अज्ञेय के जन्मदिवस 07 मार्च 2025 को कुशीनगर में आयोजित संगोष्ठी और काव्य संध्या की रिपोर्ट – डॉ गौरव तिवारी, कुशीनगर

सच्चिदानंद हीरानन्द वात्स्यायन अज्ञेय भारतीय साहित्य संस्थान समिति, श्रद्धाश्री न्यास, विद्याश्री न्यास, कलावती देवी स्मृति न्यास, बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर और राजकीय बौद्ध संग्रहालय, कुशीनगर के संयुक्त तत्वावधान में अज्ञेय के जन्मदिवस के अवसर पर सात मार्च 2025 को भारत चिंतन पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन आयोजन किया गया।

आयोजन की शुरुआत बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के संस्कृत विभाग के सहायक आचार्य डॉ सौरभ द्विवेदी के द्वारा किए गए मंगलाचरण से हुई। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ अरुणेश नीरन ने की। अतिथियों का स्वागत विद्याश्री न्यास, श्रद्धाश्री न्यास के सचिव श्री दयानिधि मिश्र ने किया। इस आयोजन में प्रसिद्ध कथाकार और कवि उदय प्रकाश को अज्ञेय स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया। कलावती देवी स्मृति न्यास द्वारा मिले इस सम्मान में उन्हें उत्तरीय, स्मृति चिह्न, प्रशस्ति पत्र और पच्चीस हजार रुपए दिए गए। पुरस्कार प्राप्ति के बाद अपने स्वीकृति वक्तव्य में उदय प्रकाश ने कहा कि अज्ञेय के नाम से दिए इस सम्मान को प्राप्त करना गर्व की बात है। उन्होंने कहा कि हिंदी साहित्य में आधुनिकता की शुरुआत अज्ञेय से होती है। वे स्वातंत्र्य बोध के साहित्यकार थे। उन्होंने अज्ञेय के जीवन से जुड़े कुछ संस्मरण भी सुनाए।

अष्टभुजा शुक्ल ने अज्ञेय स्मृति व्याख्यान देते हुए कहा अज्ञेय से ज्यादा शब्द केंद्रित कवि हिंदी में कोई दूसरा कवि नहीं हुआ। भाषा तो बन जाएगी मूल प्रत्यय शब्द है। शब्द की गरिमा रोज गिराई जा रही है। क्रूर होते जा रहे समय में अज्ञेय के भारत चिंतन पर बात करना बहुत महत्वपूर्ण है। कवि का पहला सरोकार सत्ता नहीं भाषा और मनुष्य है। भारतीय चिंतन परंपरा सूक्तियों की और सूत्रों की परम्परा है। अज्ञेय ढेर सारी बातें सूत्रों में करते हैं। वे कहते हैं अनंत काल तक जीना अमरत्व नहीं है। मृत्यु भी तो अनंत है। अमरत्व कोई क्षण कोई दृष्टि, कोई अनुभूति है। लोगों के लिए लोगों के द्वारा लोगों का शासन होते होते लोकतंत्र अज्ञेय के शब्दों में “अनपढ़ों के द्वारा अनपढ़ों के लिए अनपढ़ों का शासन” होता गया है।बूंद में समुद्र की शक्ति होती है। वैसे ही मनुष्य में असीम की शक्ति है। इसलिए बूंद होने का महत्व है। अज्ञेय की आधुनिकता और प्रतिबद्धता बूंदों के प्रति है। एक एक मनुष्य की इयत्ता के प्रति है।

उन्होंने अज्ञेय के प्रति अपनी प्रणति व्यक्त करते हुए कहा कि अज्ञेय जैसे विविध आयामी लेखक के भारत चिंतन जैसे विषय पर बात करना अत्यंत कठिन है। अज्ञेय के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है भाषा और भाषा से भी अधिक महत्वपूर्ण है शब्द। उन्होंने कहा कि उनके जानने में शब्द का अज्ञेय से बड़ा कवि कोई नहीं हुआ। अज्ञेय शब्द की प्रतिष्ठा के लिए बार-बार सबको सतर्क करते रहे। अज्ञेय के साथ एक संस्मरण को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि मैथिली शरण गुप्त की जन्म शताब्दी कार्यक्रम में अज्ञेय ने कहा था “कोई भी श्रेष्ठ लेखक या कवि की ललक राष्ट्रकवि होने की नहीं है क्योंकि यह एक राजनीतिक शब्द है।“ वर्तमान अति राजनीतिक समय में अगर कोई अराजनीतिक कवि या लेखक है तो वह अज्ञेय हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अज्ञेय का व्यक्तित्व सागर की तरह है, सागर की तरह गहरा, मौन और शांत। अज्ञेय बुद्धि के कपाट खोलने वाले लेखक हैं। उन्होंने अज्ञेय के साथ-साथ अन्य कवियों – मुक्तिबोध, शमशेर बहादुर सिंह, रघुवीर सहाय, धूमिल जैसे कवियों को याद किया तथा उनकी प्रसिद्ध पंक्तियों को सभागार में उपस्थित लोगों के साथ साझा किया। इस सत्र में दयानिधि मिश्र द्वारा संपादित अज्ञेय स्मृति व्याख्यानो पर केंद्रित पुस्तक और नर्मदा प्रसाद उपाध्याय द्वारा संपादित पुस्तक “चयनित निबंध : पंडित विद्या निवास मिश्र” का विमोचन भी अतिथियों के द्वारा किया गया। इस सत्र का संचालन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर में हिंदी के आचार्य प्रोफेसर गौरव तिवारी ने किया।

द्वितीय सत्र का विषय भारत चिंतन पर केंद्रित था। इस सत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रो अवधेश प्रधान ने कृष्ण बिहारी मिश्र के भारत चिंतन पर व्याख्यान देते हुए कहा कि उनकी विद्या भूमि काशी है तथा उनके लेखन का एक बड़ा भाग वह है जो उन्होंने अपने गुरुवार सामान लोगों पर लिखा है। उन्होंने बताया कि कोलकाता में रहते हुए भी कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने काशी और बलिया के अपने संस्कारों को धूमिल नहीं होने दिया। उन्होंने नवजागरण के सांस्कृतिक दृष्टिकोण को अपनाया। वे मुख्य रूप से विद्यासागर, दयानंद सरस्वती, रामकृष्ण, विवेकानंद आदि से प्रभावित थे। कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने गांधी जी, अज्ञेय, निर्मल वर्मा आदि को बार-बार उद्धरित किया है और सर्वधर्म समन्वय की बात की है। उन्होंने धर्म के आधार पर धर्मनिरपेक्षता की बात की। उन्होंने बताया कि भारत में धर्म ने कभी विज्ञान का विरोध नहीं किया बल्कि यहां तो नास्तिकों को भी ऋषि – मुनि कहा गया है। अपने अंतिम दिनों में कृष्ण बिहारी मिश्र जी ने विवेकानंद और परमहंस के भारत बोध पर काम किया इस ओर उस समय बहुत कम काम किया गया यह उनकी बड़ी उपलब्धि रही है। उन्होंने कहा कि भारतेंदु युग में हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में किसी संस्था के द्वारा किए जाने वाले कार्यों के बराबर अकेला कार्य कृष्ण बिहारी मिश्र ने किया। बनारस के साहित्यिक चरित्र और साहित्य पर उन्होंने बहुत आत्मीयता से लिखा। उन्होंने बताया कि कल्पतरु की उत्सव लीला में रामकृष्ण परमहंस की जीवनी के माध्यम से उन्होंने भारत के सांस्कृतिक विकास पर महत्वपूर्ण लेखन किया है।

वरिष्ठ कवि और आलोचक प्रो दिनेश कुशवाह ने कहा कि आगे, कृष्ण बिहारी मिश्र या विद्या निवास मिश्र के साहित्य में भारत चिंतन वह चिंतन नहीं है जो आज की राजनीतिक व्यवस्था के अंतर्गत दिखता रहता है। वह भारत की आत्मा को खोजने की कोशिश है।

पंडित विद्यानिवास मिश्र के भारत चिंतन पर चर्चा करते हुए गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर के अवकाश प्राप्त आचार्य प्रोफेसर चितरंजन मिश्र ने बताया कि पंडित जी का भारत उदार और सर्व समावेशी है। भारतीय परंपरा और सभ्यता की बात करते हुए उन्होंने बताया की परंपरा वह नहीं होती जो हमें पीछे ले जाती है बल्कि परंपरा वह होती है जो हमें श्रेष्ठता की ओर आगे ले जाती है। उन्होंने बताया कि पंडित जी का मानना था धर्म अलग-अलग नहीं है,भारत का धर्म केवल एक है मनुष्यता का धर्म,दूसरे को स्वयं से श्रेष्ठ मानना। पंडित जी का भारत सबको अपने में समेटने वाला है न कि बाटने वाला।

उन्होंने कहा कि विद्या निवास मिश्र अपने लेखन और चिंतन में भारत की संस्कृति का चिंतन करते हुए यह बताया है कि इतिहास की बार बार चर्चा करना प्रतिशोध के लिए खुद को तैयार करना और ललकारना होता है। विद्यानिवास मिश्र का भारत श्रेष्ठता के दंभ का भारत नहीं है, वह श्रेष्ठता के तत्वों की व्याख्या करते हुए सबको अपने में समेटने वाला भारत है। द्वितीय सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रो अनंत मिश्र ने कहा कि कल्याण और पवित्र शब्द की अवधारणा दुनिया की किसी भाषा में नहीं है। अज्ञेय और विद्यानिवास की वाणी में ज्ञान के तप की शक्ति है जो उन्हें महत्वपूर्ण बनाती है।

अतिथियों और संगोष्ठी में भाग लेने वालों का धन्यवाद ज्ञापन बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय कुशीनगर के प्राचार्य प्रो विनोद मोहन मिश्र ने किया। इस सत्र का संचालन डॉ आशुतोष तिवारी ने किया।

संगोष्ठी के बाद काव्य संध्या का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता वरिष्ठ कवि उदय प्रकाश ने की। इस काव्य गोष्ठी में अष्टभुजा शुक्ल, दिनेश कुशवाहा , प्रकाश उदय, इंद्र कुमार दीक्षित, दयाशंकर सिंह कुशवाहा, सरोज पाण्डेय, उद्भव मिश्र, अंजलि अस्थाना खुशबू, दिनेश तिवारी, सरिता मिश्र, केतन यादव आदि ने अपनी कविताएं पढ़ीं।

कार्यक्रम में प्रो महेश्वर मिश्र, परितोष मिश्र, उद्भव मिश्र डॉ सुधाकर तिवारी प्रो अमृतांशु शुक्ल, प्रो उर्मिला यादव, प्रो प्रशिला सैम, कालिंदी त्रिपाठी, प्रो सीमा त्रिपाठी, प्रो इंद्रासन प्रसाद, प्रो वीरेंद्र कुमार, प्रो कौस्तुभ नारायण मिश्र, प्रो राजेश कुमार सिंह, प्रो इंद्रजीत मिश्र, डॉ अनुज कुमार,डॉ निरंकार राम त्रिपाठी, डॉ त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, डॉ अजय कुमार सिंह, डॉ अनूप पटेल, डॉ अरुण कुमार, डॉ संजय गुप्त, डॉ अंबिका प्रसाद तिवारी, डॉ कृष्ण कुमार जायसवाल, डॉ सौरभ द्विवेदी, डॉ शंभू दयाल कुशवाहा, डॉ यज्ञेश त्रिपाठी, डॉ पंकज दुबे, डॉ सुबोध गौतम, डॉ दीपक, डॉ रामनवल, डॉ राजीव राय, डॉ मंजेश भारती, डॉ विशेषता मिश्र सहित अनेक साहित्य प्रेमी और विद्यार्थी उपस्थित रहे।