यभाव है, संस्कृतिभाव है। संत इन सबका साकार विग्रह है। इस सत्र का संयोजन संत साहित्य के मर्मज्ञ डाॅ. बिजेंद्र पांडेय ने किया।

चौथा सत्र कवि-सम्मेलन के रूप में आयोजित हुआ। इसकी अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश और ख्यात कवि श्री चन्द्रभाल सुकुमार ने की, संयोजन किया प्रसिद्ध गीतकार श्री अशोक सिंह ने। जिन कवियों के सधे हुए काव्यपाठ ने श्रोताओं को मंत्र-मुग्ध किया, उनमें प्रमुख हैं सर्वश्री हरिराम द्विवेदी, गिरिधर करुण, वशिष्ठ अनूप, सुरेन्द्र वाजपेयी, शिव कुमार पराग, ब्रजेश पांडेय, धर्मप्रकाश मिश्र, धर्मेन्द्र गुप्त साहिल, मंजरी पांडेय, सिद्धनाथ शर्मा, सविता सौरभ, अखिलेश कुमार दुबे, बृजेन्द्र कुमार द्विवेदी शैलेश, अशोक कुमार सिंह, ब्रजेश चंद्र पांडेय, घायल, दीपंकर भट्टाचार्य, ऋचा शुक्ल आदि।

आयोजन के दूसरे दिन 15 जनवरी 2023 को सूर, तुलसी, मीरा, नन्ददास, रहीम रसखान और केशव पर केंद्रित पाँचवे सत्र की अध्यक्षता प्रो. दिलीप सिंह ने की। डॉ. नीलम सिंह ने मीरां को विभिन्न पंथों के विवादी स्वरों को समरस करने वाली रागिनी के रूप में रेखांकित किया। डाॅ. प्रेमशीला शुक्ल ने रामराज्य की अवधारणा स्पष्ट करते हुए कहा कि राम विवेक को राजधर्म का मूल मानते हैं, रामराज्य प्रेम का राज्य है, जिसमें समस्त प्रजा विषमता खोकर परस्पर प्रेम की डोर से बँधी है। रामराज्य शासनमुक्त शासन है। प्रो. माधवेन्द्र पांडेय ने केशव का संदर्भ लेते हुए कहा कि उनका मूल्यांकन कुछ बड़े आलोचकों की उद्गारपरक टिप्पणियों और तुलसीदास जैसे महान कवि से तुलना का शिकार हुआ है। उन्होंने केशव पर बातचीत के लिए कविप्रिया और रसिकप्रिया को रामचंद्रिका की तुलना में बेहतर विकल्प बताया। डाॅ. सतीश पांडेय ने रहीम के काव्य-वैभव की चर्चा करते हुए कहा कि रहीम की काव्य-प्रतिभा अनुभव की समृद्धि, लोकजीवन की गहरी समझ, जीवन के प्रति सूक्ष्म अन्वेषण-दृष्टि,विषय-वैविध्य, भाषा की सहजता और शिल्प के अनूठेपन के कारण विशिष्ट है। प्रो. अवधेश प्रधान ने कहा कि श्रीकृष्ण के प्रति भक्ति रसखान को इस जीवन-जगत से काटकर किसी कल्पनालोक में लीन नहीं कर देती, बल्कि चित्त को निःस्वार्थ प्रेम की भूमिका में ले जाकर इस जीवन-जगत से और अधिक जोड़ देती है। प्रो. अनंत मिश्र ने कहा कि आज यह सोचकर आश्चर्य होता है कि कैसा वह व्यक्ति, वह समाज होगा जो कृष्ण और राम की मुस्कान पर अपना सब कुछ कुर्बान कर देता था । व्यक्ति का बेहतर या परम बेहतर होना ही भक्तिकाल की संकल्पना है । कुछ नया करने या अलग करने का भाव ही मनुष्य को मनुष्य बनाता है । जो सौंदर्य की सराहना नहीं कर सकता, वह ईश्वर को भी नहीं पा सकता, क्योंकि जो प्रत्यक्ष सौंदर्य को नहीं निहार सकता, वह परम सौंदर्य को कैसे निहारेगा, कैसे उसकी तारीफ करेगा ! डाॅ. विश्वास पाटील ने श्रीरामचरितमानस को आद्योपांत समन्वय की रसधारा के रूप में रेखांकित किया। तुलसी ने अतीत से सार ग्रहण कर भविष्य के लिए उसे रसग्राही बना दिया। उन्होंने पुरातन परंपराओं का अनादर नहीं किया, जरूरी बदलावों के साथ उन्हें अधिक मूल्यवान जरूर बना दिया है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. दिलीप सिंह ने सूर का संदर्भ लेते हुए सूरसागर को भक्तिकाव्य के सुमेरु की संज्ञा दी। उन्होंने सूर के पदों में भाषा, समाज और संस्कृति के सुंदर समन्वय पर प्रकाश डालते हुए नवीन सन्दर्भ में ‘सूर के पाठ’ को पढ़ने की आवश्यकता बताई। डाॅ. दिलीप सिंह ने सूर की भाषा अभिव्यंजना-शक्ति और नवीन उद्भवनाओ को भागवत के तुलनीय रखते हुए प्रखर व्याख्या करते हुए शैलीतात्विक और समाजभाषिक निकषों पर भक्तिकाल की रचनाओं के पुनःपाठ पर बल दिया। इस सत्र का सफल संयोजन श्री सत्यप्रकाश पाल ने किया। इस सत्र का एक विशेष आकर्षण था मंचस्थ अतिथियों द्वारा श्री गुलाब चन्द्र, अपर जिला अधिकारी, नगर वाराणसी की पुस्तक ‘कार्यालयी हिंदी एवं कम्प्यूटर’ का लोकार्पण। लेखक ने इस पुस्तक की जरूरत, इसकी रचना-प्रक्रिया और विषय-वस्तु पर एक संक्षिप्त सारगर्भित वक्तव्य भी दिया।

छठा सत्र बिहारी, घनानंद, ठाकुर, बोधा और देव पर केंद्रित था। डॉ. अंजली अस्थाना ने अपनी ठसक के लिए प्रसिद्ध कवि ठाकुर के संदर्भ में कहा कि उन्होंने अपने जीवन के कड़वे अनुभवों के आधार पर जो प्रेम-निरूपण किया है वह अपने आप में अप्रतिम है। ठाकुर एक तरफ रीति-परंपरा के विरुद्ध हैं तो दूसरी तरफ सामाजिक और प्रेम-संबंधी स्वतंत्रता के लिए विद्रोह से भरे हैं। डाॅ. श्यामसुंदर पांडेय ने कहा कि घनानंद का संपूर्ण काव्य निश्छल प्रेम का निरूपण है। वे प्रिय की उपेक्षा को भी वरदान मानकर अपने प्रेम की अनन्यता को अक्षुण्ण रखना चाहते हैं। भगवद्भक्ति में भी वे सायुज्य की जगह सामीप्य की कामना करते हैं। डॉ. निलिम्प त्रिपाठी ने मध्यकालीन कविता में भारतीय आर्ष परंपरा की चरितार्थता रेखांकित की। प्रो. श्रीनिवास पांडेय ने रीतिकाल की विभिन्न प्रवृत्तियों और उनके महत्त्व का उल्लेख किया। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. सत्यदेव त्रिपाठी ने पूर्व वक्तव्यों के समाहार के साथ ही अन्य कवियों के प्रदेयों की चर्चा करते हुए ‘रीतिकाव्य में लोक’ विषय पर अपनी बात रखी। उन्होंने लोक शब्द और उसकी यात्रा की विभिन्न संकल्पनाओं का हवाला देते हुए कहा कि आज लोक सिर्फ हमारी निवर्तमान पीढ़ी की यादों में रह गया है। उन्हीं यादों के समानान्तर उन्होंने रीतिकालीन कविता में लोकजीवन के विविध पक्षों को रोचक उदाहरणों से पुष्ट किया। इस सत्र का संचालन अपनी विदग्ध टिप्पणियों के साथ प्रो. नरेन्द्र नाथ राय ने किया।

मतिराम, भूषण, सेनापति, पद्माकर, आलम, गिरिधर कविराय पर केंद्रित सातवें सत्र की अध्यक्षता डाॅ. रामसुधार सिंह ने की। प्रो. परितोष मणि ने राष्ट्रीय चेतना के क्रांतिकारी कवि के रूप में भूषण के मूल्य और महत्ता पर प्रकाश डाला। वीर शिवाजी और छत्रसाल के गौरव-गायक भूषण किसी धर्म के पक्षधर या विरोधी से कहीं ज्यादा धर्मांधता के विरोधी हैं। डाॅ. क्रांतिबोध ने कवि सेनापति के ‘सियापति-सेवक’ होने के गुमान को लक्ष्य करते हुए उनके काव्य में निहित भक्तितत्व को ही नहीं, उनके रीतिगत कौशल को भी रेखांकित किया। डाॅ. दिनेश पाठक ने पद्माकर का संदर्भ लेते हुए उनकी जीवनचर्या के भटकाव के परिप्रेक्ष्य में उनके कवि-कर्म के मूल्यांकन की बात कही। डाॅ. एम. गोविंद राजन ने तमिल और हिंदी साहित्य के भक्ति-संदर्भों का विशेषत: उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ के माध्यम से एक सम्पूर्ण आदर्श समाज का खाका तैयार किया है जिसकी बुनियाद सामंती जीवन मूल्य है। उन्होंने क्षीण होती वर्ण-व्यवस्था एवं सामाजिक मूल्यों को स्थापित करने का प्रयास किया है। रामकथा के माध्यम से घटनाओं के आलोक में पारिवारिक, सामाजिक आदर्शों को उन्होंने व्याख्यायित करने की कोशिश की है। डाॅ. अशोक नाथ त्रिपाठी ने मतिराम का संदर्भ लेते हुए कहा कि वे पूर्ववर्ती कवियों के कथ्य के नवीकरण और सौंदर्य की मौलिक उद्भावना के सिद्ध कवि हैं। प्रकाश उदय ने आलम की कविता का पाठ शेख और आलम के संयुक्त कवि-कर्म के रूप में करने का प्रस्ताव रखा। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ.रामसुधार सिंह ने कहा कि मध्यकालीन कविता भारतीय पुनर्जागरण की कविता है, एक ऐसे समय में जब भारतीय संस्कृति का ह्रास हो रहा था, चारो तरफ से उस पर हमले किये जा रहे थे, साथ ही पाखंड और अंधविश्वास बढ़ते जा रहे थे, राम व कृष्ण के रूप में ऐसे चरित्रों का सृजन किया गया, जिन्होंने तमाम समस्याएँ झेलीं लेकिन सत्य का मार्ग को नहीं छोड़ा। मध्यकाल की कविता ने शोषण पर आधारित संसार के बरक्स हर तरह की विषमता को खारिज करते हुए बेगमपुर, बेगमदेश, वृंदावन, रामराज्य के प्रतिसंसार की रचना की। उन्होंने गिरिधर कविराय के कवि-कर्म की उन विशेषताओं का भी उल्लेख किया जिनके चलते उनकी लोक-प्रसिद्धि यथावत बनी हुई है। इस सत्र का कुशल संचालन डाॅ. रचना शर्मा ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. प्रतिभा मिश्र ने किया।

आयोजन के तीसरे और अंतिम दिन 16 जनवरी 2023 का आयोजन मध्यकालीन कविता में लोक की प्रतिष्ठा, खुली चर्चा, पुरस्कार-वितरण और समापन-समारोह लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय के पं. पारसनाथ तिवारी नवीन परिसर , नियामताबाद में संपन्न हुआ। मुख्य अतिथि श्री के. सत्यनारायण, अपर पुलिस महानिदेशक, वाराणसी परिक्षेत्र ने कहा कि यह ध्यान रखना चाहिए कि हम सभी इस वसुधा के पात्र हैं, तभी हम लोककल्याण कर पायेंगे । तेलुगु संत कवि की तुलना कबीर से करते हुए कहा कि वे भी कबीर की भाँति मूर्ति पूजा और अंधविश्वास के विरोधी थे। उन्होंने कहा कि आज जिस भी साहित्य की रचना हो रही है वो वर्तमान युग के अनुसार रची जा रही है । मध्यकालीन रचनाओं में लिखा गया सूफ़ी साहित्य कंपोज़िट कल्चर का स्वरूप था, मध्य काल की कविताएँ उस समय के आक्रांताओं के विरोध में उठने वाली जनवाणी थी। मध्यकाल के कवियों ने लोकभाषा में रचना की, ताकि उनकी बात जन-जन तक आसानी से पहुँच सके। के सत्यनारायण ने कहा कि मध्यकालीन साहित्य सामान्य जन को संबोधित है, वह यथार्थवादी है, हालाँकि जीवन-जगत के विभिन्न क्षेत्रों के लिए आदर्श के अनगिनत उदाहरण उसने प्रस्तुत किए। इस क्रम में उन्होंने एक दोस्ताना-सा कायम करते हुए महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं से संवाद स्थापित किया, उनके प्रश्नों के उत्तर भी दिए। विशिष्ट अतिथि प्रो. उदय प्रताप सिंह ने कहा कि कर्मठता के साथ संवेदना जब आती है तभी साहित्य का सृजन होता है। भारत की मूल धारा अध्यात्म की है। मध्यकाल में संतों ने लोकधारा के रूप में साहित्य की रचना की है । मध्यकाल के कवियों ने जातिवाद, छूआछूत से जनमानस को बचाने के लिए रचना की । उन्होंने कहा कि भक्ति से समरस समाज का निर्माण होता है। विशिष्ट अतिथि प्रो. वशिष्ठ अनूप ने मध्यकालीन कविता के प्रमुख अवदानों का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहारी और देव को लेकर ही मध्यकाल में तुलनात्मक आलोचना की शुरुआत हुई थी। देव की रचनाओं में लोकसामान्य और लोकोत्तर प्रेम और सौन्दर्य का बहुविध चित्रण हुआ है । डाॅ. सुनील कुमार मानस ने मध्यकालीन काव्य के महानायक के रूप में राम और कृष्ण के व्यक्तित्व और शील को संयुक्त रूप से भारतीयता के प्रतिनिधि के रूप में निरूपित किया। डाॅ. प्रणव शास्त्री ने दंतकथाओं में सूरदास और वृंदावन की लोकव्याप्ति को व्याख्यायित किया। प्रो. सुमन जैन ने कहा कि कबीर अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रश्न ही नहीं खड़े करते उनके उत्तर भी देते हैं । कबीर की रचनाओं में सांस्कृतिक तत्व प्रेम है, प्रेम ही उनका ज्ञान है, जो एक निर्मल और सहज मानवीय समाज का निर्माण करता है। डाॅ. भारती गोरे ने अनेक उदाहरणों के माध्यम से बताया कि कैसे शास्त्र के बरक्स लोक की चिंता को मध्यक़ालीन कवियों ने प्रस्तुत किया । अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. श्रद्धानंद ने कहा कि पं. पारसनाथ तिवारी की विद्याभूमि पर हम सभी पं. विद्यानिवास मिश्र को याद कर रहे हैं यह एक सुखद संयोग है। पं विद्यानिवास जी नवोदित लेखकों को प्रेरित करते हुए उनमें सृजन के बीज बोते थे। आज ऐसे लेखकों की आवश्यकता है जो जनमानस में सकारात्मकता का संचार करें । कहा कि सबसे विचारणीय यह तथ्य है कि संतोष की संस्कृति विलुप्त हो रही है जिससे हमारी सभ्यता का क्षरण हो रहा है । कार्यक्रम का शुभारंभ प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण और समाजशास्त्र की छात्राओं के स्वागत गीत और असम की बीजोमोनी बोरा के बिहू-गायन और बीहू-नृत्य से हुआ । अतिथियों का स्वागत प्रो. उदयन मिश्र ने, संचालन प्रो. इशरत जहां ने किया । धन्यवाद-ज्ञापन करते हुए महाविद्यालय के प्रबंधक श्री राजेश कुमार तिवारी जी ने कहा कि ज्ञानयोग और कर्मयोग से एक नया सृजन होता है, आज का यह आयोजन इसी का मूर्त रूप और हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है। आज के आयोजन में प्रो. इशरत जहां की कविता-पुस्तक नादानियाँ का लोकार्पण भी हुआ । युवा समवाय के अंतर्गत कविता के लिए डाॅ. फ़िरोज़ खान (बीएचयू), आलेख के लिए श्री उदयप्रताप पाल, निबंध के लिए श्री स्नेह द्विवेदी (सभी वाराणसी), कहानी के लिए जीतू कुमार गुप्ता ( असम), सभी विधाओं में प्रस्तुति के लिए कागो मादो (अरुणाचल प्रदेश) और सांस्कृतिक प्रस्तुति के लिए संयुक्त रूप से सुनीता राम (असम) और बीजूमोनी बोरा (असम) को मुख्य अतिथि द्वारा पुरस्कृत किया गया । कार्यक्रम में प्रमुख रूप से प्रो. गिरीश्वर मिश्र, प्रो. सतीश, डाॅ. शशिकला, प्रकाश उदय, प्रो. दयानिधि यादव, प्रो. अरविंद पाण्डेय, डाॅ. वाचस्पति, डाॅ. भावना, डा गुलजबीं, प्रो. संजय, प्रो. अमित, डाॅ. विजयलक्ष्मी, डाॅ. ब्रजेश, डाॅ. धर्मेन्द्र , राहुल, सुनील, सुरेंद्र, अतुल, विनीत आदि के साथ महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं की उपस्थिति रही ।

दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास
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