पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के अवसर पर युवा हिन्दी संस्थान, अमेरिका, साहित्यिक संघ, वाराणसी, लालबहादुर शास्त्री स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मुगलसराय व विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में नदेसर स्थित होटल मैजिक लीफ मे आज “*हिन्दी का विश्व प्रसार” विषय पर अंतरराष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन किया गया।
आज हिंदी का प्रयोग व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, कला, विज्ञान, के साथ विविध क्षेत्रों में बढ़ तो रहा है। भारतवासी जब तक सच्चे मन से हिन्दी को नहीं आपायेंगे तब तक उसे विश्व में सही स्थान मिलना कठिन है, अतः प्रसन्नता कि बात है कि भारत के बाहर खास तौर से अमेरिका में हिन्दी के प्रचार-प्रसार में काफी प्रगति हुई है और हिन्दी विश्व हिन्दी के रुप में स्थापित होने की ओर अग्रसर है। उक्त बातें ‘हिंदी का विश्व-प्रसार’ विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिचर्चा में युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका के अध्यक्ष *डॉ. अशोक ओझा ने मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए कही।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलपति *प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने कहा कि अमेरिका से यहाँ आये इन हिन्दी सेवियों को देख-सुनकर विश्व में हिंदी की लोकप्रियता को समझा जा सकता है। हिंदी का वैश्विक परिदृश्य संभावनाओं से परिपूर्ण है। इसका कारण हिंदीभाषियों का सम्पूर्ण विश्व में फैला होना है। आज भारत के लाखों नागरिक विदेशों में बसे हैं। इनमें शिक्षा प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों से लेकर रोजगार तथा व्यापार के लिए गये लोग भी शामिल हैं। ये सभी लोग विदेश में भारतीय भाषाओं का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं किन्तु भारत के लोगों को अंग्रेजी का मोह छोड़कर राष्ट्रीय भावना से हिन्दी को अपनाना होगा।
कार्यक्रम की सारस्वत अतिथि प्रो. गैब्रिएला निमोलावा ईलेवा ने कहा कि भाषा के आदान-प्रदान से दो राष्ट्रों के बीच सद्भाव और मैत्री की स्थापना होती है। आज पूरे विश्व में जो हिंदी का सम्मान बढ़ा है, उसका प्रमुख कारण हिंदी भाषा की उदारशीलता, अन्य भाषाओं के शब्दों की स्वीकार्यता है। आज काशी में आप सभी के बीच में आकर मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हिंदी विश्व प्रेम की भाषा है।
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो. वशिष्ठ अनूप ने कहा कि इस समय विश्व के लगभग डेढ़ सौ देशों में हिंदी का अध्ययन अध्यापन हो रहा है। इसके पीछे हिंदी भाषा में निहित भारतीय ज्ञान परंपरा और मानवता के कल्याण की भावना तो है ही, यहाँ का जनबल और बाजार भी है। भारत में बाजार की संभावना के कारण अमेरिका, चीन एवं अन्य समर्थ देश अपने विद्यार्थियों को हिंदी पढ़ा रहे हैं। दुनिया भर में फैले भारतीय समाज के लोग हिन्दी और इसके साथ ही भारतीय संस्कृति का प्रसार कर रहे हैं। आज हिंदी भारत की आवाज है।
कार्यक्रम के आरंभ में विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ. रामसुधार सिंह ने वैश्विक परिदृश्य में हिन्दी की लोकप्रियता के सन्दर्भ में अमेरिका के विभिन्न विश्वविद्यालयों में हिन्दी में किये जा रहे कार्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हिंदी भाषा में विश्व की भाषा बनने की सामर्थ्य है, अपार संभावनाएँ और आवश्यकता भी है।
युवा हिंदी संस्थान, अमेरिका से पधारे शिष्ट मण्डल का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने कहा कि संस्थान के अध्यक्ष डॉ. अशोक ओझा और उनकी टीम सच्चे मन से अमेरिका में हिन्दी का प्रचार-प्रसार का कार्य कर रही है जो हमारे लिए प्रेरणास्पद है।
सुश्री कुद्युम, ड्यूक यूनिवर्सिटी, नार्थ कोलम्बिया ने कहा कि आज अधिकांश देशों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन और प्रशिक्षण कार्य हो रहा है। हिंदी की गद्य और पद्य की अनेकशः विद्याओं में विदेशी हिंदी विद्वान और साहित्यकार अपनी रचनायें कर रहे हैं। अनेक देशों में उनके आकाशवाणी केन्द्रों और दूरदर्शन के चैनेल्स पर विशेष हिंदी कार्यक्रम और पाठ्यक्रम चलाये जा रहे हैं। अकेले अमेरिका के कई विश्वविद्यालयों में हिंदी का अध्ययन और अध्यापन हो रहा है। यह मेरा सौभाग्य है कि आज विश्व की सांस्कृतिक राजधानी काशी में आप लोगों के बीच होने का अवसर प्राप्त हुआ है।
सुश्री भानुश्री सिसांदिया, युनिवर्सिटी आफ न्यूयार्क ने कहा कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है। हिंदी भावों को इस प्रकार प्रकट करती है कि वह मानस पटल को अन्दर तक आन्दोलित करते हैं और हृदय आल्हादित हो जाता है। यही इसकी जीवन्तता का रहस्य है। अमेरिका में हिंदी का अध्यापन करना मेरे लिए गौरव की बात है।
सुश्री नीलाक्षी फूकन ने कहा कि हिंदी की लिपि वैज्ञानिक लिपि है और हिंदी एक समर्थ भाषा है। यहाँ कैपिटल लेटर और छोटे लेटर का कोई विवाद नहीं है, हर लिपि की अपनी विशेषता है। विश्व पटल पर हिन्दी का प्रसार तेजी के साथ हो रहा है। मुझे प्रसन्नता है कि मैं अमेरिका में रहते हुए हिन्दी के विकास के लिए कार्य कर रही हूँ।
सुश्री प्रेमलता वैष्णव ने हिंदी के विकास के संबन्ध में अपने अनुभव को साझा करते हुए कहा कि आज के वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी के युग में अमेरिका में हिन्दी साहित्यकारों का दायित्व और अधिक बढ़ गया है। जनसंचार के क्षेत्र में हिंदी काफी आगे बढ़ चुकी है फिर भी इसे तकनीकी शिक्षा की दृष्टि से भी समृद्ध करने की जरूरत है।
सुश्री सविता बाला ने अनुवाद की दृष्टि से हिंदी को और अधिक सक्रिय और समृद्ध बनाने की बात कही। इन्होंने कहा कि अनुवाद के भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आना होगा।
सुश्री इरियाना सविक ने कहा कि आज विश्व के कई देशों में हिन्दी भाषी लोग जाकर वसे हुए हैं और वहाँ सदियों से रहते हुए भी अपनी भाषा को भूले नहीं है। वे अपने परिवार में हिंदी में ही बातचीज करते हैं। अमेरिका में बड़ी संख्या में हिन्दी बोलने वाले भारत के लोग हैं और इन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।
सुश्री मयूरी रमन नयन- ने हिंदी सिनेमा के विकास में हिंदी भाषा के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि अमेरिका में हिन्दी सिनेमा तथा हिन्दी सीरियल काफी लोकप्रिय हैं। हिन्दी सिनेमा में विदेशी एवं प्रवासी भारतीयों को न केवल सहज समझ में आने वाली हिंदी ही सिखाई जाती है। बल्कि उन्हें भारतीय संस्कृति से भी परिचित कराया। इसी क्रम में सुश्री गरिमा अग्रवाल (न्यू जर्सी), सुश्री गाइनो मीरू मुर्मू (नाथ जर्सी) तथा अनुभूति काबरा ने हिंदी शिक्षण-प्रशिक्षण से संबंधित अपने रोचक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि अमेरिका में हिंदी के प्रति लोगों की रूचि बढ़ रही है। हिंदी की कुछ पत्रिकाएँ भी प्रकाशित की जा रही हैं। दल के अन्य सदस्यों क्रमशः श्री डैनियल मैंगो, प्रशान्त शंकरण, विनोद चौबे, राजेश शाह तथा मनोज के. सिंह ने काशी में अपने अनुभव को साझा किया।
संगोष्ठी का संचालन प्रोफेसर अमित राय ने, धन्यवाद ज्ञापन श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र तथा वाणी के माध्यम से स्वागत विद्याश्री न्यास के सचिव डॉ. दयानिधि मिश्र ने किया एवं अंग वस्त्रम व स्मृति चिन्ह प्रो उदयन, प्राचार्य व प्रो धर्मेन्द्र सिंह, प्राचार्य ने दिया।इस अवसर पर डा उदयप्रताप सिंह, प्रोफेसर सुरेंद्र प्रताप, प्रोफेसर शैलेश मिश्र धीरज, डा कंचन परिहार, डा हरीश कुमार, हिमांशु उपाध्याय, डा डी डी सिंह, श्री नरेन्द्रनाथ मिश्र, राम अवतार पाण्डेय, वासुदेव ओबेरॉय, गिरिजेश तिवारी,डा मुक्ता, डा शशिकला, श्रीमती वंदना ओझा,प्रो संजय, प्रो भावना, शत्रुंजय, प्रोफेसर राजीव, कवीन्द्र जी, डा दीपक, डा विमर्श, डा ध्रुवनारायण, श्री आलोक गुप्ता, श्री संतोष, यश नाइक, श्याम सुंदर,अरविंद, राजेश, अनुराग, बुद्धदेव तिवारी, संतोष कुमार, विजयप्रकाश, अशोक सिंह, कार्यक्रम के आरंभ में वैदिक मंगलाचरण जयेन्द्र पति व पौराणिक मंगलाचरण डा यज्ञनारायण ने किया।
