विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2026) पंडित जी की जन्मशती के समापन-समारोह के रूप में मनाया गया और इसके ब्याज से उन के रचना-कर्म के विभिन्न आयामों को विमर्श के विषय के रूप में रखा गया।
विद्याश्री न्यास और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान (लखनऊ), रजा फाउंडेशन (दिल्ली), माँ भवानी महाविद्यालय (चंदौली), साहित्यिक संघ (वाराणसी), और लाल बहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय (चंदौली) के संयुक्त तत्वावधान में इस तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को धर्मसंघ शिक्षामंडल, दुर्गाकुंड, वाराणसी के सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि महामहिम श्री लक्ष्मण आचार्य, राज्यपाल, असम ; अध्यक्ष प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, म. गां. काशी विद्यापीठ, वाराणसी), विशिष्ट अतिथियों श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), श्री जगजीतन पांडेय तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी, श्री लेखमणि त्रिपाठी, श्री सुद्धन पांडेय के वैदिक स्तवन और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। डाॅ. दयानिधि मिश्र, श्री नरेंद्र नाथ मिश्र और प्रो. उदयन मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. दयानिधि मिश्र ने स्वागत-भाषण के साथ ही जन्मशती वर्ष के पचासाधिक साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों का भी एक संक्षिप्त विवरण दिया। इस अवसर पर पूर्वोत्तर भारत के प्रतिभागियों अंकिता दत्त तथा रोहन ने शास्त्रीय नृत्य और दीपशिखा सैकिया तथा जिंतुमनी भरुआ ने बिहू नृत्य प्रस्तुत किया।
उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत अनेक पुस्तकों — रात जुन्हैयावारी, तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता, विद्यानिवास मिश्र : लोकदृष्टि और परंपरा से साक्षात्कार, आधुनिक हिंदी कविता के विविध आयाम, भारतीय ज्ञान-परंपरा : वैभव और व्याप्ति, डाॅ. नगेंद्र : सृजन के विविध आयाम, भारत-बोध : सभ्यता का नवोन्मेष तथा विकसित भारत की संकल्पना — के साथ ही पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित पत्रिकाओं — अक्षरा, भावक, बहुवचन, समीचीन, नान्दी, तथा भाषा — का मंचस्थ अतिथियों द्वारा लोकार्पण संपन्न हुआ।
उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से डाॅ. मयंक मुरारी को, ‘लोककवि सम्मान’ से डाॅ. जयप्रकाश मिश्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्रीमती संतोष श्रीवास्तव को, पत्रकारिता सम्मान से डाॅ. अत्रि भारद्वाज को, श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से डाॅ. अमिता दुबे को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। विद्याश्री न्यास के स्तंभ रहे डाॅ. अरुणेश नीरन की स्मृति में प्रथम ‘अरुणेश नीरन भोजपुरी वैभव सम्मान’ के लिए चयनित प्रो. रामदेव शुक्ल स्वास्थ्य कारणों से उपस्थित नहीं हो सके, उन्हें यह सम्मान न्यास द्वारा उनके घर जाकर प्रदान करना तय किया गया। सभी सम्मानित विभूतियों की तरफ से स्वीकृति वक्तव्य के रूप में श्रीमती संतोष श्रीवास्तव ने पंडित जी को विशेषतः प्रिय एक लोकगीत प्रस्तुत किया।
इस अवसर पर डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी की सोच भारतीय संस्कृति, परंपरा और लोकजीवन से गहराई से जुड़ी थी। उन्होंने संस्कृत ज्ञान-संपदा की आध्यात्मिकता और सार्वभौमिक मूल्य-चेतना को आधुनिक संवेदना तथा विश्वदृष्टि के साथ जोड़ा। श्री धर्मेंद्र राय ने उनके रचना-कर्म को एक ऐसे वट-वृक्ष की संज्ञा दी जिसके पास सबको देने के लिए कुछ-न-कुछ है ; थका-माँदा, भूखा-प्यासा, भावक-विचारक — कोई उनके यहाँ से निराश नहीं लौटता। श्री जगजीतन पांडेय ने पंडित जी के व्यक्तित्व में निहित उस पारिवारिकता की चर्चा की, जो वसुधामात्र को एक कुटुंब मानने वाली भारतीयता की पहचान है। मुख्य अतिथि महामहिम लक्ष्मण आचार्य ने कहा कि विद्यानिवास जी न केवल अपने चिंतन में अद्यतन रहते थे, उसे साझा करने की दृष्टि से संवाद के लिए भी खुले मन से सदा तत्पर रहते थे। शास्त्र के साथ लोक में भी उनकी प्रगाढ़ निष्ठा थी और महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्हें इन दोनो से ऊपर उठना भी आता था। पूरब और पश्चिम की भी विचार-सरणियों में उनकी अद्भुत पैठ थी, और किसी तरह के दुराग्रह को उन्होंने कभी कोई जगह नहीं दी। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने शिक्षा को लेकर पंडित जी की चिंताओं और इस क्षेत्र में उनके अवदान की चर्चा की। धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. अमिता दुबे ने किया तथा सत्र का संयोजन किया डाॅ. रामसुधार सिंह ने।
उद्घाटन सत्र के पूर्व का सत्र पहले अकादमिक सत्र के रूप में संपन्न हुआ। यह लालित्य-व्यंजना पर केंद्रित था। डाॅ. मधुबाला शुक्ल(मुंबई) ने विशेष रूप से उनके पहले निबंध और निबंध-संग्रह को आधार बनाते हुए उन बीज-विंदुओं को लक्षित किया जिन्होंने उनके रचना-कर्म में उत्तरोत्तर विस्तार पाया। डाॅ. अखिल मिश्र(गोरखपुर) ने आत्मीयता को सौंदर्य और लालित्य का आधार मानते हुए बताया कि विद्यानिवास जी का रचना-संसार हृदय की गहरी अनुभूति का प्रतिफलन है, इसलिए कोमलता और संवेदनशीलता के साथ स्वाभाविक रूप से लालित्य की स्थिति है। डाॅ. चंद्र प्रकाश सिंह (हैदराबाद) ने उनके निबंधों में मानवीय और सांस्कृतिक चेतना की चर्चा की। डाॅ. मिथिलेश कुमार तिवारी(प्रयागराज) ने पंडित जी के संस्मरणों के जरिए जीव-जीवन-जगत से उनके अपनी तरह के जुड़ाव की पड़ताल की। प्रो. अखिलेश कुमार दुबे(प्रयागराज) ने कहा कि पंडित जी जीवन को उत्सव मानने और मानव धर्म को सर्वोपरि मानने वाले सर्जक हैं। वे उजास रचने की प्रतिज्ञा वाले और ललित की उत्कट आकांक्षा वाले ऐसे रचनाकार हैं जिनकी रचना-भूमि में लोकमंगल और लोकसंग्रह की प्रधानता है। डाॅ. राजकुमार उपाध्याय मणि(दिल्ली) ने अमरकोश की परंपरा को याद करते हुए पंडित जी के विविध प्रकार के कोश-कार्य की महत्ता बताई। श्यामसुन्दर पांडेय(मुंबई) उनके रचना-कर्म को निबंध-कला के उत्कर्ष के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए बताया कि लोक का जीवन-क्रम, संस्कार, उत्सव, दिनचर्या, मनोरंजन, व्यवसाय, वस्त्राभूषण, मान-मर्यादा, वन-उपवन, फल-फूल, देवी-देवता, पशु-पक्षी, शकुन-अपशकुन, गीत-गाथा — सबकुछ उनके निबंधों में सहज शामिल है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. विश्वास पाटील(शहादा) ने सत्र के वक्तव्यों के समाहार के साथ ही कहा कि पंडित जी के जीवन, साधना और साहित्य की मूल धारा समन्वय और सुसंवादिता की आग्रही रही है, उन्होंने संस्कृत से साहित्य-अध्ययन की नींव रखी और विश्व-साहित्य के अध्ययन से उसे पुष्ट किया, वेद से लोक तक की सरणि से उसे समृद्ध किया और वे निरंतर मनुष्य की एकात्म परिस्थिति को माँजते-तराशते रहे। इस सत्र का संचालन और आभार-प्रदर्शन श्री विशाल पांडेय(नई दिल्ली) ने किया।
उद्घाटन सत्र के बाद का अकादमिक सत्र विद्यानिवास जी के संस्मरणों, यात्रावृत्त और उनके कवि-कर्म पर केंद्रित था। प्रो. क्रांतिबोध(गाजियाबाद) ने कहा कि विद्यानिवास जी ने अपनी कविताओं में लोक एवं संस्कृति के काव्यात्मक उन्मेष को अपने समय के प्रश्नों के साथ अभिव्यक्त किया है। वे नई कविता के दौर के समस्त काव्य-वैशिष्ट्य को अपनाते हुए राधा-कृष्ण और मनु-मनावी के प्रेम को पुनराख्यायित करते हैं। संवाद उनकी कविताओं का मूल गुण-धर्म है। प्रो. सुमन जैन(वाराणसी) ने कहा कि संस्कृत और भोजपुरी के गहरे रंग के साथ ही देश-दुनिया की तमाम चिंतन-परंपराओं के अध्ययन और उनमें आवाजाही के अनुभवों ने उनके रचना-कर्म को विशिष्ट बनाया है। प्रो. अशोक नाथ त्रिपाठी(वर्धा) ने ‘रैन बसेरे’ के बहाने पंडित जी के निजी जीवन के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया, उन गाँवों और शहरों का उल्लेख किया जिनका उनके व्यक्तित्व पर विशेष प्रभाव पड़ा। डाॅ. मीना राठौर(छत्तीसगढ) ने ‘अमरकंटक की सालती स्मृति और विद्यानिवास मिश्र’ शीर्षक से एक भावपूर्ण और चिंतन-संपन्न आलेख का पाठ किया। प्रो. विवेक निराला(प्रयागराज) ने ‘सपने कहाँ गए’ की चर्चा करते हुए कहा कि स्वाधीनता के पचास वर्षों बाद स्वाधीनता-संग्राम के दौर में बुने गए सपनों और उनके यथार्थ का पंडित जी ने विश्लेषण किया। उनकी यह पुस्तक संस्मरण, इतिहास, आलोचना का संतृप्त विलयन है। प्रो. परितोष मणि(गाजियाबाद) ने अपने व्याख्यान को उनके निबंधों के प्रकृति-वर्णन पर केंद्रित करते हुए कहा कि पंडित जी के यहाँ प्रकृति वाह्य नहीं, आंतरिक अनुभव है। वह दृश्य नहीं, भारतीयता और सनातनता का अक्षुण्ण प्रवाह है। उनके अनुसार प्रकृति लोक का उपाख्यान है, शास्त्र का देशी स्वरूप है, उसका अविरल प्रवाह है। प्रकृति के समस्त उपादान लोक से ही नि:सृत हैं और लोक में ही समाहित होते हैं। आरती स्मित(नई दिल्ली) ने उन्हें समृति-सागर से मोती चुन लाने वाले गुणग्राही के रूप में रेखांकित किया। उनके संस्मरणों में स्मरणीय के स्मरण की जितनी महिमा है, विस्मरणीय के विस्मरण की महिमा भी उससे कम नहीं है। प्रो. आनंदवर्धन(वाराणसी) ने कहा कि पं. विद्यानिवास मिश्र ऐसे साहित्य-चितेरे थे जिनकी दृष्टि से साहित्य-संसार की कोई घटना-परिघटना या उसका कोई आयाम अछूता नहीं था। अपने व्यक्तित्व के गढ़न के बारे में उनका अपना कहना है कि ” हिमालय के अंचल के निचले छोर ने मुझे अपनी ममता से खड़ा किया, गंगा-यमुना के संगम ने संघर्षों का झूला झुलाकर मुझे गति दी, और विंध्य ने धैर्य की गंभीरता दी”। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सतीश पांडेय(मुंबई) ने कहा कि उनके यात्रा-संस्मरण जगहों की पहचान के बदले आत्म के विस्तार और परिष्कार के प्रयास हैं। उनके अनुसार पश्चिम के देशों में परिवारहीनता चिंता का विषय है। भारतीय समाज भी इससे ग्रस्त हो रहा है यह और भी चिंता का कारण बन जाता है। भौतिक सुविधाभोग की प्रवृत्ति कृत्रिम उत्सवप्रियता का शिकार बनाती है। उन्होंने माना है कि पश्चिम के प्रति उपेक्षा का नहीं तितीक्षा का भाव होना चाहिए। पंडित जी के यात्रावृत्त उनके कला-पारखी व्यक्तित्व की भी पहचान कराते हैं। इस सत्र का संयोजन और धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. उदय पाल(वाराणसी) ने किया।
चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री जयप्रकाश मिश्र, श्रीप्रकाश मिश्र, शिवकुमार पराग, धर्मेंद्र गुप्त साहिल, सिद्धनाथ शर्मा, विजय शंकर मिश्र भास्कर, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, अरविंद मिश्र, प्रकाश आनंद, हिमांशु तिवारी, आनंदकृष्ण, अंकित, विभा, प्रसन्न वदन चतुर्वेदी, गौतम अरोड़ा सरस, ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी शैलेश, शरद श्रीवास्तव, अंजलि पांडेय, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, अखलाक खान भारतीय, आलोक सिंह बेताब, सूर्यप्रकाश मिश्र, आनंद कृष्ण मासूम, रामजतन पाल, पुष्पेंद्र अस्थाना पुष्प निरंकारी, विकास पांडेय, प्रताप शंकर दूबे, सुशील कुमार पाण्डेय साहित्येंदु, निकेता सिंह, धनंजय जी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।
आयोजन के दूसरे दिन, 14 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में कवि-कथाकार नीरजा माधव की कृति ‘शब्द-पारिजात’ के लोकार्पण के साथ पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘राम मुझे छोड़ते नहीं और कृष्ण मुझसे छूटते नहीं’, जो कि राम-कृष्ण से अपने संबंध के संबंध में पंडित जी की ही एक प्रसिद्ध उक्ति है। प्रसिद्ध आलोचक-चिंतक प्रो. रामजी तिवारी(सुल्तानपुर) ने यह स्मृति व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहा कि शास्त्रीय प्रतिष्ठा और लोकस्वीकृति के साक्ष्य पर मिश्र जी ने राम और कृष्ण की महानता के अनेक अलक्षित पक्षों का उद्घाटन किया है और परंपरापोषित स्थापनाओं से सर्वथा भिन्न अपनी मौलिक स्थापनाएँ की हैं। विभिन्न कालखंडों में विभिन्न काव्य-रूपों में प्रस्तुत राम के स्वरूप में कोई भेद वे स्वीकार नहीं करते, यह जरूर है कि हर रचनाकार उसे युगापेक्षी दायित्व से मंडित करता है। वे मानते हैं कि कृष्ण महाभारत के भीतरी सत्य हैं। उन्हीं से जीवन-रस ग्रहण करके युधिष्ठिर रूपी धर्म-द्रुम विकसित होता है। वही कालचक्र, जगच्चक्र और युगचक्र के परिवर्तनकर्ता हैं। वे कहते हैं कि राम कण-कण और जन-जन में रम रहे हैं, सभी को रमा रहे हैं, उनसे अलग होने का कोई उपाय नहीं है। श्रीकृष्ण रिश्ते नहीं निभाते, सभी को छलते हैं, सभी के अभिमान को निर्ममता से तोड़ देते हैं। किंतु उनमें ऐसा दुर्निवार आकर्षण है कि उनसे ठगा जाना भी प्रीतिकर लगता है, वे छूटते नहीं। प्रो. प्रभाकर सिंह(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी रामकथा को भारतीय संस्कृति की बहुलता का प्रतीक मानते थे। ‘मेरे राम का मुकुट भीग रहा है’ एवं ‘राममय संस्कृति’ जैसे निबंधों में वे रामकथा की जनसंस्कृति की तलाश करते हैं। उनकी प्रतिबद्धता जन के राम, जन-जन के राम के प्रति है। इस अवसर पर स्मृति-संवाद करते हुए प्रो. श्रद्धानंद(वाराणसी) और प्रो. शशिकला पांडेय(वाराणसी) ने पंडित जी से जुड़े अनेक आत्मीय प्रसंगों को साझा किया। अध्यक्षीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए श्रीमती नीरजा माधव (वाराणसी)ने कहा कि मिश्र जी के साहित्य से जुड़ना भारतीय संस्कृति की समग्रता से जुड़ना है, एक अखंड दृष्टि से जुड़ना है। भारतीय संस्कृति मनुष्य से मनुष्य और मनुष्य से प्रकृति के रिश्ते की बात करती है, राम और कृष्ण भारतीय चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं, और पंडित जी इसे प्रत्यक्ष करते हुए शास्त्र और लोक के महनीय पक्षों को अपने लेखन का विषय बनाते हैं। इस सत्र का संचालन-संयोजन और धन्यवाद-ज्ञापन डाॅ. बिजेंद्र पांडेय(वाराणसी) ने किया।
आयोजन का चौथा सत्र पंडित जी के साहित्यालोचन पर केंद्रित था। डाॅ. प्रभात मिश्र(वाराणसी) ने कहा कि साहित्य के अध्ययन में साहित्य के इतिहास को उपयोगी मानने में जिस समय संशय खड़े किए जा रहे थे, उस समय विद्यानिवास जी ‘हिंदी साहित्य का पुनरालोकन’ के माध्यम से साहित्य के इतिहास की महत्ता की पुनर्स्थापना करते हैं। इसमें उन्होंने साहित्येतिहास के जटिल संदर्भों को लेकर तार्किक निष्कर्षों की उपलब्धि की है। हिंदी साहित्य संस्कृत और प्राकृत साहित्य-परंपरा से बल लेकर आगे बढ़ा है और उसमें इन दोनो के उज्ज्वल अंशों की निरंतरता है। प्रो. गोपबंधु मिश्र(वाराणसी) ने संस्कृत साहित्य केंद्रित उनके चिंतन पर विमर्श उपस्थित करते हुए कहा कि अमरुक शतक, गीत गोविंद, कालिदास, वाणभट्ट, अग्निपुराण आदि से संबंधित उनके विवेचन से स्पष्ट है कि शास्त्र, दर्शन, उदात्त चिंतन एवं भारतीय ज्ञान-परंपरा के समन्वय का नाम पं. विद्यानिवास मिश्र है। डाॅ. सुशील कुमार पाण्डेय ‘साहित्येंदु'(सुल्तानपुर) ने उनके कालिदास विषयक व्याख्यानों का संदर्भ लेते हुए कहा कि पंडित जी कालिदास को अजेय, अप्रमेय और अखंड भारत के महागायक के रूप में देखते हैं। उन्होंने रघुवंश के माध्यम से जीवन की शुचिता को परिभाषित किया तथा न्यायसंगत लोकतंत्र की भूमिका रची, ‘अभिज्ञान शाकुंतलम्’ के माध्यम से वे आरण्यक संस्कृति की महत्ता को प्रतिपादित करते हैं। ‘लोकमानस में स्त्री की उपस्थिति’ पर बात करते हुए सुप्रिया पाठक(प्रयागराज) ने कहा कि पंडित जी लोक और संस्कृति में स्त्रियों की संवाहक भूमिका की तलाश करते हैं। डाॅ. वेद प्रकाश वत्स(नई दिल्ली) ने मध्यकालीन कविता के अनूठे व्याख्याता के रूप में उनकी पहचान की। भक्तिकालीन और रीतिकालीन कविता दोनो की अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं और सहृदय समाज में पैठ के दोनो के पास बहुतेरे उपाय हैं, जिन्हें मिश्र जी बहुत मन और जतन से प्रत्यक्ष करते हैं। श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र(प्रयागराज) ने कहा कि विद्यानिवास जी मानते हैं कि किसी भी देश में आधुनिकता, विचारधारा आदि आयातित होकर अपना वर्चस्व नहीं बना सकती, उसे यहाँ के जीवन, जरूरत और बोध के अनुसार ढलना ही होगा। पंडित जी ने हिंदी के आधुनिक साहित्य में इस ढलाई को जिन चरणों में लक्षित किया है, श्रीप्रकाश जी ने उसका एक सधा हुआ लेखा-जोखा प्रस्तुत किया। कविर्मनीषी अष्टभुजा शुक्ल(बस्ती) ने कहा कि पंडित जी के व्यक्तित्व-कृतित्व का एकमुखी विश्लेषण गलत निष्कर्षों तक ले जाएगा। भूलना नहीं चाहिए कि वे महापंडित राहुल सांकृत्यायन, नामवर जी, अज्ञेय जी सब से संबद्ध रहे, उनका अध्यवसाय और लेखन दोनो विपुल भी है, विषम भी। भारतीय और पाश्चात्य ज्ञानमीमांसा के गहन अवगाहन के बीच उनका अपना स्वाधीन चिंतन उन्हें अलग से प्रतिष्ठित करता है। वे ज्ञान बघारने वाले बहुज्ञ नहीं, उसे आत्मसात कर जीवन की सहज सर्जना में ढाल देने वाले कृती हैं। अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए आचार्य अनंत मिश्र(गोरखपुर) ने कहा कि भारतीय वांग्मय-जगत के महापुरुष पं. विद्यानिवास मिश्र की जन्मशती के समापन-समारोह के रूप में आयोजित इस साहित्य-चर्चा में पंडित जी की जो विशेष दृष्टि सामने आई है वह है साझी संस्कृति पर जोर देने की उनकी उन्मुखता। यह दुनिया एक परिवार है, चर-अचर सभी प्राणी एक दूसरे के अस्तित्व के कारण हैं। वे मानते हैं कि कला थोड़ी तो जमीन के ऊपर की चीज है और इस जमीन के ऊपर की चीज के लिए भावक को भी थोड़ा-बहुत ऊपर उठना पड़ता है। ऐसा संदेश देकर पंडित जी जमीनवादियों को यह नहीं बता रहे हैं कि जमीन कोई कमतर है, वे कहना चाहते हैं कि जमीन तभी बनती है जब उसपर चेतना के रंग-बिरंगे फूल खिलें और महकें। इस सत्र के संयोजन, संचालन और धन्यवाद-प्रदर्शन का दायित्व डाॅ. प्रीति त्रिपाठी ने निभाया।
पाँचवे अकादमिक सत्र का विषय था ‘साहित्य, लोक और आस्वाद’। श्रीमती मनीषा खटाटे (मुंबई) ने पंडित जी के साहित्य के प्रयोजन संबंधी चिंतन को प्रस्तुत करते हुए कहा कि साहित्य प्रकृति और जीव-जीवन-जगत का ही प्रतिबिंब है। पंडित जी का प्रयोजन संबंधी चिंतन इन सबसे जुड़ा हुआ है। प्रो. माधवेंद्र पांडेय (शिलांग) ने उनकी लोकचेतना की चर्चा करते हुए कहा लोक सूक्ष्म की अभिव्यक्ति है, प्रतीयमान की प्रस्तुति है और मिश्र जी इसी प्रतीयमान के गायक हैं। समरजीत यादव (वर्धा) ने लोक, शास्त्र और शिक्षा के संबंध-परस्पर पर बात रखते हुए कहा कि पंडित जी इन्हें अलग-अलग नहीं एक समग्र सांस्कृतिक प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। डाॅ. राजेंद्र खटाटे(मुंबई) ने साहित्य के आस्वाद की चर्चा करते हुए अपने व्याख्यान को कला के साथ उसके रिश्ते, अनुभूति और अभिव्यक्ति की आपसदारी, आस्वाद की ज्ञान-प्रक्रिया और कला-विवेचन से संपन्न किया। प्रो. के. के. सिंह (पटना) ने लोकसंस्कृति के वैभव का जिक्र करते हुए कहा कि मिश्र जी के निबंधों में लोकजीवन के विविध रंगों का चित्रण अत्यंत सरसता से हुआ है। उनकी राय में लोक आम आदमी से अभिन्न है। लोक का वैभव उनके निबंधों में खुलकर है, खिलकर है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए प्रो. बलराज पाण्डेय(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी का मानना था कि साहित्य मूल रूप से एक संयोजन-व्यापार है। जोड़ना ही साहित्य का मूल धर्म है। आज मनुष्यता पर विश्वव्यापी संकट है, ऐसे में साहित्य की आवश्यकता आज पहले से बढ़कर है। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. सोनी पाण्डेय (आजमगढ़) ने किया।
छठा सत्र भाषा-चिंतन, हिंदी समाज, साक्षात्कार एवं डायरी और चिट्ठियों पर केंद्रित था। प्रकाश उदय(वाराणसी) ने पंडित जी की एकमात्र डायरी और अनेकानेक चिट्ठियों के हवाले से बताया कि उनके व्यक्तित्व के ढेर सारे पहलू, जो उनके व्यक्ति-व्यंजक निबंधों से भी अछूते रह गए हैं, उनकी डायरी और चिट्ठियों में अपने ठेठ रूप में मौजूद हैं। उनमें उनके भीतर की दुनिया तो है ही, उनके जरिए देश-दुनिया को भीतर से जानने का सुख भी है। प्रो. अवधेश प्रधान(वाराणसी) ने उनके साक्षात्कारों की चर्चा करते हुए बताया कि अपने साक्षात्कारों में उन्होंने अपने जीवन, साहित्य और बुनियादी सूत्रों को स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि उन्हें पितृपक्ष से शास्त्र और मातृपक्ष से लोक के संस्कार मिले। उनके साहित्य में दोनो का संतुलन दिखता है। वे ललित निबंध को व्यक्ति-व्यंजक निबंध कहना उचित समझते थे लेकिन निबंध का व्यक्ति अपनी “संकल्पशील महाजाति का व्यंजक” है। उनकी सर्वात्मक दृष्टि मनुष्य को समस्त चराचर जगत को जोड़कर देखती है। उन्होंने एक साक्षात्कार में कहा है कि हिंदू धर्म सेकुलरिज्म के अधिक निकट है क्योंकि उसमें धर्म के लिए बहुत-से विकल्पों का महत्त्व स्वीकृत है। मनुष्य को विकल्प चुनने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उन्होंने अपने बारे में कहा है कि “मुझे एक साथ सेकुलर, समाजवादी और हिंदू रहने मे कोई परेशानी नहीं होती। प्रो. दिलीप सिंह (अमरकंटक) ने अपना अध्यक्षीय वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए पंडित जी के भाषा-चिंतन पर विचार किया, उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य भाषा-विज्ञान के समन्वय और तुलना के लिए जो पुस्तकें और लेख लिखे, उसकी चर्चा की। उन्होंने कहा कि पंडित जी का सम्यक भाषा-चिंतन नवोन्मेषी है, भाषा-विश्लेषण के लिए आधुनिक भाषा-चिंतन के आलोक में भारतीय भाषा-चिंतन की अवधारणाओं को वे किस तरह प्रस्तुत करते हैं, इसका भी प्रो. सिंह ने उल्लेख किया। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. पूजा यादव ने किया।
15 जनवरी को सातवाँ सत्र ‘भारत-चिंतन, धर्म और संस्कृति’ पर केंद्रित था। गरिमा प्रकाश ने पंडित जी की सांस्कृतिक चेतना के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। डाॅ. तनुज जैन(नई दिल्ली) ने ‘संस्कृति-विमर्श में परंपरा और आधुनिकता’ विषय पर बोलते हुए इसके संदर्भ में पंडित जी के रचना-कर्म को अनेकशः उद्धृत किया। प्रो. शशिकला त्रिपाठी(वाराणसी) ने कहा कि विद्यानिवास जी सांस्कृतिक नायक, देव-देवियों, त्योहार, पर्यावरण, लोक, वनसंपदा, पक्षियों आदि पर चिंतन करते हुए भारतीय संस्कृति और ज्ञान-परंपरा से निरंतर साक्षात्कार करते हैं, तार्किक विश्लेषण करते हैं और तब सांस्कृतिक धरोहर को नवनीत की भाँति पाठकों के समक्ष रखते हैं। श्री सुशील कुमार तिवारी (चित्रकूट) और श्री राम प्रकाश शर्मा ने भी इस विषय में अपने विचार रखे। श्री अंबिकादत्त शर्मा (वाराणसी) ने पंडित जी के भारतबोध पर विचार करते हुए कहा कि उनके लिए भारत का मतलब भारत के पशु-पक्षी, पेड़-पहाड़, पर्व-त्योहार सब है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री नागेंद्र प्रसाद सिंह (नोएडा) ने सभी वक्तव्यों का समाहार करते हुए कहा कि विद्यानिवास जी का भारत-चिंतन और धर्म-संस्कृति संबंधी चिंतन हर तरह की अतियों से मुक्त और भारत के जन-मन के लिए, उसी की तरफ से है। इस सत्र का संयोजन और आभार-प्रदर्शन डाॅ. प्रीति जायसवाल (वाराणसी) ने किया।
आठवाँ सत्र विचार सत्र के साथ ही समापन, संपूर्ति समारोह, जन्मशती सम्मान और पुरस्कार-वितरण के रूप प्रो. राकेश उपाध्याय, निदेशक, भारतीय जनसंचार संस्थान की अध्यक्षता में आयोजित हुआ। मुख्य अतिथि थे म. गां. काशी विद्यापीठ के पूर्व कुलपति प्रो. पृथ्वीश नाग, विशिष्ट अतिथि थे पद्मश्री राजेश्वर आचार्य और श्री हरेंद्र प्रताप सिंह तथा सारस्वत अतिथि थे डाॅ. दयाशंकर मिश्र दयालु, आयुष राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश। प्रज्ञा प्रवाह के वरिष्ठ प्रचारक श्री रामाशीष सिंह ने कहा कि विद्यानिवास जी संस्कृति-पुरुष थे, दक्षिण भारत के बहुत-से प्रचारकों ने उन्हीं से हिंदी भाषा का ज्ञान लिया था। डाॅ. अंकिता तिवारी ने मिश्र जी के यात्रा-संस्मरणों की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी यात्राओं को मनुष्य की अर्थवत्ता की तलाश के रूप में रेखांकित किया है। प्रो. श्रुति पाण्डेय (शिलांग) ने विद्यानिवास जी के उस व्यक्तित्व का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत किया जो उनके व्यक्ति-व्यंजक निबंधों से व्यंजित होता है। डाॅ. प्रतिभा मिश्र ने कहा कि मिश्र जी का संपूर्ण जीवन उस चंदन की तरह है जिसकी सुरभि उनके बचपन की स्मृतियों में रची-बसी है। परंपरा के लचीलेपन को अनिवार्य मानते हुए उन्होंने धर्म को जीवन जीने की प्रक्रिया को जन्म देने वाला बताया है। डाॅ. रामसुधार सिंह (वाराणसी) ने उनके संपादन-कर्म पर टिप्पणी करते हुए बताया कि उनके संपादन कार्य के क्षितिज-विस्तार में संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी और जनपदीय भाषाएँ — सभी शामिल हैं। ग्रंथ-संपादन के अतिरिक्त उन्होंने नवभारत टाइम्स जैसे दैनिक पत्र और ‘साहित्य अमृत’ सहित कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया। कबीर, सूर, तुलसी, रहीम, रसखान से लेकर अज्ञेय तक की कविताओं का संचयन उन्होंने प्रस्तुत किया। प्रो. हीरामन तिवारी (नई दिल्ली) ने विद्यानिवास जी की उस वैचारिकी का विश्लेषण किया जिसमें उन्होंने कहा था कि लोक और शास्त्र का विभेद भारतीय संस्कृति में तभी संभव हो सकता है जब कोई हमारी संस्कृति की उस क्षमता को परख सके जिसमें ग्रहण और त्याग की भावना साथ-साथ प्रतिफलित होती है। विशिष्ट अतिथि श्री हरेंद्र प्रताप सिंह(दिल्ली) ने पंडित जी की पत्रकारिता की चर्चा करते हुए कहा कि उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से भी भारतीय संस्कृति की आत्मा को ही स्थापित किया। वे भारतीय पत्रकारिता में सभी विचारधाराओं को लेकर चलने वाले इकलौते संपादक थे। विशिष्ट अतिथि पद्मश्री राजेश्वर आचार्य ने कहा कि मिश्र जी का मन भारतवर्ष की उस श्रेष्ठता की तरफ हमेशा खिंचा रहा जहाँ से सभ्यता और संस्कृति का विकास हुआ और प्रकाश की आशा में जिसकी तरफ आज भी दुनिया की निगाहें लगी हुई हैं। सारस्वत अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र दयालु ने कहा कि पंडित जी का रचना-संसार बहुत विस्तृत है। प्रतिवर्ष उनके जन्मदिन पर मनाए जाने वाले उत्सव के माध्यम से भारत के संपूर्ण साहित्य-जगत को जिस तरह विद्याश्री न्यास ने जोड़कर रखा है, वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन का सौंदर्य तो है ही, उसके लिए जो अपेक्षित है उसकी भी चर्चा है। मुख्य अतिथि प्रो. पृथ्वीश नाग ने कहा कि पंडित जी के कुलपति रहते काशी विद्यापीठ और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय का चौमुख विकास हुआ। पाणिनी की व्याकरण-तकनीक का उन्होंने जो विश्लेषण किया वह दुनिया भर में आज भी मान्य और समादृत है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. राकेश उपाध्याय(नई दिल्ली) ने कहा कि विद्यानिवास जी लोकधर्मी साहित्यकार, व्याख्याता और शिक्षाविद तो थे ही, एक महान संपादक के रूप में उन्होंने नवभारत टाइम्स को एक नया तेवर दिया। संपादक के रूप में उनका सोचना था कि पत्रकारिता नायकों का निर्माण करने के लिए नहीं, नायकों की खोज और उनके कर्मों के आकलन के लिए जरूरी है। कहा कि उन्हें इतिहास की दृष्टि लोक से मिली थी, उनका साहित्य अमर भारत की निरंतर सृजन-शक्ति का परिचायक है।
संपूर्ति सत्र में काशी की कला और साहित्य के क्षेत्र की सात विभूतियों — सर्वश्री सुनील कुमार विश्वकर्मा, मनीष खत्री, ज्ञानेश्वर नाथ शर्मा और कवि-कथाकार मुक्ता, ब्रजेंद्र नारायण द्विवेदी ‘शैलेश’, कवीन्द्र नारायण श्रीवास्तव तथा कंचन सिंह परिहार — को ‘पं. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती सम्मान’ से समारोहपूर्वक विभूषित किया गया। इसके साथ ही युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित प्रतियोगिताओं में कविता के लिए शिखा सिंह को प्रथम, श्रुति शाश्वत चतुर्वेदी को द्वितीय और डाॅ. फिरोज को तृतीय पुरस्कार से तथा शोधालेख के लिए साधना सरोज को प्रथम, पूजा राय को द्वितीय और मुस्कान बेनी को तृतीय पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया। इस अवसर पर असम और मेघालय के प्रतिभागी छात्र-छात्राओं अंकिता दत्त, रोहन, दीपशिखा सैकिया, जिंतुमनी भरुआ तथा अन्य को विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया।
विभिन्न सत्रों में सर्वश्री सुशील कुमार तिवारी, चंद्रप्रकाश सिंह, विभा द्विवेदी, दिनेश साहू (गंगटोक)रविकेश मिश्र, सुधीर तिवारी तथा मयंक मुरारी ने चर्चा-परिचर्चा में अपनी भागीदारी से विमर्श को और अर्थवान बनाया। अतिथि सुधीजन के साथ ही वाराणसी के प्रबुद्धजन तथा बीएचयू, विद्यापीठ, संस्कृत विश्वविद्यालय, लाल बहादुर शास्त्री पीजी कॉलेज और श्री बलदेव पीजी काॅलेज सहित विभिन्न शिक्षण-संस्थानों की प्रतिभागिता ने इस आयोजन की गरिमा में श्रीवृद्धि की।
इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया तथा ‘सोच-विचार’ पत्रिका के संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने आयोजक मंडल की तरफ से इस तीन दिवसीय आयोजन के सभी वक्ताओं, श्रोताओं और सहयोगियों को धन्यवाद ज्ञापित किया।
दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास
