सदा सजग रहे समाज की सज्जन-शक्ति : 14 फरवरी 2026

विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं श्रमण विद्या संकाय, संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2026 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में *रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान, पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर बिहारी लाल शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, आचार्य अंकित राज दूबे के वैदिक मंगलाचरण, आ. लेखमणि त्रिपाठी के पौराणिक मंगलाचरण, बौद्ध भिक्षुओं के बौद्ध मंगलाचरण, आ. अंकितराज दूबे और श्रीकृष्ण शर्मा के स्वस्तिवाचन और शंखध्वनि के बीच मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा श्रमण विद्या संकाय के अध्यक्ष प्रो. रमेश प्रसाद के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर वर्ष 2026 के ‘पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान’ से संस्कृत भाषा-साहित्य के विश्रुत विद्वान कविवर प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी को, मंचस्थ अतिथियों एवं डा दयानिधि मिश्र ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया।

श्रद्धानिधि न्यास द्वारा प्रवर्तित पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘साहित्यशास्त्र में भक्तिभाव एवं रस-पर्यावलोचन’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी ने आचार्य भरत से लेकर पंडितराज-पर्यंत रसतत्व का समीक्षात्मक विश्लेषण किया। इस क्रम में उन्होंने साहित्यशास्त्रियों के साथ ही रूपगोस्वामी और करपात्री जी जैसे संतों के भक्ति-संबंधी बोध और वैचारिकी का भी महत्त्व-प्रतिपादन किया। मुख्यअतिथि केंद्रीय उच्च तिब्बती शिक्षा संस्थान के कुलपति ने अपने संबोधन में विद्यानिवास जी के यथानाम व्यक्तित्व और कृतित्व को याद करते हुए ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की अवधारणा वाली भारतीय संस्कृति को आज की अनिवार्य आवश्यकता के रूप में रेखांकित किया और सबसे सबके जुड़ाव का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वसुधैव कुटुंबकम भारतीय दर्शन (महा उपनिषद) पर आधारित है, जो भौगोलिक सीमाओं से ऊपर उठकर करुणा, समानता और साझा जिम्मेदारी के माध्यम से एक समृद्ध भविष्य के निर्माण को बढ़ावा देता है। विशिष्ट अतिथि के रूप में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रांत संपर्क प्रमुख श्री दीनदयाल पांडेय ने पंडित जी की बहुमुखी प्रतिभा को सबके लिए प्रेरणादायी है उन्होंने कहा कि इसी के चलते उनकी कीर्ति एक छोटे-से गाँव से चलकर दिग्दिगंत तक छा गई। उन्होंने करणीय के तौर पर लोकहित को रेखांकित किया और कहा कि सभ्यता और संस्कृति की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि समाज की सज्जन-शक्ति सोने न पाए, सदा सजग रहे।

अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. बिहारी लाल शर्मा ने इस और ऐसे संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतिनिष्ठ आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित किया। कहा कि विद्यानिवास जी शास्त्र और लोक दोनो के ज्ञाता और उद्गाता ही नहीं, उनकी गहनता और सहजता को धारण करने वाले भी थे। जड़ों से जुड़ाव और आधुनिकता से निरंतर संवाद -दोनो को उन्होंने साधा भी और इस साधना के लिए प्रेरित भी किया।

प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी की अध्यक्षता में संपन्न संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत प्रो. गायत्री प्रसाद पाण्डेय (पुनरवतारम् धारय माधव रक्षतु भारत देश:), प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी (विद्यानिवास गुरवो विलसंति कीर्त्या:), प्रो. सदाशिव कुमार द्विवेदी( नित्यं शास्त्र समर्पितेन विधिना देवस्य संपूजनम्), प्रो. विवेक पाण्डेय (‘सौमनस्यम्’ , ‘प्रिय ते दर्शनमिच्छामि सदा’ ), प्रो शैलेश तिवारी ( ‘दयित ददन दद दमित मदन मद’ और ‘नवमधुमास समागम समये’) आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया।

इस सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और संचालन प्रो. हरिप्रसाद अधिकारी ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया।

सर्वश्री नरेन्द्र नाथ मिश्र , डा राम सुधार सिंह, प्यारेलाल पाण्डेय, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल, वीरेंद्र राम त्रिपाठी, उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, आशीष मणि त्रिपाठी, शुभंकर बाबू, सत्येंद्र, ओमप्रकाश पांडेय, प्रकाश उदय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।