हिंदी की धरोहर काशी की सृजन परंपरा एवं विद्याश्री न्यास वाराणसी का संयुक्त का आयोजन। पंडित विद्यानिवास मिश्र के जन्म शताब्दी वर्ष में संकल्पित श्रृंखला के द्वादश पुष्प के रूप में आज अर्दली बाजार स्थित राजकीय जिला पुस्तकालय में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी तथा आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के अवदान पर चर्चा हुई। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्यिक अवदान पर बोलते हुए बसंत महिला महाविद्यालय हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष एवं साहित्यकार प्रोफेसर शशि कला त्रिपाठी ने कहा कि आचार्य द्विवेदी आलोचना की नई परंपरा में प्रमुख थे। बड़ा लेखक वही होता है जो अपने समकालीन को ही नहीं, अगली पीढ़ी को भी प्रभावित करें। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी काशी की पंडित की परंपरा के ऐसे ही उद्भट विद्वान लेखक थे ।हजारी प्रसाद द्विवेदी समावेशी समाज- संस्कृति के पक्षधर थे। उन्होंने संस्कृति की अनेक अंतर्धाराओं को पहचाना और उसे श्रेष्ठ परंपरा के रूप में रेखांकित किया ।आचार्य पंडित श्री राम चतुर्वेदी के योगदान को रेखांकित करते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की पूर्व प्रोफेसर एवं जननायक चंद्रशेखर विश्वविद्यालय बलिया की पूर्व कुलपति प्रोफेसर कल्पलता पांडे ने कहा कि पंडित जी बहुआयामी व्यक्तित्व, ओजस्वी वक्ता, निर्भीकता, अनुशासन प्रियता, कला एवं नाटक के क्षेत्र में नवीन सृजनात्मकता आपको अत्यंत विशिष्ट बनाती है। चतुर्वेदी ने गद्य में जीवन चरित्र, उपन्यास, कहानी, ललित निबंध, चिंतन पूर्ण लेखन ,संस्मरण ,रेखा चित्र आदि सभी विधाओं में पर्याप्त लेखन किया। आपके जीवन का सूत्र वाक्य न दैन्यम् न पलायनम् था, जिसका पालन अपने पूरे जीवन किया। अध्यक्षता करते हुए कथा लेखिका डॉक्टर भगवंती सिंह ने कहा कि आज के इस आयोजन में जिन दो विशिष्ट साहित्यकारों पर विस्तार से चर्चा हुई है, दोनों का हिंदी साहित्य के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी के सर्वश्रेष्ठ विद्वान, ज्योतिषाचार्य एवं हिंदी तथा संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे। बाणभट्ट की आत्मकथा उनका सर्वश्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक उपन्यास है। सूर साहित्य, हिंदी साहित्य का आदिकाल, कबीर आदि उनके अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं हैं ।आचार्य सीताराम सरस्वती हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान थे। उन्होंने हिंदी भाषा और साहित्य की सेवा में संपूर्ण जीवन लगा दिया ।समारोह का एक विशेष आकर्षण रहा हैदराबाद से पधारे हिंदी के वरिष्ठ कवि वेणुगोपाल भट्टड का होना ,जिन्होंने अपने हिंदी के हाइकू एवं व्यंग्य रचनाएं सुनाकर कर लोगों को भाव विभोर कर दिया। दीप प्रज्वलन एवं दोनों रचनाकारों के चित्र पर माल्यार्पण के उपरांत कार्यक्रम में सरस्वती वंदना पुस्तकालयाध्यक्ष कंचन सिंह परिहार ने किया ।प्रारंभ में सभी का स्वागत करते हुए विद्याश्री न्यास के सचिव डॉक्टर दयानिधि मिश्र जी ने कहा कि पंडित विद्यानिवास मिश्र के शताब्दी वर्ष में प्रारंभ हुए इस आयोजन का यह 12वां पुष्प है ।इसमें जिन दो विभूतियों पर आज चर्चा की गई, उन पर काशी की साहित्य परंपरा को अत्यंत गर्व है ।कार्यक्रम का संचालन कवयित्री डॉक्टर मंजरी पांडे ने तथा धन्यवाद प्रकाश सोच विचार पत्रिका के संपादक नरेंद्र नाथ मिश्रा ने किया । इस अवसर पर प्रकाश उदय, डा. राम सुधार सिंह, प्रभात झा, शिवकुमार पराग, कवींद्र नारायण,ओम धीरज,पवन कुमार शास्त्री, सुरेंद्र वाजपेई, अशोक कुमार सिंह, गौतम अरोड़ा सरस,शरद श्रीवास्तव, वासुदेव ओबेरॉय आदि कवि लेखक एवं साहित्यिक जन उपस्थित रहे।
