हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परम्परा में प्रेमचंद और बंगमहिला की गूँज – अगस्त 2025

“प्रेमचंद और बंगमहिला : साहित्य में मुक्ति चेतना के अग्रदूत”

“काशी की सृजन परंपरा में प्रेमचंद और बंगमहिला की गूँज”

प्रेमचंद और बंग महिला दोनो का कथा साहित्य मुक्ति चेतना का साहित्य है

वाराणसी। एलटी कालेज (अर्दली बाजार) में हिन्दी साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिंदी की धरोहर:काशी की सृजन परंपरा विषयक व्याख्यान में अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह ने कहा कि प्रेमचंद अपने समय की धड़कन को बहुत करीब से देख रहे थे।वे देख रहे थे कि देश के अर्थतंत्र की रीढ किसान दुखी है,स्त्री और दलित को समाज में उनका उचित स्थान प्राप्त नहीं है,समाज ऊंच नीच,अमीर गरीब में बंटा हुआ है,ऐसी स्थिति में स्वतंत्रता केवल राजनीतिक हस्तांतरण होगी।बंग महिला ने ऐसे समय कहानी लिखना शुरू किया जब कहानी को युवाओं को बिगाड़ने वाली चीज माना जाता था।ऐसे समय में श्रीमती राजेन्द्र बाला घोष को अपना वास्तविक नाम छिपाकर बंग महिला नाम से लिखना पड़ा।आज के विवेच्य दोनो साहित्यकार अपने अपने ढंग से हर तरह ।के बंधन तोड़कर मुक्ति की गाथा रचने वाले रचनाकार थे।

पंचम पुष्प के रूप में प्रेमचंद के अवदान पर प्रो बलराज पांडेय ने कहा कि हिन्दी कथा साहित्य में प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं के द्वारा जो महत्व प्राप्त किया है,वह किसी भी कथाकार के लिए स्पर्द्धा का विषय हो सकता है।आज हर कथाकार की तमन्ना होती है कि वह प्रेमचंद की ऊंचाई का स्पर्श करे। सेवासदन से लेकर गोदान उपन्यास तथा पंच परमेश्वर से लेकर कफ़न कहानी जैसी कई अनमोल रचनाओं के द्वारा उन्होंने हिन्दी कथा साहित्य को समृद्ध किया है। हिन्दी ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय कथा साहित्य के वे गौरव हैं। विश्व के कथा साहित्य में उनकी तुलना मक्सीम गोर्की तथा लू शुन से की जाती है। प्रेमचंद ने हिन्दी कथा साहित्य में उन लोगों को नायकत्व प्रदान किया,जो सदियों से उपेक्षित थे।वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अपनी लेखनी के द्वारा बड़ी भूमिका निभा रहे थे।वे शोषण पर आधारित समाज व्यवस्था को बदलकर ऐसी व्यवस्था चाहते थे, जिसमें समानता हो, बंधुत्व हो और भाईचारा हो। उन्होंने जाति और धर्म पर आधारित हर प्रकार के भेद-भाव और पाखंड का खुलकर विरोध किया।

राजेन्द्र बाला घोष बंग महिला का योगदान पर डा.मुक्ता ने कहा कि राजेंद्रबाला घोष ने उस काल में जन्म लिया जब स्त्रियाँ असूर्यमपश्याएँ हुआ करती थीं और बाल विवाह का अटल साम्राज्य था। यह काल और परिस्थितियां ही उनके क्रान्तिदर्शी लेखों की पृष्ठभूमि बनीं । सन1882 में राजेंद्रबाला घोष का काशी के कोदई चौकी मोहल्ले में जन्म हुआ। इनकी कहानी ‘ दुलाईवाली’ को हिंदी की प्रथम तीन मौलिक कहानियों में स्थान प्राप्त है। हिंदी ऐयारी और तिलस्म में उलझ चुकी थी । कुछ विद्वतजन उर्दू, फारसी और बंगला साहित्य की सामग्री से स्वयं को महिमामंडित करने का प्रयास कर रहे थे। ऐसी विषम परिस्थिति में बंगमहिला ने’हिंदी के ग्रंथकार ‘शीर्षक लेख लिखकर चेतावनी दी और भविष्य के लिये सावधान किया। बंगमहिला स्त्री पुरूष समानता की पक्षधर थीं। हिन्दू धर्म और संस्कृति के नाम पर फैलाई जा रही भ्रामक बातों का उन्होंने लेख द्वारा एवं लेखों के अनुवाद द्वारा खंडन किया और लोगों का ध्यान आकृष्ट किया।

बंगमहिला के सम्पूर्ण साहित्य में राष्ट्रीय चेतना और लोकजागरण की गूँज है।

प्रारंभ में दीप प्रज्वलन और पंडित विद्यानिवास मिश्र तथा प्रेमचंद, बंग महिला के चित्र पर माल्यार्पण के उपरान्त विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दयानिधि मिश्र ने स्वागत भाषण दिए और कंचन सिंह परिहार ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत किया।कार्यक्रम का संचालन प्रसिद्ध गीतकार डॉक्टर अशोक कुमार सिंह ने तथा धन्यावाद प्रकाश सोच विचार पत्रिका के संपादक श्री नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया।