हिन्दी की धरोहर : काशी की सृजन परंपरा के सातवें चरण के रूप में काशी की हास्य-व्यंग्य परंपरा में श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड, बेढब बनारसी तथा अन्नपूर्णानंद के व्यापक अवदान पर गंभीर परिचर्चा – 29 अक्टूबर 2025

राजकीय जिला पुस्तकालय में ‘हास्य-व्यंग्य परंपरा’ पर गंभीर मंथन

वाराणसी। एलटी कालेज स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में बुधवार को पं विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में संकल्पित योजनाओं की श्रृंखला में साहित्यिक संघ एवं विद्याश्री न्यास के संयुक्त तत्वावधान में हिन्दी धरोहर:काशी की सृजन परंपरा के सातवें चरण के रूप में काशी की हास्य-व्यंग्य परंपरा में श्री कृष्णदेव प्रसाद गौड, बेढब बनारसी तथा अन्नपूर्णानंद के व्यापक अवदान पर गंभीर परिचर्चा सम्पन्न हुई। अतिथियों द्वारा वाग्देवी के चित्र पर माल्यार्पण,कंचन सिंह परिहार द्वारा मंगलाचरण और अतिथियों के स्वागत से कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। विद्याश्री न्यास के सचिव डा.दयानिधि मिश्र ने परिचर्चा की विषय स्थापना के साथ सभी का स्वागत करते हुए आयोजन श्रृंखला के महत्व पर प्रकाश डाला। बताया कि इस श्रृंखलाबद्ध आयोजन के माध्यम से काशी के साहित्य का ऐतिहासिक दस्तावेज तैयार हो रहा है। कृष्णदेव प्रसाद गौड बेढब बनारसी के महत्त्व को रेखांकित करते हुए बीएचयू हिन्दी विभाग की डा.प्रीति त्रिपाठी ने कहा कि बनारस की माटी में जन्मे साहित्यकारों में बेढब बनारसी ने यहां की ठेठ बोली में समाज की सच्चाइयों हंसते-हंसते उजागर किया। उनकी रचनाओं में हास्य व्यंग्य और बनारसी ठेठ बोली का अनोखा रंग झलकता है। आमजन की बात को उन्होंने मुस्कुराहट और चुटकी में कह डाला। बेढब की कविता हंसी के बीच छिपे संदेश की कविता है यही उनकी पहचान है। आज की श्रृंखला के अन्य रचनाकार अन्नपूर्णानंद के महत्व की चर्चा करते हुए प्रोफेसर श्रध्दानंद ने कहा कि अन्नपूर्णानंद जी ने भारतेंदु के पश्चात हास्य व्यंग की धारा को जीवंत किया। नौ रसों में हास्य रस की सदा उपेक्षा की गई है, जबकि हास्य रस संघर्ष भरे इस जीवन की संजीवनी है। अन्नपूर्णानंद जी ने हास्य रस की इस सूखती धारा को अपनी रोचक एवं हास्य पूर्ण कहानियों के द्वारा सरस बनाया। उन्होंने शिष्ट हास्य-व्यंग्य के माध्यम में न केवल व्यक्ति, समाज और देश के विविध रूप रंगों को बखूबी टटोला, बल्कि साहित्य में हास्य रस के अभाव को भावमय किया। जीवन में संघर्ष और तनाव की स्थिति हर क़ाल खंड में बनी रहती है, ऐसे क्षण में सीख और सुख मिलने में हास्य व्यंग की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने फूहड़ता के विरुद्ध शिष्ट और मर्यादित हास्य रस की सर्जना की। वे हास्य व्यंग के अद्भुत शैलीकार हैं। उनकी तुलना अंग्रेजी के प्रसिद्ध हास्य व्यंग्य लेखक मार्कट्वेन से तथा बंगाल के प्रसिद्ध लेखक परशुराम से की जाती है। उनकी महाकविचच्चा, मगन रहु चोला, मंगलमोद, मेरी हजामत, मन मयूर,मिसिर जी आदि आधुनिक हिंदी साहित्य जगत की अद्वितीय रचनाएं हैं। अध्यक्षता करते हुए डॉक्टर शशिकला पांडेय ने कहा कि काशी में प्रेमचंद और जयशंकर प्रसाद के बाद एकदम सन्नाटा छा गया था, देश की आजादी का आंदोलन अपने चरम पर था। ऐसे समय में काशी के इन रचनाकारों ने साहित्य की हास्य व्यंग की धारा को सशक्त करते हुए साहित्य को एक नए रंग से सजाया। इस परंपरा में पहला नाम बेढब बनारसी जी का आता है, उन्होंने अपनी व्यंग्य रचनाओं से अंग्रेजी सरकार को सीधी चुनौती दी। श्री अन्नपूर्णानंद ने पहली बार गद्य विधा में हास्य प्रस्तुत किया। धन्यवाद ज्ञापन सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने तथा संचालन डॉक्टर अत्रि भारद्वाज किया।इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ राम सुधार सिंह, डॉक्टर प्रकाश उदय ,डॉक्टर अशोक सिंह, शरद श्रीवास्तव, कवींद्र नारायण सहित बड़ी संख्या में छात्र एवं छात्राएं उपस्थित थे।