विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं श्रमण विद्या संकाय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2023 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में संस्कृत कवि सम्मान, पं. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन सं. सं. विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी की अध्यक्षता तथा मुख्य अतिथि के रूप में सोमनाथ संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. गोपबंधु मिश्र एवं विशिष्ट अतिथि के रूप में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय के पूर्व संकाय प्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र के सारस्वत सानिध्य में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, आ. लेखमणि त्रिपाठी के मंगलाचरण, बौद्ध दर्शन विभाग के बौद्ध मंगलाचरण, मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा विद्याश्री न्यास एवं श्रद्धानिधि न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर 2021, 2022 एवं 2023 के पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान से क्रमशः प्रो. कौशलेन्द्र पाण्डेय, प्रो. उपेन्द्र पाण्डेय तथा डाॅ. गायत्री प्रसाद पाण्डेय को मंचस्थ अतिथियों ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। इसी क्रम में इस वर्ष संस्कृत विद्या युवा प्रतिभा सम्मान से पं. ऋषि कुमार द्विवेदी को और उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान से विशिष्ट पुरस्कार-प्राप्त प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी, प्रो. धर्मदत्त चतुर्वेदी तथा उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से सौहार्द सम्मान-प्राप्त प्रो. पवन कुमार शास्त्री को भी सम्मानित किया गया। सम्मान-समारोह में प्रशस्ति-पत्र का वाचन प्रो. चंद्रकांता राय ने तथा शंखध्वनि एवं स्वस्ति-वाचन डाॅ. जयेन्द्रपति त्रिपाठी ने किया।
पं. क्षेत्रेश चंद्र चट्टोपाध्याय स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘कवि-समय का प्रवाह’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में प्रो. गोपबंधु मिश्र ने ‘कवि-समय’ या ‘कवि-प्रसिद्धि’ की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए उसके काव्यशास्त्रीय ही नहीं समाजशास्त्रीय पक्षों को भी निरूपित किया। काल-प्रवाह में कवि-प्रसिद्धियों की सुदीर्घ यात्राएँ जीवन में, और जीवन के लिए, विश्वास के बल को ही नहीं ; तर्क की, निरर्थकता को भी बखानती हैं, और सबसे बड़ी बात है कि वे इसे विद्या-बल से नहीं, अपने रचनात्मक पराक्रम से संपन्न करती हैं। उन्होंने कवि-प्रसिद्धियों के तमाम प्रकारों और प्रकरणों का उल्लेख करते हुए कवि-कर्म में शामिल उन घटकों की भी चर्चा की, जिन्हें हम आम तौर पर कवि-समय के तौर पर न जानते हैं, न मानते हैं, लेकिन जिनका मूल चरित्र बहुधा और बहुलांश में वही है। ध्यातव्य है कि प्राकृतिक उपादानों से मानवीय रिश्ते कायम करने की परंपरा हमारे यहाँ अद्यावधि अबाधित है। विद्वान वक्ता ने इन कवि-समयों को तमाम भाषिक भिन्नताओं के रहते भारत की सांस्कृतिक एकता की पहचान के रूप में भी प्रस्तावित किया। विशिष्ट अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने विभिन्न कवियों द्वारा एक ही कवि-समय के वैविध्यपूर्ण रचनात्मक उपयोग का सोदाहरण महत्त्वांकन करते हुए बताया कि कवि-प्रसिद्धियों को नित्य नूतन किए रखने की इस प्रविधि ने ही उन्हें काल-प्रवाह में निरन्तर उपस्थित रखा है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. हरेराम त्रिपाठी ने सबका समाहार करते हुए इस सारस्वत आयोजन को पं. विद्यानिवास मिश्र के वैदुष्य के अनुरूप बताया। विगत अठारह वर्षों से नियत तिथि को अनवरुद्ध चल रही यह संस्कृत काव्य-गोष्ठी अपने ढंग की अकेली भी है, अनूठी भी। उन्होंने स्मृति व्याख्यान के लिए कवि-समय के प्रवाह जैसे अत्यल्प-चर्चित विषय के चयन की भी प्रशंसा की और इस विषय के कुछ अछूते आयामों की तरफ भी संकेत किए।
संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत युवा कवियों के अतिरिक्त सर्वश्री कौशलेन्द्र पाण्डेय, उपेन्द्र पाण्डेय, गायत्री प्रसाद पाण्डेय, पवन कुमार शास्त्री, चंद्रकांता राय, विवेक कुमार पाण्डेय, उमाकांत चतुर्वेदी, कमला पाण्डेय, कमलाकांत त्रिपाठी, धर्मदत्त चतुर्वेदी, विजय कुमार पाण्डेय, शिवराम शर्मा, सदाशिव कुमार द्विवेदी, मनुलता शर्मा आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया। इस आयोजन के कुशल संयोजन और संचालन प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन प्रो. हरिकिशोर पाण्डेय ने किया।
सर्वश्री प्यारेलाल पाण्डेय, गोविन्द त्रिपाठी, गोविन्द मिश्र, अशोक सिंह, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल,पद उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, प्रकाश उदय, प्रतीक त्रिपाठी एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।
