‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं आचार्य रामचंद्र शुक्ल विषयक संगोष्ठी- जुलाई 2025

रामचंद्र शुक्ल और राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द की साहित्यिक योगदानों पर मंथन

वाराणसी। राजकीय जिला पुस्तकालय में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में ‘हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा’ श्रृंखला के अंतर्गत हिंदी गद्य के उन्नायक राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद एवं हिंदी निबंध के शीर्ष आचार्य राम चंद्र शुक्ल से संबंधित संगोष्ठी आयोजित की गई ।आचार्य रामचंद्र शुक्ल के समग्र योगदान को रेखांकित करते हुए मुख्य वक्ता जवाहर लाल नेहरू विवि दिल्ली के हिन्दी एवं भारतीय भाषा विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के पहले गंभीर और व्यवस्थित आलोचक हैं। उनकी आलोचना का दायरा व्यापक है।हिंदी , अंग्रेजी और संस्कृत साहित्य के विस्तृत अध्ययन और विवेचन से उनका समीक्षा साहित्य विकसित हुआ है। वे मात्र समीक्षक ही नहीं हैं । कवि ,अनुवादक, निबंधकार , जीवनीकार , संपादन और टिप्पणीकार आदि रूपों में भी उनकी समान गति दिखाई देती है। शुक्लजी के अंग्रेजी निबंधों से हिंदी के पाठक कम परिचित हैं । इन निबंधों का दायरा विस्तृत है । ये निबंध साहित्य , समाज और राजनीति को केंद्र में रखकर लिखे गए हैं । शुक्लजी के आलोचक व्यक्तित्व की निर्मिति में अंग्रेजी से हिंदी में किया गया उनका अनुवाद केंद्रीय भूमिका का निर्वाह करता है।

बीएचयू हिन्दी विभाग के प्रो प्रभाकर सिंह ने शिवप्रसाद सितारे हिंद के अवदान की चर्चा करते हुए कहा कि राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द:भाषा चिंतन और इतिहास दृष्टि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में और हिन्दी नवजागरण के चिंतक और लेखक राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द भाषा और इतिहास संबधी अपने चिंतन के लिए जितना जाने गये उससे अधिक हिन्दी-उर्दू विवाद के लिए चर्चित रहे। ‘इतिहास तिमिर नाशक’ और ‘भूगोल हस्तमलक’पुस्तके उनके ज्ञान साहित्य की नवाचारी इतिहास-दृष्टि की परिचायक हैं तो ‘राजा भोज का सपना’उनके सृजन धर्मी व्यक्तित्व का उदाहरण है। प्राजा शिवप्रसाद सितारे हिन्द के इतिहानलेल लेखन में अन्ग्रेजी साम्राज्यवादी इतिहास -दृष्टि के प्रति प्रशंसा भाव के बावजूद वह भारतीय इतिहास की वैज्ञानिक चेतना की भी शिनाख्त कर रहे थे। भाषा चिंतन में वह हिन्दी-उर्दू के व्यावहारिक मिलन से उत्पन्न ‘हिन्दुस्तानी’ के पक्षधर थे। फ़ारसी लिपि की जगह देवनागरी लिपि का समर्थन कर रहे थे। आज जरूरत है उनके चिंतन और सृजन के वैज्ञानिक पहलू‌ओं की पड़ताल करने की।

अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध कथा लेखिका डा. मुक्ता ने कहा कि प्रारंभिक खड़ी बोली हिंदी के विकास एवं देवनागरी लिपि के अस्तित्व के संघर्ष में राजा शिवप्रसाद सितारे हिंद का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने हिंदी की रक्षा के लिए पाठ्य पुस्तक’ गुटका में राजा भोज का सपना वीर सिंह वृतांत आदि कहानियाँ लिखीं।’ बनारस अखबार ‘ का प्रकाशन शुरू किया। सुविख्यात आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल आलोचक आचार्य रामचंद्र शुक्ल की कृति’ हिंदी साहित्य का इतिहास’ आज भी मिल का पत्थर बनी हुई है। हिंदी साहित्य का शब्दकोश हिंदी शब्द सागर, भाषा शैली व्याकरण संबंधी नए मानक बनाने और हिंदी साहित्य को विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में सम्मिलित करने का श्रेय आचार्य शुक्ल को है। आचार्य शुक्ल ने हिंदी को’ देव बड़े हैं या बिहारी’ के संकीर्ण घेरे से बाहर निकाला। स्वागत भाषण करते हुए डा दयानिधि मिश्र ने हिंदी की धरोहर ःकाशी की सृजन परंपरा के महत्व को बताते हुए आज के विषय पर प्रकाश डाला। संचालन डा.शुभ्रा श्रीवास्तव ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।सरस्वती वंदना मंजरी पाण्डेय ने किया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,प्रो इंदीवर, डा.सुरेन्द्र प्रताप ने भी विचार व्यक्त किया।इस अवसर पर दीपेश चौधरी, अशोक सिंह, इशरत जहां, मंजरी पाण्डेय,कवीन्द्र नारायण आदि की उपस्थिति महत्वपूर्ण रही।