जन्मोत्सव : साहित्योत्सव ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर (14-15 जनवरी 2025)

पं. विद्यानिवास मिश्र जन्मशती समारोह (2025-26)
विद्याश्री न्यास के सांवत्सर उपक्रमों में से एक, पं. विद्यानिवास मिश्र के जन्मदिवस 14 जनवरी के आसपास आयोजित होने वाली राष्ट्रीय संगोष्ठी एवं भारतीय लेखक-शिविर इस वर्ष (2025) ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ पर केंद्रित था। उल्लेखनीय है कि यह वर्ष पंडित जी का जन्म-शताब्दी वर्ष है और इस आयोजन के साथ ही न्यास द्वारा संकल्पित वर्षपर्यंत चलने वाले विभिन्न सांस्कृतिक-साहित्यिक उत्सवों-समारोहों का भी श्रीगणेश हुआ।

इस दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी और भारतीय लेखक-शिविर को, जन्म-शताब्दी वर्ष के वैशिष्ट्य के अनुरूप, धर्मसंघ शिक्षामंडल के, विद्यानिवास जी को अतिशय प्रिय राधा-माधव के युगल भाव से सुसज्जित सभागार में आयोजित किया गया। आयोजन का शुभारंभ उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डाॅ. दयाशंकर मिश्र ‘दयालु’ ( आयुष्य राज्यमंत्री, स्वतंत्र प्रभार, उत्तर प्रदेश ), अध्यक्ष प्रो. सुनील कुलकर्णी ( निदेशक, केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा), विशिष्ट अतिथियों प्रो. आनंद कुमार त्यागी ( कुलपति, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ ), श्री धर्मेंद्र सिंह ( सदस्य, विधान परिषद, उत्तर प्रदेश ), डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र ( प्रधान संपादक, ‘सोच-विचार’ पत्रिका, वाराणसी ), डाॅ. अरुणेश नीरन ( पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर बुद्ध महाविद्यालय, कुशीनगर ), प्रो. सदानंद शाही ( पूर्व अध्यक्ष, हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय ) एवं प्रो. गिरीश्वर मिश्र ( पूर्व कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा ) तथा डाॅ. दयानिधि मिश्र ( सचिव, विद्याश्री न्यास ) द्वारा दीप-प्रज्ज्वलन, माँ सरस्वती और पं. विद्यानिवास मिश्र के चित्रों पर माल्यार्पण, श्रीकृष्ण शर्मा और डाॅ. ध्रुवनारायण पांडेय की शंख-ध्वनि, श्री जयेंद्रपति त्रिपाठी के वैदिक स्तवन, श्रीयुत श्रीनिवास विलासराव इनामदार के घनपाठ और प्रो. उमापति दीक्षित के पौराणिक मंगलाचरण से हुआ। इस अवसर को आयुष्मान रिदित मिश्र के तबला-वादन , आयुष्मती आतुषी मिश्र के वीणा-वादन एवं श्री प्रीतम मिश्र के गायन ने एक विशिष्ट गरिमा प्रदान की। प्रो. अरविंद मिश्र, प्रो. श्रद्धानंद, प्रो. उदयन मिश्र और प्रो. ऋतंधर मिश्र ने माल्यार्पण, उत्तरीय, नारिकेल, पुस्तक एवं प्रतीक-चिह्न से मंचस्थ अतिथियों का स्वागत किया। डाॅ. अरुणेश नीरन ने स्वागत-भाषण के साथ ही संगोष्ठी के विषय को प्रस्तावित करते हुए हिंदी उपन्यास के महत्त्वपूर्ण पड़ावों और युगांतर उपस्थित करने वाली कृतियों के उल्लेख के साथ विमर्श के विभिन्न आयामों की तरफ मूल्यवान संकेत किए।

उद्घाटन सत्र की आनुषंगिक कड़ी के रूप में लोकार्पण-समारोह के अंतर्गत जन्मशती वर्ष के उपलक्ष्य में पंडितजी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित दो पत्रिकाओं ‘सोच-विचार’ और ‘वीणा’ के साथ ही ‘नान्दी’ पत्रिका और डाॅ. दयानिधि मिश्र तथा प्रो. गिरीश्वर मिश्र द्वारा संपादित पुस्तकों ‘लोक, लोकतंत्र और मीडिया’ (सस्ता साहित्य मंडल), ‘समवेत का सौंदर्य’, ‘रामकथा मंदाकिनी’, ‘भारत और भारतीयता’, ‘पलाश के फूल की दहक’, ‘शिरीष का आग्रह’, ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि’ ( सभी प्रलेक प्रकाशन ), धर्मेंद्र सिंह संपादित ‘अविनाशी काशी’ के अतिरिक्त ‘भाषा-दर्शन’, ‘प्रियांश’, ‘मरुस्थल’ तथा ‘मृणाल सेन और उनका सिनेमा’ जैसी दर्जनाधिक पुस्तक-पत्रिकाओं का लोकार्पण संपन्न हुआ। डाॅ. राम सुधार सिंह ने इन सभी लोकार्पित कृतियों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया।

उद्घाटन सत्र की दूसरी आनुषंगिक कड़ी सम्मान-समारोह के अंतर्गत इस वर्ष के ‘विद्यानिवास मिश्र स्मृति सम्मान’ से श्रीयुत श्रीप्रकाश मिश्र को, लोककवि सम्मान से डाॅ. बलभद्र को, श्रीमती राधिका देवी लोककला सम्मान से श्री रामजनम भारती को, पत्रकारिता सम्मान से श्री राकेश कुमार शर्मा को तथा श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से श्री नरोत्तम शिल्पी को माला, नारिकेल, उत्तरीय, स्मृति-चिह्न, प्रशस्ति-पत्र एवं सम्मान-राशि से शंख-ध्वनि एवं स्वस्तिवाचन सहित समारोहपूर्वक सम्मानित किया गया। सम्मानित विभूतियों के परिचय तथा प्रशस्ति-वाचन का दायित्व सुश्री अंजलि मिश्र ने निभाया। अपरिहार्य कारणों से श्री राकेश कुमार शर्मा सम्मान-समारोह में उपस्थित नहीं हो सके। इस अवसर पर स्वीकृति वक्तव्य के साथ ही उनसे विशेष आग्रहपूर्वक उनकी कविताएँ भी सुनी गईं।

बीज-वक्तव्य प्रस्तुत करते हुए प्रो. सदानंद शाही ने कहा कि हिंदी साहित्य में यूरोप से आगत विधाओं में से सर्वाधिक लोकप्रियता उपन्यास ने ही अर्जित की, इस वैशिष्ट्य के साथ कि इस पश्चिमी विधा को हिंदी ने ही नहीं, हिंद ने ही, अपने ही रंग-ढंग से विकसित किया। जिस मध्यवर्ग की विधा इसे माना गया, हिंदी में उसकी जगह शुरुआती दौर में किसानों और वंचितों ने ली, स्त्रियों ने विशेषतः। आज भी हिंदी उपन्यासों की मुख्य धारा में मुख्यतः वही हैं जो सामाजिक जीवन की मुख्य धारा में नहीं हैं। प्रो. आनंद कुमार त्यागी ने इस सारस्वत आयोजन और उसमें एक साथ इतनी पुस्तकों के लोकार्पण को पंडित जी के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कथा के लिए जीवन को जितनी, जीवन के लिए कथा को भी उतनी ही बड़ी जरूरत के तौर पर निरूपित किया। शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद डाॅ. जितेंद्र नाथ मिश्र की गरिमामय उपस्थिति ने इस आयोजन को संपन्नतर किया। ‘काशी अविनाशी’ के रचयिता श्री धर्मेंद्र सिंह ने उसी अविनाशी काशी की एक धरोहर के रूप में विद्यानिवास जी के व्यक्तित्व और कृतित्व को याद किया। मुख्य अतिथि श्री दयाशंकर मिश्र दयालु ने पंडित जी के साथ ही काशी की पांडित्य-परंपरा का उल्लेख करते हुए इस आयोजन से अपने जुड़ाव को एक ऐसे सौभाग्य के रूप में उद्धृत किया जो आत्मा को बल देता है, आध्यात्मिक रूप से उन्नत करता है। अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. सुनील कुलकर्णी ने लोकार्पित कृतियों और सम्मानित विभूतियों के साथ ही प्रस्तुत वक्तव्यों के हवाले से इस और ऐसे सारस्वत आयोजनों को समकालीन भारत की सांस्कृतिक अनिवार्यता के रूप में रेखांकित किया। पंडित विद्यानिवास मिश्र को भारत-भाव के कथा-प्रवाह के दीप्त चरित के रूप में याद करते हुए उन्होंने उनके जन्मशती वर्ष के आगामी आयोजनों में अपने और केंद्रीय हिंदी संस्थान के सतत सहभागी होने की प्रतिबद्धता जताई। इस सत्र का संयोजन प्रकाश उदय ने किया।

दूसरे अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वतंत्रतापूर्व’ की शुरुआत डाॅ. श्रुति पाण्डेय (शिलांग, मेघालय) के वक्तव्य से हुई। मुक्ति-चेतना के ब्याज से स्वतंत्रतापूर्व के हिंदी उपन्यासों में निहित स्त्री-मुक्ति और भारत मुक्ति की समानांतर और उत्तरोत्तर दृढ़ होती गई आवाज को उन्होंने उदाहरणों के साथ प्रस्तुत किया। डाॅ. प्रभात मिश्र ने हिंदी उपन्यासों के विशिष्ट संदर्भ में भारतीय मध्यवर्ग की अपनी पहचान से हिंदी उपन्यासों की अपनी पहचान के बनने की बात कही। भारतीय मध्यवर्ग के घटनाबहुल जीवन से जुड़कर ही संभवतः हिंदी के प्रारंभिक उपन्यास घटनाओं के घटाटोप से घिरे रहे हैं। इस मध्यवर्ग के स्वरूप में आए बदलाव के साथ ही उपन्यासों के स्वरूप में भी आते बदलाव को महसूस किया जा सकता है। प्रो. वशिष्ठ अनूप ने प्रेमचंद को भारतीय किसानों के सर्वाधिक विश्वसनीय कथाकार के रूप में आँकते हुए, कृषि-जीवन की उनकी समझ के साथ ही उनके और हिंदी के उपन्यासमात्र के, शिल्प और संवेदना दोनो दिशाओं में, उत्तरोत्तर विकास को निरूपित किया। प्रो. बलराज पाण्डेय ने हिंदी उपन्यास के प्रारंभिक से लेकर अब तक के विकास का एक रोचक आख्यान प्रस्तुत करते हुए उसकी उपलब्धि के रूप में निम्न वर्ग और निम्न वर्ण और चाहे जिस बहाने, जिन तरीकों, दबाई-कुचली गई आवाजों को आवाज देने के हथियार के रूप में बनी और बनती रही पहचान को रेखांकित किया। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में डाॅ. विश्वास पाटिल ने मुक्ति-चेतना के विभिन्न आयामों की चर्चा करते हुए उन्हें धारण करने वाले स्वतंत्रतापूर्व के प्रतिनिधि उपन्यासों और उपन्यासकारों के वैशिष्ट्य का व्याख्यान किया। सुचिंतित टिप्पणियों के साथ इस सत्र का सफल संयोजन डाॅ. प्रीति जायसवाल ने किया।

तीसरा अकादमिक सत्र ‘हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि : स्वातंत्र्योत्तर चार दशक’ प्रो. चितरंजन मिश्र की अध्यक्षता में संपन्न हुआ। डाॅ. अखिलेश मिश्र ने आजादी के बाद के बहुविध मोहभंग और चतुर्दिक ह्रासोन्मुखता और सांप्रदायिक वैमनस्य को तब के उपन्यासों झूठा सच, तमस, आधा गाँव, कितने पाकिस्तान आदि के माध्यम से पढ़ने की कोशिश की। डाॅ. कुमार वरुण ने बैल की आँख, माधोपुर का घर आदि उपन्यासों के जरिए बिहार के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक जीवन को रेखांकित होते हुए दिखाया। डाॅ. मधुबाला शुक्ल ने विभाजन की त्रासदी और सांप्रदायिक उन्माद के सामाजिक प्रभाव के औपन्यासिक पाठ के रूप में राही मासूम रजा के कथा-कर्म को प्रस्तुत किया। डाॅ. नरेंद्र नाथ राय ने मुक्ति-चेतना के कथा-पाठ को आपातकाल के विशेष संदर्भ में लिया और हिंदी उपन्यासों पर वैश्विक घटनाओं-परिघटनाओं के प्रभाव का भी मूल्यांकन किया। डाॅ. रंजन पांडेय ने पाहीघर, बेदखल, डूब, पार, माँ का आँचल आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों में बदलते हुए गाँवों के प्रवेश को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि होरी तो खैर अपने सामने आई चुनौतियों से जूझ रहा था, अब के किसानों के पास इसकी भी क्षमता नहीं बची। प्रो. सत्यदेव त्रिपाठी ने बताया कि प्रेमचंद के गाँव-केंद्रित उपन्यासों के बाद एक वक्त आया जब रेणु के यहाँ नायक शहर से उठकर गाँव आए, बहुत कुछ अच्छा-अच्छा करने के इरादे लेकर, लेकिन उसके बाद गाँवों का हाल कुछ इस कदर बेहाल हुआ कि चाहे ‘अलग-अलग वैतरणी’ का देवनाथ उपाध्याय हो या मास्टर शशिकांत या ‘रागदरबारी’ का रंगनाथ या ‘जल टूटता हुआ’ का सतीश — सबको गाँव छोड़कर भागना पड़ा। यह छोड़कर भागना नायकों का ही नहीं है, बहुत कुछ कथाकारों का भी है, यही वजह है शायद कि हिंदी उपन्यासों की कथाभूमि के रूप में गाँव अब जब-तब है। प्रो. अवधेश प्रधान ने हजारी प्रसाद द्विवेदी के सांस्कृतिक उपन्यास ‘बाणभट्ट की आत्मकथा’ पर केंद्रित होते हुए बताया कि कैसे वह एक तरफ स्त्री-मुक्ति का ताना-बाना बुनता है, दूसरी तरफ दूसरे विश्वयुद्ध की भी छाया छूता है, और तीसरी तरफ अपनी सामाजिक विषमता पर चोट करते हुए पूर्व की धार्मिक उदारता और पश्चिम की सामाजिक उदारता के गँठजोड़ की जरूरत की तरफ भी संकेत करता है। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. चितरंजन मिश्र ने सबके समाहार के साथ ही बताया कि समस्याएँ भी और उनके समाधान के लिए संघर्ष भी बहुत है, और बहुविध है। संवेदनाओं के इतने रंग हैं कि कई बार वे एक-दूसरे को काटते हुए भी नजर आते हैं। ऐसे में कथाभूमि का चयन और उसका निर्वाह भी बेशक निरंतर कठिन होता जा रहा है, लेकिन अपनी कथा-प्रतिभा पर अविश्वास की भी कोई वजह नहीं दिखती। डाॅ. रचना शर्मा ने इस सत्र का संयोजन किया।

चौथे सत्र को ‘पं. हरिराम द्विवेदी स्मृति काव्य-संध्या’ के रूप में आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता प्रो. वशिष्ठ अनूप ने की तथा संयोजन किया डाॅ. अशोक सिंह ने। इस काव्य-संध्या को अध्यक्षीय और संयोजकीय काव्य-पाठ के अतिरिक्त सर्वश्री शरद श्रीवास्तव, अभिनव अरुण, धर्मप्रकाश मिश्र, रचना शर्मा, विजय जी, मासूम जी, प्रतीक त्रिपाठी, अंजलि मिश्र, हिमांशु त्रिपाठी, अंकित मिश्र, संगीता श्रीवास्तव, नसीमा निशा, अखलाक साहब, आलोक सिंह, बेताल जी, नागेश शांडिल्य, कंचन सिंह परिहार, महेंद्र श्रीवास्तव, सविता सौरभ, धनंजय जी और इस वर्ष श्रीकृष्ण तिवारी गीतकार सम्मान से सम्मानित नरोत्तम शिल्पी प्रभृति कवियों ने अपने काव्यपाठ से संपन्न किया।

आयोजन के दूसरे दिन, 15 जनवरी का शुभारंभ पंचम सत्र के रूप में पं. विद्यानिवास मिश्र स्मृति व्याख्यान से हुआ। विषय था ‘हिंदी उपन्यास : रचना-विधान और विकास-क्रम। मुख्य वक्तव्य प्रो. दिलीप सिंह का था और उनके अतिरिक्त दो और महत्त्वपूर्ण वक्तव्य प्रो. प्रभाकर सिंह और डाॅ. इंदीवर के हुए। इस सत्र की अध्यक्षता प्रो. श्रद्धानंद ने की और इसका संयोजन किया डाॅ. बिजेंद्र पांडेय ने। अपने मुख्य वक्तव्य मे प्रो. दिलीप सिंह ने रचना-विधान के सौष्ठव की दृष्टि से कृति के विश्लेषण और परख के आग्रह के साथ कहा कि यदि हिंदी उपन्यास-यात्रा के आदि से आज तक के विकास-क्रम को देखें तो पाएँगे कि यह अपने भीतर सरल, हास्यमय, रहस्यमय, चामत्कारिक, गंभीर, सुखद, दुखद अनेक गद्यरूप समेटे हुए है। यह गुंफन ही हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को विचारणीय बनाता है। उन्होंने रचना-विधान के गठाव के आधार पर ही हिंदी के पहले उपन्यास को तय करने की बात कही। चंद्रकांता के रूप में, उन्होंने लक्ष्य किया कि अपने जन्म के दस ही बरस बाद हिंदी उपन्यास की भाषा दौड़ती-भागती, लहराती-मचलती, उछलती-कूदती हमारे सामने आ गई। रचना-विधान की इसी ठोस जमीन पर समाजगत मूल्यवत्ता में निहित अर्थवान तत्वों को पकड़ते हुए प्रेमचंद सामने आए। उन्होंने हिंदी उपन्यास के रचना-विधान को नए-नए मोड़ से संपन्न करने वाले उपन्यास के रूप में प्रसाद, निराला, जैनेंद्र, अज्ञेय, शिवकुमार मिश्र रुद्र, वृंदावन लाल वर्मा, यशपाल, धर्मवीर भारती, अमृत लाल नागर आदि की चयनित कथाकृतियों के पाठ का प्रस्ताव रखा। प्रो. प्रभाकर सिंह ने हिंदी उपन्यासों के रचना-विधान पर वैश्वीकरण के प्रभाव को अपने वक्तव्य के केंद्र में रखते हुए बताया कि यह एक तो उपन्यास में विभिन्न विधाओं के शिल्प के प्रवेश के रूप में घटित हुआ, जैसे ‘काशी का अस्सी’ या ‘कलिकथा बाई पास’ में, दूसरे यह विमर्शों की भीड़ में भी उनसे निराक्रांत रहने की अनधीरता में दिखता है, जैसे ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ में और तीसरे ‘मणिकर्णिका’ या ‘मुर्दहिया’ जैसी घोषित रूप से आत्मकथाओं में जो अपने पूरे गठन से अपने उपन्यास होने को दर्ज करती हैं। इसे उन्होंने उपन्यास के केंद्र में न सिर्फ देश, बल्कि एक लघुतर देश जैसे एक मुहल्ले, अस्सी, के आ जाने के रूप में भी रेखांकित किया। डाॅ. इंदीवर ने हिंदी के प्रारंभिक ‘परीक्षा गुरु’, ‘देवरानी-जेठानी’ जैसे उपन्यासों की संरचना के माध्यम से हिंदी उपन्यासों की बनावट-बुनावट के अद्यावधि विस्तार की प्राथमिक रेखाओं को समझने-समझाने की चेष्टा की। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. श्रद्धानंद ने सभी वक्तव्यों के समाहार के साथ ही शिल्प और संवेदना दोनो स्तरों पर हिंदी की उपन्यास-यात्रा में प्रेमचंद की केंद्रीयता के विभिन्न आयामों को स्पष्ट किया।

आयोजन का छठा सत्र 90 के बाद के हिंदी उपन्यासों पर केंद्रित था, जिसकी अध्यक्षता प्रो. अनंत मिश्र ने की। प्रो. सुमन जैन ने ‘ग्लोबल गाँव के देवता’ को बाजारवाद के संकटों से घिरे आदिवासियों की संतप्त कथा के रूप में रेखांकित किया। आज के समय की सबसे बड़ी चिंता पर्यावरण की है, जिसे आदिम समाज बचाए हुए है और सभ्यता की विकास-यात्रा उसी समाज को रोड़ा मानते हुए राह से हटा देने को तत्पर है। प्रो. मानवेंद्र पांडेय ने पूर्वोत्तर भारत के हिंदी उपन्यासों से उपेक्षित रह जाने को प्रश्नांकित करते हुए उसके भूगोल और सामाजिक जीवन में निहित कथा-संभावनाओं की चर्चा की। इसके साथ ही उन्होंने हिंदी के उन विरलप्राय उपन्यासों का भी एक संक्षिप्त सारगर्भित मूल्यांकन प्रस्तुत किया जो पूर्वोत्तर के जनजातीय जीवन से जुड़े हैं, जैसे देवेंद्र सत्यार्थी का ‘ब्रह्मपुत्र’, श्रीप्रकाश मिश्र का ‘जहाँ बाँस फूलते हैं’, ‘देश भीतर देश’ आदि। श्रीप्रकाश मिश्र ने आदिवासियों से जुड़े उपन्यासों की विस्तृत अनुभवजन्य चर्चा की। कहा कि आदिवासी रचनाकार आमतौर पर अपनी पहचान के लिए लिखते हैं जबकि गैरआदिवासी प्रायः किसी राजनीतिक दृष्टिकोण को लेकर चलते हैं। डाॅ. राम सुधार सिंह ने 90 के बाद के उपन्यासों में निहित मुक्ति-चेतना को विशेषतः ‘पहला गिरमिटिया’ और ‘बा’ तथा आनुषंगिक रूप से ‘निर्वासन’, ‘रेहन पर रग्घू’, ‘आखेट’, ‘दस द्वारे का पींजरा’ आदि के आधार पर विवेचित किया। सत्र के अध्यक्षीय वक्तव्य में प्रो. अनंत मिश्र ने सत्र के सभी व्याख्यानों के समाहार के साथ ही बताया कि रचनाकार के शिल्प का निर्माण उसके लेखन से होता है और प्रतिभाशाली लेखक अपनी रचनाओं में शिल्प को लेकर आते हैं। रचनाकार ही है जिसे समाज के अन्याय का अहसास होता है और वह उसकी तरफ इंगिति का साहस भी रखता है, सामर्थ्य भी। इस सत्र का संयोजन डाॅ. साधना भारती ने किया।

सातवें अकादमिक सत्र का विषय था ‘हिंदी उपन्यास और विभिन्न अस्मिताएँ’। इस सत्र की अध्यक्षता प्रसिद्ध कथाकार डाॅ. नीरजा माधव ने की। डाॅ. सुनील कुमार मानस ने स्त्री अस्मिता से जुड़े औपन्यासिक प्रयोगों की चर्चा की। डाॅ. मनु पांडेय ने ‘सूत्रधार’, ‘टोपी शुक्ला’ आदि उपन्यासों के आधार पर हिंदी उपन्यासों की संरचनात्मक व्यवस्था की पहचान की। प्रो. वंदना मिश्र ने ‘यमदीप’, ‘पोस्ट बाॅक्स नंबर 203 नाला सोपारा’, ‘तीसरी ताली’ और ‘गुलाम मंडी’ जैसे उपन्यासों के माध्यम से थर्ड जेंडर संबंधी विमर्श की औपन्यासिक परिणति का मूल्यांकन प्रस्तुत किया। प्रो. भारती गोरे ने स्त्री, दलित और आदिवासी विमर्श की विस्तृत चर्चा करते हुए यह भी कहा कि यदि ये विमर्श केवल विमर्श के नाम पर जिंदा हैं तो यह चर्चा की नहीं, चिंता का विषय है। स्त्री की स्वतंत्रता का मतलब देह की स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में डाॅ. नीरजा माधव ने सांस्कृतिक और भौगोलिक अस्मिताओं का उल्लेख करते हुए विभिन्न अस्मिताओं को लेकर कुछ फैल गए और कुछ फैलाए गए भ्रमों के सोदाहरण निवारण की कोशिश की। रचना के स्तर पर, खास तौर पर थर्ड जेंडर को लेकर, कुछ सुनी-सुनाई बातों के आधार पर कथाओं के गढ़न-पढ़न को उन्होंने प्रश्नांकित किया। उन्होंने कहा कि अस्मिता-विमर्श का मूल उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, तोड़ना नहीं। अपनी विदग्ध टिप्पणियों के साथ इस सत्र का संयोजन प्रो. गोरखनाथ ने किया।

आठवाँ सत्र समापन, संपूर्ति समारोह, स्मृति-संवाद और पुरस्कार-वितरण के रूप में आयोजित हुआ। विद्यानिवास मिश्र स्मृति-संवाद में डाॅ. मुक्ता ने बताया कि पंडित जी उन विभूतियों में थे जो धारा में रहते हुए भी धारा के विपरीत चलने का भी साहस रखते हैं। डाॅ. शशिकला पांडेय ने प्रकृति से उनके लगाव और वात्सल्य भाव की विशेष चर्चा की। मुख्य अतिथि प्रो. गोपबंधु मिश्र ने इस आयोजन के केंद्रीय विषय के शास्त्रीय पक्ष को प्रस्तुत किया, इस तर्क के साथ कि मूल को भूलना स्वयं को भुलावे में रखना है, और यह बात पं. विद्यानिवास मिश्र की उस निबंध-कला से स्थापित होती है जो मौलिक, न कि मूलघ्न चिंतन पर आधारित है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने कहा कि पंडित जी ने कोई उपन्यास भले न लिखा हो, लेकिन अपने निबंधों से जो वैचारिक रसायन उन्होंने उपस्थित किया है वह कथा-प्रबंधों के लिए भी स्पृहा की वस्तु है। उन्होंने हिंदी के पहले वैश्विक उपन्यास के रूप में ‘पहला गिरमिटिया’ की पहचान का आग्रह भी किया।

युवा समवाय के अंतर्गत आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं का पुरस्कार-वितरण भी इस सत्र का एक और आकर्षण था। उपन्यास-समीक्षा पर आधारित आलेखों में प्रथम पुरस्कार श्री धनंजय मलिक को, द्वितीय पुरस्कार डाॅ. गुलजबीं अख्तर को, तृतीय पुरस्कार सुश्री क्षमता मिश्र को, सांत्वना पुरस्कार सुश्री शिखा सिंह को तथा सौहार्द पुरस्कार सुश्री नीमालामा को प्रदान किया गया। कविता के लिए सुश्री कागोमादो को प्रथम, डाॅ. फिरोज को द्वितीय, कविता सरोज को तृतीय, अरशान अजीज और नवोदिता त्रिपाठी को सांत्वना पुरस्कार से तथा निबंध के लिए सुश्री पूजा राय को पुरस्कृत किया गया। इस सत्र के संयोजन का दायित्व डाॅ. धीरेंद्रनाथ चौबे ने निभाया।

इस दो दिवसीय आयोजन में वाराणसी सहित देश के विभिन्न हिस्सों से पधारे सुधीजन की भागीदारी रही। हर वर्ष की तरह पूर्वोत्तर भारत के शोध छात्र-छात्राओं ने इस वर्ष भी आयोजन के विभिन्न उपक्रमों में बढ़-चढ़कर भाग लिया। इस आयोजन को सफल बनाने में इसके विभिन्न आयामों से जुड़े सभी सुधीजन के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए प्रो. गिरीश्वर मिश्र ने कहा कि ऐसे आयोजनों के बहुत सारे प्रयोजन होते हैं, लेकिन यह आयोजन विशुद्ध रूप से साहित्य के लिए है। पंडित. विद्यानिवास मिश्र के जन्मोत्सव के साहित्योत्सव होने में ही उसकी सार्थकता है, और यह सार्थकता इस सारस्वत आयोजन में आप सभी सुधीजन की सहभागिता से है।

दयानिधि मिश्र
सचिव, विद्याश्री न्यास