विद्याश्री न्यास, श्रद्धानिधि न्यास एवं संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के संयुक्त तत्वावधान में पं. विद्यानिवास मिश्र की पुण्यतिथि पर 14 फरवरी 2025 को योग साधना केंद्र, सं. सं. विश्वविद्यालय में संस्कृत कवि सम्मान, पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यान एवं संस्कृत कवि-गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह आयोजन काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृतविद्या धर्मविज्ञान संकाय के पूर्व संकायप्रमुख प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। आयोजन का शुभारंभ मंचस्थ अतिथियों द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन तथा माँ सरस्वती एवं पंडित विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्री लेखमणि त्रिपाठी के वैदिक मंगलाचरण, मंचस्थ अतिथियों के सम्मान तथा विद्याश्री न्यास एवं श्रद्धानिधि न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र के भावपूर्ण स्वागत-भाषण से हुआ। इस अवसर पर वर्ष 2025 के ‘पं. रामरुचि त्रिपाठी संस्कृत कवि सम्मान’ से संस्कृत भाषा-साहित्य के विश्रुत विद्वान कविवर प्रो. गोपबंधु मिश्र को, मंचस्थ अतिथियों एवं डाॅ. दयानिधि मिश्र ने माला, नारिकेल, उत्तरीय, पुस्तक, प्रतीक-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से समारोहपूर्वक सम्मानित किया। अपने स्वीकृति-वक्तव्य में प्रो. गोपबंधु मिश्र ने पं. विद्यानिवास मिश्र के व्यक्तित्व-कृतित्व का अत्यंत श्रद्धापूर्वक स्मरण किया। उन्होंने पंडित जी की वैचारिक प्रामाणिकता, भारतीय संस्कृति के प्रति उनकी अविचल निष्ठा के साथ ही उनके रचनाकर्म में निहित व्यंगात्मकता और उत्तरोत्तर गहनतर होती गई सामाजिकता की विशेषतः चर्चा की।
श्रद्धानिधि न्यास द्वारा प्रवर्तित पं. मुनिवर मिश्र स्मृति व्याख्यानमाला के अंतर्गत ‘महाभारत की कथाभूमि’ विषय पर अपने सुचिन्तित व्याख्यान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा-साहित्य के पूर्व आचार्य प्रो. जयशंकर लाल त्रिपाठी ने महाभारत-संबंधी विमर्श के क्षेत्र में पं. विद्यानिवास मिश्र की रचना ‘महाभारत का काव्यार्थ’ के मूल्य और महत्त्व को स्थापित किया। उन्होंने कहा कि महाभारत में वर्णित अनेक आख्यान-उपाख्यान हैं जिनके आधार पर संस्कृत सहित विभिन्न भाषाओं में विविधविध साहित्य-रचना हुई है। कालिदास प्रभृति रचनाकारों की कृतियाँ तो विश्वविख्यात हुईं, लेकिन मूल कथाओं का अपना सौंदर्य है, अपना स्वरूप है। व्यास की शैली और कथा की बनावट-बुनावट नवीन अध्येताओं और शोध-छात्रों के लिए समीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।महाभारत आदि आर्ष ग्रंथों के मूलरूप के अध्ययन के महत्त्व को विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से स्थापित किया।
संस्कृत कवि-गोष्ठी के अंतर्गत प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र, श्री पवन कुमार शास्त्री, प्रो. चंद्रकांता राय, प्रो. गायत्री प्रसाद पाण्डेय, प्रो. विवेक पाण्डेय, प्रो.कमला पाण्डेय, प्रो. विजय पाण्डेय आदि ने शाश्वत-सामयिक विविध विषयों को लेकर भावपूर्ण काव्य-पाठ किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. विंध्येश्वरी प्रसाद मिश्र ने इस और ऐसे संस्कृतनिष्ठ और संस्कृतनिष्ठ आयोजनों की उपादेयता को रेखांकित करते हुए यह भी बताया कि कैसे महाभारत की कथा हमारी सभ्यता का आख्यान है। उन्होंने अपने काव्य-पाठ से भी अपने उद्बोधन को संपन्न और सहृदय समाज को मंत्रमुग्ध किया।
इस सारस्वत आयोजन का कुशल संयोजन और संचालन प्रो. चंद्रकांता राय ने किया। धन्यवाद-ज्ञापन विद्याश्री न्यास के सचिव डाॅ. दयानिधि मिश्र ने किया।
सर्वश्री राजनाथ त्रिपाठी, उमेश त्रिपाठी, सुजीत कुमार सिंह, राम सुधार सिंह, प्यारेलाल पाण्डेय, सुरेन्द्र प्रजापति, अशोक शुक्ल, शारदा, गोविन्द त्रिपाठी, वीरेंद्र राम त्रिपाठी, उदयन मिश्र, ध्रुवनारायण पाण्डेय, आशीष मणि त्रिपाठी, शुभंकर बाबू, प्रकाश उदय एवं संस्कृत विश्वविद्यालय के छात्रों-शिक्षकों की उपस्थिति ने इस आयोजन की गरिमा की श्रीवृद्धि की।
