हिंदी की धरोहर : काशी की सृजन परम्परा (तृतीय पुष्प) – 23 जून 2025

वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय पुस्तकालय में साहित्यिक संस्था साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी की धरोहर काशी की सृजन -परंपरा के अन्तर्गत हरिश्चंद्र की प्रेमपोषिता एवं उस समय की महत्वपूर्ण किन्तु उपेक्षित लेखिका मल्लिका तथा हिन्दी के उन्नायक बाबू श्यामसुंदर दास पर केंद्रित व्याख्यानमाला आयोजित किया गया। मल्लिका के योगदान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध साहित्यकार डा. नीरजा माधव ने कहा कि 19वीं सदी की एक गुमनाम लेखिका 21वीं सदी में एकाएक चर्चा में आती हैं और वह थीं माल्लिका। मल्लिका प्रख्यात लेखक भारतेंदु की प्रेम पोषिता थीं, यह बात दुनिया को हिंदी साहित्य के पुराने इतिहास लेखन के ग्रन्थों से नहीं पता चलती क्योंकि वहां तो मल्लिका देवी का नामोल्लेख तक नहीं मिलता कि उन्होंने भी साहित्य में क ख ग कुछ भी लिखा था। मल्लिका बंगाल की बाल विधवा थीं। काशीवास के लिए आई थीं और भारतेंदु भवन के ठीक दक्षिण गली में वह निवास करती थीं। साहित्य के कारण ही वे भारतेंदु जी के संपर्क में आईं। मल्लिका की रचनाओं में चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश, कुमुदिनी और पारस्य उपन्यास के अलावा प्रेम तरंग नामक बांग्ला गानों का संग्रह भी है। उन्होंने बांग्ला साहित्य से कई ग्रंथों का हिंदी में अनुवाद भी किया था। इसके अलावा उन्होंने बहुत सी स्फुट कहानियां भी लिखी थीं। नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी में उनकी बहुत सारी रचनाएं जीर्ण-शीर्ण अवस्था में मुझे उपलब्ध हुईं जिन्हें मैंने अपने इतिहास ग्रंथ” हिंदी साहित्य का ओझल नारी इतिहास” में पहली बार शामिल किया । लेकिन दुखद रहा कि भारतेंदु जी की समकालीन इस लेखिका को इतिहास के पन्नों में कोई जगह नहीं मिल सकी। रोचक बात यह भी है कि बाद के कुछ इतिहासकारों ने “चंद्रप्रभा पूर्ण प्रकाश” उपन्यास को भारतेंदु के ही रचनाओं के खाते में डाल दिया। मल्लिका के ब्याज से हिंदी साहित्य के आधुनिक काल की एक नई पड़ताल आवश्यक हो गई है। बाबू श्यामसुंदर दास के योगदान की चर्चा करते हुए डा.प्रभात मिश्र ने कहा कि विभिन्न प्रांतों में इस समय भाषा को लेकर जिस प्रकार की संकुचित धारणा सामने आ रही हैं, उस समय बाबू श्यामसुंदर दास को याद करने का अर्थ बड़ा हो जाता है। श्यामसुंदर दास हिन्दी भाषा एवं साहित्य के प्रचारक, विस्तारक और उन्नायक इन तीनों भूमिकाओं में अग्रणी रहे। यह कहा जाता रहा है कि श्यामसुंदर दास ने ग्रंथों के साथ ग्रंथकारों की भी रचना की थी।

भाषा विज्ञान, साहित्य का इतिहास, समालोचना जैसे हिन्दी के नवीन क्षेत्रों में आपके द्वारा जैसी मजबूत पीठिका स्थापित हो सकी उसी पर हिन्दी आज भी स्थिर दिखाई पड़ती है। हिन्दी विषय में विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा का आरंभ श्यामसुंदर दास के अशांत श्रम के अभाव में उस समय संभव ही नहीं था। काशी नागरी प्रचारिणी सभा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, सरस्वती पत्रिका, हिन्दू विश्वविद्यालय हर जगह श्यामसुंदर दास ने अपनी अमिट छाप छोड़ी है। उनके काम से बाद की पीढ़ियों ने प्रेरणा पाई है।

साहित्य को समृद्ध बनाने के लिए श्यामसुंदर दास ने हजारों पांडुलिपियों की खोज करवाई, योग्य विद्वानों से उनका उत्कृष्ट संपादन करवाया, शब्दकोश का निर्माण किया और व्याकरण के ग्रंथ तैयार करवाए, साहित्य का इतिहास लिखा।

बाबू साहब जातीयता के प्रचण्ड पोषक थे, अपनी संस्कृति के कट्टर उद्घोषक थे। इसी से जातीयता अथवा संस्कृति संबंधी प्रश्नों पर किसी से समझौता करने के पक्ष में वे नहीं थे। वे देवनागरी लिपि को वैज्ञानिक लिपि मानते थे, और उसमें वे किसी भी प्रकार के परिवर्तन किये जाने के विरोधी थे। वे किसी भी मूल्य पर उसकी सुन्दरता नष्ट करने को तैयार नहीं थे।
श्यामसुंदर दास में दूरदृष्टि और निर्माण की अद्भुत क्षमता थी। हमें ऐसे साहित्य मनीषी की साहित्य सेवा के प्रति कृतज्ञ होना ही चाहिए। अध्यक्षता करते हुए प्रोफेसर श्रद्धानंद ने कहा कि मल्लिका भारतेंदु की समकालीन थी,उन्हीं की प्रेरणा से बंगला से हिंदी साहित्य लेखन में प्रवृत्त हुई। उनकी ‘कुमुदिनी’ हिंदी के आरंभिक उपन्यासों में परिगणित की जा सकती है,परंतु इतिहास लेखकों ने उपेक्षित रखा। उनकी कविताएँ भारतेंदु के प्रेमतरंग में संकलित है ।उनके साहित्यिक अवदान पर यथेष्ट प्रकाश डालने की आवश्यक है।
बाबू श्यामसुंदर दास जी ने हिंदी भाषा,नागरी तथा साहित्य को समृद्ध करने में अपना सर्वस्व खपाया।नागरी प्रचारिणी सभा उनका जीवंत स्मारक है। उन्होंने हिन्दी साहित्य इतिहास लेखन एवं हिन्दी आलोचना को नई दिशा दी । बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी बाबू श्यामसुंदर दास के इतिहास एवं आलोचना दृष्टि को पुनर्मूल्यांकित करने की महती आवश्यकता है । प्रारंभ में स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्रा ने कहा कि साहित्यिक विरासत को जानने समझने के लिए यह महत्वपूर्ण है। धन्यवाद ज्ञापन सोच-विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्र ने किया। सरस्वती वंदना कंचन सिंह परिहार ने किया।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह,डा.प्रकाश उदय,डा.अशोक कुमार सिंह,डा.भगवंती सिंह,डा.शशिकला पांडेय,कविन्द्र नारायण सहित बड़ी संख्या में काशी के कवि, रचनाकार, उपस्थित रहे। विशेष बात यह रही की कार्यक्रम में बाबू श्यामसुंदर दास के वंशज अशोक खन्ना,तथा भारतेन्दु के वंशज दीपेश चौधरी भी उपस्थित थे।